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वैष्णव आन्दोलन  

वैष्णव आन्दोलन उत्तर भारत में विष्णु के दो अवतार राम और कृष्ण के प्रति भक्ति भावना को लेकर चलाया गया भक्ति आन्दोलन था। कृष्ण की बाल लीला और गोकुल की गोपियों और विशेषतः राधा के साथ रासलीला भक्त कवियों का प्रिय काव्य बन गया। इसे आत्मा और परमात्मा के बीच प्रेम के अनेक रूपों के प्रतीक के रूप में उन्होंने प्रयुक्त किया। प्रारम्भिक सूफ़ियों की भाँति ही चैतन्य महाप्रभु ने संगीत मण्डलियाँ जोड़ी और कीर्तन को आध्यात्मिक अनुभूति के लिए प्रयुक्त किया, जिसमें ईश्वर का नाम लेने से बाह्य संसार की सुध नहीं रहती।

विष्णु की श्रेष्ठता

भारत में सबसे प्रमुख देवता थे 'सविता'। इन्द्र और विष्णु उसी के अलग-अलग रूप थे। इन्द्र की कल्पना विष्णु से पहले ही कर ली गयी थी। उनकी प्रतिष्ठा भी विष्णु से अधिक थी। इसलिए विष्णु इन्द्रावरज या इन्द्र के अनुज कहलाते थे। पूजा की दृष्टि से शिव प्राचीनतम हैं। शक्ति या दुर्गा उनकी सहचरी हैं। ब्रह्मा तो वेद के प्रदाता ही हैं। सबसे सम्बन्धित साहित्य था-सौर, ब्रह्म, शैव और देवी या कालिका पुराण। किन्तु 'वैष्णव आन्दोलन' के तेज प्रवाह ने सबको बहा दिया। गुप्त काल में वैष्णव धर्म को राज्य-सम्मान प्राप्त हुआ। पुराणों के नये संस्करण हुए, जिनमें विष्णु को सर्वोपरि ठहराया गया। अवतारों की कल्पना भी इसी प्रकार की गयी कि राम और कृष्ण को विष्णु का पूर्ण अवतार सिद्ध कर दिया गया। कृष्ण की प्रतिष्ठा के लिए महाभारत में द्रौपदी चीरहरण और गोवर्धन-धारण की कथाएँ गढ़ी गयीं और महाभारत में प्रक्षिप्त कर दी गईं। एकलव्य की कथा भी महाभारत के अंशों में है। रामायण के शंबूक और सीता के निर्वासन वाला उत्तरकाण्ड, बालकाण्ड का 80 प्रतिशत भाग और अयोध्या काण्ड का जाबालोपदेश ये सब बाद में रामायण में प्रक्षिप्त किये गये, यद्यपि यह प्रक्षेपण ईसा की प्रारम्भिक सदियों में ही हो गया था।[1]

आन्दोलन की व्यापकता

छठी सती के लगभग 'वैष्णव आन्दोलन' जो एक बार प्रारम्भ हुआ तो वैदिक संहिताओं और गम्भीर दार्शनिक साहित्य को एक किनारे ढकेल कर घर-घर जा पहुँचा और चारों ओर व्याप्त हो गया। शताब्दियों से याज्ञिक क्रियाओं और 'शैव सम्प्रदायों' पाशुपत, कालामुख, लकुलीश, लिंगायत, और शाक्त दर्शन की रुक्षता और नीरसता से त्रस्त समाज किसी ऐसी विचारधारा की तलाश में ही था, जो उसकी कोमल भावनाओं और संवेदनाओं को तृप्ति दे सके। जाति-पांति और ऊँच-नीच की भावना तथा आडम्बरों से मुक्त वैष्णव उपासना तपती बालू पर प्रथम वर्षा जल के समान आयी। यद्यपि वह राम-कृष्ण दोनों को आराध्य मान कर चली थी, फिर भी पलड़ा कृष्ण का ही भारी था। परन्तु राम कथा में काव्यतत्वों की प्रचुरता होने से विवेकशील वर्ग में रामचरित को कहीं अधिक सम्मान मिला।

