सांख्य मीमांसा  

सांख्य प्रमाण मीमांसा

भारतीय दर्शन की एक सामान्य विशेषता है उसका मानव केन्द्रित होना। सांख्य दर्शन भी मानव केन्द्रित है। तत्त्व गणना या विवेचना साध्य नहीं है। यह साधन है मानव के अन्तर्निहित और स्पष्ट उद्देश्य की प्राप्ति का। उद्देश्य संसार के दु:खों से स्वयं को मुक्त करने की मानवी प्रवृत्ति ही रही है। अत: तदनुरूप ही सांख्याचार्यों ने उन विषयों की विवेचना को अधिक महत्त्व दिया, जिनसे उनके अनुसार उद्देश्य की प्राप्ति हो सके। मानव मात्र दु:ख से निवृत्ति चाहता है। संसार में दु:ख है- इस ज्ञान के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, दु:ख से मुक्ति हेतु प्रवृत्ति भी प्रमाणापेक्षी नहीं है। दु:खनिवृत्ति के मानवकृत सामान्य प्रयासों से तात्कालिक निवृत्ति तो होती है लेकिन ऐकान्तिक और आत्यन्तिक निवृत्ति नहीं होता। दु:ख क्यों होता है, कैसे उत्पन्न होता है, मानव दु:ख से क्यों मुक्त होना चाहता है- आदि प्रश्न गंभीर चिन्तनापेक्षी और उत्तरापेक्षी हे। यह चिन्तन और तदनुसार उत्तर ही दु:ख निवृत्ति में साधक हो सकते हैं। यह क्षेत्र ही 'ज्ञान' का है। अत: सांख्याचार्य अपनी दार्शनिक विवेचना का आरंभ ही दु:ख-विवेचना से करते हैं।

  • अथ त्रिविधदु:खात्यन्तिकनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थ:[1]
  • दु:खत्रयाभिघाताज्जिज्ञासा तदभिघातके हेतौ॥[2]
  • दु:खनिवृत्ति की जिज्ञासा ज्ञाता-जिज्ञासु की अभीप्सा है कुछ जानने की। लेकिन कुछ जाना जा सकता है, जाना गया कुछ सत्य है, प्रामाणिक है- ऐसा मानने के लिए ज्ञान की सीमा और ज्ञान की साधनभूत कसौटियों का निर्धारण आवश्यक है। यही प्रमाण मीमांसा का क्षेत्र है।

सांख्य दर्शन की प्रमाण-मीमांसा

द्वयोरेकतरस्य वाप्यसन्निकृष्टार्थपरिच्छित्ति: प्रमा
तत्साधकतमं यत्तत् त्रिविधं प्रमाणम्॥[3]

बुद्धि और पुरुष दोनों में से एक का पूर्व से अनधिगत अर्थ का अवधारण प्रमा है और उस प्रमा (यथार्थ ज्ञान) का जो अतिशय साधक (करण) है; उसे प्रमाण कहते हैं। प्रमा अर्थात ज्ञान की परिभाषा में अनधिगत और अवधारण दो महत्त्वपूर्ण शर्ते हैं। यथार्थ ज्ञान या प्रमा होने में। अनधिगत या जो पहले से ज्ञात नहीं है- उसे ही जाना जाता है। यदि पहले से ही ज्ञात हो तो उसकी स्मृति होगी यथार्थ ज्ञान नहीं। फिर अवधारणा अर्थात भली-भांति या निश्चयात्मक रूप से धारण करना भी एक शर्त है। अनिश्चित ज्ञान संशय रूप होगा। अत: परिच्छित्ति या अवधारणा प्रमा से संशय को पृथक् करता है। यथार्थ ज्ञान की परिभाषा में इसे बुद्धि और पुरुष दोनों में से 'एक' का भी कहा है। इसका आशय यह है कि ज्ञान बुद्धि को भी होता है पुरुष को भी। दोनों ही दशाओं में बुद्धि पुरुष संयोग अनिवार्य है। पुरुष शुद्ध चैतन्य है, असंग है। अत: विषय अवधारण तो बुद्धि में ही होता है। लेकिन पुरुष में उपचरित होता है। विचारणीय यह है कि बुद्धि तो अचेतन या जड़ है, उसे ज्ञान होता है, कहना भी संगत नहीं होगा। अत: ज्ञान तो पुरुष को ही होता है- ऐसा मानना होगा। फिर, समस्त विकार पुरुषार्थ हेतुक हैं। अत: बुद्धिवृत्ति भी साधन ही कही जाएगी पुरुषार्थ के लिए। सूत्रकार बुद्धि और पुरुष दोनों के 'ज्ञान' की संभावना को स्वीकार करते हैं। विज्ञान भिक्षु इस स्थिति को प्रमाता-साक्षी-भेद करके स्पष्ट करते हैं। उनके अनुसार पुरुष प्रमाता नहीं बल्कि प्रमा का साक्षी है। प्रमा चाहे बुद्धिनिष्ठ (बुद्धिवृत्ति) हो चाहे पुरुषनिष्ठ या पौरुषेयबोध या दोनों का हो, प्रमा का जो साधकतम करण होगा, उसे ही प्रमाण कहा जाएगा और यदि बुद्धिवृत्ति को प्रमा कहें तब इन्द्रिय सन्निकर्ष को प्रमाण कहा जाएगा।

  • तीन प्रकार के प्रमाण सांख्य को अभीष्ट है-
  1. प्रत्यक्ष प्रमाण,
  2. अनुमान प्रमाण तथा
  3. शब्द प्रमाण।

प्रत्यक्ष प्रमाण

यत् सम्बद्धं सत् तदाकारोल्लेखि विज्ञानं तत् प्रत्यक्षं[4]— जिसके साथ सम्बद्ध होता हुआ उसी के आकार को निर्देशित करने वाला जो विज्ञान (बुद्धिवृत्ति) है वह प्रत्यक्ष है। प्रत्यक्ष की इस परिभाषा से सूत्रकार बुद्धिवृत्ति को प्रमाण रूप में स्वीकार करते प्रतीत होते हैं अर्थात वे प्रमा पौरुषेय बोध को मानते प्रतीत होते हैं क्योंकि इन्द्रिय का विषय से सन्निकर्ष होने पर इन्द्रिय विषयाकार नहीं होती वरन् बुद्धि विषयाकार होती है। बुद्धि का विषयाकार होना ही बुद्धिवृत्ति है।

  • ईश्वरकृष्ण ने सांख्यकारिका में भी इसी तरह प्रत्यक्ष निरूपण किया है। कारिका में कहा गया है 'प्रतिविषयाध्यवसायो दृष्टं[5]' अध्यवसाय बुद्धि का व्यापार है। विषय सन्निकर्ष इन्द्रियों का होता है। मात्र इन्द्रिय-विषय-सन्निकर्ष प्रत्यक्ष नहीं कहलाएगा। यह केवल 'संवेदना' की स्थिति है। जब इस सन्निकर्ष में बुद्धिवृत्ति इन्द्रिय माध्यम से विषयाकार हो और निश्चयात्मक अवधारण (अध्यवसय) हो, तभी वह प्रत्यक्ष कहा जाएगा। इस तरह संशय या भ्रमरूप या सदोष सन्निकर्ष प्रत्यक्ष की कोटि में नहीं रखा जा सकेगा। भ्रम आदि को भी प्रत्यक्ष के रूप मानने पर प्रत्यक्ष को प्रमाण यथार्थ ज्ञान कराने वाला करण नहीं का जा सकेगा। प्रत्यक्ष की यह प्रक्रिया बाह्यान्त:करण की युगपत प्रक्रिया कही गई है।
  • ईश्वरकृष्ण 30वीं कारिका में कहते हैं- 'युगपच्चतुष्टयस्य तु वृत्ति: क्रमशश्च तस्य निर्दिष्टा।' चतुष्टयस्य में त्रिविध अन्त:करण तथा कोई एक ज्ञानेन्द्रिय निहित है। 'चतुष्टयस्य' कहने में एक अन्य भाव निहित प्रतीत होता है जिसका स्पष्टीकरण युगपत शब्द द्वारा दिया गया। इस कारिकांश का अर्थ है कि प्रत्यक्ष में विषय की ओर व्यापार कभी चारो (बुद्धि, अहंकार, मन तथा एक ज्ञानेन्द्रिय) का एक साथ होता है तो कभी क्रमश:। चक्षु जब किसी विषय को ग्रहण करती है तब मन का संकल्पविकल्पात्मक व्यापार, अहंकार का अभिमान तथा बुद्धि का अध्यवसाय व्यापार घटित होता है। तब यह रजत है ऐसा ज्ञान होता है। यहाँ यह ध्यान रखना होगा कि इस पूरी प्रक्रिया में अहंकार का अभिमान व्यापार भी निहित है। अत: 'यह रजत' में 'अहं जानामि' का भाव भी निहित रहता है। तथापि नैसर्गिक, स्पष्ट और लोक प्रसिद्ध होने से अभिव्यक्ति में 'अहं जानामि' का लोप हो जाता है। यह भी ध्यान में रखना होगा कि कार्यकारण संबंध होने से बुद्धि, अहंकार और मन सर्वथा पृथक् कभी नहीं रहते हैं। लेकिन इनका व्यापार 'स्थूल से सूक्ष्म' के क्रम से ही होता है। इसलिए इनके व्यापार को युगपत के साथ-साथ क्रमश: भी कहा गया है।
  • प्रत्यक्ष प्रमाण समस्त प्रमाण-प्रक्रिया में प्राथमिक तथा महत्त्वपूर्ण है। लेकिन बाह्य विषयों या प्रमेयों के ज्ञान में प्रत्यक्ष की अपर्याप्तता कई कारणों से सिद्ध होती है। *विषयोऽविषयोऽप्यतिदूरादेर्हानोपादानाभ्यामिन्द्रियस्य।[6]अत्यन्त दूर आदि के कारण तथा इन्द्रिय की हानि तथा व्यवधान आदि कारणों से विषय अविषय प्रतीत होते हैं।
  • 'अतिदूरादे: के आदे:' का विस्तार ईश्वरकृष्ण कृत कारिका-में किया गया है।

अतिदूरात् सामीप्यादिन्द्रियघातान्मेनोऽनवस्थानात्। सौक्ष्म्याद्व्यवधानादभिभवात् समानाभिहाराच्च॥[7]

  • वस्तु के अत्यन्त दूर, अत्यन्त समीप होने से, इन्द्रिय शक्ति की हानि, मन के विचलित होने पर, वस्तु के अत्यन्त सूक्ष्म होने, इन्द्रिय और विषय के बीच व्यवधान होने से, एक वस्तु के अभिभूत होने से, तथा किसी वस्तु के सजातीय सम्मिश्रण के कारण प्रत्यक्ष नहीं हो पाता है। अथवा अशुद्ध प्रमाण प्रस्तुत होता है। प्रकृति आदि प्रमेय अत्यन्त सूक्ष्म और समीप होने से ही उपलब्ध प्रतीत नहीं होते। यद्यपि कार्य के आधार पर उनकी उपलब्धि अनुमेय है।
  • जयमंगलाकार ने कारिका भाष्य में प्रत्यक्ष के दो भेद स्वीकार किया है-
  1. शुद्ध और
  2. अशुद्ध प्रत्यक्ष।
  • अनिरुद्ध तथा विज्ञानभिक्षु ने सविकल्प तथा निर्विकल्प भेद प्रत्यक्ष को स्वीकार किए हैं।
  • सांख्यशास्त्रीय साहित्य में प्रत्यक्ष प्रमाण पर विस्तृत एवं पूर्ण चर्चा उपलब्ध नहीं है। इसका कारण सांख्य दर्शन का प्रमुख लक्ष्य आत्म साक्षात्कार और प्रकृति-पुरुष-विवेक है। दूसरी ओर सर्वसाधारण से लेकर दार्शनिकों तक यह मूलप्रमाण है। शेष प्रमाणों का किसी न किसी रूप में यह आधार है, जबकि प्रत्यक्ष अन्य किसी प्रमाण पर आश्रित नहीं है।

अनुमान प्रमाण

प्रतिबन्धदृश: प्रतिबद्धानमनुमानम्[8]

