भारतीय संस्कृति  

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भारतीय संस्कृति
भारतीय संस्कृति के विभिन्न रूप
विवरण भारतीय संस्कृति भारत के विस्तृत इतिहास, साहित्य, विलक्षण भूगोल, विभिन्न धर्मों तथा उनकी परम्पराओं का सम्मिश्रण है। भारतीय संस्कृति को 'देव संस्कृति' कहकर भी सम्मानित किया गया है।
मुख्य भाषाएँ असमिया, बांग्ला, गुजराती, हिन्दी, कन्नड़, कश्मीरी, मराठी, मलयालम, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलुगु, उर्दू, सिंधी, कोंकणी, मणिपुरी, बोडो, डोगरी, मैथिली, संथाली आदि
साहित्य-दर्शन वेद, उपनिषद, पुराण, गीता, जैन साहित्य, बौद्ध साहित्य, वैशेषिक दर्शन, सांख्य दर्शन, दर्शन शास्त्र, जैन दर्शन, बौद्ध दर्शन आदि
धर्म हिन्दू, इस्लाम, जैन, बौद्ध, पारसी, सिक्ख धर्म, ईसाई
कला स्थापत्य कला, मूर्तिकला, चित्रकला, नृत्यकला, भारतीय संगीत (गायन, वादन)
प्रतीक , तुलसी, गाय, स्वस्तिक, पीपल, सूर्य, दीपक, तिलक, शिवलिंग, कमल, शंख आदि
मुख्य त्योहार दीपावली, रक्षाबंधन, होली, ईद-उल-फ़ितर, लोहड़ी, पोंगल, वैशाखी, विशु, बिहू
उत्सव और मेले कुम्भ मेला, यम द्वितीया, गुरु पूर्णिमा, जगन्नाथ रथयात्रा, खजुराहो नृत्य महोत्सव, अम्बुवासी मेला, पुष्कर मेला आदि
खान-पान भारतीय भोजन (निरामिष एवं सामिष)
मुख्य खेल कबड्डी, शतरंज, हॉकी, क्रिकेट, खो-खो, गुल्ली डंडा, निशानेबाज़ी, कुश्ती, मुक्केबाज़ी आदि

भारत के बहु-सांस्‍कृतिक भण्‍डार और विश्‍वविख्‍यात विरासत के सतत अनुस्‍मारक के रूप में भारतीय इतिहास के तीन हज़ार से अधिक वर्ष की जानकारी और अनेक सभ्‍यताओं के विषय में बताया गया है। भारत के निवासी और उनकी जीवन शैलियाँ, उनके नृत्‍य और संगीत शैलियाँ, कला और हस्‍तकला जैसे अन्‍य अनेक विधाएँ भारतीय संस्‍कृति और विरासत के विभिन्‍न वर्णों को प्रस्तुत करती हैं, जो देश की राष्ट्रीयता का सच्‍चा चित्र प्रस्‍तुत करते हैं। इस खण्‍ड में उन सभी तत्‍वों को शामिल किया गया है जो भारत की संस्‍कृति और विरासत के प्रतीक हैं। भारत की संस्कृति कई चीज़ों को मिला-जुलाकर बनती है जिसमें भारत का लम्बा इतिहास, विलक्षण भूगोल और सिन्धु घाटी की सभ्यता के दौरान बनी और आगे चलकर वैदिक युग में विकसित हुई, बौद्ध धर्म एवं स्वर्ण युग की शुरुआत और उसके अस्तगमन के साथ फली-फूली अपनी खुद की प्राचीन विरासत शामिल हैं। इसके साथ ही पड़ोसी देशों के रिवाज़, परम्पराओं और विचारों का भी इसमें समावेश है। भारतीय संस्कृति विश्व की प्रधान संस्कृति है, यह कोई गर्वोक्ति नहीं, बल्कि वास्तविकता है। हज़ारों वर्षों से भारत की सांस्कृतिक प्रथाओं, भाषाओं, रीति-रिवाज़ों आदि में विविधता बनी रही है जो कि आज भी विद्यमान है और यही अनेकता में एकता भारतीय संस्कृति की महान् विशेषता है।

सिंधु घाटी सभ्यता कालीन बर्तन

800 ई. से 1200 ई. का काल आर्थिक और सामाजिक जीवन तथा धर्म के लिए उपयुक्त है। आर्थिक व्यवस्था, समाज, धार्मिक विश्वास तथा मानव विचार राजनीति से कहीं कम परिवर्तनशील है। इसीलिए ऐसी कई विशेषताएँ जो नौवीं शताब्दी के पूर्व पायी जाती थीं, अभी भी ज़ारी थीं। पर साथ ही कुछ ऐसी भी बातें थीं, जिससे इस काल को पहले के युग से भिन्न माना जाता है। सामान्यतः इस ऐतिहासिक काल में नए तत्वों के साथ पुराने तत्त्व भी विद्यमान रहते हैं, पर परिवर्तन की दिशाएँ भिन्न रहती हैं।

वाणिज्य और व्यापार

उत्तर काल में यह काल सामान्यतः जड़ता तथा ह्रास का काल माना जाता है। इसका मुख्य कारण यह था कि सातवीं शताब्दी और दसवीं शताब्दी के बीच वाणिज्य और व्यापार में गतिरोध आ गया था। इसके परिणामस्वरूप इस क्षेत्र में नगरों तथा नागरिक जीवन का ह्रास हुआ। वाणिज्य और व्यापार में गतिरोध का मुख्य कारण पश्चिम में रोमन साम्राज्य का पतन था। जिसके साथ भारत का बड़े पैमाने पर तथा मुनाफ़े का व्यापार होता था। भारत में कभी भी बड़ी मात्रा में सोने और चाँदी के खनन का काम नहीं हुआ। सोना और चाँदी जिसके लिए भारत विख्यात था, वह भारत के लाभकारी व्यापार के कारण था क्योंकि मुनाफ़े के रूप में यहाँ सोना और चाँदी आते थे। इस्लाम के उदय से भी, जिससे सासानीद (ईरानी) जैसे प्राचीन साम्राज्यों का पतन हो गया, भारत के व्यापार और विशेष कर ज़मीन के रास्ते होने वाले व्यापार पर बहुत असर पड़ा। परिणामस्वरूप उत्तरी भारत में आठवीं और दसवीं शताब्दी के बीच नई स्वर्ण मुद्राओं की बहुत कमी हो गई। पश्चिम एशिया तथा उत्तरी अफ्रीका में विस्तृत और शक्तिशाली अरब साम्राज्य में ऐसे कई क्षेत्र शामिल थे जिनमें बड़ी मात्रा में ख़ानों से स्वर्ण निकाला जाता था। अरब स्वयं भी समुद्र प्रेमी व्यक्ति थे। भारतीय कपड़ों, मसालों तथा लोबान के लिए अमीर अरब शासकों की माँग के कारण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के द्वीपों को मसालों के द्वीप के नाम से जाना जाता था। नौवीं और दसवीं शताब्दी के बीच कई अरब यात्री पश्चिमी तट के नगरों में आए और उन्होंने देश की तत्कालीन स्थिति का विवरण किया है। दसवीं शताब्दी के बाद उत्तर भारत में विदेश व्यापार और वाणिज्य में धीरे-धीरे फिर वृद्धि हुई। व्यापार के इस पुनरुत्थान से सबसे अधिक लाभ मालवा और गुजरात को पहुँचा। गुजरात में चंपानेर और अंकिलेश्वर जैसे कई नगरों की नींव इसी काल में पड़ी। उन दिनों भारत की जनसंख्या दस करोड़ से भी कम थी, अर्थात् आज की तुलना में, छटे हिस्से से भी कम थी। देश का एक बड़ा भाग जंगलों से ढका था जिनमें जंगली पशुओं के अलावा ऐसे क़बीले थे जो राहगीरों को लूट लेते थे। नदियों पर पुल नहीं थे और बरसात के मौसम में सड़कें बहुत ख़राब हो जाती थीं। इन कारणो से उन दिनों यात्रा, चाहे व्यापार हो या फिर शौक़ के लिए, कभी भी खतरे से ख़ाली नहीं थी। सुरक्षा के ध्यान से व्यापारी तथा अन्य लोग कारवों में चलते थे जिसकी सुरक्षा उनके अपने सैनिक करते थे। इसके बावजूद कभी-कभी साहसी लुटेरे उन्हें लूट लेते थे।
बच्चे के साथ महिला, मोन, नागालैंड

