मानव श्रौतसूत्र  

कृष्णयजुर्वेदीय की मैत्रायणी शाखा के दो श्रौतसूत्र उपलब्ध होते हैं-

  1. मानव श्रौतसूत्र
  2. वाराह श्रौतसूत्र

मानव श्रौतसूत्र का प्रसार–प्रदेश दक्षिण का गोदा नामक भू–भाग है। मैत्रायणी शाखा के ब्राह्मण और आरण्यक पृथक् रूप से उपलब्ध नहीं हैं। मैत्रायणी शाखा से सम्बद्ध मानव श्रौतसूत्र आकार, शैली एवं श्रौत यागों के विशद निरूपण के कारण श्रौत साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखता है।

काल

विद्वानों के अनुसार समग्र श्रौत साहित्य उत्तर वैदिक काल में रचा गया है। ब्रैडले ने अनेक उद्धरणों से यही सिद्ध किया है कि मानव श्रौतसूत्र अथवा मानव गृह्यसूत्र एक ही सूत्रकार की रचनाएँ हैं। मानव श्रौतसूत्र आपस्तम्ब श्रौतसूत्र से पहले की रचना है, क्योंकि आपस्तम्ब श्रौतसूत्र ने यज्ञों के वर्णन में मानव श्रौतसूत्र का अनुकरण किया है। डॉ. रामगोपाल ने कलप–साहित्य की तिथि पर विचार करते हुए मानव श्रौतसूत्र को सूत्रकाल के प्रथम चरण की कृति माना है। यह तथ्य उसकी शैली से भी प्रमाणित है। इसकी शैली ब्राह्मण ग्रन्थों की शैली के सदृश है। इसलिए बहुत सम्भव है कि यह श्रौतसूत्र पाणिनि से पूर्ववर्ती रचना हो। सूत्र–साहित्य के प्रथम चरण में लिखे गए सभी सूत्र–ग्रन्थ पाणिनि से पूर्व संभावित हैं। पाणिनि का समय डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने पाँचवीं शती ईस्वी पूर्व का माना है। अत: मानव श्रौतसूत्र उससे पहले की रचना है।

स्वरूप और प्रतिपाद्य

मैत्रायणी शाखा के कल्प–साहित्य में यह श्रौतसूत्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह श्रौतसूत्र दस भागों में विभक्त है। प्रत्येक भाग अध्यायों, खण्डों एवं सूत्रों के उपविभाजन में विभाजित है।

प्रथम भाग

  • प्रथम भाग की संज्ञा प्राक्सोम है। प्राक्सोम भाग के प्रथम चार अध्यायों में दर्शपौणमास यज्ञ का वर्णन है। यह सभी हविर्यज्ञों की प्रकृति है। इस याग में दो इष्टिओं का मिश्रण है– इन छ: हवियों की समाष्टि को दर्शपौणमास कहते हैं। दर्शेष्टि का सम्पादन अमावस्या तथा पौर्णमास का सम्पादन पूर्णिमा को होता है। इस यज्ञ में अनेकानेक कृत्य होते हैं जिनमें से अधिकांश का वर्णन मानव श्रौतसूत्र में उपलब्ध होता है। इसके प्रमुख कृत्य ये हैं:–
वत्स अपाकरण, बर्हि आहरण, इध्म आहरण, पिण्डपितृ यज्ञ, वेष एवं उपवेष–निर्माण, पवित्र निर्माण, सांय दोह, वाग्यमन, प्रातर्दोह, विहार संस्तरण, पात्राधान, प्रणीता–प्रणयन, हविनिर्माण, वेदि निर्माण, पत्नीलोक स्थापन, पत्नी सन्नहन, आज्याधिश्रयण, प्रस्तर अपादान, परिधि स्थापन, पुरोडाशाभिघारण, सामिधेनी अनुवाचन, आघार, होतृवरण, प्रयाज, आज्यभाग का यजन, आग्नेय पुरोडाश होम, ऐन्द्राग्नपुरोडाश होम, उपांशुयाग, स्विष्टकृत् याग, प्राशित्रहरण, इडाकर्म, दक्षिणा, अनुयाज, सूक्तवाक्, शंयुवाक्, विष्णुक्रम, परिधि होम, पत्नीसंयाज, समिष्टयजुर्होम।