  • इसकी व्याख्या में विज्ञानभिक्षु लिखते हैं- 'व्याप्तिदर्शनाद् व्यापकज्ञानं वृत्तिरूपमनुमानम्'- प्रतिबन्ध दो पदार्थों के बीच नियम सम्बन्ध या व्याप्ति के आधार पर व्यापक का ज्ञान होता है उसे अनुमान प्रमाण कहते हैं। केवल प्रतिबन्ध या लिंग-लिंगी सम्बन्ध पूर्वक ज्ञान-अनुमान है। अनुमान में प्रत्यक्ष तो सदा निहित आधार होता है। अनुमान काल में तो प्रत्यक्ष आधार बनता ही है। साथ ही पूर्व में प्रत्यक्षीकृत ज्ञान की स्मृति भी अनुमान में होती है। अत: अनुमान को व्याप्तिज्ञानस्मरणपूर्वक व्याप्य से व्यापक का ज्ञान[9]कहा जा सकता है।
  • वाचस्पति मिश्र अनुमान का सामान्य लक्षण बताते हैं- व्याप्य (लिंग) और व्यापक (लिंगी) के व्याप्ति ज्ञान तथा लिंग के पक्षधर्मता ज्ञान से उत्पन्न ज्ञान अनुमान प्रमाण है। लिंग-लिंगी या व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध दो प्रकार का होता है-
  1. समव्याप्ति तथा
  2. विषमव्याप्ति।
  • जहां हेतु और साध्य में नियम साहचर्य रूप स्वाभाविक सम्बन्ध हो, जिसे अन्वय और व्यतिरेक के द्वारा समान रूप से बताया जा सके, वहां उस व्याप्ति को समव्याप्ति कहा जाएगा। जैसे वृक्ष के पत्तों को हिलते देखकर वायु के प्रवाहित होने का अनुमान किया जा सकता है और पत्तों के न हिलने से वायु का प्रवाह न होने का अनुमान भी किया जा सकता है। लेकिन ऐसे भी उदाहरण बताये जा सकते हैं जहां ऐसा नहीं होता। धूम को देखकर अग्नि के होने का तो अनुमान किया जा सकता है तथापि अग्नि को देखकर धूम के होने का अनुमान नहीं किया जा सकता। गीली लकड़ी में आग लगने पर धुआं दिखाई देगा अन्यथा नहीं। इस प्रकार की व्याप्तिविषम व्याप्ति कही जाएगी।
  • अनुमान के भेदों का उल्लेख सांख्य सूत्र में नहीं है। तथापि कारिका में 'त्रिविधमनुमानम्' कहकर अनुमान के तीन भेदों को स्वीकार किया है। सभी भाष्यकारों ने
  1. शेषवत,
  2. पूर्ववत तथा
  3. सामान्यतोदृष्ट भेदों की चर्चा की है।
  • विज्ञानभिक्षु ने 'प्रत्यक्षीकृतजातीयविषयं पूर्ववत' कहकर पूर्ववत अनुमान को स्पष्ट किया है। अर्थात प्रत्यक्षीकृत विषय के सजातीय या उससे उत्पन्न विषय का अनुमान पूर्ववत कहा जाता है। अग्नि से धूम की उत्पत्ति का प्रत्यक्ष रसोई आदि में किया जा चुका है और अब धूम को देखकर अग्नि का अनुमान करना पूर्ववत अनुमान है।
  • वाचस्पति मिश्र के अनुसार 'दृष्टस्वलक्षण-सामान्य विषयं यत् तत्पूर्ववत्[10]' अर्थात ऐसी किसी वस्तु का सामान्य रूप विषय जिसका प्रत्यक्ष पूर्व में ही हो चुका हो-पूर्ववत कहलाता है।
  • शेषवत अनुमान में किसी समूह या विस्तृत विषय के अंश के प्रत्यक्ष के आधार पर शेष का अनुमान किया जाता है। समुद्र के एक बूंद जल को चखकर सारे समुद्र के जल के खारेपन का अनुमान शेषवत अनुमान का रूप है। वाचस्पति मिश्र व्यतिरेकी अनुमान को शेषवत मानते हैं। 'व्यक्तिरेकमुखेन प्रवर्तमानं निषेधकम्... शेषवत्' व्यापक के निषेध द्वारा व्याप्य का पक्ष में निषेधज्ञान शेषवत अनुमान है।
  • 'सामान्यतोदृष्ट' अनुमान का तीसरा प्रकार है। सांख्य सूत्र के अनुसार सामान्यतोदृष्टादुभयसिद्धि:[11] सामान्यतोदृष्ट अनुमान से दोनों (प्रकृति और पुरुष या अचेतन और चेतन) की सिद्धि हो जाती है जिसका विशिष्ट या साधारण रूप पूर्वदृष्ट न हो।[12]क्रिया होने से इनका कारण भी होगा-इस प्रकार इन्द्रियों का ज्ञान होना सामान्यतोदृष्ट अनुमान है।[13]विज्ञानभिक्षु के अनुसार 'अप्रत्यक्षजातीय पदार्थ का अनुमान सामान्यतोदृष्ट अनुमान है। प्रत्येक कार्य स्वसजातीयकारण से उत्पन्न होता है। 'शक्तस्य शक्यकारणात्[14] में यही भाव है। यह सत्कार्यवादी मान्यता है जिसके अनुसार कार्य-कारण गुणात्मक होता है। अत: कार्य को देखकर कारण त्रिगुणात्मक (सुख-दु:ख-मोहात्मक) होता है। अत: इनका कारण रूप अव्यक्त भी ऐसा ही होगा। इस तरह प्रकृति की त्रिगुणात्मकता का अनुमान होता है। इसी तरह संघात की परार्थता (चेतनार्थता) देखकर चेतन का भी अनुमान होता है।

शब्द प्रमाण

आप्तोपदेश: शब्द:।[15]आप्त व्यक्ति के उपदेश वचन को शब्द प्रमाण कहा जाता है। विज्ञान भिक्षु 'आप्ति' को योग्यता के अर्थ में स्वीकार करते हैं। विज्ञानभिक्षु के शिष्य भावागणेश 'स्वकर्मण्यभियुक्तो रागद्वेषरहितो ज्ञानवान् शीलसम्पन्न:[16]' को आप्त कहते हैं। उन आप्तों के वचनों का शब्द कहा जाता है। विज्ञानभिक्षु योग्य शब्द से उत्पन्न ज्ञान को शब्द प्रमा और कारण भूत शब्द को प्रमाण कहते हैं। ईश्वरकृष्ण 'आप्तश्रुतिराप्तवचनं' के रूप में शब्द प्रमाण को स्पष्ट करते हैं। यहाँ श्रुति को वाचस्पति मिश्र 'वाक्यजनितं वाक्यार्थज्ञानम्' कहते हैं और इसे (श्रुति प्रमाण को) स्वत: प्रमाण कहते हैं। यह स्वत: या स्वतंत्र प्रमाण 'अपौरुषेयवेद वाक्यजनितत्वेन सकलदोषाशंका विनिर्मुक्तेत्युक्तं[17]' होता है। न केवल सकल दोषाशंका रहित होने से अपौरुषेय वेद वाक्य जनित ज्ञान स्वत: प्रमाण होता है अपितु वेदमूलक स्मृति, इतिहास पुराणादि के वाक्य भी शब्द प्रमाण होते हैं। शब्द प्रमाण की यह स्वत: प्रमाणता शब्द की अपना ज्ञान कराने की शक्ति के कारण हैं।

सांख्य दर्शन में तीन की प्रमाण माने गए हैं, क्योंकि सांख्यों के अनुसार समस्त प्रमेयों का ज्ञान इन तीन प्रमाणों से हो जाता है। अन्य कथित प्रमाणों का भी विलय इन्हीं के अन्तर्गत हो जाता है। अब एक प्रश्न यह उठता है कि व्यक्ताव्यक्तज्ञ अर्थात व्यक्त जगत के पदार्थों का स्थूल से सूक्ष्म की ओर क्रम से प्रत्यक्ष और अनुमान से ज्ञान होता है, प्रकृति पुरुष विवेक भी सामान्यतोदृष्ट अनुमान प्रमाणगम्य माना गया है। तब शब्द, आप्तोपदेश या वेद या श्रुति प्रमाण के लिए प्रमेय ही क्या शेष रहा?

  • डॉ. रामशंकर भट्टाचार्य ने संभवत इसीलिए कहा है कि 'अनापेक्षिक दृष्टि से ऐसा कोई भी सत पदार्थ नहीं है जो आप्तवचनामात्र गम्य हो। यही कारण है कि हम समझते हैं कि आपेक्षिक दृष्टि से ही 'तस्मादपि चासिद्धम्' का तात्पर्य लेना चाहिए, जो किसी पदार्थ को न दृष्टि से न अनुमान से जान सकता है वह उसे उपदेश के माध्यम से जान सकता हैं।[18]
  • डॉ. शिवकुमार का मत है कि वेदों के ज्ञानपक्ष की अस्वीकृति का सांख्य पर आरोपण न हो सके, इसलिए तथा सांख्याचार्यों के वचनों की आप्तता के लिए या स्वर्गादि जैसे विषयों के ज्ञान कराने के लिए, ताकि उनकी वास्तविक स्थिति जानकर, लोग सांख्य मार्ग का अवलम्बन कर सके, साथ ही सृष्टि-प्रक्रिया में तत्त्वोत्पत्ति क्रम तथा पुरुष के मुक्तावस्था के स्वरूप ज्ञान के लिए आप्त प्रमाण को स्वीकार किया गया।[19]
  • डॉ. भट्टचार्य के मत के विषय में इतना ही वक्तव्य है कि सूत्र और कारिका में त्रिविध प्रमाणों का उल्लेख किया है और माना है समस्त प्रमेयों की सिद्धि इनसे हो जाती है। प्रमाणों का यह उल्लेख प्रमेयों के संदर्भ में है न कि प्रमाता या ज्ञाता के संदर्भ में। अत: जिसे एक प्रमाण से ज्ञान नहीं होता उसे अन्य प्रमाण से ज्ञान होगा ऐसा भाव ग्रहण करना समीचीन नहीं है। प्रमाणों के वर्गीकरण में प्रमाताओं का वर्गीकरण ग्रहण करने का कोई संकेत यहाँ नहीं है। डॉ. शिवकुमार का मत अधिक ग्राह्य प्रतीत होता है। यदि इतना और जोड़ दिया जाये कि परमात्मा का ज्ञान भी आप्तप्रमाण या वेदप्रमाणगम्य है तो अनुचित नहीं होगा, साथ ही अधिक सार्थक भी होगा। प्रकृति के विकारों का और पुरुष के प्रकृति से भिन्नत्व का ज्ञान तो अनुमान से भी सिद्ध होता है। इसी से पुरुष के मुक्तस्वरूप का भी ज्ञान हो जाता है। यदि इसमें आपत प्रमाण भी प्रयुक्त हो तो अनुमान से प्राप्त निष्कर्ष की पुष्टि हो जाती है। लेकिन प्रत्यक्ष और अनुमान से भी जो सिद्ध न हो-ऐसे प्रमेय की मान्यता की ओर संकेत करता है जो केवल शब्द, आप्त या वेद प्रमाणगम्य हो ऐसा तत्त्व परमात्मा ही है।

सदसत्ख्यातिवाद

भारतीय दर्शन में ख्यातिवाद भ्रम संबंधी मत के लिए प्रचलित हो गया है। भ्रम के स्वरूप के वर्णन भेद से ख्याति भेद भी हैं। भ्रम के एक उदाहरण के माध्यम से विभिन्न ख्याति संबंधी मतों के भेद को स्पष्ट किया जा सकता है। रज्जु-सर्प-भ्रम का दृष्टान्त भारतीय दर्शन में बहुत प्रचलित है। किसी स्थान पर पड़े हुए रज्जु को सर्प समझ लेना भ्रम है। ऐसा क्यों होता है कैसे होता है- इन प्रश्नों का उत्तर निम्नलिखित रूप में दिया जा सकता है-

  1. भ्रमस्थल पर सर्प नहीं है फिर भी प्रतीत हो रहा है यह असत सर्प है।
  2. कहीं न कहीं तो सर्प है सत है जिसकी प्रतीति हो रही है।
  3. भ्रमस्थल पर स्थिति रज्जु अन्यथा (सर्प) प्रतीत हो रही है।
  4. भ्रमस्थल पर सर्प न तो सत है न असत है अत: अनिवर्चनीय सर्प की प्रतीति हो रही है।
  5. प्रतीति सत और असत दोनों है।

सांख्य दर्शन सत्कार्यवादी है अत: उसके अनुसार असत की प्रतीति हो नहीं सकती है, अत: भ्रमस्थल पर 'असत सर्प है' कहना मान्य नहीं होगा। साथ ही बाध हो जाने पर वह सत भी नहीं है। सत और असत है और नहीं है एक साथ संभव नहीं है और वस्तु के बारे में इनके अतिरिक्त अन्य कुछ कहा भी नहीं जा सकता है। अत: अनिवर्चनीय सर्प की कल्पना भी नहीं की जा सकती। भ्रमस्थल पर जो वस्तु पड़ी है उसके स्थान पर अन्य वस्तु है कहना आत्मविरोधी स्थिति होगी। यह रज्जु है, यह ज्ञान भ्रमस्थाल पर होता है अत: भ्रमस्थल सर्प या ऐसा नहीं कहा जा सकता अत: सांख्य मत में सत और असत दोनों का एक साथ मानना ही संभव प्रतीत होता है।