उपजातियों का रूप

उस समय की कहानियों की किताबों में यात्रा के ख़तरों का बड़ा रोचक वर्णन मिलता है। गाँवों में जीवन और सम्पत्ति की असुरक्षा से यात्रा और भी कठिन थी और इस कारण भी वाणिज्य और व्यापार का ह्रास हुआ। इससे एक नये समाज का उदय हुआ जिसमें ग्रामीण क्षेत्र आर्थिक दृष्टि से अधिक आत्म-निर्भर होते गए। कुछ लोग समाज के इस विकास को सामंतवाद के विकास के साथ जोड़ते हैं। आंतरिक व्यापार के ह्रास से उत्तर भारत में व्यापार संघ, जिन्हें श्रेणी और संघ कहा जाता था, भी कमज़ोर पड़े। इन व्यापार संघों में अधिकतर विभिन्न जाति के लोग थे पर श्रेणियों के आचरण के अपने नियम थे जो इसके सभी सदस्यों को मानने पड़ते थे। वे पैसों के लेन-देन तथा दान प्राप्त करने का भी अधिकार रखते थे। वाणिज्य और व्यापार के ह्रास के साथ-साथ इन संघों का महत्त्व भी कम हो गया। इस काल में इन संघों द्वारा दान प्राप्त करने की बहुत कम चर्चा उपलब्ध है। कालान्तर में कुछ पुरानी श्रेणियों ने उपजातियों का रूप धारण कर लिया, उदाहरणार्थ - दास, वैश्यों की एक उपजाति बन गया। व्यापारी वर्ग अधिकतर जैन धर्म के समर्थक थे, इसलिए उनके साथ जैन धर्म भी कमज़ोर पड़ गया।

वाणिज्य और व्यापार के ह्रास की झलक इस काल की विचारधारा में भी मिलती है। इस काल में रचित कुछ धर्मशास्त्रों ने विदेश यात्रा को निषिद्ध माना है। उनके अनुसार उस जगह नहीं जाना चाहिए जहाँ मुंज घास नहीं उगती हो और जहाँ काले हिरण विचरण नहीं करते हों। कहने का तात्पर्य यह है कि भारत के बाहर की यात्रा नहीं करनी चाहिए। इनके अनुसार नमकीन समुद्र की यात्रा करने से आदमी दूषित हो जाता है। यह अवश्य था कि इन प्रतिबन्धों को सभी पूरी तरह नहीं मानते थे। भारतीय व्यापारियों, दार्शनिकों, चिकित्साशास्त्रियों तथा हस्तकला विशेषज्ञों के वृत्तान्त मिलते हैं जिन्होंने पश्चिम एशिया में बग़दाद तथा अन्य शहरों की यात्रा कीं। धर्मशास्त्रों का प्रतिबन्ध शायद ब्राह्मणों के लिए ही था या फिर वे इस भय से लगाए गए थे कि कहीं भारतीय बड़ी संख्या में विदेश जाकर ऐसे विरोधी धार्मिक विचार या सामाजिक समानता के विचार भारत में न ले आएँ जो ब्राह्मणों और शासक वर्ग को अमान्य हों।

धर्मशास्त्रों द्वारा समुद्र यात्रा पर प्रतिबन्ध

समुद्र यात्रा पर धर्मशास्त्रों द्वारा लगाए गए प्रतिबन्धों का दक्षिण-पूर्व एशिया तथा चीन के साथ होने वाले व्यापार पर कोई असर नहीं पड़ा। भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के बीच छठी शताब्दी से ही बड़े पैमाने पर व्यापार आरम्भ हो गया था। उस क्षेत्र के देशों का विस्तृत भौगोलिक ज्ञान उस समय के साहित्य में परिलक्षित है। 'हरिसेन' की 'वृहतकथा कोष' जैसी उस काल की किताबों में इस क्षेत्र के पहनावे और भाषाओं आदि के बारे में विस्तृत चर्चा की है। इस क्षेत्र में चमत्कारी समुद्रों में भारतीय व्यापारियों की कई रोमांचकारी कहानियाँ हैं जो बाद में विख्यात 'सिंदबाद की कहानियों' का आधार बनी। अनेक भारतीय व्यापारी इन देशों में बस तक गए और कुछ लोगों ने स्थानीय लोगों से शादी-विवाह भी कर लिया। व्यापारियों के पीछे-पीछे धर्म प्रचारक भी आए और इस प्रकार इस क्षेत्र में बौद्ध तथा हिन्दू धर्मों का प्रादुर्भाव हुआ। जावा में बोरोबोदुर के बौद्ध तथा अंकोरवाट के हिन्दू मन्दिरों से हमें इस क्षेत्र में इन धर्मों के प्रचार के बारे में पता चलता है। इस क्षेत्र के कुछ शासक हिन्दू धर्म से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने भारत के साथ व्यापारिक तथा सांस्कृतिक सम्बन्धों का स्वागत किया। इस प्रकार भारतीय और स्थानीय संस्कृतियों के सम्मिश्रण से नयी सांस्कृतिक और साहित्यिक धाराओं का जन्म हुआ।

जावा और सुमात्रा आदि की यात्रा के लिए मुख्य भारतीय बंदरगाह बंगाल का ताम्रलिप्ति था। इस काल की कई कहानियों में हमें भारतीय व्यापारियों की ताम्रलिप्ति से सुवर्णद्वीप (आधुनिक इंडोनेशिया) और कटाहा (मलाया में केदाह) की यात्रा के लिए रवाना होने की चर्चा मिलती है। जावा के चौदहवीं शताब्दी के एक लेखक के अनुसार वहाँ बड़ी संख्या में जम्बूद्वीप (भारत), कर्नाटक (दक्षिण भारत) तथा गौड़ (बंगाल) के लोग बड़े-बड़े जहाजों में आते थे। इस व्यापार में गुजरात के व्यापारी भी भाग लेते थे।

भारत और चीन का व्यापार

भारत का दक्षिण पूर्व एशिया के साथ व्यापार स्वयं में महत्त्वपूर्ण तो था ही इसके साथ-साथ वह भारत और चीन के व्यापार के लिए केन्द्र का कार्य भी करता था। आमतौर पर चीनी जहाज़ मोलस्का द्वीपों के आगे नहीं आते थे। उधर भारत और चीन के बीच का सड़क मार्ग उस काल में तुर्क, अरब तथा चीनियों के बीच संघर्ष के कारण सुरक्षित नहीं रह गया था। इसके स्थान पर भारत और चीन के बीच का समुद्री मार्ग अधिक महत्त्व का होता जा रहा था। चीन के विदेश व्यापार के लिए वहाँ का प्रमुख बंदरगाह कैटन, या जैसा कि अरब यात्री पुकारते थे, क़ाफु था। भारत से बौद्ध विद्वान् भी समुद्र मार्ग से चीन जाते थे। चीनी इतिहासकारों ने लिखा है कि दसवीं शताब्दी के अंत तथा ग्यारहवीं शताब्दी के आरम्भ में चीनी राजदरबार में जितने भारतीय भिक्षु थे, उतने चीन के इतिहास में पहले कभी नहीं रहे। कुछ और पहले के काल के चीनी वृत्तान्त के अनुसार कैटन नदी भारत, फ़ारस और अरब से आने वाले जहाजों से भरी रहती थी। इसके अलवा कैटन में तीन हिन्दू मन्दिर थे जिनमें भारतीय ब्राह्मण रहते थे। चीनी समुद्र में भारतीयों की उपस्थिति के बारे में हमें जापानी सूत्रों से भी पता चलता है। इनके अनुसार जापान में कपास के परिचय का श्रेय दो भारतीयों को है। जो अपनी समुद्री यात्रा के दौरान लहरों के ज़ोर से ग़लती से जापान पहुँच गए थे। भारतीय शासकों, विशेषकर बंगाल के पाल, सेन तथा दक्षिण के पल्लव और चोल वंश के शासकों ने चीनी सम्राटों के दरबारों में अपने राजदूत भेज कर इस व्यापार को और उत्साहित करने की चेष्टा की। चीन के साथ भारत के व्यापार में बाधा डालने वाले मलाया तथा अन्य पड़ोसी देशों के विरुद्ध चोल शासक राजेन्द्र प्रथम ने अपनी नौसेना भेजी। चीन के साथ व्यापार करने वाले देशों को इतना लाभ होता था कि तेरहवीं शताब्दी में चीनी सरकार ने वहाँ से सोने और चाँदी के निर्यात पर प्रतिबन्ध लगाने की चेष्टा की। धीरे-धीरे भारत का व्यापार अरबों और चीनियों के मुक़ाबले कम होता गया क्योंकि इन व्यापारियों के जहाज़ भारतीय जहाजों से बड़े और अधिक तेज़ थे। कहा जाता है कि चीनी जहाज़ कई मंज़िल होते थे और उनमें चार सौ सैनिकों के अलावा छः सौ यात्री चल सकते थें चीनी जहाजों के विकास में कुतुबनुमा की बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। यह आविष्कार चीन से दसवीं शताब्दी में पश्चिम पहुँचा। अब तक भारतीय विज्ञान तथा तकनीक पीछे पड़ते जा रहे थे।

