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'''शाल्व''' ‘सौभ’ नामक विमान के अधिपति एक राजा, जो काशीराज की पुत्रियों [[अम्बा]] आदि के [[स्वयंवर]] में उपस्थित हुए थे और फिर युद्ध में [[भीष्म]] द्वारा पराजित हुए थे। दमघोष के पुत्र तथा [[चेदि जनपद|चेदि देश]] के राजा [[शिशुपाल]] के ये मित्र थे। जब शिशुपाल [[श्रीकृष्ण]] द्वारा मारा गया, तब शाल्व ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए [[द्वारिका]] पर धावा बोला, किन्तु वह स्वयं युद्ध में मारे गए।<ref>[[महाभारत]] [[वनपर्व महाभारत|वनपर्व]], अध्याय 15 से 22 तक।</ref><ref>{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=पौराणिक कोश|लेखक=|अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी|संकलन= |संपादन=राणा प्रसाद शर्मा|पृष्ठ संख्या=493|url=}}</ref> | |||
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==कृष्ण से युद्ध== | |||
[[कृष्ण]] के द्वारा [[शिशुपाल]] के मारे जाने पर शाल्व ने [[द्वारिका]] पर आक्रमण कर दिया। श्रीकृष्ण उन दिनों [[पांडव|पांडवों]] के पास [[इन्द्रप्रस्थ]] गये हुए थे। [[उद्धव]], [[प्रद्युम्न]], चारुदेष्ण तथा [[सात्यकि]] आदि ने बहुत समय तक शाल्व से युद्ध किया। शाल्व मायावी प्रयोगों में चतुर था। प्रद्युम्न बहुत अच्छा योद्धा था। दोनों घायल होकर भी युद्ध में लगे रहे। प्रद्युम्न उस पर कोई विषाक्त [[बाण अस्त्र|बाण]] छोड़ने वाला था, तभी देवताओं के भेजे हुए वायुदेव ने प्रद्युम्न को संदेश दिया कि उसकी मृत्यु श्रीकृष्ण के हाथों होनी निश्चित है, अत: वह अपना बाण न छोड़े। प्रद्युम्न ने अपने बाण समेट लिये। शाल्व विमान में अपने नगर की ओर भाग गया। उसके पास आकाशचारी सोम विमान था, जिसमें रहकर वह युद्ध करता था।<ref>महाभारत, वनपर्व, अध्याय 15-22</ref> | |||
====वध==== | |||
'शाल्व' शिशुपाल के मित्रों में से था। शिशुपाल के वध के उपरांत उसने घोर तपस्या से [[शिव]] को प्रसन्न करके वरदान स्वरूप ऐसा विमान प्राप्त किया था, जो चालक की इच्छानुसार किसी भी स्थान पर पहुंचाने में समर्थ था तथा अंधकार की अधिकता के कारण किसी को दिखायी नहीं पड़ता था। वह यदुवंशियों के लिए त्रासक था। उस सोम वाहन का निर्माण [[मय दानव]] ने लोहे से किया था। शाल्व ने उस विमान पर अनेक सैनिकों को सवार करके [[द्वारिका]] पर चढ़ाई कर दी। वहां [[प्रद्युम्न]] से उसका घोर युद्ध हुआ। द्वारकावासी बहुत त्रस्त थे। उधर [[यज्ञ]] की समाप्ति पर अपशकुनों का अनुभव करते हुए [[कृष्ण]] और [[बलराम]] द्वारिका पहुंचे। बलराम को नगर की रक्षा का भार सौंपकर कृष्ण युद्ध क्षेत्र में पहुंचे। उन्होंने शाल्व के सैनिकों को क्षत-विक्षत कर दिया। शाल्व घायल होकर अंतर्धान हो गया। एक अपरिचित व्यक्ति ने उसका दौत्य कर्म संपन्न करते हुए कृष्ण से कहा कि शाल्व ने उनके [[पिता]] को कैद कर लिया है। कुछ क्षण तो कृष्ण उदास रहे, फिर अचानक विमान पर शाल्व को वसुदेव के साथ देख वे समझ गये कि यह सब शाल्व नहीं, माया मात्र है। उन्होंने [[सुदर्शन चक्र]] से शाल्व को मार डाला। विमान चूर-चूर होकर [[समुद्र]] में गिर गया। शाल्व के वध और सोम विमान के नाश के उपरांत क्रमश: तदंवक्त्र तथा विदूरक भी कृष्ण के हाथों मारे गये।<ref>श्रीमद् भागवत, 10।76-77, 10।78।1-16</ref> | |||
==अन्य प्रसंग== | |||