  • सांख्य सूत्र कहता है- सदसत्ख्यातिर्बाधाबाधात्।[20]भ्रमस्थल पर वस्त्फरूपता का बाध नहीं होता लेकिन वस्तुविशेष का बाध भी होता है, अत: बाध-अबाध दोनों होने से सदसत्ख्याति मान्य है। भ्रमकाल में 'अयं सर्प:' का ज्ञान होता है। इसमें 'इर्द' का ज्ञान वस्तुरूप या वस्तुसत्ता का ज्ञान है- इसका बाध नहीं होता है। साथ ही 'सर्प' का ज्ञान भी होता है जो तत्काल वास्तव में नहीं होता जिसका बाध हो जाता है। लेकिन यह बाध सर्प का बाध न होकर स्थल विशेष पर सर्प का बोध होता है। इस तरह सांख्यमत में सदसत्ख्याति को स्वीकार किया जाता है। सांख्यकारिका में कहा गया है कि सत का ज्ञान उसके अत्यन्त सूक्ष्म, दूर, समीप होने से अथवा अन्यमनस्कता के कारण व्यवधान, अभिभव तथा साम्यग्रहण के कारण ही नहीं हो पाता है- रज्जु में उसकी लम्बाई, वक्राकार में पड़े रहना आकृति दृष्टता समानाभिहार होने से, तथा अपर्याप्त प्रकाशादि व्यवधान से सर्प प्रतीत होता है। सर्प भी पूर्व में प्रत्यक्ष किया गया है और आकृतिरूप में रज्जु के साथ साम्य होने से स्मृति प्रत्यक्ष को अभिभूत कर लेता है। इसीलिए सर्पज्ञान होता है।
  • भ्रम की इस प्रक्रिया को एक अन्य रीति से भी समझा जा सकता है। रज्जु की आकृति और लम्बाई आदि का ज्ञान हो तो जाता है तथापि उसके अन्य लक्षणों का ज्ञान नहीं होता है इसलिए भ्रम हो जाता है इस तरह अपूर्ण ज्ञान ही भ्रम है। अपूरृण ज्ञान भी सत ही होता है, असत नहीं। इस अपूर्ण ज्ञान में स्मृति ज्ञान मिला दिया जाय तो भ्रम का सद्सत रूप सामने आ जाता है। इस प्रकार सांख्यमत में सत्ख्यातिवाद भी मान्य हो सकता है। सत्ख्याति तथा सदसत्ख्याति जिस रूप में सांख्यसम्मत है- उसमें उक्तिभेद तो है तथापि विरोध नहीं है।
  • सांख्यमत में प्रकृति का विकार रूप बुद्धि सत है ओर सुख-दु:ख-मोहात्मक है, पुरुष भी सत है, असंग है। लेकिन इसके अपूर्ण ज्ञान के कारण तथा अभेद ज्ञान के कारण चैतन्य में सुख-दु:खादि का बोध होने लगता है। जब पूर्ण ज्ञान हो जाय और भेद या विवेकज्ञान हो जाय तब पुरुष त्रिगुणसंग से रहित केवल ज्ञान प्राप्त कर लेता है।

प्रमेय मीमांसा

प्रमेयों के बारे में विचार करने से पूर्व सत्कार्यवाद पर चर्चा अपेक्षित है। सभी दर्शन-सम्प्रदाय प्राय: सृष्टि को कार्य या परिणाम के रूप में ग्रहण करते हैं और इसके मूल कारण की खोज करते हैं। मूल कारण की खोज करने से पूर्व एक तथ्य विश्वास के रूप में होना अनिवार्य है। कारण की खोज करने से पूर्व कारण का अस्तित्व है, ऐसा विश्वास यदि न हो तो कारण की खोज निरर्थक होगी। कारण के अस्तित्व का यह विश्वास प्रत्यक्ष पर आधृत अनुमान का ही रूप है। मृत्तिका से घट तथा तिल से तेल का उत्पन्न होना प्रत्यक्ष सिद्ध है। यदि कुछ उत्पन्न हुआ है तो उत्पन्न होने से पूर्व उसकी कोई अवस्था अवश्य रहनी चाहिए। जिस तरह 'घट' बनने से पूर्व 'मृत्तिका' घट की पूर्वावस्था होती है, उसी तरह हर कार्य की उत्पत्ति किसी न किसी कारण से ही होनी चाहिए। यदि कार्य नहीं है या असत है तो उसकी उत्पत्ति की चर्चा भी निरर्थक होगी। अत: कार्य के सत होने या मानने पर ही कारण चर्चा या उत्पत्ति चर्चा का औचित्य है। सृष्टि के स्वरूप, लक्षण, धर्म आदि की चर्चा अवश्य की जा सकती है। भगवान कपिल कहते हैं- नासदुत्पादो नृश्रृंगवत्[21]। मनुष्य के सींग के समान असत वस्तु की उत्पत्ति नहीं होती। सांख्य दर्शन के सत्कार्यवाद का यही आधार है। सत्कार्यवाद के सिद्धान्त को सिद्ध करने के लिए अन्य चार हेतु सूत्रकार ने प्रस्तुत किया है-

उपादाननियमात्, सर्वत्र सर्वदा सर्वासम्भवात्।
शक्तस्य शक्यकरणात् तथा कारणभावात्।[22]

प्रत्येक कार्य का उपादान नियम होने से, सर्वत्र, हमेशा किसी भी एक कारण से सभी कार्यो की उत्पत्ति न होने से, विशेष शक्ति से सम्पन्न कारण ही विशेष कार्य को उत्पन्न करने में सक्षम होने से तथा कार्य का कारण भावात्मक होने से सत्कार्यवाद की सिद्धि होती है। कार्य यदि है तो वह कभी असत नहीं हो सकता। अत: कार्य सत है। साथ ही कार्य अपनी उत्पत्ति से पूर्व किसी रूप में या अवस्था में असत है तब भी कार्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती। अत: कार्य कारण रूप में भी पूर्व से ही सत्तावान है। मृत्तिका से घट उत्पन्न होता है, लेकिन घट की उत्पत्ति जल से नहीं होती। फिर मृत्तिका के अभाव में कुंभकार घट निर्माण भी नहीं कर सकता। अत: घट की उत्पत्ति के लिए उपादान जो घट में परिणत हो सके-होना आवश्यक तो है साथ ही, पद आदि अन्य कार्यों के लिए पृथक्-पृथक् उपादान की व्यवस्था है, इसीलिए यह भी लोकप्रसिद्ध है कि सभी कारणों से सभी कार्य हमेशा उत्पन्न नहीं होते हैं। कार्य उत्पन्न करने की विशेष क्षमता होने पर ही विशेष कार्य सम्पन्न होते हैं। यद्यपि मृत्तिका से घट उत्पन्न करने की विशेष क्षमता होने पर ही विशेष कार्य सम्पन्न होते हैं। यद्यपि मृत्तिका से घट उत्पन्न होता है तथापि पथरीली सूखी मिट्टी घट रूप में परिणत नहीं की जा सकती। मृत्तिका को एक विशेष रूप से साफ़ करके गीला करने पर ही 'घट' निर्माण होगा। घट बन जाने के बाद मृत्तिका का नाश नहीं हो जाता। मृत्तिका ही घट रूप में परिणत होती है। अत: कार्य में कारण के गुण भी विद्यमान रहते हैं ऐसा मानना होगा। इन सभी प्रत्यक्ष तथ्यों से यह सिद्ध होता है कि कार्य उत्पत्ति की शर्तों तथा कारण-कार्य सम्बन्ध के स्वरूप के आधार पर कार्य सत है ऐसा सिद्ध होता है।

इसीलिए सांख्यदर्शन में प्रत्यक्ष के विषयों के कारणों की खोज में कार्य के आधार पर न केवल कारण का अनुमान करते हैं वरन् कारण के लक्षणों या धर्मो का अनुमान करते हैं। समस्त प्रमेयों को सांख्य दर्शन में व्यक्त प्रकट अव्यक्त अप्रकट तथा 'ज्ञ' इन तीन वर्गों में बांटा गया है। फिर व्यक्त तथा अव्यक्त में साधर्म्य की चर्चा करते हुए पुरुष के साथ उनका साधर्म्य-वैधर्म्य भी बताया गया। प्रकट व्यक्त अप्रकट अव्यक्त तथा 'ज्ञ' रूप में प्रमेयों का वर्गीकरण प्रमाणों की ओर भी संकेत करता है। प्रत्यक्ष के द्वारा व्यक्त, अनुमान के द्वारा अव्यक्त, तथा 'ज्ञ' या क्षेत्रज्ञ (हमारे मत में सर्वज्ञ परमात्मा भी) का ज्ञान शब्दप्रमाण द्वारा होता है। प्राय: विद्वान अव्यक्त तथा व्यक्त पदों को सर्वत्र प्रकृति और उसके कार्य के ही अर्थ में ग्रहण करते हैं। क्योंकि अव्यक्त को पारिभाषिक शब्द समझा जाता है प्रकृति के अर्थ में। यह जानना रोचक होगा कि सम्पूर्ण सांख्य सूत्र ग्रन्थ में केवल एक बार ही इस शब्द का प्रयोग हुआ है।[23]प्रधान और प्रकृति का प्रयोग अनेकश: हुआ है। जिस सूत्र में अव्यक्त शब्द का प्रयोग हुआ है वहां यह नपुसंकलिंगी प्रयोग है जिसका अर्थ अप्रकट है। वहां कहा गया है (त्रिगुणात्मक लिंग जो कि प्रथम व्यक्ततत्त्व है) से अव्यक्त (अप्रकट कारण) का अनुमान होता है। इससे पूर्व सूत्र में कहा है- 'कार्यात् कारणानुमानं तत्साहित्यम्[24]' इससे अव्यक्त का अप्रकट अथवा कारण अर्थ ही स्पष्ट होता है। 'त्रिगुणात्' पद अव्यक्त रूप कारण को प्रकृति के अर्थ में ग्रहण कराने के लिए है। सांख्यकारिका में 'अव्यक्तम्' शब्द का प्रयोग 5 स्थानों पर हुआ है। जिनमें से दूसरी दसवी तथा चौदहवीं कारिका में अप्रकट के ही अर्थ में हुआ है। सोलहवीं कारिका में 'त्रिगुणत:' शब्द के प्रयोग से अप्रकट प्रकृति के अर्थ में, अठावनवीं कारिका में 'पुरुषस्य विमोक्षार्थ' होने से अप्रकट प्रकृति के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अभिप्राय यह है कि सूत्र/कारिका में प्रयुक्त अव्यक्त पद अप्रकट के अर्थ में हुआ है। प्रकृति के लिए इसका प्रयोग त्रिगुणसाम्यावस्था के अर्थ में किया गया है।

उपर्युक्त उल्लेख का आशय यह बताना मात्र है कि जहां भी अव्यक्त शब्द दिखे, उसे सीधे प्रकृति के अर्थ में ग्रहण न कर, अप्रकट के अर्थ में ग्रहण करने पर कारिका दर्शन की ऐसी व्याख्या संभव है जो महाभारत, गीता आदि में वर्णित सांख्य दर्शन के अनुरूप हो। साथ ही सांख्य तत्त्वों या प्रमेयों का उनके इष्ट प्रमाणों से सीधे संगति भी स्पष्ट हो सके। प्रत्यक्ष केवल व्यक्त का होता है यद्यपि व्यक्त केवल प्रत्यक्ष तक सीमित नहीं है; अव्यक्त तो अनुमान का विषय है ही। इसीलिए समस्त प्रमेयों को व्यक्त-अव्यक्त दो वर्गों में बांटा गया। इनके लक्षण इस प्रकार बताए गए हैं[25]-

  • व्यक्त हेतुमत् (कारणयुक्त) अनित्य, अव्यापि, अनेक, आश्रित, लीन होने वाला, सावयव, परतंत्र है। इसके विपरीत लक्षणों वाला अव्यक्त है अर्थात अव्यक्त अहेतुमत् (जिसका कोई कारण न हो) नित्य व्यापी, अक्रिय, एक, अनाश्रित (अपनी सला के लिए अन्य पर आश्रित न होना) अलिंग, (लीन न होने वाला) निरवयव, स्वतंत्र है।
  • व्यक्त के अन्य लक्षण हैं त्रिगुणत्व, अविवेकित्व, विषयत्व, सामान्यत्व, अचेतनत्व और प्रसवधर्मिता। प्रधान में भी ये लक्षण हैं। पुरुष उसके विपरीत है और समान भी। ग्यारहवीं कारिकोक्त 'तद्विपरीतस्तथाच पुमान्' की व्याख्या-संगति में प्राय: व्याख्याकार अस्पष्ट प्रतीत होते हैं। अव्यक्त से पुरुष का साधर्म्य –निरूपण करते समय व्यक्त के अनेक के विपरीत अव्यक्त को 'एक' कहकर पुरुष को अनेक कह दिया। अर्थात 'एकत्व' के अतिरिक्त शेष सभी लक्षण पुरुष पर घटित किए गए। ऐसा पुरुषबहुत्व की स्थापित सांख्यावधारणा के कारण किया गया प्रतीत होता है। इससे तो माठर और गौडपाद भी परिचित रहे होंगे। लेकिन इन दोनों व्याख्याकारों ने अव्यक्त के सभी लक्षणों को पुरुष पर घटित किया।
  • माठर का कथन है- तथा प्रधानसधर्मा पुरुष:। तथा हि ..निष्क्रिय एको 7 नाश्रिता..
  • गौडपाद का कथन है- अनेकं व्यक्तमेकमव्यक्तं तथा च पुमानप्येक:।