पश्चिम के साथ भारत का व्यापार दसवीं शताब्दी के बाद ही तेज़ हो सका, पर दक्षिण-पूर्व एशिया तथा चीन के साथ उसका व्यापार बारहवीं शताब्दी तक धीरे-धीरे बढ़ता ही गया। इस व्यापार में भारत तथा बंगाल की मुख्य भूमिका थी। इन क्षेत्रों की सम्पत्ति और समृद्धी का भी यही प्रमुख कारण था।

समाज

भारतीय संस्कृति के विभिन्न दृश्य

इस काल में भारतीय समाज में कई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। इनमें से एक यह था कि विशिष्ट वर्ग के लोगों की शक्ति बहुत बढ़ी जिन्हें सामंत, रानक अथवा रौत्त (राजपूत) आदि पुकारा जाता था। इन वर्गों की उत्पत्ति विभिन्न तरीकों से हुई थी। इनमें से कुछ ऐसे सरकारी अधिकारी थे जिनको वेतन मुद्रा की जगह ग्रामों में दिया जाता था, जिससे ये कर प्राप्त करते थे। कुछ और ऐसे पराजित राजा थे जिनके समर्थक सीमित क्षेत्रों के कर के अभी भी अधिकारी बने बैठे थे। कुछ और वंशागत स्थानीय सरदार या बहादुर सैनिक थे, जिन्होंने अपने कुछ हथियारबन्द समर्थकों की सहायता से अधिकार क्षेत्र स्थापित कर लिया था। इन लोगों की हैसियत भी अलग-अलग थी। इनमें से कुछ केवल ग्रामों के प्रमुख थे और कुछ का अधिकार कुछ ग्रामों पर था और कुछ ऐसे भी थे जो एक सारे क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने में सफल हो सके थे। इस प्रकार इन सरदारों की निश्चित श्रेणियाँ थी। ये अपने अधिकार क्षेत्र को बढ़ाने के लिए आपस में लगातार संघर्ष किया करते थे। ऐसे 'लगान' वाले क्षेत्र[1] जो राजा अपने अधिकारियों या समर्थकों को देता था, वे अस्थायी थे और जिन्हें राजा अपनी मर्जी से जब चाहे, वापस ले सकता था। लेकिन बड़े विद्रोह अथवा विश्वासघात के मामलों में छोड़कर राजा द्वारा ज़मीन शायद ही वापस ली जाती थी। समसामयिक विचारधारा के अनुसार पराजित नरेश की भूमि को भी लेना पाप माना जाता था।

सामंतवादी व्यवस्था

परिणामस्वरूप इस काल के राज्यों में कई ऐसे क्षेत्र शामिल थे जिन पर पराजित अथवा अधीन राजाओं का प्रभुत्व था और वे अपनी स्वाधीनता की घोषणा करने की ताक में लगे रहते थे। इसके अलावा राज्यों के कई क्षेत्रों में ऐसे अधिकारी थे, जो अधीन भूमि को पुश्तैनी जायदाद मानते थे। कालान्तर में इन अधिकारियों का पद भी वंशागत हो गया। बंगाल के एक परिवार से चार पुश्तों के सदस्य महामंत्री थे। इसी प्रकार सरकार के कई पद कुछ ही अधिकारियों के लिए सुरक्षित हो गए। इन वंशागत अधिकारियों ने धीरे-धीरे प्रशासने के कई कार्य अपने हाथों में ले लिए। यह न केवल लगान निर्धारित तथा वसूल करने का कार्य करते थे, बल्कि इन्होंने अधिक से अधिक प्रशासनिक अधिकारियों को भी अपने हाथों में लिया और ये न्यायाधीश भी बन बैठे और अपने ही बल पर ऐसे मामलों में ज़ुर्माना तक करने लगे, जो पहले राजा की ओर से विशेषाधिकार के रूप में दिए गए थे। ये अपने क्षेत्र में पाए गए ख़ज़ानों पर भी अपने अधिकार का दावा करते थे, जबकि क़ायदे से इन पर राजा का अधिकार होना चाहिए था। इन्होंने अपनी भूमि को राजा की अनुमति के बिना अपने समर्थकों के बीच बांट देने के अधिकार को भी स्वयं ही ग्रहण कर लिया। इस प्रकार ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती गई जो ज़मीन पर बिना काम किए ही इससे कमाते थे। ऐसी समाज व्यवस्था को 'सामंतवादी व्यवस्था' कहा जा सकता है। सामंतवादी समाज की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें ऐसे लोग अधिक शक्तिशाली होते हैं जो ज़मीन पर बिना काम किए उस पर अधिकार रखते हैं।

सामंती सरदारों द्वारा सुरक्षा

भारत में सामंतवादी समाज के विकास से बड़े दूरगामी प्रभाव पड़े। इससे राजा की शक्ति कम हो गई और वह ऐसे सामंती सरदारों पर अधिक निर्भर रहने लगा, जिनके पास अपनी स्वयं की सेनाएँ थी, जिनसे वे अपने राजाओं का विरोध कर सकते थे। भारतीय राज्यों की आन्तरिक कमज़ोरी और मतभेद, बाद में तुर्कों से उनके संघर्ष में घातक सिद्ध हुए। ये छोटे राज्य व्यापार को निरुत्साहित करते थे तथा ग्रामों में ऐसी अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करते थे जिससे वे अधिक से अधिक आत्मनिर्भर बन सकें। इन सामंती सरदारों के प्रभाव से ग्राम का स्वशासन भी कमज़ोर हो गया। इसके बावजूद सामंतवादी व्यवस्था के कुछ लाभ भी थे। हिंसा तथा अशान्ति के युग में अधिक शक्तिशाली सामंती सरदारों ने किसानों तथा अन्य लोगों के जीवन तथा उनकी सम्पत्ति को सुरक्षा प्रदान की। जिसके बिना रोज़मर्रा की जीवन बहुत कठिन हो जाता। कुछ सामंतों ने कृषि के विस्तार और विकास में भी रुचि दिखाई।

जीवन स्तर

भारतीय जनजीवन

इस काल में भी भारतीय दस्तकारी तथा खनन कार्य उच्च स्तर का बना रहा तथा कृषि भी उन्नतिशील रही। भारत आने वाले कई अरब यात्रियों ने यहाँ की ज़मीन की उर्वरता और भारतीय किसानों की कुशलता की चर्चा की है। इस काल की सभी साहित्यिक कृतियों में मंत्रियों, अधिकारियों तथा सामंतों की शान-शौक़त तथा दिखावे का वर्णन मिलता है। उन्होंने राजा के रहने के रंग-ढंग की नक़ल की और रहने के लिए तीन से पाँच मंज़िली इमारतें बनवाई। ये चीनी रेशम तथा आयातित ऊन से बने विदेशी कपड़े पहनते थे तथा बहूमूल्य जवाहरातों और सोने-चाँदी के आभूषण धारण करते थे। इनके घरों में बड़ी संख्या में स्त्रियाँ होती थीं और उनकी देख-रेख के लिए उतनी ही संख्या में घरेलू नौकर होते थे। ये जब भी बाहर जाते थे तो इनके साथ पूरा क़ाफ़िला चलता था। ये 'महासामंतरधिपति' जैसी बड़ी-बड़ी पदवियाँ स्वयं ग्रहण कर लेते थे और व्यक्तिगत प्रतीक के रूप में झण्डे, नक़्क़ाशी की हुई छतरियाँ तथा चंवर रखते थे। उस समय की एक कृति में एक राजकीय अधिकारी के युवा-पुत्र का वर्णन है, जो राजकीय अधिकारियों तथा छोटे सामंतों के वर्ग का प्रतीक माना जा सकता है। इस कृति में उसका वर्णन करते हुए कहा गया है कि वह विशेष प्रकार की अंगूठियाँ तथा कुंडल धारण करता है और गले में सोने की जंजीर पहनता है। वह अपने शरीर पर कस्तूरी लगा कर रखता है। जिससे उसमें पीलापन आ जाता है। उसके जूते भी नक्क़ाशीदार हैं तथा उसके वस्त्र कस्तूरी रंग से रंगे हुए हैं जिनमें सोने का बॉर्डर है। जब भी वह आम जनता के बीच आता है, उसके साथ कई सेवक चलते हैं जिनमें से पाँच छः हथियारबन्द होते हैं तथा एक सेवक के हाथ में पानदान रहता है।

