मुक्त छंद  

मुक्त छंद का प्रयोग हिन्दी काव्यक्षेत्र में एक विद्रोह का प्रतीक रहा है। इसे 'स्वच्छंद छंद' भी कहा गया है। अतुकांत कविता उतनी विद्रोहात्मक सिद्ध नहीं हुई, जितना मुक्त छंद, क्योंकि अतुकांत के पक्ष में संस्कृत का विपुल काव्य साहित्य उद्धृत किया जा सकता था, परंतु 'मुक्त छंद' छंद:शास्त्र के अनेक परम्परागत सर्वस्वीकृत नियमों का उल्लंघन करता हुआ दिखाई दिया। चरणों की अनियमित, असमान स्वच्छंद गति और भावानुकूल यतिविधान, यही मुक्त छंद की मुख्य विशेषताएँ हैं, जिन्हें प्राचीन शास्त्रीय दृष्टि से विहित नहीं माना गया और मुक्त छंद का प्रयोग करने वाले कवियों पर नाना प्रकार के व्यंग्य विद्रूप होते रहे।[1]

हिन्दी काव्य में स्थापना

मुक्त छंद की स्वच्छंद प्रवृत्ति का परिहास करते हुए इसे रबड़ छंद, केंचुआ, कंगारू छंद इत्यादि अनेक नाम दिये गये, फिर भी छंद-स्वातंत्र्यभावना के युगानुरूप होने के कारण इसकी सत्ता उन्मूलित नहीं की जा सकी। अंग्रेज़ी[2] और बांग्ला साहित्य में विकसित उन्मुक्त छंद-प्रणाली ने हिन्दी मुक्त छंद की उद्भावना और स्थिति में पर्याप्त प्रेरणा एवं सहयोग दिया। सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' और सुमित्रानन्दन पंत को मुक्त छंद को हिन्दी काव्य में संस्थापित करने का श्रेय है। जयशंकर प्रसाद ने भी कुछ कविताएँ मुक्त छंद में रचीं, जैसे- 'पेशोला की प्रतिध्वनि', परंतु व्यापक रूप से वे मुक्त छंद को स्वीकार न कर सके। निराला ने अपने 'परिमल' की भूमिका में इसका परिचय निम्नलिखित रूप में दिया है-

"मुक्त छंद तो वह है, जो छंद की भूमि में रहकर भी मुक्त है। इस पुस्तक के तीसरे खण्ड में जितनी कविताएँ हैं, सब इसी प्रकार की हैं। इनमें कोई नियम नहीं। केवल प्रवाह कवित्त छंद का सा जान पड़ता है। कहीं-कहीं आठ अक्षर आप-ही-आप आ जाते हैं। मुक्त छंद का समर्थक उसका प्रवाह ही है। वही उसे छंद सिद्ध करता है और उसका नियमराहित्य उसकी 'मुक्ति"।[1]

पंत तथा निराला का मतभेद

सुमित्रानंदन पंत की सुप्रसिद्ध पंक्तियाँ स्वयं छंदोबद्ध होते हुए भी मुक्त छंद का उन्मुक्त उद्घोष करती हैं- "खुल गये छंद के बन्ध, प्रासके रजत पाश। अब गीत मुक्त औ, युगवाणी बहती अयास"।[3] पंत ने मुक्त छंद का आधार मात्रिक संगीत को भी माना, परंतु सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' का आग्रह रहा कि मुक्त छंद केवल वर्णिक अथवा अक्षर-छंद पर ही आधारित होना चाहिये, क्योंकि उसकी प्रकृति स्त्री-प्रकृति न होकर पुरुष-प्रकृति है। दोनों में इस सम्बन्ध में पर्याप्त वाद-विवाद भी चला, जिसका परिचय निराला की 'पंत और पल्लव' नामक रचना से मिलता है। कुछ अंश द्रष्टव्य है-