ऐसा प्रतीत होता है कि इन दोनों व्याख्याकारों को पुरुष की एकता और बहुत्व में कोई असंगति नहीं प्रतीत हुई होगी। ऐसा दो कारणों से हो सकता है। एक तो यह कि एकत्व से इनका अभिप्राय प्रत्येक पुरुष के अनेक जन्मों में एक बना रहना या फिर पुरुष की दो अवस्थाएँ या दो प्रकार के पुरुष तत्त्व को ये सांख्यसम्मत समझते हों। पहले अर्थ में शाब्दिक खींचतान ही अधिक प्रतीत होता है। जबकि दूसरे अर्थ को स्वीकार करने पर सांख्यदर्शन का रूप वेदान्त सदृश ही हो जाता है कि अव्यक्तावस्था में पुरुष एक रहता है। और व्यक्तावस्था में अनेक रूप प्रतीत होने लगता है[26]

  • एक तीसरी संभावना कारिकोक्त दर्शन के त्रेतवादी निरूपण का है[27]। यहाँ इतना ही ध्यातव्य है कि व्यक्त-अव्यक्त साधर्म्य-वैधर्म्य की प्रचलित परिपाटी निर्दोष नहीं है।
  • सांख्याभिमत प्रमेयों के प्रमाण वर्ग के आधार पर वर्गीकरण करने के उपरान्त अब सांख्यसम्मत 25 तत्त्वों की चर्चा की जाएगी। 'सत्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृति: प्रकृतेर्महान् महतोऽहंकारोऽहंकारात् पञ्चतन्मात्राण्युभयमिन्द्रियं, तन्मात्रेभ्य: स्थूलभूतानि पुरुष इति पचविंशतिर्गण:[28]'

मूलप्रकृतिरविकृतिमर्हदाद्या: प्रकृतिविकृतय: सप्त।
षोडषकस्तु विकारो ने प्रकृतिर्न विकृति: पुरुष:॥[29]
अष्टौ प्रकृतय: ॥ षोडषविकारा: ॥ पुरुष: ॥[30]

सत्व, रजत् तथा तमस की साम्यावस्था प्रकृति है, महत, अहंकार, पञ्चन्मात्राएँ, एकादशेन्द्रिय, पंचस्थूलभूत तथा पुरुष ये सांख्यसम्मत पच्चीस तत्त्व हैं। प्रकृति-पुरुष-विवेक (भेद) कहें या व्यक्तकव्यक्तज्ञ कहें-इनमें ये पच्चीस तत्त्व ही प्रमेय कहे गए हैं। त्रिगुण की साम्यावस्था प्रकृति है- ऐसा सांख्यकारिका में उल्लेख नहीं मिलता। संभवत: कारिका- रचना से पूर्व तक प्रकृति की अव्यक्त रूप 'गुणसाम्य' के रूप में प्रसिद्धि हो जाने के कारण कारिकाकार को ऐसा कहने की आवश्यकता नहीं रही होगी। यद्यपि मूलप्रकृति के लिए अविकृति पद के प्रयोग में यह अर्थ भी निहित है। 'महाभारत' के प्रकृति विषयक उल्लेखों में तथा 'तत्त्वसमाससूत्र' में अष्टप्रकृति की मान्यता का पता चलता है। कारिका में मूलप्रकृति के साथ सात और तत्त्वों को विकृति के साथ-साथ प्रकृति कहकर मान्यता के साथ सामंजस्य रखा गया है। षोडश विकारों के समूह का उल्लेख तत्त्वसमाससूत्र, महाभारत आदि तथा सांख्यकारिका में उपलब्ध है। पुरुष न तो प्रकृति (कारण) है न विकृति (कार्य) अब इन तत्त्वों का परिचय दिया जा रहा है।

प्रकृति

  • विज्ञानभिक्षु के अनुसार 'प्रकृष्टा कृति: परिणामरूपा अस्या इति व्युत्पते:'। प्रकृति के पर्याय शक्ति अजा, प्रधान, अव्यक्त, तम, माया, अविद्या, ब्रह्म, अक्षर, क्षेत्र हैं[31]। प्रकृति को सर्वत्र 'त्रिगुणात्मक' कहा गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रकृति नामक तत्त्व में तीन गुण हैं। भावागणेश इसे स्पष्ट करते हैं कि 'सत्त्वादिगुणवती सत्त्वाद्यतिरिक्ता प्रकृतिरिति तु न शङ्कनीयम्, किन्तु गुण एव प्रकृति:[32]....। गुणों की साम्यावस्था प्रकृति की अव्यक्तावस्था है। प्रकृति किसी अन्य का कार्य या विकार नहीं है। इसीलिए इसे अविकृति कहा गया है। यह समस्त अचेतन विकारों का मूल उपादान है।
  • त्रिगुणसाम्य की अवस्था प्रकृति कही गई है। साम्यावस्था प्रकृति की अव्यक्तावस्था है। साम्य-भंग या वैषम्यावस्था प्रकृति का नाश नहीं, व्यक्तोन्मुखता है। व्यक्तावस्था कार्य रूप है और अव्यक्तावस्था कारण रूप है। दोनों ही अवस्थाओं में अवस्थाभेद के कारण वैषम्य भी है और उपादानता के कारण साम्य भी। व्यक्ताव्यक्त साधर्म्य त्रिगुणत्व अविवेकित्व, विषयरूपता, अचेतनत्व सामान्यत्व तथा प्रसवात्मकता की दृष्टि से है।[33]यही लक्षण व्यक्त पदार्थों में सर्वत्र पाए जाते हैं। अत: एतद्द्वारा कारण रूप में भी इन लक्षणों का होना अनुमानगम्य है। सृष्टि कार्यावस्था है, इस आधार पर कारणावस्था के अनुमान में पांच हेतु दिए जाते हैं।[34]जगत के समस्त पदार्थ परिमित या सीमित हैं अत: इस सबका कारण अपरिमित या असीम, व्यापक होना चाहिए। समस्त पदार्थ सुख दु:ख मोहात्मक हैं। अत: इनका कारण भी त्रिगुणात्मक होना चाहिए। कार्य कारण की शक्ति से उत्पन्न होता है अत: शक्तिमती कारण होना चाहिए। कार्यकारण भेद लोक प्रसिद्ध है। सृष्टि कार्यरूप है, अत: कारण की इससे भिन्न सत्ता होनी चाहिए। जगत् के समस्त पदार्थ स्वरूपदृष्ट्या एक हैं। अत: इस नानात्व का कारण भी एक होना चाहिए। इस तरह न केवल कार्य से कारण की सत्ता सिद्ध होती है वरन् कार्य के लक्षणों के ही आधार पर कारण के लक्षणों का भी अनुमान हो जाता है।
  • अव्यक्त रूप में प्रकृति एक है लेकिन व्यक्त रूप में वह अनेक है। व्यक्त रूप में अनेक कहने का आशय यह है कि त्रिगुण परस्पर क्रिया से अनेकाश: तत्त्वोत्पत्ति करते हैं।
  • अव्यक्त प्रकृति एक है या अनेक-संख्यात्मक दृष्टि से इस प्रश्न का उत्तर देना संभव नहीं है। तालाब में एकत्र जल को एक कहें या अनेक? जलकण अनेक होते हुए भी तालाब में दो जल हैं, तीन जल है या असंख्य जल हैं कहना जितना विचित्र है उतना ही विचित्र प्रकृति को एक या असंख्य कहना है। सार की दृष्टि से एकरूपता अवश्य कही जा सकती है।

गुण

प्रकृति त्रिगुणात्मक कही गई है। यदि गुणों में परस्पर एकरूपता और साधर्म्य हो तो विषम सृष्टि संभव नहीं होगी, कार्य के कारण गुणात्मक होने से। लेकिन विषम सृष्टि तो प्रत्यक्ष सिद्ध है। अत: कारणभूत गुणों में भी वैषम्य अनुमित है। इसलिए इस वैषम्य या वैधर्म्य का निरूपण करते हुए ईश्वरकृष्ण कहते हैं-

प्रीत्यप्रीतिविषादात्मका: प्रकाशप्रवृलिनियमार्था:।
अन्योन्याभिभमवाश्रयजननमिथुनवृत्तयश्च गुणा:॥ -(कारिका-12)

  • प्रीति, अप्रीति, विषाद आदि[35] से प्रतीत होता है कि सूत्रकार प्रीति-अप्रीति के अतिरिक्त अन्य लक्षणों की ओर सकेत कर रहे हैं।
  • शांति पर्व अध्याय 212 में तीन गुणों के अन्य लक्षणों को इस प्रकार बताया गया है-

सम्मोहकं तमो विद्यात् कृष्णमज्ञानसम्भवम्।
प्रीतिदु:खनिबन्द्धाश्च समस्तांस्त्रीनथो गुणान्॥21॥
सत्त्वस्य रजसश्चैव तमसश्च निबोध तान्।
प्रसादो हर्षजाप्रीतिरसंदेहो धृति: स्मृति:॥
एतान् सत्त्वगुणान् विद्यादिमान् राजसतामसान्॥22॥
कामक्रोधौ प्रमादश्च लोभमोहौ भयं क्लम:।
विषादशोकावरतिर्मानदर्पावनार्यता ॥23॥
प्रर्वत्तमानं रजस्तद्भावेनानुवर्तते।
प्रहर्ष: प्रीतिरानन्द: सुखं सशान्तचिलता॥25॥
कथंचिदुपपद्यन्ते पुरुषे सात्त्विका गुणा:।
परिदाहस्तथा शोक: संतापो पूतिरक्षमा॥26॥
लिंगानि रजस स्तानि दृश्यन्ते हेत्वहेतुभि:।
अविद्यारागमोहौ च प्रमाद: स्तब्धता भयम्॥27॥
असमृद्धिस्तथा दैन्यं प्रमोह: स्वप्नतन्द्रिता।
कथंचिदुपवर्तन्ते विविधास्तामता गुणा:॥28॥

  • इस तरह प्रीति आदि का अर्थ प्रीति, हर्ष, आनन्द, सुख, शान्तचित्रता आदि, अप्रीति आदि में अप्रीति के साथ शोक सन्ताप, दु:ख, काम, क्रोध, आदि, अविद्या, राग, मोह, विषाद, आदि विषादादि से ग्रहण करना चाहिए। गुणों के ये असंख्य रूप संसार में मनुष्य द्वारा ज्ञेय या अनुभूयमान हैं।
  • इन्हें मुख्यरूप से तीन वर्गों में बांटा गया है। सत्त्व, रजस, तमस इनके नाम हैं। ये गुण जब क्रियाशील या प्रवृत्त होते हैं तब एक दूसरे के साथ प्रतिक्रिया करते हुए नानाविध कार्यों को उत्पन्न करते हैं। मुख्यरूप से इन गुणों का स्वरूप लक्षण क्रमश: प्रकाशन, प्रवर्त्तन और नियमन हैं। तीनों गुण दीपक (कपास तेल-अग्नि के मेल) की तरह कार्य करते हैं। इनकी कार्य-प्रणाली को अन्योन्य आश्रय, अन्योन्य अभिभव, जनन, मिथुन और अन्योन्य व्यापार द्वारा समझाया गया। जैसे सत्त्व गुण अन्य दोनों गुणों को अभिभूत करके अपने स्वभाव को उन पर आवृत कर देता है, उसी तरह तीनों गुण परस्पर आश्रय लेकर नए स्वरूप को प्रस्तुत करते हैं। तीनों गुण परस्पर मिलकर किसी एक गुण प्रधान वाले कार्य को उत्पन्न करते हैं। कभी-कभी ये गुण एक दूसरे की वृत्तियों के अनुसार कार्य करने लगते हैं। इस तरह सृष्टि के समस्त कार्यों में तीनों गुण अनिवार्यत: विद्यमान रहते हैं।