रहन-सहन

राजा के रहन-सहन के ढंग की नक़ल बड़े व्यापारियों ने भी की। चालुक्य सम्राट के एक कोटीश्वर व्यापारी के बारे में कहा गया है कि उसके भवन के ऊपर बड़े-बड़े झण्डे फहराते थे जिनमें घण्टियाँ लगी रहती थी तथा उसके पास बड़ी संख्या में हाथी और घोड़े थे। उसके मुख्य भवन में जाने के लिए स्फटिक की सीढ़ियाँ थीं। उसके मन्दिर में भी स्फटिक का फ़र्श और स्फटिक की दीवारें थीं, जिन पर कई धार्मिक चित्र बने हुए थे। मन्दिर में प्रतिष्ठापित प्रतिमा भी स्फटिक की थी। गुजरात के वस्तुपाल तथा तेजपाल नामक मंत्रियों के बारे में कहा जाता है कि वे अपने समय के सबसे धनी व्यापारी थे। ऐसा नहीं था कि चारों तरफ समृद्धि और खुशहाली छाई थी। अनाज सस्ता अवश्य था लेकिन इसके बावजूद शहरों में ऐसे ग़रीब लोग थे जिनको भरपेट खाना भी नहीं मिल पाता था। राजतरंगिनी[2] के लेखक के मन में इन्हीं लोगों की बात है, जब वह हमें बताता है कि एक ओर दरबारी लोग भुना गोश्त खाते थे और ठण्डी और सुगन्धित शराब पीते थे तो दूसरी ओर आम आदमी को चावल तथा उत्पलसेक[3] से सन्तोष कर लेना पड़ता था।

सामंतों द्वारा लगान वसूली

इस समय के निर्धन लोगों के विषय में कई कहानियाँ मिलती हैं। कई लोग ग़रीबी से तंग आकर डाकू तथा लुटेरे बन जाते थे। जहाँ तक ग्रामों का सवाल है, जिनमें अधिकतर आबादी बसती थी, हमें किसानों के जीवन के बारे में साहित्यिक कृतियों तथा भूमि अनुदान से सम्बन्धित अभिलेखों से पता चलता है। धर्मशास्त्रों के व्याख्याकारों के अनुसार, पहले की तरह लगान की दर अभी भी कुल उत्पादन का छठा हिस्सा थी। लेकिन कुद अनुदानों से हमें पता चलता है कि इसके अलावा भी कई प्रकार के कर थे। जैसे तालाब-कर और चारागाह-कर। किसानों को निर्धारित लगान के अलावा ये कर भी देने पड़ते थे। कुछ अनुदानों से ज़मीन के मालिक को यह अधिकार मिल जाता था कि वह उस ज़मीन पर उचित अथवा अनुचित अर्थात् अपनी इच्छा से कर लगा सकता था जो ग़रीब किसानों को लगान के अलावा चुकाना ही पड़ता था। किसानों को बेगार भी करनी पड़ती थी। मध्य भारत तथा उड़ीसा के कुछ मामलों में तो हम पाते हैं कि मध्ययुगीन यूरोप के कृषि दासों की भाँति यहाँ भी गाँवों के साथ-साथ वहाँ बसे हुए किसान, चरवाहे तथा दस्तकार भी दान में दे दिये जाते थे। साहित्यिक कृतियों में हमें ऐसे सामंतों के बारे में पढ़ने को मिलता है जो पैसा वसूलने का कोई भी मौक़ा चूकते नहीं थे। बताया जाता है कि राजपूत सरदार तो बटेरों, मृत पक्षियों, सूअर की लीद तथा मृत व्यक्तियों के क़फ़न से भी पैसा बनाया करते थे। एक अन्य सामंत की चर्चा है कि जिसके अत्याचारों से त्रस्त होकर गाँव की सारी की सारी आबादी ने गाँव को ही छोड़ दिया था।
भारत के सांस्कृतिक परिधान

सरदारों के ये अत्याचार तो थे ही फिर इसके ऊपर युद्ध और बाढ़ का प्रकोप भी था। युद्ध में नहरों और तालाबों को तोड़ देना, गाँव के गाँव ही जला देना, ज़बर्दस्ती सारे अनाज और सारे पशुओं को क़ब्ज़े में कर लेना आम बात थी। यहाँ तक कि सामंतवादी व्यवस्था के लेखकों ने इस प्रकार के कार्यों को उचित माना है।

वर्ण व्यवस्था

पहले से चली आ रही वर्ण व्यवस्था इस युग में भी क़ायम रही। स्मृतियों के लेखकों ने ब्राह्मणों के विशेषाधिकारों के बारे में बढ़ा-चढ़ा कर तो कहा ही, शूद्रों की सामाजिक और धार्मिक अयोग्यता को उचित ठहराने में तो वे पिछले लेखकों से कहीं आगे निकल गए। एक लेखक, पराशर के अनुसार शूद्र के साथ भोजन, उसके साथ मिलना-जुलना, शूद्र के साथ एक ही आसन पर बैठना तथा शूद्र से शिक्षा ग्रहण करना ऐसे कार्य हैं जो उच्चतम व्यक्ति का नीच बना देते हैं। यहाँ तक की शूद्रों की छाया तक दूषित थी। यह कहना कठिन है कि स्मृतियों के रचनाकारों के विचारों का व्यावहारिक जीवन में कितना पालन किया जाता था, पर इसमें कोई संदेह नहीं कि नीची समझी जाने वाली जातियों की इस काल में स्थिति और भी ख़राब हो गयी। अंतर्जातीय विवाह को भी नीची दृष्टि से देखा जाता था। यदि कोई उच्च जाति पुरुष निम्न जाति की स्त्री से विवाह करता था तो उसके बच्चों की जाति माँ की जाति के अनुसार तय की जाती थी। इसके विपरीत यदि उच्च कुल की स्त्री नीच कुल के पुरुष से विवाह करती थी तो बच्चे की जाति बाप की जाति से तय की जाती थी। समसामयिक लेखकों ने उस समय की कई जातियों की चर्चा की है। जिनमें कुम्हार, बुनकर, सुनार, संगीतज्ञ, नाई, चमार, ब्याध तथा मछेरे शामिल थे। इनमें से कुछ ने तो अपने रोजग़ार के हिसाब से संघ बना लिए थे, पर उनकी गिनती भी एक जाति के रूप में ही होती थी। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि स्मृति लेखकों ने दस्तकारी को नीच जाति को पेशा माना है। इस प्रकार अधिकतर मज़दूर और भोलों जैसे आदिवासी, अछूतों की श्रेणी में गिने जाने लगे थे।

राजपूतों का उदय

इस युग में हमें एक नयी जाति, राजपूतों की चर्चा भी मिलती है। राजपूतों की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में बड़ा मतभेद है। कई राजपूत अपने को महाभारत के सूर्य वंश और चन्द्र वंश के क्षत्रियों का वंशज मानते थे। कुछ और अपनी उत्पत्ति का स्रोत उस यज्ञ को बताते थे जो ऋषि वसिष्ठ ने आबू पहाड़ पर किया था। किन्तु आबू यज्ञ का उल्लेख हमें पहली बार सोलहवीं शताब्दी में मिलता है। इन कथाओं से हम केवल इतना निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि विभिन्न राजपूत वंशों की उत्पत्ति विभिन्न प्रकार से हुई थी। कुछ विद्वान, जिनमें विदेशी भी शामिल हैं, यह मानते हैं कि कुछ राजपूत वंशों की उत्पत्ति उन हूण और सीथियाई लोगों से हुई होगी जो हर्ष के काल के बाद भारत में बस गए। कुछ अन्य वंशों की उत्पत्ति भारतीय क़बीलों से ही हुई। विभिन्न कालों में क्षत्रियों के अलावा ब्राह्मण तथा वैश्य वंशों ने भी शासन किया। ऐसा प्रतीत होता है कि कालान्तर में शासन करने वाले सभी वंशों को एक जाति का माना जाने लगा और ये 'राजपूत्र' अथवा 'राजपूत' कहे जाने लगे और क्षत्रिय वंश में शामिल हो गए।