इन कृत्यों में किसी प्रकार की त्रुटि होने पर प्रायश्चित्त का भी विधान है।

  • पाँचवे अध्याय में अग्न्याधान इष्टि का विशद विवेचन है। सत्याषाढ श्रौतसूत्र के अनुसार रथकार भी अग्न्याधान कर सकता है पर मानव श्रौतसूत्र में ऐसा उल्लेख नहीं है। मानव श्रौतसूत्र के अनुसार अग्न्याधान के प्रमुख कृत्य ये है:–
व्रत ग्रहण, अरणी–आहरण एवं यजमान द्वारा उनका ग्रहण, अग्निस्थल निर्धारण, संभार निवपन, अग्नि–मंथन, गार्हपत्य आधान, अक्षिणाग्नि आधान, आहवनीयाग्नि आधान, सभ्य एवं आवसथ्य अग्नियों का आधान, ब्रह्मौदन, अधिदेवन, अग्नि उपस्थान, दक्षिणा, आरम्भणीयेष्टि तथा जय होम आदि।
  • प्राक्सोम के छठे अध्याय में अग्निहोत्र, आग्रयण तथा पुनराधान इष्टियों का वर्णन मिलता है। मानव श्रौतसूत्र के अनुसार प्रात: एवं सांयकालीन अग्निहोत्र का उद्देश्य प्रतिदिन क्रमश: रात्रि एवं दिन में किए गए पापों से मुक्त होना है। विभिन्न कामनाओं में भिन्न–भिन्न पदार्थों की आहुति का विधान है। नित्य अग्निहोत्र में आज्याहुतियाँ ही विहित हैं, क्योंकि आज्याहुतियाँ यज्ञ की आँखें हैं। आग्रयण इष्टि नवीन अन्नों के प्रयोग के पूर्व की जाती है। बसंत में यव तथा शरद् में चावल से आग्रयणेष्टि की जाती है। आग्रयण में अनेकानेक अनुष्ठानों का विधान है। अग्न्याधान के पश्चात् इष्टफल की प्राप्ति न होने पर अथवा किसी प्रकार का विघ्न पड़ जाने पर पुनराधान का नियम है। पुनराधान की पद्धति अग्न्याधान की ही भाँति है। इसी भाग के सातवें अध्याय में चातुर्मास्य इष्टि का निरूपण है। चातुर्मास्य इष्टि मंप चार पर्व होते हैं:–
  1. वैश्वदेव,
  2. वरुण प्रघास,
  3. साकमेध,
  4. शुनासीरीय।

कुछ ग्रन्थों में तो प्रथम तीन पर्व का ही विधान है। इन चारों पर्वों की पाँच सामान्य हवियाँ हैं। इसके साथ ही प्रत्येक पर्व की कुछ विशिष्ट हवियाँ भी हैं। चातुर्मास्य का सम्पादन एक दिन में भी संभव है तथा पाँच दिन में भी। यह ऐष्टिक, पाशुक तथा सौमिक तीन प्रकार का होता है।

  • प्राक्सोम के अंतिम अध्याय में पशुयाग की प्रकृति निरूढ पशुबन्ध का निरूपण है। इसका सम्पादन दो दिन में होता है पर एक दिन में भी संभव है। इस याग में चार प्रमुख ऋत्विजों के अतिरिक्त प्रतिप्रस्थाता तथा मैत्रावरुण नामक दो और ऋत्विक् होते हैं जो क्रमश: होता है तथा अध्वर्यु की सहायता करते हैं।