प्रकृति के विकार

  • प्रकृति अव्यक्त है। उसके व्यक्त होने की प्रक्रिया गुणक्षोम या साम्यभंग से शुरू होती है। न तो कारिका में न ही सूत्रों में गुणक्षोभ का कहीं उल्लेख है। संभवत: बहुप्रचलित होने से उल्लेख आवश्यक न समझा गया हो। अव्यक्त के व्यक्त होने में प्रथम सोपान महत या बुद्धि तत्त्व है। महत से अहंकार, अहंकार से सोलह विकार, तथा उनमें से पंचतन्मात्र से पांच स्थूलभूत व्यक्त होते हैं।
  • सांख्य सूत्र में 'पंचतन्मात्राणि उभयमिन्द्रियं' कहकर[36] पांच और ग्यारह तत्त्वों के दो समूह को स्वीकार किया है। कारिका में भी अहंकार से सोलह तत्त्वों का समूह उत्पन्न होना बताकर उनमें से पांच से पंचभूत कहा गया है। लेकिन अहंकार में 'द्विविध: प्रवर्तते सर्ग:[37]' कहकर षोडश विकारों को दो वर्गों में बांटा गया है। इस तरह षोडश विकारों को दो समूहों में बांटने का विशेष उद्देश्य होना चाहिए। हमारे विचार से यह वर्गीकरण दो आधारों पर किया गया है। एक तो तत्त्वों के स्वरूप के आधार पर। स्वरूपत: पंचतन्मात्र कार्य होने के साथ-साथ कारणरूप भी है। जबकि एकादशेन्द्रिय केवल कार्यरूप हैं। दूसरा आधार उत्पत्ति के उपादान की भिन्नता। एकादशेन्द्रिय का प्रमुख उपादान सत्त्व गुण है जबकि तन्मात्र का प्रमुख उपादान तमोगुण है।

महत या बुद्धि

  • प्रकृति का प्रथम विकार महत या बुद्धि है। सत्त्व प्रधान होने से यह अन्य तत्त्वों की तुलना में अधिक पारदर्शी होती है। इसीलिए पुरुष के भोग-ज्ञान होनों ही बुद्धि द्वारा सम्पादित किए जाते हैं। विभिन्न इन्द्रियों के भिन्न-भिन्न विषय होने से, विषय विशेष तक इन्द्रिय शक्ति के सीमित होने से, समग्र रूप से ज्ञान बुद्धि वृत्ति के ही रूप में संभव है। इन न्यूनतम जगत-ज्ञान के बिना भोग संभव नहीं है। यही कारण है कि सर्वप्रथम कार्य के रूप में बुद्धि को स्वीकार किया गया है। साथ ही अव्यक्त से व्यक्त स्थूलभूत तक सूक्ष्म से स्थूल की ओर सर्ग प्रक्रिया भी प्रत्यक्षगम्य दृष्टान्तों द्वारा स्थापित की जा सकती है। बीज सूक्ष्म वस्तु है और उत्पन्न वृक्ष क्रमश: विकसित कार्य है।
  • बुद्धि को अध्यवसायात्मक स्वीकार किया है। अध्यवसाय अर्थात निश्चय करना बुद्धि का लक्षण है।[38]निश्चय ही मूल्यदृष्टि या मूल्य-अंकन उसके गुणों (सत्त्वादि) के आधार पर किया जा सकता है। निश्चय का यह मूल्यांकित रूप ही बुद्धि के कार्य[39]अथवा रूप[40]कहे जा सकते हैं। सत्त्वाधिक्य निश्चय के रूप है ज्ञान, वैराग्य, धर्म और ऐश्वर्य। तमोगुण प्रधान निश्चय के रूप हैं अज्ञान, राग, अनैश्वर्य।
  • बुद्धि या महत एक है या अनेक इस पर सूत्र अथवा कारिका में कोई स्पष्ट विचार प्राप्त नहीं होता है। लेकिन पुरुष बहुत्व के आधार पर बुद्धितत्त्व का संयोग हो जाता है। बुद्धि और पुरुष के इस संयोग के उपरान्त ही भोक्ता पुरुष के लिए भोग साधन (इन्द्रिय) और भोग विषयों की उत्पत्ति होती है। बुद्धि और पुरुष का यह संयोग सर्गकाल में बना ही रहता है। केवल एक ही अवस्था में, जब पुरुष केवल ज्ञान प्राप्त कर लेता है तब ही लक्ष्य पूरा हो जाने या पुरुषार्थ रूप प्रयोजन सिद्ध हो जाने से बुद्धि अपने मूल कारण में लीन हो जाती है।[41]हमारे विचार से सर्गकाल में तो पुरुष और बुद्धि के संयोगहीन अवस्था की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। शांति पर्व[42]में यही बात कही गई है-

पृथग्भूतौ प्रकृत्या तौ सम्प्रयुक्तौ च सर्वदा।
यथा मत्स्योऽद्भिरन्य: स्यात् सम्प्रयुक्तौ तथैव तौ

अहंकार

  • महत से या महत के अनन्तर अहंकार की उत्पत्ति होती है। इसका लक्षण है अभिमान।[43]बुद्धि में 'मैं-मेरा' का भाव ही अभिमान है। इसका अर्थ यह होगा कि अहंकार बुद्धि की ही एक विशेष अभिव्यक्ति है। अहंकार त्रिगुणात्मक अचेतन तत्त्व है। अभिमान करना अचेतन का लक्षण नहीं हो सकता। अभिमान 'मैं' की ज्ञानपूर्वक अवस्था है। बुद्धि भी अचेतन तत्त्व है। अत: उसे भी सीधे अहंकार उत्पन्न करने वाला नहीं कहा जा सकता। तथापि उपादान रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
  • सांख्यसूत्रों तथा कारिकाओं के सभी व्याख्याकारों ने अभिमान को समझने के लिए 'मैं हूँ' 'मैं कर्ता हूँ' आदि प्रकार के भावों को ही प्रस्तुत किया।
  • श्रीगजानन शास्त्री मुसलगांवकर के अनुसार 'अहम् यानी मैं' की भावना को जो पैदा करता है उसे अहंकार कहा गया है।[44] इन सभी कथनों में 'अहम्' भाव अहंकार नामक अचेतन तत्त्व का लक्षण स्वीकार किया गया है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? 'अहम्' भाव पुरुष का एक प्रकार का भाव है। पुरुष का स्व-अस्तित्व-बोध ही अहंभाव है। तब इसे अचेतन का लक्षण कहना उचित नहीं प्रतीत होता। हमारे विचार से पुरुष का बुद्धि से संयोग होने पर पुरुष को होने वाला सर्वप्रथम ज्ञान 'अहम्बोध' है।
  • सांख्यदर्शन में 'ज्ञान' पौरुषेय बोध तो है ही। अत: अभिमान पुरुषबोध के रूप में स्वीकार करना होगा। सांख्यमत में अहंकार की उत्पत्ति बुद्धि से बताई गई है। अत: यह कहा जा सकता है कि बुद्धि से चेतन पुरुष-संयोग होने पर बुद्धि की पुरुषविषयक जो वृत्ति होती है वही अभिमान है। अत: अहंकार वस्तुत: बुद्धि ही है। दोनों में भेद उपादान भूत गुण सत्त्वादि के भेद से है। साथ ही बुद्धि अचेतन है जबकि अहंकार चिज्जड़ रूप है। अहंकार में चिदंश पुरुष का है और जडांश त्रिगुणात्मक है। पुरुष चूंकि स्वरूपत: भोक्ता है अत: बुद्धि से संयुक्त होते ही उसमें भोगोन्मुख योग्यता प्रस्फुटित होने लगती है जिसके परिणामस्वरूप ही भोग साधनभूत अन्य तत्त्वों की उत्पत्ति आरंभ होती है। इसके परिणाम स्वरूप अकर्ता होते हुए भी पुरुष कर्ता हो जाता है और अचेतन होते हुए भी लिगम या बुद्धि चेतनावत हो जाती है।[45]
  • अहंकार के जड़ांश से दो प्रकार की सृष्टि होती है। प्रथम प्रकार तो अविशेष रूप तन्मात्र सर्ग है जो तामस अहंकार से व्यक्त होता है और द्वितीय एकादशेन्द्रिय की सृष्टि है जिसे सात्त्विक अहंकार से उत्पन्न कहा गया है।[46] राजस अहंकार से दोनों की ही उत्पत्ति कही गई है।
  • एकादशेन्द्रिय— पांच ज्ञानेन्द्रियाँ, पांच कर्मेन्द्रियाँ, तथा मन ये ग्यारह इन्द्रियाँ अहंकार से होने वाली एक प्रकार की सृष्टि है। सांख्यकारिका के सभी टीकाकारों ने इन्हें सात्विक अहंकार या वैकृत अहंकार से उत्पन्न माना है, जबकि विज्ञानभिक्षु न केवल मन को सात्विक अहंकार तथा अन्य दस इन्द्रियों को राजस अहंकार से उत्पन्न माना है। उन्होंने 'एकादशकम्' को 'ग्यारह' के बजाये 'ग्यारहवां' के अर्थ में ग्रहण किया और ग्यारहवां इन्द्रिय मन को ही सात्त्विक माना है।[47]अपने मत के समर्थन में उन्होंने भागवत पुराण तथा सांख्यकारिका दोनों को उद्धृत किया है।
  • विज्ञानभिक्षुकृत ऐसा अर्थ न तो कारिका सम्मत है और न ही सूत्र सम्मत। सांख्यसूत्र[48] में अहंकार के कार्य के बारे में एकादश पंचतन्मात्र ऐसा कहा गया। इससे सूत्रकार की यह भावना स्पष्ट हो जाती है कि उनका आग्रह एकादश इन्द्रियों को एक ही समूह में रखने का है। तब दस और एक के दो समूह या गण मानने का औचित्य नहीं रह जाता। फिर, सूत्रकार ने राजस अहंकार से अन्य दस इन्द्रियों की उत्पत्ति कहीं नहीं दिखाई। इन्द्रियों के उत्पत्ति ज्ञापक एक ही सूत्र है जिसमें एकादश इन्द्रियों की ही उत्पत्ति बताई गई है।
  • कारिका में जो 'तैजसादुभयम्' कहा गया है उससे ज्ञानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय 'उभय' का अर्थ ग्रहण नहीं होता, क्योंकि इससे पूर्व की कारिका में स्पष्टत: द्विविध सर्ग की उत्पत्ति स्वीकार की गई। फिर 'तेजसादुभयम्' सात्त्विक और तामस सर्ग के बाद उल्लेख के बाद कहा गया है। इससे यही अर्थ निकलता है कि सात्त्विक और तामस अहंकार से जो द्विविध सर्ग प्रवर्तित होते होते हैं, वे दोनों ही राजस (तेजस) से उत्पन्न होते हैं।
  • चक्षु, श्रोत्र, जिह्वा (रसना) घ्राण तथा त्वक- ये पांच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। जिनके विषय क्रमश: रूप, शब्द, रस, गन्ध तथा स्पर्श हैं।
  • वाक्, पाणि, पाद, पायु तथा उपस्थ- ये पांच कर्मेन्द्रियाँ हैं जिनके कार्य क्रमश: वचन, ग्रहण या पकड़ना गमन चलना, मलोत्सर्ग तथा प्रजनन है।
  • मन को ज्ञानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय दोनों ही कहा गया है।[49]
  • बुद्धि, अहंकार तथा एकादश इन्द्रियों को करण या साधन कहा जाता है। इनमें से बुद्धि अहंकार तथा मन-इन तीनों को अन्त:करण कहा गया है शेष दस बाह्य करण हैं।[50]इन करणों के कार्य हैं आहरण (ग्रहण करना), धारण करना तथा बुद्धि का कार्य प्रकाशित करना है। ये त्रयोदश करण अपनी-अपनी स्वाभाविक वृत्ति के अनुसार स्वयं ही कार्य करते हैं।

पंचतन्मात्र

  • तामस अहंकार से पंचतन्मात्रों की उत्पत्ति होती है। तन्मात्र वास्तव में केवल 'है' कहे जा सकते हैं। इनमें रूपादि विशेष लक्षण नहीं होते वरन् विषयों की ये सूक्ष्म अवस्थाएँ हैं। इसलिए इन्हें अविशेष कहा जाता है। ये पांच तन्मात्र हैं शब्द, रूप, रस, गन्ध तथा स्पर्श।
  • इन अविशेष तन्मात्रों से स्थूल भूतों की उत्पत्ति होती है। ये स्थूल भूत इन्द्रियग्राह्य विषय होते हैं। शब्द तन्मात्र से आकाश, रूप तन्मात्र से तेज, रस से अप (जल) गन्ध से पृथ्वी तथा स्पर्श तन्मात्र से वायु की उत्पत्ति होती है।
  • उपर्युक्त तत्त्वों में से सत्रह तत्त्वों का संघात (बुद्धि, अहंकार, पञ्च तन्मात्र तथा दस इन्द्रियाँ) सूक्ष्म शरीर कहा जाता है। स्थूलभूत युक्त होने पर यह शरीर स्थूल शरीर कहलाता है। स्थूल भूत तथा एकादश इन्द्रियाँ केवल कार्य हैं कारण नहीं। इस प्रकार मूल प्रकृति से लेकर पांच स्थूल भूत तक चौबीस तत्त्व प्रकृति और उसके विकार है और पच्चीसवां तत्त्व पुरुष है।