शाल्व म्लेच्छों का राजा था। [[शल्य]] के वधोपरांत शाल्व ने पांडवों से युद्ध किया था। उसका [[हाथी]] अत्यंत बलशाली था। [[धृष्टद्युम्न]] से युद्ध करते हुए पहले तो उसका हाथी थोड़ा पीछे हटा, फिर क्रुद्ध होकर उसने धृष्टद्युम्न के रथ को सारथि सहित कुचल डाला, फिर सूंड़ से उठाकर पटक दिया। उसका क्रोध देखकर ही धृष्टद्युम्न रथ से नीचे कूद गया तथा अपनी [[गदा]] उठाकर मारी, जिससे हाथी का मस्तक विदीर्ण हो गया, तभी सात्यकि ने एक तीखे मल्ल से शाल्व का सिर काट दिया।<ref>महाभारत, शल्यपर्व, 20</ref> | |||
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शाल्व ‘सौभ’ नामक विमान के अधिपति एक राजा, जो काशीराज की पुत्रियों अम्बा आदि के स्वयंवर में उपस्थित हुए थे और फिर युद्ध में भीष्म द्वारा पराजित हुए थे। दमघोष के पुत्र तथा चेदि देश के राजा शिशुपाल के ये मित्र थे। जब शिशुपाल श्रीकृष्ण द्वारा मारा गया, तब शाल्व ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए द्वारिका पर धावा बोला, किन्तु वह स्वयं युद्ध में मारे गए।[1][2]
कृष्ण से युद्ध
कृष्ण के द्वारा शिशुपाल के मारे जाने पर शाल्व ने द्वारिका पर आक्रमण कर दिया। श्रीकृष्ण उन दिनों पांडवों के पास इन्द्रप्रस्थ गये हुए थे। उद्धव, प्रद्युम्न, चारुदेष्ण तथा सात्यकि आदि ने बहुत समय तक शाल्व से युद्ध किया। शाल्व मायावी प्रयोगों में चतुर था। प्रद्युम्न बहुत अच्छा योद्धा था। दोनों घायल होकर भी युद्ध में लगे रहे। प्रद्युम्न उस पर कोई विषाक्त बाण छोड़ने वाला था, तभी देवताओं के भेजे हुए वायुदेव ने प्रद्युम्न को संदेश दिया कि उसकी मृत्यु श्रीकृष्ण के हाथों होनी निश्चित है, अत: वह अपना बाण न छोड़े। प्रद्युम्न ने अपने बाण समेट लिये। शाल्व विमान में अपने नगर की ओर भाग गया। उसके पास आकाशचारी सोम विमान था, जिसमें रहकर वह युद्ध करता था।[3]
वध
'शाल्व' शिशुपाल के मित्रों में से था। शिशुपाल के वध के उपरांत उसने घोर तपस्या से शिव को प्रसन्न करके वरदान स्वरूप ऐसा विमान प्राप्त किया था, जो चालक की इच्छानुसार किसी भी स्थान पर पहुंचाने में समर्थ था तथा अंधकार की अधिकता के कारण किसी को दिखायी नहीं पड़ता था। वह यदुवंशियों के लिए त्रासक था। उस सोम वाहन का निर्माण मय दानव ने लोहे से किया था। शाल्व ने उस विमान पर अनेक सैनिकों को सवार करके द्वारिका पर चढ़ाई कर दी। वहां प्रद्युम्न से उसका घोर युद्ध हुआ। द्वारकावासी बहुत त्रस्त थे। उधर यज्ञ की समाप्ति पर अपशकुनों का अनुभव करते हुए कृष्ण और बलराम द्वारिका पहुंचे। बलराम को नगर की रक्षा का भार सौंपकर कृष्ण युद्ध क्षेत्र में पहुंचे। उन्होंने शाल्व के सैनिकों को क्षत-विक्षत कर दिया। शाल्व घायल होकर अंतर्धान हो गया। एक अपरिचित व्यक्ति ने उसका दौत्य कर्म संपन्न करते हुए कृष्ण से कहा कि शाल्व ने उनके पिता को कैद कर लिया है। कुछ क्षण तो कृष्ण उदास रहे, फिर अचानक विमान पर शाल्व को वसुदेव के साथ देख वे समझ गये कि यह सब शाल्व नहीं, माया मात्र है। उन्होंने सुदर्शन चक्र से शाल्व को मार डाला। विमान चूर-चूर होकर समुद्र में गिर गया। शाल्व के वध और सोम विमान के नाश के उपरांत क्रमश: तदंवक्त्र तथा विदूरक भी कृष्ण के हाथों मारे गये।[4]
अन्य प्रसंग
शाल्व म्लेच्छों का राजा था। शल्य के वधोपरांत शाल्व ने पांडवों से युद्ध किया था। उसका हाथी अत्यंत बलशाली था। धृष्टद्युम्न से युद्ध करते हुए पहले तो उसका हाथी थोड़ा पीछे हटा, फिर क्रुद्ध होकर उसने धृष्टद्युम्न के रथ को सारथि सहित कुचल डाला, फिर सूंड़ से उठाकर पटक दिया। उसका क्रोध देखकर ही धृष्टद्युम्न रथ से नीचे कूद गया तथा अपनी गदा उठाकर मारी, जिससे हाथी का मस्तक विदीर्ण हो गया, तभी सात्यकि ने एक तीखे मल्ल से शाल्व का सिर काट दिया।[5]
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