खाना बनाती ग्रामीण महिला, गुजरात

यह स्पष्ट है कि जातियों का वर्गीकरण इतना पक्का नहीं था, जैसा कि आम तौर पर माना जाता है। विभिन्न दल अथवा व्यक्ति उच्च वर्ग की सदस्यता हासिल कर सकते थे, वे नीची जाति में गिर भी सकते थे। इसका एक उदाहरण हमें कायस्थ जाति में मिलता है। जिसका वर्णन सबसे पहले इसी काल में मिलता है। आरम्भ में विभिन्न जातियों, जिनमें ब्राह्मण और शूद्र भी शामिल थे, के ऐसे लोग जो राजघरानों में काम करते थे, उन्हें 'कायस्थ' कहा जाता था। कालान्तर में इन्हीं की एक विशिष्ट जाति बन गई। इस काल में हिन्दू धर्म का प्रसार बहुत तेज़ी से हुआ। कई बौद्ध और जैनियों के अलावा कई विदेशी तथा भारतीय क़बीले हिन्दू धर्म में एकात्म हो गए। समय के साथ नये वर्गों ने, विभिन्न जातियों और उपजातियों का रूप धारण कर लिया। पर उन्होंने विवाह, अपने विशिष्ट देवी-दवताओं की पूजा तथा अन्य त्योहारों को मनाना जारी रखा। इस प्रकार धर्म और समाज व्यवस्था अधिक जटिल होती चली गई।

स्त्रियों की स्थिति

पहले की तरह इस काल में भी स्त्रियों को मानसिक स्तर पर नीचा माना जाता था। इनका कर्तव्य मूलतः बिना कुछ सोचे समझे अपने पति की आज्ञा का पालन था। एक लेखक ने स्त्री के अपने पति के प्रति कर्तव्य के बारे में कहा है कि उसे अपने पति के पैरों को धोना चाहिए और नौकर की तरह उसकी पूरी सेवा करनी चाहिए, लेकिन उसने पति के कर्तव्य के बारे में भी कहा है कि उसे धर्म के पथ पर चलना चाहिए और अपनी पत्नी के प्रति घृणा तथा ईर्ष्या के भाव से मुक्त रहना चाहिए। मत्स्य पुराण में ग़लत राह पर चलने वाली पत्नी को पति के द्वारा[4] रस्सी या बेंत से मारने के अधिकार दिए गए हैं। स्त्रियाँ अभी भी वेदों के अध्ययन के अधिकार से वंचित थी। इसके अलावा स्त्रियों के विवाह की उम्र भी बहुत कम कर दी गई थी। जिससे उन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिल ही न सके। इस काल की पुस्तकों में महिला शिक्षकों की कोई चर्चा नहीं है। जिससे स्त्रियों के उच्च शिक्षा से वंचित रहने के बारे में पता चलता है। लेकिन इसी काल के नाटकों में हमें रनिवास की ऐसी महारानी तथा उनकी दासियों का हवाला मिलता है जो संस्कृत और प्राकृत में अच्छी काव्य रचना कर सकती थीं। कई कहानियों में, ललित कलाओं, विशेषकर संगीत और चित्रकला में, उनकी दक्षता का वर्णन मिलता है। उच्च अधिकारियों की लड़कियाँ, गणिकाएँ तथा वेश्याएँ भी विभिन्न कलाओं, विशेषकर काव्य में पारंगत होती थी।

पुनर्विवाह

विवाह के बारे में स्मृतियों में कहा गया कि माँ-बाप को अपनी लड़कियों का विवाह छः और आठ वर्ष से बीच की आयु, अर्थात् यौवनारम्भ, के पहले ही कर देना चाहिए। पति द्वारा पत्नी के त्याग[5], उसकी (पति की) मृत्यु, उसके द्वारा सन्न्यास ग्रहण, समाज द्वारा बहिष्कार तथा उसके नपुंसक होने जैसी कुछ विशेष स्थितियों में स्त्री को पुनर्विवाह की स्वीकृति थी। आम तौर पर औरतों को भरोसे लायक़ नहीं समझा जाता था। उनको अलग कर रखा जाता था और उन परिवार के पुरुष सदस्यों, पिता, भाई, पति, पुत्र आदि का नियंत्रण रहता था। लेकिन घर के अन्दर उनको आदर अवश्य ही दिया जाता था। यदि कोई पुरुष अपनी पत्नी का त्याग करता था तो भले ही वह दोषी क्यों न हो, उसे पत्नी को रहन-सहन का खर्चा देना ही पड़ता था। भूमि पर व्यक्तिगत अधिकारों के बढ़ने के साथ स्त्री के सम्पत्ति-अधिकार भी बढ़ते गए। परिवार की सम्पत्ति को बनाए रखने के लिए स्त्री को पुरुष सदस्य की सम्पत्ति के अधिकार भी दिए गए। यदि बिना पुत्र प्राप्ति के किसी पुरुष की मृत्यु हो जाती थी तो कुछ मामलों में छोड़कर उसकी पत्नी को अपने पति की सारी जायदाद का अधिकार मिल जाता था। किसी विधवा की सम्पत्ति पर उसकी लड़कियों का अधिकार भी हो सकता था। इस प्रकार सामंतवादी व्यवस्था से निजी सम्पत्ति के अधिकार की धारणा मज़बूत हुई।

घाघरा पहने हुए महिलायें

इस काल के कुछ लेखकों ने सती प्रथा को आवश्यक माना, पर कुछ औरों ने इसकी आलोचना की। अरबी लेखक सुलेमान के अनुसार राजा की मृत्यु पर उसकी रानियाँ उसके साथ सती हो जाती थीं। पर यह स्वयं उनकी इच्छा पर निर्भर करता था। ऐसा लगता है कि सामंतों द्वारा कई स्त्रियों के रखने और सम्पत्ति पर बढ़ते हुए झगड़ों के साथ सती की प्रथा भी बढ़ी।

पहनावा, भोजन, मनोरंजन

गुजराती खाने से सजी हुई थाली

इस काल में पुरुषों और स्त्रियों के पहनावे में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ। पहले की तरह अब भी पुरुष आम तौर पर धोती तथा स्त्रियाँ साड़ी पहनती थीं। इसके अतिरिक्त उत्तर भारत में पुरुष जैकेट तथा स्त्रियाँ चोली पहनती थीं। उस समय की मूर्तियों को देखने से पता चलता है कि उत्तरी भारत में उच्च वर्ग के लोग लम्बे कोट, पैंट तथा जूते पहनते थे। राजतरंगिनी के अनुसार हर्ष ने कश्मीर में राजसी पहनावे का प्रचलन आरम्भ किया। इसमें एक लम्बा कोट शामिल था। बताया जाता है कि राजा अपने मंत्री पर इसलिए नाराज़ हो गया क्योंकि मंत्री ने छोटा कोट पहन रखा था। जाड़े में ऊनी कम्बलों का इस्तेमाल किया जाता था। यद्यपि आमतौर पर सूती कपड़ों का ही इस्तेमाल होता था। उच्च वर्ग के लोग रेशम तथा मलमल के कपड़े भी पहनते थे। अरब यात्रियों के अनुसार पुरुष और स्त्रियाँ, दोनों ही आभूषणों के शौक़ीन थे। वे सोने के कड़े और कानों में कभी-कभी क़ीमती पत्थरों के झुमके पहनते थे। चीनी लेखक 'चाऊ जू क्वा' हमें बताते हैं कि गुजरात में पुरुष तथा महिलाएँ दोनों, कानों में झुमके अथवा कुण्डल पहनते थे। वे ढीले ढाले वस्त्र धारण करते थे और उनके सर ढके रहते थे। पांवों में लाल रंग के जूते पहनते थे।