पुरुष

  • सांख्य दर्शन में जड़ और चेतन दो मूल तत्त्वों को स्वीकार किया गया है। इसीलिए तत्त्वमीमांसीय दृष्टि से इसे द्वैतवादी कहा जाता है। जड़ या अचेतन तत्त्व को प्रकृति कहा गया है। नाना रूपात्मक विषम सृष्टि में प्रकृति या मूल अचेतन तत्त्व को सक्षम मानते हुए भी चेतन के सान्निध्य, प्रेरणा, या साहाय्य के बिना अचेतन स्वत: प्रवृत्त होता है, ऐसा सांख्यदर्शन में नहीं माना जाता। इसीलिए भारतीय दर्शन-परम्परा में इसे जड़वादी नहीं माना गया। उस चेतन तत्त्व को सांख्यदर्शन में पुरुष कहा गया है। शरीर रूपी पुर में निवास करने वाला तत्त्व होने से शरीरभिन्न सत्ता को पुरुष या पुमान कहा गया है।[51]
  • सांख्य शास्त्रीय साहित्य में चेतन या आत्मा के लिए पुरुष शब्द के प्रयोग का आग्रह अधिक देखा जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि सांख्यदर्शन में निरपेक्ष चेतना को प्रमेय रूप में स्वीकार करने में संकोच किया जाता है। बिना अचेतन शरीर के चेतना का अनुमान संभव नहीं है। सांख्य चूंकि मुख्य रूप से प्रत्यक्षानुमानाश्रित तर्कमूलक दर्शन है, अत: उसकी यह विवेचना-विधि उचित ही है। चेतना के बारे में जब भी कुछ कहा जाएगा; वह अचेतन की अपेक्षा से ही कहा जाएगा।
  • सांख्यसूत्र और कारिका में पुरुष के अस्तित्व में दिए गए हेतुओं से यह बात स्पष्ट हो जाती है। पुरुष या पुमान् को व्यक्त के समान तथा विपरीत भी कहा गया है।[52]त्रिगुण अचेतन, विषय, सामान्य, तथा प्रसवधर्मी के विपरीत पुरुष अत्रिगुणादि है। पुरुष के अस्तित्व की सिद्धि में हेतु इस प्रकार दिए गए हैं।[53]
  • संघातपरार्थत्वात्— संघात रूप समसत पदार्थ हमेशा अन्य के लिए होने से वह अन्य संघात से भिन्न होना चाहिए। वह चेतन पुरुष है। संसार में देखा जाता है कि बिस्तर, खाट आदि अचेतन पदार्थों की संहिति स्वयं उनके लिए नहीं बल्कि अन्य के लिए होती है। उसी प्रकार त्रिगुण संहिति, महत, अहंकार, तन्मात्रादि की संहति भी स्वयं उनके प्रयोजन के लिए न होकर अन्य के लिए होती है। वह अन्य ही पुरुष कहा जाता है।
  • त्रिगुणादिविपर्ययात्- वह 'अन्य' जिसके लिए त्रिगुणादि संहति होती है त्रिगुणादि से विपरीत होना चाहिये। लोक में यह देखा जाता है कि मेज, कुर्सी के लिए, या बिस्तर खाट के लिए नहीं होते हैं। इनका उपयोग करने वाला इनके लक्षणों के विपरीत ही होता है, अर्थात चेतन ही होता है। अत: अचेतन त्रिगुणात्मक से विपरीत होने से पुरुष की सिद्धि होता है।
  • अधिष्ठानात्- अचेतन की प्रवृत्ति के लिए चेतन अधिष्ठान की अपेक्षा होने से भी चेतन पुरुष की सिद्धि होत है। इस तीसरे हेतु के बाद सांख्यसूत्र में हेतु समाप्त सूचक 'चेति' को जोड़ा गया है (अधिष्ठानात्)। प्रश्न उठता है कि यदि पुरुष के अस्तित्व की सिद्धि में पांच हेतु देना अभीष्ट था, तब तीन हेतुओं के बाद समाप्ति बोधक पदों का उपयोग क्यों किया गया? सांख्यप्रज्ञा के लेखक के अनुसार इन तीनों हेतुओं में भोक्तृभाव तथा कैवल्यार्थ प्रवृत्ति अनिवार्यत: निहित नहीं है। जिस प्रकार इनकी व्याख्या प्रचलित है, इसमें अवश्य भोक्तृभाव निहित है। तब सूत्रकार को हेतु-समाप्ति का संकेत देना ही नहीं था। वास्तव में ये हेतु अनिवार्यत: जीवात्मबोधक नहीं है, जबकि शेष दोनों हेतु[54]स्पष्ट भोक्ता चैतन्य की सिद्धि करते हैं। इस स्थल पर कारिका व्याख्या में 'प्रज्ञाकार' परमात्मा जीवात्मा दोनों की सिद्धि मानते हैं।[55]गजाननशास्त्री मुसलगांवकर त्रिगुणादि विपयर्यात् तथा अधिष्ठानाच्चेति सूत्रों से जीवात्मा और परमात्मा दोनों की सिद्धि मानते हैं।[56]
  • भोक्तृभावात्- चेतन प्राणि मात्र में भोक्तृभाव होने से भी भोक्ता जो कि निश्चित रूप से अचेतन नहीं होता-का चेतन अस्तित्व सिद्ध होता है।
  • कैवल्यार्थ प्रवृत्तेश्च- त्रिगुणात्मक पदार्थ तो सुख-दु:ख मोहात्मक है। अत: भोक्तृभाव उनमें हो तो दु:ख-निवृत्ति हेतु प्रवृत्ति ही नहीं होगी। लेकिन प्राणिमात्र दु:ख-निवृत्ति हेतु प्रवृत्त होता है। अस्तु दु:खनिवृत्ति या कैवल्यप्राप्ति के लिए प्रवृत्ति पायी जाने से भी केवल स्वरूप चेतन तत्त्व की सिद्धि होती है।

  • सांख्यकारिका तथा सांख्यसूत्रों के प्राय: व्याख्याकार इन पांच हेतुओं से जीवात्मा-पुरुष की सत्ता की सिद्धि को निरूपित करते हैं। सांख्य मत में पुरुष बहुत्व को स्वीकार किया जाता है[57]तदनुसार जन्म-मरण तथा इन्द्रियों की व्यवस्था प्रत्येक शरीर की स्वतंत्र होने के पुरुष बहुत्व की सिद्धि होती है[58]साथ ही त्रिगुण तथा उनके अन्योन्य प्रवृत्ति से जो भिन्न-भिन्न पुरुषों में भिन्न गुण परिलक्षित होते हैं, इससे भी पुरुष बहुत्व का निरूपण होता है।[59]प्रचलित व्याख्याओं के अनुसार इस प्रसंग में सांख्यकारिका में केवल पुरुष के बहुत्व की सिद्धिमात्र है, उसके स्वरूप का निरूपण नहीं। एक जन्म, मृत्यु इन्द्रिय से युक्ति (शरीर) के आधार पर एक ओर जहां पुरुष बहुत्व की सिद्धि की गयी है, वहीं यह निरूपण भी स्वयमेव हो जाता है कि पुरुष जन्म, मृत्यु और त्रिगुण से प्रभावित होता है। सांख्यमत में पुरुष और कैवल्य हेतु शरीरों में संसरणशील है। इससे उसके चैतन्य स्वरूप पर आक्षेप नहीं होता[60]पुरुष का असंग और केवल होना ही उसकी त्रिगुण भिन्नता का द्योतक मात्र है। त्रिगुण के साथ संयुक्ति में अथवा भोगापवर्गप्रवृत्ति में चैतन्य स्वरूप में विकृति नहीं आ जाती। अस्तु, जिन हेतुओं से पुरुष बहुत्व की सिद्धि की गई उन्हें केवल बद्ध पुरुष की ही सिद्धि मानना उचित प्रतीत नहीं होता।
  • ईश्वरकृष्णकृत 19वीं कारिका में पुरुष में कैवल्य, माध्यस्थ्य साक्षित्व, द्रष्टृत्व, अकर्तृत्व आदि की सिद्धि की गई है। प्रचलित मतानुसार यह पुरुष जिनके बहुत्व की सिद्धि 18वीं कारिका में की गई है- के ही धर्मों का निरूपण है। यहाँ उसके मुक्तस्वरूप का वर्णन किया गया है। ऐसा संभवत: इसलिए माना जाता है, क्योंकि केवल अकर्ता, साक्षीभाव आदि स्वरूप वाले पुरुष का जन्म, मृत्यु आदि के आधार पर बहुत्वसिद्धि असंगत प्रतीत होती है।
  • प्रकृति-पुरुष-संयोग— सांख्याशास्त्र के प्रचलित व्याख्या-ग्रन्थों के अनुसार प्रकृति और पुरुष में पंगु-अन्धवत संयोग होता है और इस संयोग से सर्गारम्भ होता है। जिस तरह पंगु और अन्ध दोनों परस्परापेक्षी होकर गन्तव्य की ओर अग्रसर होते हैं, उसी तरह प्रकृति और पुरुष परस्परापेक्षी होकर सर्गोन्मुख होते हैं। भोक्तृभाव होने से पुरुष की सर्गोन्मुखता वास्तव में भोगोन्मुखता ही है। व्यक्त होना प्रकृति की सर्गोन्मुखता है। पुरुष पंगु (अविकारी) है अत: नानाविध पदार्थों का वह कर्ता नहीं है। वह अन्धे (जो चलने वाला है) के आश्रय से संसरण करता है। प्रकृति अन्धी है। अत: लक्ष्य (उद्देश्य) का उसे ज्ञान नहीं होता। वह विकारी है, अत: पंगु के मार्गदर्शन में वह कार्य करती है। सांख्य के इस दृष्टान्त की आलोचना प्राय: यह कहकर की जाती है कि पंगु और अन्ध दोनों ही चेतन है जबकि प्रकृति और पुरुष परस्पर विपरीत धर्म वाले हैं। अत: दृष्टान्त अनुपयुक्त है। वास्तव में दृष्टान्त केवल यह बताने के लिए दिया गया है कि पंगु और अन्ध की तरह प्रकृति-पुरुष परस्परापेक्षी है। इससे अधिक साम्य दिखाना अभीष्ट नहीं है। अत: आलोचना सार्थक नहीं कही जा सकती।
  • इस प्रकार प्रचलित मतानुसार सांख्य दर्शन में असंग त्रिगुणातीत चैतन्य स्वरूप सत्ता पुरुष स्वीकार्य है। यहाँ पुरुष को भोक्तारूप में स्वीकार किया गया है। साथ ही भोक्तृभाव के अवास्तविक या मिथ्या होने का संकेत भी कहीं नहीं है। सांख्यमत में तो चित या चैतन्य में विषयों का अवसान ही भोग है। अत: 'भोग' से चिदंश को अलग नहीं किया जा सकता। फिर भोक्तृत्व पुरुष के अस्तित्व में हेतु है और किसी अवास्तविक या मिथ्या लक्षण को हेतु बनाया गया होगा- ऐसा मानना भी उचित नहीं है। सत्कार्यवादी के लिए यदि पुरुष स्वरूपत: भोक्ता नहीं है तो उसमें भोक्तृभाव कल्पित भी नहीं किया जा सकता है। लेकिन यदि पुरुष सत्य ही भोक्ता है तब सांख्यदर्शन के प्रचलित मत पुरुष न बंधता है न संसरण करता है न ही मुक्त होता है- अवश्य ही विचारणीय होना चाहिए।

मोक्ष मीमांसा

  • दु:खों की अत्यन्त निवृत्ति रूप पुरुषार्थ ही विवेक का केन्द्रीय लक्ष्य है। लेकिन इसका यह आशय नहीं है कि सांख्य दर्शन संसार को केवल दु:खमय मानकर संसार से ही निवृत्ति को लक्ष्य मानता हो। सुख मात्रा व तीव्रता में कितना भी अल्प क्यों न हो, उसे त्याज्य नहीं कहा गया। साथ ही एक तर्कप्रधान दर्शन से ऐसी अपेक्षा भी नहीं को जानी चाहिए कि वह ऐसा लक्ष्य स्वीकार करे जो कहीं प्रत्यक्ष में संकेतित न होता है। जीवेषणा और सुख-भोगेच्छा तो चेतना-स्वभाव है। स्वभाव के त्याग को कल्पना भी भला की जा सकती है? हां, प्राणी मात्र की दु:ख से निवृत्ति हेतु व्याकुलता अवश्य प्रत्यक्ष सिद्ध है। अत: सांख्य दर्शन में मोक्ष का अर्थ दु:ख निवृत्ति ही है। इसे कुछ पाने के रूप में लेकर कुछ त्यागने के अर्थ में ग्रहण करना चाहिए। न तो पुरुष का प्रकृति से संयोग बन्धन है और न ही प्रकृति-पुरुष-वियोग मोक्ष है। जीवन के लक्ष्य या पुरुषार्थ रूप मोक्ष केवल दु:ख से मुक्ति मात्र है।
  • सांख्य मत में त्रिविध दु:ख कहे गए हैं-
  1. आध्यात्मिक,
  2. आधिदैविक तथा
  3. आधिभौतिक।
  • आध्यात्मिक दु:ख दो प्रकार का है-
  1. शरीरिक तथा
  2. मानसिक[61] वात, पित्त, कफ की विषमता से उत्पन्न दु:ख शारीरिक दु:ख है।[62]
  • सांख्यकारिका के व्याख्याकारों ने मानसिक दु:ख के अन्तर्गत काम, क्रोधादि से उत्पन्न दु:ख, प्रिय से वियोग तथा अप्रिय से संयोग आदि के कारण उत्पन्न दु:खों को सम्मिलित किया है। दु:खों के समस्त वर्गीकरण दु:ख उत्पादक कारणों के वर्गीकरण पर आधारित है अन्यथा समस्त दु:ख तो मन के अनुभव रूप ही हैं।[63]
  • सृष्टि में पुरुष के लिए दु:ख स्वभाविक है। ईश्वरकृष्ण कहते हैं-

