अष्टधातु  

अष्टधातु आठ धातुओं का संप्रदाय जिसमें सोना चाँदी, तांबा, रांगा, जस्ता, सीसा, लोहा, तथा पारा (रस) की गणना की जाती है। एक प्राचीन में इनका निर्देश यों किया गया है:

स्वर्ण रूप्यं ताम्रं च रंग यशदमेव च।
शीसं लौहं रसश्चेति धातवोऽष्टौ प्रकीर्तिता

सुश्रुतसंहिता में केवल प्रथम सात धातुओं का ही निर्देश देखकर आपातत: प्रतीत होता है कि सुश्रुत पारा (पारद, रस) को धातु मानने के पक्ष में नहीं हैं, पर यह कल्पना ठीक नहीं। उन्होंने रस को धातु भी अन्यत्र माना है।[1] अष्टधातु का उपयोग प्रतिमा के निर्माण के लिए भी किया जाता था तब रस के स्थान पर पीतल का ग्रहण समझना चाहिए; भविष्यपुराण के एक वचन के आधार पर हेमाद्रि का ऐसा निर्णय है।[2]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. ततो रस इति प्रोक्त: स च धातुरपि स्मृतथ:
  2. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 292 |

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