स्वर्णाभूषणों का प्रचलन

एक और प्रसिद्ध यात्री मार्कोपोलो बताता है कि मालाबार में पुरुष तथा महिलाएँ, यहाँ तक की वहाँ का राजा भी बस कमरे में कपड़ा बाँध कर रहता था और दर्ज़ी के पेशे से लोग अनजान थे। ऐसी ही वेशभूषा कुइलौन में भी प्रचलित थी। यद्यपि कपड़े कम पहने जाते थे, दक्षिण के नरेश आभूषणों के बड़े शौक़ीन थे। चाऊ जू क्वा के अनुसार मालाबार का नरेश अपनी प्रजा की तरह कमर में बस कपड़ा बाँधता था और नंगे पैर रहता था। लेकिन जब वह हाथी पर शोभा यात्रा में निकलता था तब मोती-जवाहरातों से जड़ा स्वर्ण मुकुट धारण करता था, तथा हाथों और पांवों में स्वर्णाभूषण पहनता था। मार्कोपोलो के अनुसार राजा स्वर्ण और क़ीमती पत्थरों के जो गहने पहनता था, उनकी क़ीमत एक पूरे शहर की क़ीमत से अधिक थी। जहाँ तक भोजन का सवाल है, यद्यपि अधिकतर क्षेत्रों में लोग शाकाहारी थे, उस समय के प्रमुख स्मृति लेखक ने विस्तार में उन अवसरों की चर्चा की है जब माँस खाना उचित माना जाता था। इससे ऐसा लगता है कि मोर, घोड़े तथा जंगली सूअर और मुर्ग का माँस उचित भोज्य-पदार्थ समझा जाता था। आश्चर्य की बात है कि उस समय की एक पुस्तक में म्लेच्छ भोजन को गेहूँ का पर्यायवाची शब्द बताया गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि उस समय तक गेहूँ को भारत में आम भोज्य पदार्थों में शामिल नहीं किया गया था।

धोती-कुर्ते में लड़के

अरब लेखकों ने इस बात की प्रशंसा की है कि भारत में नशीले पदार्थों का सेवन नहीं होता था। इस काल की साहित्यिक कृतियों में हमें शराब पीने की चर्चा मिलती है। कुछ समय वर्गों में विवाह-भोज और त्योहारों के अवसरों पर शराब पीना बहुत लोकप्रिय था। यहाँ तक की राजा के साथ रहने वाली औरतें भी खुल कर शराब पीती थीं। कुछ स्मृतियों में तीन उच्च वर्गों में शराब पर पाबंदी लगाई गई है। लेकिन कुछ स्मृतियों में शराब को केवल ब्राह्मणों के लिए निषिद्ध बताया गया है और कुछ अपवादों को छोड़कर क्षत्रिय और वैश्यों को इसकी स्वीकृति दी गई है। समसामयिक साहित्य से लगता है कि नगरों के निवासी मनोरंजन-प्रिय थे। मेले और त्योहारों के अलावा तैराकी तथा बग़ीचे में घूमना बहुत लोकप्रिय था। भेड़ों, मुर्ग़ों और अन्य जानवरों के बीच लड़ाई तथा कुश्ती जनसाधारण के मनोरंजन के प्रिय साधन थे। उच्च श्रेणी के लोगों में शिकार तथा जुआ बड़े प्रचलित थे और एक विशेष प्रकार के 'चौगान' को राजसी खेल माना जाता था।

शिक्षा और ज्ञान

शिक्षा के क्षेत्र में पहले से लेकर अब तक जो विकास हुआ था, वही परिपाटी बिना अधिक परिवर्तन के इस काल में भी क़ायम रही। उन दिनों सामूहिक शिक्षा की धारणा ने जन्म नहीं लिया था और लोग वही सीखते थे जो उनके जीवन यापन के लिए आवश्यक था। पढ़ना-लिखना कुछ ही लोगों में सीमित था। जिनमें अधिकतर ब्राह्मण या उच्च वर्ग के लोग थे। गाँव में पढ़ना लिखना वहाँ का ब्राह्मण सिखाता था। बच्चे अधिकतर मन्दिरों में पढ़ते थे जो भूमि-अनुदान पर निर्भर करते थे। ज्ञानी ब्राह्मणों को भूमि दान में देना धार्मिक कृत्य माना जाता था। उस काल के ताम्रपत्र, जिन पर ऐसे दान का उल्लेख है, हमें बड़ी संख्या में प्राप्त हैं जिनसे हमें पता चलता है कि इस प्रकार के अनुदान काफ़ी प्रचलित थे। कभी-कभी मन्दिरों की और से ही उच्च शिक्षा का प्रबंन्ध कर दिया जाता था। आमतौर पर उच्च शिक्षा के प्रारम्भ के लिए विद्यार्थी को अपने शिक्षक के घर जाकर उसी के साथ रहना पड़ता था। ऐसे मामले में उसे अपने शिक्षक को फ़ीस देनी पड़ती थी या फिर अपनी शिक्षा के अन्त में वह शिक्षक को गुरुदक्षिणा देता था। ऐसे विद्यार्थी जो ग़रीबी के कारण फ़ीस नहीं दे सकते थे, वे गुरुदक्षिणा गुरु की सेवा के रूप में चुकाते थे। शिक्षा के मुख्य विषय वेद तथा व्याकरण थे। यद्यपि बच्चे को अक्षर ज्ञान के साथ गणित भी सिखाया जाता था। उन दिनों भारतीयों की दिलचस्पी विज्ञान में बहुत कम हो गई थी। इस काल में हमें शल्यचिकित्सा का विवरण नहीं मिलता। पुलों तथा बाँधों का निर्माण निम्न श्रेणी का काम माना जाता था। ऐसा इसलिए था कि इस समय तक शारीरिक श्रम को हेय दृष्टि से देखा जाता था। किसी कार्य के प्रशिक्षण की ज़िम्मेदारी आम तौर पर संघों तथा कुछ परिवारों पर थी। उदाहरण के लिए एक व्यापारी द्वारा अपने पुत्र को प्रशिक्षित करने का हमें विस्तृत ब्यौरा मिलता है। विज्ञान में उच्च प्रशिक्षण तथा अन्य प्रकार की उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए यात्रा को प्रोत्साहित किया जाता था। एक लेखक ने कहा है कि वे लोग जो दूसरे देशों के पहनावे, रहन-सहन और उनकी भाषा का अध्ययन नहीं करते वे बिना सींग वाले बैलों के समान हैं। फिर भी भारत के अन्दर भी यात्रा ख़राब सड़कों और चोर-डाकुओं के भय से अत्यन्त सीमित रहती होंगी। इसके अलावा कोई साधन-सम्पन्न व्यक्ति ही यात्रा पर जा सकता था।

शिक्षा के केंद्र बौद्ध विहार

उच्च शिक्षा में धार्मिक विषयों के अलावा अन्य विषय भी शामिल थे, और इसका केन्द्र बौद्ध विहार ही था। इनमें से सबसे प्रसिद्ध, बिहार का नालन्दा विश्वविद्यालय था। अन्य शिक्षा के प्रमुख केन्द्र विक्रमशिला और उद्दंडपुर थे। ये भी बिहार में ही थे। इन केन्द्रों में दूर-दूर से, यहाँ तक की तिब्बत से भी, विद्यार्थी आते थे। यहाँ शिक्षा नि:शुल्क प्रदान की जाती थी। इन विश्वविद्यालयों का खर्च शासकों द्वारा दी गई मुद्रा और भूमि के दान से चलता था। नालन्दा को दो सौ ग्रामों का अनुदान प्राप्त था।