तत्र जरामरणकृतं दुखं प्राप्नोति चेतन: पुरुष:।
लिंगस्याविनिवृत्तेस्तस्माद् दुखं स्वभावेन॥[64]

  • तत्र (सृष्टि में) लिंग या लिंग शरीर या बुद्धि से निवृत्ति पर्यन्त पुरुष के लिए दु:ख स्वाभाविक है। बन्धन-जिस अवस्था से मुक्ति का लक्ष्य पुरुषार्थ है वही अवस्था बन्धना है। सांख्यमत में निर्विवादत: दु:ख से मुक्ति को लक्ष्य माना गया है। अत: दु:ख ही बन्धन है। पुरुष को असंग, अपरिणामी चैतन्यस्वरूप कहा गया है। अत: ऐसे स्वरूप वाले पुरुष का दु:खी होना या बन्धन में पड़ना संभव नहीं है। दूसरी ओर दु:खों को भोक्ता होना भी कैवल्यार्थप्रवृत्ति से स्पष्ट है। तब बन्धन का स्वरूप क्या होगा? सांख्यमत में प्रकृति-पुरुष-विवेक से दु:ख निवृत्ति होती है। अत: अविवेक को ही दु:ख का ही कारण समझना होगा। लेकिन विज्ञानभिक्षु के अनुसार अविवेक भी संयोग द्वारा ही बन्धन का कारण बनता है।[65]सांख्यमत में अविवेक का अर्थ है अभेद। अत: विवेक का अर्थ है भेद। जीवात्मा का प्रकृति और उसके विकारों से भेद न करने पर प्रकृति के गुणों के प्रभावों को पुरुष अभिमानवश स्वयं में मानने लगता है। अहंकार रजस प्रधान है और रजोगुण दु:खात्मक। अत: पुरुष दु:ख रूप बन्धन में स्वयं को पाता है।
  • तत्त्वसमाससूत्र में 'त्रिविधो बन्ध:[66]' की व्याख्या में भावागणेश ने पञ्चशिख के मतानुसार प्राकृतिक, वैकृतिक तथा दक्षिण-तीन प्रकार के बन्धनों का उल्लेख किया है। अष्ट प्रकृतियों में अभिमान से प्राकृतिक बन्ध होता है। प्रकृति के विकारों को ही अन्तिम मानने पर उन्हें ही श्रेयस मानने पर वैकृतिक या वैकारिक बन्ध होता है तथा दान-दक्षिणा देने से दक्षिणा बन्ध होता है।

मोक्ष अपवर्ग या कैवल्य-प्राप्ति

सांख्य मत में मोक्ष, अपवर्ग और कैवल्य दु:ख निवृत्ति रूप ही है। जब पुरुष को यह ज्ञान हो जाता है कि दु:ख तो रजोगुण का धर्म है और प्रकृति त्रिगुणात्मिका है अत: प्रकृति के विकारों में दु:ख तो रहेगा ही। तब वह यह भी जान लेता है कि वह (पुरुष) न सृष्टिकर्ता (गुणकर्ता) है, न वह स्वयं गुण स्वरूप है और न ही त्रिगुण उसके हैं[67]तब वह प्रकृति और उसके विकारों का तटस्थ द्रष्टा होकर रह जाता है। यही मोक्ष है। प्रारब्धवश जब तक शरीर है तब तक वह संसार में रहता है। (शरीरपात) प्रारब्धक्षय के उपरान्त उसे आत्यन्तिक और ऐकान्तिक मुक्ति की प्राप्ति हो जाती है। पुरुष के भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजन (पुरुषार्थ) की सिद्धि हो जाने पर प्रकृति उससे उपरमित हो जाती है।

बन्ध-मोक्ष पुरुष का ही

  • पुरुषों न बध्यते सर्वगतत्वात्, अविकारित्वात्, निष्क्रियत्वात् अकर्तृत्वात्। यस्मान्न बध्यते तस्मान्न मुच्यते।[68] बन्धाभावान्न बध्यते विमुच्यते नापि संसरति निष्क्रियत्वात्।[69]
  • पुरुष के निष्क्रिय, असंगत्व, अविकारित्व आदि के कारण तथा ईश्वरकृष्ण रचित 62वीं कारिका की व्याख्याओं के आधार पर ऐसा माना जाता है कि पुरुष का बन्ध-मोक्ष व्यावहारिक है, वास्तव में बन्ध-मोक्ष तो प्रकृति का ही होता है। एक ओर भोग-अपवर्ग को पुरुषार्थ कहा गया।[70]चेतना में अवसान को भोग माना गया[71]यह भी कहा गया कि चेतन पुरुष ही दु:ख प्राप्त करता है।[72]तब बन्ध-मोक्ष पुरुष का न मानना उचित नहीं प्रतीत होता। आचार्य उदयवीर शास्त्री ने सविस्तर इस मान्यता का निराकरण करते हुए आत्मा या पुरुष के ही बन्ध और मोक्ष को सांख्य सम्मत माना है।[73]

सांख्य दर्शन में ईश्वरवाद

सांख्य कारिका के भाष्यों के आधार पर विद्वानों की यह धारणा बन गई है कि सांख्य दर्शन निरीश्वरवादी ही है। यद्यपि कारिका पूर्वदर्शन या प्राचीन सांख्य को महाभारत आदि ग्रन्थों के आधार पर ईश्वरवादी या परमात्मवादी मान लेने में विद्वानों को आपत्ति नहीं होती, तथापि प्रामाणिक दर्शन शास्त्र के रूप में इसे निरीश्वरवादी ही माना जाता है। ऐसा इसलिए कि आधुनिक विद्वान सांख्यकारिका को ही सांख्य दर्शन की उपलब्ध प्राचीनत रचना मानते हैं और उपलब्ध भाष्य, टीका, वृत्ति आदि में कहीं भी ईश्वर (परमात्मा) का निरुपण प्राप्त नहीं होता। सांख्य दर्शन के बारे में सूचित करने वाले प्राचीन ग्रन्थों में अर्हिबुध्न्यसंहिता, महाभारत, भगवद्गीता, कतिपय उपनिषदों आदि में सांख्यदर्शन परमात्मवादी ही प्रतीत होता है। इसे वहां कपिल प्रणीत दर्शन ही माना गया है। लेकिन सांख्यग्रन्थ रूप में मान्य सांख्यसूत्र तथा सांख्यकारिका में भाष्यकारों के मतानुसार परमात्मा की सत्ता स्वीकृत न होने से आधुनिक विद्वानों ने सांख्यदर्शन को विकास के तीन चरणों में विभाजित किया है। तदनुसार प्राचीन सांख्य ईश्वरवादी था। द्वितीय चरण में वह निरीश्वरवादी हो गया जिसके अन्तर्गत सूत्र-कारिका सम्मिलित है तथा तृतीय चरण में विज्ञानभिक्षु ने सांख्य को पुन: प्राचीन रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया, तथापि सांख्य ग्रन्थों में ईश्वर-प्रतिषेध है- ऐसा वे भी स्वीकार करते हैं। इसीलिए वे इस अंश में सांख्यदर्शन को दुर्बल मानते हैं। उनका मत है कि सांख्यदर्शन में प्रौढिवादी से व्यावहारिक ईश्वर का ही प्रतिषेध है।[74]अत: यद्यपि विज्ञानभिक्षु को ईश्वरवादी माने जाने पर भी विज्ञानभिक्षु सांख्य सूत्र में ईश्वर का खण्डन किया जाना स्वीकार करते हैं। लेकिन उनके अनुसार यह खण्डन ईश्वर का खण्डन न होकर एक देशीयों के प्रौढिवादी से किया गया खण्डन है। अन्यथा 'ईश्वर सिद्धि' के स्थान पर 'ईश्वराभावात्' सूत्र होता।[75]

  • आचार्य विज्ञानभिक्षु के अनुसार निर्गुण अपरिणामी चेतन तत्त्व का सृष्टिकर्तृत्व मान्य नहीं, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं। 'अहंकाररूपो य: कर्ता तदधीनैव कार्यसिद्धि: सृष्टिसंहारनिष्पतिर्भवति.. अनहंकृतसृष्टत्वे नित्येश्वरे च प्रमाणाऽभावात् अहंकारोपाधिक ब्रह्मरुद्रयो: सृष्टिसंहारकर्तृत्वं श्रुतिस्मृतिसिद्धम्[76]' विज्ञानभिक्षु के उक्त कथन से तथा सांख्यसूत्रों के ईश्वरप्रतिषेधपरक अंशों से निर्गुण अपरिणाम साक्षी चैतन्य स्वरूप सत्ता का निषेध सिद्ध नहीं होता, अपितु उसमें सृष्टिकर्तृत्व का निषेध सिद्ध होता है। यह निषेध भी उपादान दृष्ट्या ही है। सांख्यदर्शन में चेतना के सन्निधान से प्रकृति में प्रवृत्ति को संभव माना गया है।
  • उदयवीर शास्त्री के अनुसार सांख्यमत में प्रकृति की प्रेरणा अथवा नियंत्रण के लिए परमात्मा का अधिष्ठातृत्व स्वीकृत है जीवात्मा का नहीं है।[77]
  • सांख्यकारिका के व्याख्याकारों ने भी कारिका में ईश्वर की सत्ता को निराकरण नहीं किया। यही नहीं, व्याख्याकारों ने ईश्वरकारणता की अस्वीकृति का कारण जिस प्रकार स्पष्ट किया है उससे सांख्यमत में ईश्वर की सत्ता की स्वीकृति का संकेत मिलता है। माठर-वृत्ति में लिखा है-

'सांख्य वदन्ति। ईश्वर: कारणं न भवति। कस्मात्? निर्गुणत्वात्।
इमा: सगुणा: प्रजा:। सत्त्वरजस्तमांसि त्रयो गुणा:। प्रकृतेरिमा:
समुत्पन्न: प्रजा:। यदीश्वरं कारणं स्यात्ततो निर्गुणादीश्वरा-
र्त्रिर्गुणा एव प्रजा:। न चैवम्। तस्मादीश्वर: कारणं न भवति।[78]

  • ऐसा ही गौडपादभाष्य, सांख्यवृत्ति, सुवर्णसप्तति आदि में भी कहा गया है। यहाँ सांख्य को 'ईश्वर की सत्ता मान्य नहीं है' ऐसा नहीं कहा गया। साथ ही ईश्वर की जगत कारणता का निराकरण जिस तरह किया है, वह उसके परिणामिता के निषेध से सम्बद्ध है। ईश्वर निर्गुण है और जगत त्रिगुणात्मक है। सांख्य की मान्यता है कि पुरुष अत्रिगुण है अत: त्रिगुणात्मक जगत उसका परिणाम या विकार नहीं हो सकता। उपर्युक्त कथन में जिस कारण का संकेत है वह त्रिगुणात्मक व्यक्त पदार्थ रूपी परिणाम का उपादान रूप कारण है। निमित्त या अधिष्ठातृत्व रूप कारण का नहीं। अत: सांख्यसूत्र अथवा कारिका पर निरीश्वरवादी होने का मतारोपण उचित नहीं है।
  • सांख्य दर्शन के आधुनिक भारतीय विद्वान श्रद्धेय उदयवीर शास्त्री तथा डॉ. गजाननशास्त्री मुसलगांवकर, श्री अभय कुमार मजूमदार सांख्यदर्शन की मुख्य परम्परा को सेश्वर ही मानते हैं।
  • डॉ. आद्या प्रसाद मिश्र कपिलोपदिष्ट सांख्य को मूलत: ईश्वरवादी मानते हैं। उनके अनुसार सांख्यसूत्र के ईश्वर प्रतिषेधक सूत्रों को वे व्याख्यापेक्षया सेश्वर निरीश्वर दोनों संभव मानते हैं तथापि ईश्वरकृष्ण की कारिकाओं में ईश्वर-खण्डन न होने पर भी ईश्वर की सत्ता की विवेचना या महत्ता का उल्लेख न होने से उसे वे अनीश्वरवादी ही मानते हैं[79]। अधिकांश विद्वान सांख्यकारिका को निरीश्वरवादी मानते हैं। सांख्यसूत्र तो अर्वाचीन माने जाते हैं। अत: कारिकाओं के आधार पर इन्हें भी तथैव ही माना जाता है।
  • सांख्यकारिका की एक अर्वाचीन व्याख्या सांख्यतरुवसन्त के रचयिता मुडुम्ब नरसिंह स्वामी सांख्य को वेदान्तीय रूप में प्रस्तुत करते हैं। सांख्यमत को वे श्रुति से असंगत या विरोधी नहीं मानते। तीसरी कारिका के भाष्य में वे कहते हैं-

