अदह  

अदह (ऐस्बेस्टस) कई प्रकार के खनिज सिलीकेटों के समूह को कहते हैं, जो रेशेदार तथा अदह्य होते हैं। इसके रेशे चमकदार होते हैं। इकट्ठा रहने पर उनका रंग सफ़ेद, हरा, भूरा या नीला दिखाई पड़ता है, परंतु प्रत्येक अलग रेशे का रंग चमकीला सफ़ेद ही होता है। इस पदार्थ में अनेक गुण होते हैं, जैसे- रेशेदार बनावट, आततन बल, कड़ापन, विद्युत के प्रति असीम रोधशक्ति, अम्ल में न घुलना और अदहता। इन गुणों के कारण यह बहुत से उद्योंगों में काम आता है।

विभाजन

अदह को साधारण रूप से निम्नलिखित दो जातियों में बाँटा जा सकता है-

  1. रेशेदार सरपेंटाइन या क्राइसोटाइल
  2. ऐंफ़ीबोल समूह के रेशेदार खनिज पदार्थ, जैसे- क्रोसिडोलाइट, ट्रेमोलाइट, ऐक्टीनोलाइट तथा ऐंथोफिलाइट आदि।

प्राप्ति स्थान

अदह की सबसे अधिक उपयोग होने वाली जाति क्राइसोटाइल है। यह पदार्थ सरपेंटाइन की शिलाओं की पतली धमनियों में पाया जाता है और रासायनिक दृष्टि से साधारण मैगनीशियम सिलिकेट होता है। इन धमनियों में सफ़ेद या हरे रंग का मणिम रेशमी रेशा पाया जाता है। इस प्रकार के अदह का 70 प्रतिशत भाग कनाडा की क्विबेक खदानों से निकाला जाता है। क्राइसोटाइल-युक्त चट्टान में क्राइसोटाइल-अदह की मात्रा भारानुसार 5 से 10 प्रतिशत होती है। इस मेल के रेशे बहुत अच्छे, मजबूत, लचीले और आतनन बल वाले होते हैं। इनको आसानी से सूत की तरह कपड़ों के रूप में बुना जा सकता है। ऐंफीबोल समूह की अपेक्षा[1] उष्मारोधी शक्ति कम होती है तथा अम्ल में घुलनशीलता अधिक। भारत में उपर्युक्त मेल के अदह हिमाचल प्रदेश में शिमला के पास शाली की पहाड़ियों में, मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर में, आंध्र प्रदेश के कडप तथा करनूलु में तथा मैसूर के शिनगोरा में पाए जाते हैं।[2]

रेशों को खदान में से खोदकर और अदहयुक्त पत्थर को मशीन ड्रिलों के द्वारा निकाला जाता है; तत्पश्चात् यांत्रिक विधियों से रेशों को अलग कर लिया जाता है। इसके लिए पत्थर को पहले तोड़ा तथा सुखाया जाता है, फिर क्रमानुसार घूमने वाली चक्कियों, बेलनों, कुट्टकों, पंखों तथा अधोपाती कक्षों में पहुँचाया जाता है और अंत में रेशों को इकट्ठा कर लिया जाता है।

ऐंफ़ीबोल अदह

इस प्रकार का अदह रेशों के पुंज के रूप में पाया जाता है, परंतु रेशे बहुधा अनियमित क्रम के होते हैं। इन धमनियों की लंबाई कभी-कभी कई फुट तक होती है। इस प्रकार के अदह निम्नलिखित उपजातियों के पाए जाते हैं-

ऐंथोफिलाइट

यह लोहे और मैग्नीशियम का सिलिकेट होता है। इसमें आतनन बल कम होता है, परंतु यह क्राइसोटाइल की अपेक्षा अम्ल में कम घुलता है और इसकी उष्मारोधक शक्ति अधिक होती है। यह बहुत भंजनशील होता है और इसीलिए इसको काटना बहुत कठिन होता है।

क्रोसोडोलाइट

यह लोहे और सोडियम का सिलीकेट है। यह हल्के नीले रंग का और रेशम की तरह चमकीला होता है। इसमें आततन बल पर्याप्त होता है।

ट्रेमोलाइट

यह कैल्शियम मैग्नीशियम सिलीकेट होता है।

एकटिनोलाइट

यह मैग्नीशियम, कैल्शियम और लोहे का मिला हुआ सिलीकेट है।

पहली दोनों उपजातियों के अदह का सफ़ेद रंग से हल्का हरा रंग तक होता है। रंग का गाढापन लोहे की मात्रा के ऊपर निर्भर है। इनके रेशे में अधिक लोच नहीं होती, अत: ये बुनने के काम में नहीं आ सकते। ये कठिनता से पिघलते और अम्ल में बहुत कम घुलते हैं। इनको अम्ल छानने और विद्युत के उपकरण बनाने के काम में लाया जाता है। भारत में अदह की ऐकटिनोलाइट तथा ट्रेमोलाइट उपजातियाँ ही बहुतायत से पाई जाती हैं। इनके मिलने की जगहें हैं- उत्तराखंड के कुमाऊँ तथा गढ़वाल, मध्य प्रदेश के सागर तथा भंडारा, बिहार के मुँगेर, बरवाना तथा भानपुर, उड़ीसा के मयूरभंज, सरायकेला; मद्रास के नीलगिरि तथा कोयंबटूर[2]