शिक्षा का एक अन्य प्रमुख केन्द्र कश्मीर था। इस काल में कश्मीर में शैव मत तथा अन्य मतावलंबी शिक्षा केन्द्र थे। दक्षिण भारत में मदुरई तथा श्रृंगेरी में भी कई महत्त्वपूर्ण मठों की स्थापना हुई। इन केन्द्रों में प्रमुख रूप से धर्म तथा दर्शन शास्त्र पर विचार-विमर्श होता था। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित मठों और शिक्षा केन्द्रों के कारण विचार विनिमय आसानी और शीघ्रता से देश के एक भाग से दूसरे भाग तक हो सकते थे। किसी दर्शन शास्त्री की विद्या उस समय तक पूर्ण नहीं मानी जाती थी जब तक वह देश के विभिन्न भागों में जाकर वहाँ के लोगों से शास्त्रार्थ न करता हो। इस तरह देश में विचारों के मुक्त और शीघ्रतापूर्ण आदान-प्रदान से भारत की सांस्कृतिक एकता को बहुत बल मिला, लेकिन इसके बावजूद इस काल में शिक्षित वर्ग का दृष्टिकोण अधिक संकीर्ण होता गया। वे नये विचारों का प्रतिपादन अथवा उसका स्वागत करने के स्थान पर केवल अतीत के ज्ञान पर ही निर्भर करते थे। वे भारत के बाहर पनपने वाले वैज्ञानिक विचारों से भी स्वयं को अलग रखते थे। इस प्रवृत्ति की झलक हमें मध्य एशिया के प्रसिद्ध वैज्ञानिक और विद्वान् अलबेरूनी की रचनाओं में मिलती है। अलबेरूनी ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में क़रीब दस वर्षों तक भारत में रहा। यद्यपि वह भारतीय ज्ञान और विज्ञान का प्रशंसक था, उसने यहाँ के शिक्षित वर्गों और विशेषकर ब्राह्मणों की संकीर्णता की चर्चा भी की हैः- 'ये घमण्डी, गर्वीले, दंभी तथा संकीर्ण प्रवृत्ति के हैं। ये प्रवृत्ति से ही अपने ज्ञान को दूसरों को बाँटने के मामले में कंजूस हैं और इस बात का अधिक से अधिक ख्याल रखते हैं कि कहीं और कोई जात के किसी आदमी, विशेषकर किसी विदेशी को उनका ज्ञान नहीं मिल जाए। उनका विश्वास है कि उनके अलावा और किसी को भी विज्ञान का कोई ज्ञान नहीं है।' ज्ञान को ही कुछ लोगों तक सीमित रखने की उनकी इस प्रवृत्ति तथा घमण्ड के कारण तथा किसी और स्रोत से प्राप्त ज्ञान को तुच्छ समझने के कारण भारतवर्ष इस मामले में पिछड़ गया। कालान्तर में उसे इस प्रवृत्ति का बहुत बड़ा मूल्य चुकाना पड़ा।

धार्मिक विचार

इस काल में बौद्ध और जैन धर्म का ह्रास हुआ, यद्यपि दक्षिण भारत में जैन धर्म का प्रभाव दसवीं शताब्दी तक बना रहा। इसी काल में बौद्ध धर्म अपने जन्म के देश में समाप्त प्रायः हो गया पर हिन्दू धर्म का पुर्नजागरण और उसका विस्तार हुआ। इसने अनेकों रूप अपनाए जिसमें सबसे प्रमुख शिव और विष्णु की लोकप्रियता थी। इन देवों की पूजा को प्रमुख मानते हुए कई सम्प्रदाय उठ खड़े हुए पर बौद्ध और जैन धर्म के सिद्धांतों को चुनौती दी गई।

कालान्तर में शिव तथा विष्णु प्रमुख देवता बन गए और सूर्य, ब्रह्मा आदि की लोकप्रियता कम हो गई। पूर्वी भारत में पूजा की एक नई विधि का विकास हुआ। यह शक्ति पूजा थी जिसमें स्त्री शक्ति को सृष्टि का आधार सिद्धांत माना गया। इस प्रकार बौद्धों ने अतीत के बोधिसत्वों की पत्नी के रूप में तारा तथा हिन्दुओं ने दुर्गा और काली की पूजा शुरू की, जिन्हें शिव की पत्नियाँ बताया गया।

बौद्ध धर्म का प्रतीक

इस काल में बौद्ध धर्म का प्रभाव पूर्वी भारत तक सीमित रहा। बंगाल के पाल शासक बौद्ध धर्म को मानने वाले थे। दसवीं शताब्दी के बाद उनके पतन से बौद्ध धर्म को भी धक्का पहुँचा। लेकिन इससे ज़्यादा गम्भीर बौद्ध धर्म के आंतरिक मतभेद थे। बुद्ध ने स्वयं एक व्यावहारिक दर्शन का प्रसार किया था। जिसमें पुजारी वर्ग की भूमिका न्यूनतम थी तथा ईश्वर तथा उसके अस्तित्व के बारे में अधिक अटकलबाज़ी की गुंजाइश नहीं थी। ईस्वीं युग के आरम्भ की शताब्दियों में महायान मत का विकास हुआ, जिसमें बुद्ध को ईश्वर के रूप में पूजा जाता था। धीरे-धीरे इनकी पूजा परिपाटी और जटिल तथा भव्य होती गई। साथ-साथ यह विश्वास मज़बूत होता गया कि पूजक मंत्रों को पढ़कर अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकता है। उनका यह भी विश्वास था कि इन कार्यकलापों तथा विभिन्न प्रकार के कष्ट सहने से उन्हें हवा में उड़ने और अद्श्य होने जैसी दैवी शक्तियाँ प्राप्त हो सकती थीं। मनुष्य इस प्रकार से प्रकृति पर नियंत्रण के लिए हमेशा से इच्छुक रहा है, पर इसकी ये इच्छाएँ केवल आधुनिक विज्ञान के विकास से पूरी हुई है। कई हिन्दू योगियों ने भी इस प्रकार की चेष्टा की। इनमें सबसे प्रसिद्ध गोरखनाथ थे। गोरखनाथ शिष्यों को नाथपंथी कहा जाता है तथा एक समय ये सारे उत्तर भारत में लोकप्रिय थे। इनमें से कई योगी नीची जाति के थे और उन्होंने वर्ण-व्यवस्था तथा ब्रह्मणों के विशेषाधिकार की आलोचना की। उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत को तन्त्र कहा जाता है और इसकी सदस्यता बिना जातिभेद के सभी के लिए खुली थी। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि बौद्ध धर्म का पतन नहीं हुआ, लेकिन उसने कई ऐसे रूप धारण कर लिए जो हिन्दू धर्म से बहुत भिन्न नहीं थे।

लोकप्रिय जैन धर्म

पश्चिम भारत में, विशेषकर व्यापारी वर्ग के बीच, जैन धर्म लोकप्रिय बना रहा। गुजरात के चालुक्य शासकों ने जैन धर्म को प्रोत्साहित किया। उन्हीं के काल में आबू पहाड़ पर दिलवाड़ा जैसे भव्य मन्दिरों का निर्माण किया गया। मालवा के परमार शासकों ने भी जैन तीर्थंकरों और महावीर की, बड़ी-बड़ी प्रतिमाएँ बनवायी जिन्हें अब ईश्वर के रूप में पूजा जाने लगा था। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में बड़े-बड़े जैनालय बनवाए, जो यात्रियों के विश्राम स्थल के रूप में लोकप्रिय हुए।

दक्षिण भारत में जैन धर्म नौवीं और दसवीं शताब्दियों में शिखर पर पहुँच गया। कर्नाटक के गंग शासक जैन धर्म के बहुत बड़े संरक्षक थे। इस काल में विभिन्न हिस्सों में जैन मन्दिरों तथा महास्तम्भों का निर्माण किया गया। श्रावण बेलगोला में महावीर की विशाल प्रतिमा भी इसी काल में बनी। यह मूर्ति 18 मीटर ऊँची तथा एक ही चट्टान से काटकर बनाई गई है। इसमें महावीर को तपस्या की मुद्रा में खड़ा दिखाया गया है। वे अपने चारों ओर के वातावरण से अनभिज्ञ हैं। उनके पांवों में साँप लिपटे हुए हैं तथा चीटियों ने मिट्टी के घरौंदे बना दिए हैं। जैनियों के चार वरों (शिक्षा, अन्न, चिकित्सा और आवास) के सिद्धांत ने लोगों के बीच जैन धर्म को लोकप्रिय बना दिया था। कालान्तर में जैनियों की संकीर्णता तथा राजसी प्रोत्साहन की कमी से धीरे-धीरे इसका भी ह्रास होता गया। इसके अलावा इसी काल में दक्षिण भारत में शिव तथा विष्णु से सम्बन्धित कई लोकप्रिय आन्दोलन शुरू हो गए। जिसके कारण जैनियों की लोकप्रियता घटती चली गई। इनमें से सबसे प्रमुख भक्ति आन्दोलन था। जिसका नेतृत्व लोकप्रिय सन्तों ने किया, जिन्हें 'नयनार' तथा 'अलवार' पुकारा जाता था। इनके मत में कठोर तपस्या का कोई स्थान नहीं था। वे धर्म को रीति-रिवाजों से जटिल पूजा, तथा केवल सिद्धांत मात्र नहीं मानते थे। इनके अनुसार धर्म ईश्वर तथा भक्त के बीच एक जीवन्त सम्पर्क साधन था। ये सन्त तमिल और तेलुगु में लिखते थे, जिन्हें सभी समझ सकते हों। ये सन्त जगह-जगह स्वयं जाकर लोगों को भक्ति और प्रेम के सिद्धांत बताते थे। इनमें से कुछ नीची जाति के थे, पर कुछ ब्राह्मण भी थे। इनके अलावा इस आन्दोलन में कुछ स्त्रियाँ भी थीं। क़रीब-क़रीब सभी सन्तों ने जाति व्यवस्था का विरोध किए बिना उससे उससे उत्पन्न होने वाले भेदभाव को ग़लत बताया। नीची जाति के लोगों को वैदिक ज्ञान तथा पूजा से बहिष्कृत किया गया, लेकिन इन सन्तों द्वारा प्रतिपादित भक्ति मार्ग सभी के लिए खुला था, उसमें जाति व्यवस्था का कोई स्थान नहीं था।