दूसरा भाग

मानव श्रौतसूत्र के दूसरे भाग में कुल पाँच अध्याय हैं। इन पाँचों अध्यायों में सोमयाग की प्रकृति अग्निष्टोम का वर्णन किया गया है।

तीसरा भाग

तीसरे भाग में एक ही अध्याय है जिसमें इष्टि, सोम तथा पशुयागों से सम्बन्धित प्रायश्चित्तों का वर्णन है।

चौथा भाग

चौथे भाग में भी एक ही अध्याय है तथा इसमें प्रवर्ग्य याग का विस्तृत वर्णन किया गया है। प्रवर्ग्य याग के सम्पादन से यजमान नवीन जीवन प्राप्त करता है। प्रवर्ग्य में प्रयुक्त धर्म को सूर्य से समीकृत किया गया है तथा उसे यश का सिर कहा गया है। गर्म दूध को दिव्य जीवन एवं प्रकाश का प्रतीक माना गया है। मानव श्रौतसूत्र के अनुसार प्रथम ज्योतिष्टोम तथा उक्थ्य के समय प्रजा एवं पशुकामी को प्रवर्ग्य याग नहीं करना चाहिए।

पाँचवा भाग

पाँचवे भाग में दो अध्याय हैं, इसे इष्टि तथा पशुयाग का परिशेष माना जा सकता है, क्योंकि इस प्रकरण में उस प्रसंग में छूटी हुई बातों का वर्णन है। इसी प्रकरण में विभिन्न कामनाओं की पूर्ति के उद्देश्य से की जाने वाली अनेक कामेष्टियों का निरूपण है। उनमें आयुष्कामेष्टि, स्वस्ति कामेष्टि, पुरोधा कामेष्टि, पुत्र कामेष्टि, श्रेष्ठत्व कामेष्टि, वृष्टि कामेष्टि, पशु कामेष्टि, धन कामेष्टि, ब्रह्मवर्चस कामेष्टि तका प्रजा कामेष्टि पुभृति प्रमुख हैं।

छठा भाग

छठा भाग दो अध्यायों में विभक्त है जिसमें अग्निचयन नामक जटिल सोमयाग का विशद निरूपण है। अग्निचयन का अर्थ है– ईंटों के द्वारा उत्तरवेदि पर प्रस्तरों की संरचना करना। वस्तुत: यह अग्नि का संस्कार है और सोमयाग का अंग है। इसमें अनेक कृत्यों का अनुष्ठान आवश्यक है, यथा– उखा संभरण, पांशुक इष्टि, दीक्षणीयेष्टि, गार्हपत्य चयन, नैर्ऋत चयन, महावेदि निर्माण, लोष्ठ चयन, प्रथम चिति, द्वितीय चिति, तृतीय चिति, चतुर्थ चिति, अन्तिम चिति, पुनश्चिति, महाव्रत, अग्निप्रोक्षण, शतरुद्रिय होम, अग्निसिञ्चन, विकर्षण, अग्निसादन, समिधाधान, द्वादश तथा सप्तकपालक पुरोडाशयाग, वसुधारा, राष्ट्रभृत होम, धिष्ण्य निपवन, अन्वारोह आहुति आदि।

सातवाँ भाग

सातवाँ भाग भी दो अध्यायों में विभक्त है। प्रथम अध्याय में स्वराज्य–प्राप्ति की कामना से किए जाने वाले वाजपेय याग का वर्णन है। मानव के अनुसार स्वराज्यकामी ब्राह्मण व क्षत्रिय को शरद ऋतु में इसका अनुष्ठान करना चाहिए। वाजपेय यज्ञ में सत्रह दीक्षा दिवस और तीन उपसद् दिवस होते हैं। दूसरे अध्याय में उभयात्मक–सत्रात्मक तथा अहीनात्मक द्वादशाह तथा गवामयन याग निरूपित हैं।