"पंत जी की कविताओं में स्वच्छंद छंद की एक लड़ी भी नहीं, परंतु वे कहते हैं, 'पल्लव' में मेरी अधिकांश रचनाएँ इसी छंद में हैं, जिनमें 'उच्छास', 'आँसू' तथा 'परिवर्तन' विशेष बड़ी हैं। यदि गीति काव्य और स्वच्छंद छंद का भेद, दोनों की विशेषताएँ पंत जी को मालूम होतीं तो वे ऐसा न लिखते।... पंत जी ने जो लिखा है कि स्वच्छंद ह्रस्व-दीर्घ मात्रिक संगीत पर चल सकता है, यह एक बहुत बड़ा भ्रम है। स्वच्छंद छंद में 'आर्ट ऑफ़ म्यूजिक' नहीं मिल सकता, वहाँ है 'आर्ट ऑफ़ रीडिंग', वह स्वर प्रधान नहीं, व्यंजन प्रधान है। वह कविता की स्त्री-सुकुमारता नहीं, कवित्व का पुरुष-गर्व है'[4] सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की उपर्युक्त स्थापनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि वे हिन्दी में मुक्त छंद के सबसे अधिक ओजस्वी प्रवक्ता रहे हैं और इस सम्बन्ध में उनकी धारणाएँ स्वतंत्र महत्त्व रखती हैं। निराला के व्यक्तित्व में मुक्त छंद ने अपनी सार्थकता उपलब्ध की, इसमें सन्देह नहीं। उनकी 'जागरण' शीर्षक कविता में मुक्त छंद की व्याख्या मुक्त छंद में ही की गयी है- "अलंकार लेश-रहित, श्लेषहीन। शून्य विशेषणों से- "नग्न नीलिमा-सी व्यक्त। भाषा सुरक्षित वह वेदों में आज भी। मुक्त छंद, सहज प्रकाश वह मन का। निज भावों का अकृत्रिम चित्र"।[5]

महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अतुकान्त कविता का तो पक्ष लिया, परंतु मुक्त छंद का समर्थन वे न कर सके और 'आजकल की कविता' नामक एक निबन्ध में उन्होंने मुक्त छंद के प्रयोक्ता कवियों को अहंवादी घोषित किया। उनका विरोध भी मुक्त छंद की प्रगति को कुण्ठित न कर सका। छायावादोत्तर काल में हिन्दी कविता की एक प्रमुख धारा ने मुक्त छंद को अपनाया और अब अधिकांश प्रयोग मुक्त छंद में ही हो रहे हैं, जिनसे उसके स्वरूप वैविध्य और सामर्थ्य में विकास परिलक्षित होने लगा है।

पश्चिमी बीज का पूर्वी अंकुर

मुक्त छंद के लिए कहा गया है कि "यह पश्चिमी बीज का पूर्वी अंकुर है"।[6] इस कथन में बहुत-कुछ सत्य है, क्योंकि पश्चिमी मुक्त छंद की कविताओं ने आधुनिक भारतीय कविता के रूप विधान को अवश्य प्रभावित किया है। अमेरिकी कवि वाल्ट ह्विटमैन (1819-1892) ने अपने कविता संग्रह 'घास की पत्तियाँ' में, जिसे वह जीवनभर परिवर्धित करता रहा, मुक्त छंद का आग्रहपूर्वक व्यवहार किया है। उस काल में अंग्रेज़ी के प्रचलित छंद विधान के विरुद्ध उसका मुक्त छंद एक क्रांतिकारी तत्त्व के रूप में सामने आया। मुक्त छंद की पंक्तियाँ घास की पत्तियों की तरह असमान होते हुए भी सहज सौन्दर्य से युक्त होती हैं, कदाचित् इसी सादृश्य से ह्विटमैन ने अपने संग्रह का उक्त नामकरण किया होगा, ऐसी कल्पना की जाती है। 'द म्यूजिक ऑफ़ पोइट्री' शीर्षक निबन्ध में टी. एस. ईलियट ने लिखा है कि "मुक्त छंद के नाम से बहुत-सा अपरिपक्व गद्य भी लिखा गया है, जो अनपेक्षित है। मुक्त छंद का स्वागत उस काव्य रूप को पुनरुज्जीवित करने या नये रूप को विकसित करने की दृष्टि से ही आविर्भूत हुआ। ब्राह्या एकता के विरुद्ध कविता की आंतरिक एकता पर मुक्त छंद बल देता है, जो प्रत्येक काव्य-रचना के लिए सत्य है। कविता अपने 'रूप' से पूर्व ही जन्म ले चुकती हैं, इस अर्थ में कि 'रूप' कुछ कहने से ही उत्पन्न होता है"।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 हिन्दी साहित्य कोश, भाग 1 |प्रकाशक: ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी |संकलन: भारतकोश पुस्तकालय |संपादन: डॉ. धीरेंद्र वर्मा |पृष्ठ संख्या: 504 |
  2. blank verse
  3. नत्रदृष्टि
  4. पृ. 44
  5. परिमल, पृ. 264
  6. लक्ष्मीनारायण सुधांशु: जीवन के तत्त्व और काव्य के सिद्धांत

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