भक्ति आंदोलन और कथा-कहानियाँ

भक्ति आंदोलन ने न केवल कई बौद्ध तथा जैन मताबलम्बियों को हिन्दू धर्म की ओर आकर्षित किया, वरन् उन कई क़बीलों को भी हिन्दू धर्म में मिल जाने को प्रेरित किया, जो अब तक इसके बाहर थे। इस प्रकार विभिन्न क़बीले जाति व्यवस्था में ढलकर हिन्दू बन गए थे। आम तौर पर वे अपने क़बीलाई देवी-देवताओं की ही पूजा करते थे, लेकिन बाद में उन्हें शिव तथा विष्णु के मित्र अथवा पत्नियाँ बना दिया गया। इस प्रकार के सांस्कृतिक सम्मेलन में कथा-कहानियों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वैदिक परंपरा

बारहवीं शताब्दी के दौरान एक और लोकप्रिय आंदोलन शुरू हुआ। जिसे लिंगायत कहते हैं। इसके प्रतिष्ठाता 'बसव' और उनका भतीजा 'चन्नबसव' थे, जो कर्नाटक के कलचूरी नरेशों के दरबार में रहते थे। इन्होंने जैन मतावलम्बियों से कड़े विरोध के बाद इस मत की स्थापना की। लिंगायत शिव के पूजक होते हैं। इन्होंने जाति व्यवस्था की कड़ी आलोचना की, तथा उपवास, बलि प्रथा और तीर्थों का बहिष्कार किया। सामाजिक क्षेत्र में इन्होंने बाल विवाह का विरोध किया तथा विधवा विवाह की स्वीकृति दी। इस प्रकार दक्षिण तथा उत्तर भारत, दोनों स्थानों में हिन्दू धर्म के विस्तार और पुनर्जागरण ने दो रूप अपनाए -

  1. एक ओर वेदों तथा वैदिक पूजा और उनके साथ-साथ साहित्य तथा बौद्धिक आंदोलनों पर ज़ोर दिया गया।
  2. दूसरी ओर उत्तर भारत में तंत्र तथा दक्षिण भारत में भक्ति जैसे लोकप्रिय आंदोलनों का आरम्भ हुआ। तंत्र तथा भक्ति के आंदोलनों में जाति-भेद का कोई स्थान नहीं था और इनके द्वार सब के लिए खुले थे।

बौद्धिक स्तर पर बौद्ध तथा जैन धर्म को सबसे बड़ी चुनौती शंकर ने दी, जिन्होंने हिन्दू दर्शन की पुनःव्याख्या की। शंकर का जन्म सम्भवतः नौवीं शताब्दी में केरल में हुआ था। उनके प्रारम्भिक जीवन के बारे में हमें विशेष जानकारी नहीं है तथा उनके बारे में कई कहानियाँ प्रचलित हो गई हैं। कहा जाता है कि जैन मतावलम्बियों के विरोध के कारण उन्हें मदुरई से भागना पड़ा और उसके बाद उन्होंने उत्तर भारत की यात्रा की तथा शास्त्रार्थ में बड़े से बड़े विरोधियों को पराजित किया। जब वे मदुरई लौटे तब वहाँ के नरेश ने उनका भव्य स्वागत किया तथा अपने दरबार से जैनियों को निकाल दिया। इससे स्पष्ट हो जाता है कि शंकर को अपने सिद्धांत प्रतिपादित करने के दौरान बौद्ध तथा जैन मतावलम्बियों से कड़े विरोध का सामना करना पड़ा था। शंकर के दर्शन को अद्वैतवाद के नाम से जाना जाता है। इसके अनुसार ईश्वर तथा उसकी सृष्टि वास्तव में एक है। उसके अनुसार मोक्ष का मार्ग इसी बात की अनुभूति थी कि ईश्वर तथा उसकी सृष्टि एक ही है। इस दर्शन को वेदान्त कहा जाता है। इस प्रकार शंकर ने वेदों को उच्चतम ज्ञान का स्रोत बताया। शंकर द्वारा प्रतिपादित ज्ञान का मार्ग कुछ ही लोगों की समझ में आ सकता था। इससे जनसमूह प्रभावित नहीं हो सकता था। ग्यारहवीं शताब्दी में एक और प्रसिद्ध विद्वान् रामानुज ने भक्ति तथा वेदों की परम्परा के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयत्न किया। उनके अनुसार मोक्ष के लिए ईश्वर के ज्ञान से अधिक उसकी कृपादृष्टि आवश्यक थी। उन्होंने भक्ति मार्ग का प्रतिपादन किया, जिसके द्वार बिना जाति भेद के खुले थे। इस प्रकार रामानुज ने भक्ति के लोकप्रिय आंदोलन तथा वेदों पर आधारित उच्च वर्गीय आंदोलन के बीच सेतु का कार्य किया। रामानुज के कई बौद्धिक अनुयायी हुए। इनमें मध्वाचार्य (चौदहवीं शताब्दी) तथा उत्तर भारत में रामानन्द (पंद्रहवीं शताब्दी) प्रमुख हैं। इस प्रकार आठवीं और बारहवीं शताब्दियों के बीच के काल में न केवल समाज में वरन् धार्मिक विचारों में भी अनेक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए।

राज्यों की संस्कृति
बिहू नृत्य
बिहू नृत्य, असम
कुची पुडी नृत्य
कुची पुडी नृत्य, आंध्र प्रदेश
आरती
आरती, गंगा नदी, वाराणसी
आरती कुंभ मेला
आरती कुंभ मेला, हरिद्वार
ओडिसी नृत्य
ओडिसी नृत्य, उड़ीसा
विरुपाक्ष मंदिर
विरूपाक्ष मंदिर, हम्पी
नौका दौड़
नौका दौड़, केरल
गरबा नृत्य
गरबा नृत्य, गुजरात
गोवा तट
गोवा तट
बोरानदेव मंदिर
बोरानदेव मंदिर, छत्तीसगढ़
कश्मीरी शॉल
कश्मीरी शॉल, जम्मू और कश्मीर
मसनजोर बांध
मसनजोर बांध, दुमका
महाबलीपुरम के बाज़ार का एक दृश्य
महाबलीपुरम के बाज़ार का एक दृश्य
महिला
महिला, त्रिपुरा
लोक गीत कलाकार
लोक गीत कलाकार, दिल्ली
नागालैंड का एक दृश्य
नागालैंड का एक दृश्य
भांगड़ा नृत्य
भांगड़ा नृत्य, पंजाब
लेप्चा प्रजाति के लोग
लेप्चा प्रजाति के लोग, दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल
कुट त्‍योहार
कुट त्‍योहार, मणिपुर
खजुराहो मन्दिर
खजुराहो मन्दिर, मध्य प्रदेश
अजंता की गुफ़ाएं
अजंता की गुफ़ाएं, औरंगाबाद
घूमर नृत्य
घूमर नृत्य, राजस्थान
बुद्ध मंदिर
बुद्ध मंदिर, सिक्किम
होली
होली
दीपावली की रात्रि में जलता हुए दीपक
दीपावली की रात्रि में जलता हुए दीपक
ओणम
ओणम
ईद पर नमाज़ पढ़ते लोग
ईद पर नमाज़ पढ़ते लोग
लोहड़ी का त्योहार मनाते लोग
लोहड़ी का त्योहार मनाते लोग
भाई को राखी बांधती बहन
भाई को राखी बांधती बहन



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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. जिनको भोग कहा जाता था
  2. जिसकी रचना कश्मीर में बारहवीं शताब्दी में हुई थी
  3. एक प्रकार की खारी सब्जी
  4. सिर तथा छाती को छोड़ कर
  5. अर्थात् जब उसका कुछ अता-पता नहीं चलता हो

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