आठवाँ भाग

आठवें भाग की संज्ञा अनुग्राहिक है। इसे इष्टि, पशु तथा सोम का परिशेष कहा जा सकता है। इसमें कुछ ऐसे भी विषयों का उल्लेख है जिन्हें प्रत्यक्ष रूप से श्रौत याग से सम्बद्ध नहीं किया जा सकता।

नवाँ भाग

नवाँ तथा पाँचवा अवान्तर भागों में विभक्त है जिसमें प्रथम में राजसूय, दूसरे में अश्वमेध, तीसरे में एकाह, चौथे में अहीन और पाँचवें में सत्र यागों का निरूपण है। राजसूय एक जटिल यज्ञ है जिसमें बहुत सी इष्टियाँ पृथक–पृथक् सम्पादित की जाती हैं। यह दीर्घावधि तक चलता है। मानव श्रौतसूत्र के अनुसार राज्यकामी राजा को राजसूय यज्ञ करना चाहिए।

दसवाँ भाग

मानव श्रौतसूत्र के दसवें भाग में शुल्ब सूत्रों का उल्लेख है जिसमें विविध श्रौत यागों में प्रयुक्त होने वाली वेदि–निर्माण प्रक्रिया सविस्तर निरूपित है। हवि, पशु एवं सोम– इन तीनों यज्ञों में पृथक–पृथक् वेदियों का प्रयोग किया जाता है। अग्निहोत्र, दर्शपौर्णमास आदि इष्टियों की वेदि का स्वरूप सरल है। चातुर्मास्य के वरुणप्रघास पर्व में इष्टियों की वेदि के साथ ही एक अतिरिक्त वेदि की आवश्यकता होती है जिसे उत्तरवेदि कहते हैं। स्वतन्त्र पशुयाग की वेदि इष्टियों से जटिल है। अग्निष्टोम आदि सोमयागों की वेदि जटिलतर होती है। इसके अतिरिक्त एक और वेदि होती है जिसका आकार पक्षियों के सदृश होता है तथा रचना जटिलतम होती है।

आधार

इस श्रौतसूत्र का आधार मुख्य रूप से मैत्रायणी संहिता है। अधिकांश यज्ञों में प्रयुक्त संकेतात्मक मन्त्रों का ग्रहण मत्रायणी संहिता से ही किया गया है। परन्तु दोनों के सम्बन्धों पर सूक्ष्म दृष्टि–निक्षेप करने से यह तथ्य प्रकट होता है कि इस श्रौतसूत्रकार ने आधारभूत मैत्रायणी संहिता का अक्षरश: अनुकरण नहीं किया है। मानव श्रौतसूत्र के बहुत से सूत्र उक्त संहिता में नहीं मिलते, क्योंकि दोनों के उद्देश्य, क्षेत्र तथा शैली में मौलिक अंतर है। मानव श्रौतसूत्र में सर्वमेध का वर्णन मिलता है लेकिन कृष्णयजुर्वेदी संहिताओं में इसका निरूपण नहीं किया गया है। मानव श्रौतसूत्र में इसका वैणन शतपथ ब्राह्मण के आधार पर किया गया है। कहीं–कहीं मानव श्रौतसूत्र में शुक्लयजुर्वेद संहिता के मन्त्रों का भी विनियोग मिलता है। इसी प्रकार कहीं–कहीं काठक शाखा के मन्त्रों का विनियोग भी उपलब्ध होता है। कुछ एकाह, अहीन तथा सत्त्र यागों का आधार तैत्तिरीय संहिता, ताण्डय तथा षड्विंश ब्राह्मण भी हैं। अत: मानव श्रौतसूत्र इन ग्रन्थों का ऋणी माना जा सकता है।