एकपत्नीव्रत, जनकल्याण और शौर्य के साथ दया, धर्म, विनय आदि में विश्वास रखने वाली जनता ने रामचरित में अपनी-अपनी आयु और स्थिति के अनुसार माता-पिता, बन्धु, सखा, रक्षक, वीर आदि सभी पारिवारिक आदर्शजनों के दर्शन कर लिये। रामायण का कथानक भी अपने में भारत की चारों दिशाओं को समेटे था। केकय जनपद, उत्तर-दक्षिण कोसल, मिथिला प्रदेश, सारा आदिवासी क्षेत्र, नासिक, किष्किन्धा और श्रीलंका का सिंहली भाग नगर और वनवासी जनों का परस्पर मिलन और पश्चात्वर्ती शैव-वैष्णव संघर्ष की पूर्व छाया भी। बस राम की कथा घर-घर में फैल गयी।[1]

भक्त कवियों का योगदान

ऐसा माना जाता है कि चैतन्य महाप्रभु ने वृन्दावन सहित सारे भारत का भ्रमण किया था। वृन्दावन में उन्होंने कृष्ण भक्ति की पुनःस्थापना की। परन्तु, उन्होंने अपना अधिकांश समय गया में व्यतीत किया था। उनका प्रभाव व्यापक था। पूर्वी भारत में तो यह प्रभाव और भी गहरा था। इनके कीर्तनों में हिन्दू और मुसलमान दोनों जाते थे। इनमें निम्न जातियों के लोग भी होते थे। चैतन्य ने धार्मिक ग्रंथों या मूर्तिपूजा का विरोध नहीं किया, लेकिन उन्हें परम्परावादी भी नहीं कहा जा सकता। गुजरात के नरसिंह मेहता, राजस्थान की मीरा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सूरदास और बंगाल तथा उड़ीसा के चैतन्य का लक्ष्य गीति-काव्य और प्रेम की अदभुत ऊँचाई पर पहुँचा, जो वर्ण और जाति की सीमाओं को पार कर गया। ये संत अपने मत में आने के लिए बिना किसी भेद-भाव के सब का स्वागत करते थे। यह चैतन्य के जीवन से एकदम साफ़ हो जाता है। चैतन्य का जन्म 'नदिया' में हुआ था। वहीं उनकी शिक्षा हुई। नदिया उस समय वेदान्तिक तर्कवाद का प्रमुख केन्द्र था लेकिन 22 साल की आयु में चैतन्य की जीवन धारा बदल गई। वे गया गये थे और वहीं उन्होंने एक वैरागी से कृष्ण भक्ति की दीक्षा ली। वे ईश्वर के गहरे नशे में खो गये और निरन्तर कृष्ण का नाम जपने लगे।

ये सब संत हिन्दू धर्म के विशाल ढांचे में ही रहे। उनके दार्शनिक सिद्धांत वेदान्त के अद्धैतवाद कि ही शाखाएँ थीं, जो ईश्वर और उसकी सृष्टि को एक होने पर ही बल देता है। वेदान्त दर्शन पर अनेक विचारकों ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए थे, किन्तु भक्त कवियों को सबसे अधिक प्रभावित करने वाले वेदान्तिक सम्भ्वतः वल्लभ थे। वल्लभ तेलंग ब्राह्मण थे। उनका समय पंद्रहवीं शताब्दी का अंत और सोलहवीं शताब्दी का प्रारम्भ माना जाता है।

मानवीय दृष्टिकोण

इन भक्त कवियों का दृष्टिकोण मानवीय था। उन्होंने उदारतम मानवीय भावनाओं पर बल दिया। ये भावनाएँ थीं प्रेम और प्रत्येक रूप में सुन्दरता। अन्य असाम्प्रदायिकों की भाँति ये भक्ति-कवि भी वर्ण व्यवस्था को भेदने में असफल रहे। फिर भी वे उसे कुछ ढीला करने में सफल हुए, जिससे एकता के लिए एक आधार तैयार हुआ, जिसे बहुत से लोग समझ सकते थे।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 भारतीय संस्कृति संग्रह (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 01 अप्रैल, 2012।

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