खान से निकालना

अदह की खानें मिट्टी की सतह के नीचे मिलती हैं। 500 से 600 फुट नीचे तक पाए जाने वाले अदह को खुली मैदान विधि से निकाला जाता है। इससे और अधिक गहराई में पाए जाने वाले अदह के निकालने में वे ही विधियाँ प्रयुक्त होती हैं जो अन्य धातुओं के लिए अपनाई जाती हैं। भारतवर्ष में अदह हाथ-बरमी से छेदकर और विस्फोट पदार्थ तथा हथौड़ों द्वारा फोड़कर निकाले जाते हैं, परंतु दूसरे देशों, जैसे- दक्षिणी अमरीका और संयुक्त राष्ट्र (अमरीका) में, वायुचालित बरमों का प्रयोग किया जाता है। अदह को छेदते समय जल का प्रयोग नहीं किया जाता, क्योंकि पानी के साथ मिलने पर स्पंजी मिश्रण बन जाता है, जिसमें से इसको अलग निकालना कठिन हो जाता है। कच्चे अदह को छानने के पश्चात्‌ हथौड़ों से खूब पीटा जाता है। इससे अदह के रेशों में लगे हुए पत्थर के टुकड़े तथा अन्य वस्तुएँ दूर हो जाती हैं। इसके बाद इसे कुचलने वाली चक्की में डाला जाता है। बाद में रेशों को हवा के झोंके से अलग कर लिया जाता है। अंत में हिलते हुए छनने पर डालकर उनके द्वारा शोषक पंपों से हवा चूसकर धूलि पूर्णतया खींच ली जाती है। इसके उपरांत अदह का मूल्यांकन होता है।

बाज़ार में उपलब्धता

अदह के निम्नलिखित चार मेल बाज़ार में भेजे जाते है-

  1. एकहरा माल[3]
  2. महीन माल[4]
  3. सीमेंट में मिलाने योग्य[5]
  4. चूरा[6]

मूल्यांकन

अदह का मूल्यांकन इसको जलाने के बाद बची हुई राख के आधार पर किया जाता है।

अदह का मूल्यांकन
अदह की उपजाति जलने के बाद बची हुई राख, प्रतिशत
क्रोसिडोलाइट 3.8
ट्रमोलाइट 2.3
एंथोफिलाइट 2.23
एकटिनोलाइट 1.99
क्राइसोटाइल 14.5
क्षेत्र परीक्षण

यदि अच्छे अदह को उँगलियों के बीच रगड़ा जाए तो उससे रेशमी डोर जैसी वस्तु बन जाती है, जो खींचने पर शीघ्र टूटती नहीं। घटिया मेल के अदह के छोटे-छोटे टुकड़े हो जाते हैं; वह कठोर भी होता है। अच्छे अदह के पतले पुंज को यदि अँगूठे के नख से धीरे-धीरे खींचा जाए तो लचीले तथा अच्छे आतनन वाले रेशे मिलते हैं अथवा वे महीन रेशों में विभाजित हो जाते हैं, परंतु निम्न कोटि के अदह के रेशे बिलकुल टूट जाते हैं। उत्तम कोटि के अदह के रेशों को मसलने से कोमल गोलियाँ बनाई जा सकती हैं, परंतु घटिया अदह के रेशे टूट जाते हैं।[2]

उपयोग

अदह के सभी प्रकार ko विद्युतरोधक अथवा उष्मारोधक बनाने के काम में लाया जाता है। इसके अतिरिक्त इन्हें अम्ल छानने, रासायनिक उद्योग तथा रंग बनाने के कारखानों में इस्तेमाल किया जाता है। लंबे रेशों को बुन या बटकर कपड़ा तथा रस्सी आदि बनाई जाती है। इनसे अग्निरक्षक परदे, वस्त्र और ऐसी ही अन्य वस्तुएँ बनाई जाती हैं। भारत में अदह का मुख्य उपयोग अदहयुक्त सीमेंट तथा तत्संबंधी वस्तुएँ, जैसे स्लेट, टाईल, पाइप और चादरें बनाने में किया जाता है। 1952 तथा 1953 में भारत में अदह का उत्पादन क्रमानुसार 865 तथा 718 टन था। इस अदह को केवल अवरोधक उपकरण बनाने के काम में ही लाया जा सका, क्योंकि यह भंजनशील तथा दुर्बल था। भारत को अन्य वस्तुएँ बनाने के लिए अदह का आयात करना पड़ता है। 1955, 1956 तथा 1957 में क्रमानुसार 13,00 टन, 15,160 टन और 13,922 टन अदह बाहर से आया था। भारत को इसके लिए प्रति वर्ष लगभग दो करोड़ रुपया देना पड़ता है।[2]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. क्रोसीडोलाइट को छोड़कर
  2. 2.0 2.1 2.2 2.3 अदह (हिन्दी) भारतखोज। अभिगमन तिथि: 11 फरवरी, 2015।
  3. सिंगिल स्टॉक
  4. पेपर स्टॉक
  5. सीमेंट स्टॉक
  6. शॉर्ट्स

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