शैली

सभी यज्ञों के वर्णन में सम्पादन–काल, हविर्द्रव्य तथा कामना आदि का निर्देश है। विभिन्न वर्णों के लिए भिन्न–भिन्न ऋतुओं तथा भिन्न–भिन्न हविर्द्रव्यों का उल्लेख है। इस श्रौतसूत्र में कहीं–कहीं लम्बे लम्बे वाक्यों का प्रयोग भी दृष्टिगत होता है। यद्यपि यह श्रौतसूत्र प्राचीनतम श्रौतसूत्रों के मध्य परिगणित है, फिर भी इसकी शैली में सूत्रात्मकता, संक्षिप्तता तथा स्पष्टता का कहीं भी अभाव नहीं है। शैली आद्यन्त रोचक तथा प्रवाहपूर्ण है। भाषा सरल तथा प्राञ्जल है। विषय–प्रतिपादन का ढंग सरल है। वाक्य छोटे–छोटे हैं परन्तु उनमें गूढ़ अभिप्राय निहित है। प्राय: प्रत्येक अध्याय का आरम्भ नवीन ढंग से किया गया है। प्रत्येक यज्ञ के प्रथम सूत्र में यज्ञ के प्रयोजन, सम्पादन–काल, अधिकारी, कामना आदि का निर्देश किया है, जिसमें प्रथम सूत्र के पढ़ते ही पूरे अध्याय को पढ़ने की जिज्ञासा होती है। यथास्थान पारिभाषिक शब्दों तथा पात्रों के स्वरूप का भी उल्लेख किया गया है। पूरे दसवें भाग में वेदि–रचना का वर्णन इस श्रौतसूत्र की मौलिक विशेषता है। ग्रन्थ की शैली आदि से अंत तक एक–जैसी है। जहाँ कहीं भी लम्बे वाक्यों का प्रयोग है, वहाँ ब्राह्मण ग्रन्थों का स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है।

निष्कर्ष

संक्षेप में कहा जा सकता है कि इस श्रौतसूत्र का श्रौत साहित्य में विशिष्ट स्थान है। सूत्रकार को श्रौतयागीय परम्पराओं की पूर्ण जानकारी थी। यह श्रौतसूत्र सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। उत्तरवैदिक कालीन सभ्यता, संस्कृति एवं समाज को जानने के लिए इस श्रौतसूत्र का परिशीलन अति आवश्यक है। मैत्रायणी शाखा की याज्ञिक परम्परा को सुरक्षित और अक्षुण्ण बनाए रखने का श्रेय केवल मानव श्रौतसूत्र को ही प्राप्त है। यद्यपि श्रौतसूत्रकार ने यागों के निरूपण में मैत्रायणी संहिता को मुख्य रूप से आधार बनाया है, तथा प्राचीनों के प्रति गौरवबुद्धि रखते हुए मैत्रायणी संहिता में अप्राप्त सर्वमेध, एकाह, अहीनादि यागों का निरूपण करने के लिए मैत्रायणी शाखेतर शाखा की संहिताओं और ब्राह्मण ग्रन्थों का आश्रय भी लिया है।

व्याख्याएँ एवं संस्करण

मानव श्रौतसूत्र के प्राक्सोम भाग पर कुमारिल भट्ट की टीका का संपादन गोल्डस्टकर ने किया है, जो लन्दन से 1861 में छपी है। हस्तलेख रूप में बालकृष्णकृत 'मानव सूत्रवृत्ति' भी उपलब्ध है। 1–5 भागों में फ्रेडरिक क्नायेर (F. Knauer¬) के द्वारा सम्पादित तथा 1900–1903 के मध्य सैंट पीटर्सबर्ग से यह श्रौतसूत्र प्रकाशित है। षष्ठ पाठ का संपादन गेल्डर ने 1919 में किया था। गेल्डर (V. M. Van Gelder) ने ही 1961 में सम्पूर्ण ग्रन्थ को दिल्ली से संपादित कर प्रकाशित कराया है। 1985 में इसी का पुनर्मुद्रण हुआ। चिं. ग. काशीकर ने भी मानव श्रौतसूत्र के सम्पादन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

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