'प्रकृतिपुरुषौ द्वौ च तत्त्वमिति कपिलमते नास्त्येव श्रुतिविसंवाद:
पुरुष एक: सनातन: स निर्विशेष: चितिरूप:.............
पुमान् अविविक्त संसारभुक् संसारपालकश्चेति द्विकोटिस्थो वर्तते।
संसारभुजो वयं, तत्पालका: ब्रह्मरुद्रेन्द्रादय:। विविक्त:
परम: पुमानेक एव। स आदौ सर्गमूलनिर्वाहाय ज्ञानेन विविक्तोऽपि
इच्छया अविविक्तो भवति। स एव नारायणादिशब्दैरुच्यते।

  • मुडुम्ब नरसिंह स्वामी ने यह मत अपने भाष्य में अवश्य कहा है परन्तु वे किसी कारिका में इस मत का दर्शन नहीं करा सके।
  • डा. रामशंकर भट्टाचार्य का मत है कि सांख्य को सेश्वर-निरीश्वररूपेण विभक्त नहीं किया जा सकता। सांख्यदृष्टि में अनेक प्रकार के ईश्वर हैं और प्रत्येक प्रकार में ईश्वर व्यक्तियों की संख्या अवधारणीय नहीं है।[80]इस विशेष प्रकार के ईश्वर की मान्यता के होने या न होने के आधार पर सांख्य दर्शन को निरीश्वरवादी नहीं कहा जाता है। वैदिक दर्शनों में मान्य परमात्मा या सृष्टिकर्ता सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामी नित्य सत्ता रूप ईश्वर की मान्यता के न होने की धारणा के कारण सांख्यदर्शन को निरीश्वरवादी कहा जाता है।
  • सांख्यदर्शन ईश्वरवादी है या नहीं- इस पर विचार करते समय कुछ प्रश्नों के उत्तर के विषय में स्पष्ट समाधान और समाधान की स्वीकृति तथा सहमति आवश्यक है। वे प्रश्न और संभावित समाधान इस प्रकार हैं-
  • क्या कपिल का दर्शन ईश्वरवादी था? यदि कपिल का दर्शन निर्विवादत: निरीश्वरवादी था तब तो सांख्यसूत्र और कारिकाओं की निरीश्वरवादी व्याख्याएँ युक्तिसंगत मानी जाएंगी। लेकिन प्राचीन ग्रन्थों में सांख्य दर्शन का जो रूप मिलता है उससे यह स्वीकार करने के अधिक और प्रबल प्रमाण हैं कि कपिल का दर्शन मूलत: ईश्वरवादी था। अत: ऐसा कोई भी ग्रन्थ जिसे कपिल दर्शन का ग्रन्थ माना जाता हो की व्याख्या ईश्वरवादीही होनी चाहिए। सांख्यसूत्रों में ईश्वर प्रतिषेधपरक प्रसंगों से दो बातें सामने आती हैं। एक तो यह कि सूत्रकार ईश्वर की सिद्धि प्रमाणों द्वारा संभव नहीं मानते और दूसरा यह कि ईश्वर की सत्ता का खण्डन न करके सूत्रकार उसके सृष्टिकर्तृत्व, कर्मफलदाता आदि रूपों का खण्डन करते हैं। दोनों की तथ्य सांख्यसूत्र के दर्शन को निरीश्वरवादी निरूपित करने के लिए सुनिश्चित आधार नहीं है।
  • क्या भारत के इतिहास से यह प्रमाणित हो सकता है कि कोई वैदिक दर्शन निरीश्वरवादी रहा हो और तब भी सुप्रतिष्ठित, विख्यात और लोकप्रिय रहा हो? न तो प्राक् बौद्ध-जैन-काल में ऐसे दर्शन के अस्तित्व का प्रमाण है और न ही प्राचीन भारतीय समाज की प्रवृत्ति ऐसी रही है, जहां नास्तिक दर्शन लोकप्रिय हो सकते हों। इस बात के प्रबल प्रमाण (अहिर्बुध्न्संहिता, महाभारत, गीता, पुराण आदि में) हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि सांख्य दर्शन अत्यन्त प्राचीन काल से ही सुप्रतिष्ठित, समादृत और लोकप्रिय दर्शन रहा है। जैन, बौद्ध आदि अवैदिक और निरीश्वरवादी दर्शन भी थोड़े से समय के लिए लोकप्रिय होकर सिमट गए। अत: इतना सुप्रतिष्ठित और लोकप्रिय दर्शन निरीश्वरवादी रहा होगा- यह संदेहास्पद तो है साथ ही भारतीय समाज की प्रकृति को देखते हुए असंभव भी लगता है।
  • बौद्ध दर्शन के प्रभावकाल और उसके उपरान्त रचे गए दर्शन-साहित्य में ही प्राय: सांख्यदर्शन को निरीश्वरवादी रूप में ख्याति क्यों मिली? कहीं सांख्यकारिका का निरीश्वरवादी रूप में व्याख्यायित होना बौद्ध प्रभाव का परिणाम तो नहीं? आचार्य उदयवीर शास्त्री के इस कथन को हम उचित समझते हैं कि 'जब उन विचारों (बौद्ध विचारों) को दर्शन का रूप दिया जाने लगा तब इसका अनुभव हुआ कि मूल रूप में ईश्वर के अस्तित्व की अनावश्यकता का कोई प्राचीन आधार होना चाहिए। विचार और प्रतिष्ठा की दृष्टि से सांख्यदर्शन का स्थान विद्वत्समाज में सदा मूर्द्धन्य रहा है, और उस समय तो वह अपने पूर्व प्रकाश में विद्यमान था। बौद्ध विद्वानों का ध्यान उस ओर जाना स्वाभाविक था। उन्होंने विचारों की दृष्टि से सांख्य के अन्तर्गत वार्षगण्य के सिद्धान्तों को अपने बहुत समीप देखा। उन्होंने इसी को अपने दर्शन का प्रथम आधार बनाकर, जगत्सर्ग-प्रक्रिया में ईश्वर के अस्तित्व को अनावश्यक बताकर उसे अलग निकाल फेंका तथा वार्षगण्य के एतत्सम्बन्धी सिद्धान्तों को सांख्य के नाम पर प्रबल प्रयत्न के साथ प्रचारित किया। शताब्दियों के इस प्रचार का यह परिणाम हुआ कि सांख्य पर निरीश्वरवादिता दृढरूप में आरोपित कर दी गई और इसी लिए सांख्यकारिका की निरीश्वरवादी व्याख्याएँ ही अधिक प्रामाणिक मान ली गई।[81]'
  • आधुनिक विद्वान सांख्यकारिका को ही सांख्यदर्शन की उपलब्ध प्राचीन प्रामाणिक रचना मानते हैं। सांख्यकारिका के ही साक्ष्य से यह स्पष्ट होता है कि कारिकोक्त दर्शन कपिल दर्शन है। कपिल का दर्शन जब ईश्वरवादी है तब कारिकादर्शन निरीश्वरवादी क्यों मान लिया गया? बौद्ध प्रभावकाल में लिखी गई कारिका व्याख्याओं से स्वतंत्र कोई व्याख्या 15वीं शताब्दी तक लिखी ही नहीं गई है जो उपलब्ध हो। क्या सांख्यदर्शन को ईश्वरवादी मानकर कारिकाओं की व्याख्या करना संभव नहीं था? उपर्युक्त विचारों के प्रकाश में यदि सूत्र-कारिका पर स्वतंत्र रूप से विचार किया जाय और प्राचीन सांख्यदर्शन के उपलब्ध विचारों के अनुरूप उनकी व्याख्या की जाय तो इन्हें भी ईश्वरवादी निरूपित किया जा सकता है। इस तरह की व्याख्या के तीन प्रयासों की हमें जानकारी है। मुडुम्ब नरसिंह स्वामी का 'सांख्यतरुवसन्त' तथा अभय कुमार मजूमदार का समीक्षात्मक ग्रन्थ 'सांख्य कन्सप्ट आफ पर्सनालिटी' में पुरुष के एकत्व का निरूपण किया गया। उनके अनुसार परमार्थत: या कारण रूप या अव्यक्त रूप में पुरुष एक है और व्यवहारत: कार्यरूप या व्यक्त रूप में पुरुष अनेक है। श्री मजूमदार अट्ठारहवीं कारिकागत पुरुष बहुत्व की सिद्धि को पुरुष बहुतत्त्व के बजाय 'उपाधि बहुत्व' की सिद्धि मानते हैं। उनके मत में पुरुष की सिद्धि सम्भव नहीं।[82]लेकिन कारिका में स्पष्टत: पुरुष की सिद्ध कही गई है। अत: श्री मजूमदार एकत्व और बहुत्व का समायोजन यह मानकर करते हैं कि एक ही पुरुष सत् है (जोकि परमसत् परमपुरुष है) और उसका उपाधिभेद से, या वैयक्तीकरण से बहुत्व है। यह ठीक है कि बहुत्व कल्पना उपाधि या पुरि के द्वारा ही होती है। लेकिन कारिकाकार उपाधि के बहुत्व की सिद्धि न करके पुरुष (पुरि नहीं) का बहुत्व सिद्ध कर रहे हैं। अत: ऐसा समायोजन जिसमें पुरुष बहुत्व पारमार्थिक न हो, सांख्यीय समायोजन नहीं कहा जा सकता। सांख्यदर्शन के ईश्वरवादी निरूपण का एक रूप 'त्रैतवादी' भी है। भोक्ता, भोग्य प्रेरिता 'द्वा सुपर्णा आदि सांख्यभिमतानुसार ही है। यह त्रैत मौलिक सांख्य की अपनी विशिष्ठता थी[83]। आचार्य उदयवीर शास्त्री[84], डॉ. गजाननशास्त्री मुसलगांवकर[85]सांख्यदर्शन को त्रैतवादी मानते हैं। त्रैतवादी का स्पष्ट संकेत हमें सांख्यसूत्रों तथा कारिका दोनों में ही मिलते हैं। यदि प्राचीन सांख्य के अनुरूप इन ग्रन्थों की व्याख्या की जाए तो इनकी न केवल संगति निरूपित होती अपि तु प्रचलित विसंगतियाँ भी निराकृत हो जाती हैं। पुरुष की अस्तित्वसिद्धि में जो हेतु सांख्यसूत्रवर्णित हैं, उनकी प्रचलित व्याख्याओं से तो हेतुओं की पुनरावृत्ति संगत नहीं कही जाएगी। ईश्वरकृष्णकृत कारिकाएँ चूंकि विशाल ग्रन्थ की संक्षेप में प्रस्तुति थीं, वहां भी पुनरावृत्ति असंगत ही कही जाएगी। 'संघातपरार्थत्वात्' की व्याख्या में भोक्तृभाव तो अन्तर्निहित है फिर अलग से भोक्तृभावात् कहकर पुनरुक्ति का कोई औचित्य नहीं। फिर सांख्यसूत्र में तीन हेतुओं के उपरान्त प्रकरण समाप्तिसूचक 'चेति' का भी कोई औचित्य नहीं रह जाता यदि हम पांचों हेतुओं को जीवात्म पुरुष साधक ही मानें। सूत्र 1/140-142 तो परमात्मा और जीवात्मा दोनों का ही निरूपण करते हैं। सूत्र 1/143, 144 केवल जीवात्मा का निरूपण करते हैं। सांख्यकारिका में 11वीं कारिकोक्त तद्विपरीतस्तथा च पुंमान्'य की युक्तिसंगत व्याख्या भी दो प्रकार के चेतन तत्त्व या पुरुष के निरूपणार्थ ग्रहण करने पर ही संभव है।

सांख्य दर्शन समाधान

  • सांख्यदर्शन एक अत्यन्त प्राचीन दर्शन होने से तथा सूत्र और कारिका के गूढार्थक होने से उनकी व्याख्याओं के आधार पर सांख्यदर्शन की पर्याप्त आलोचनाएँ की गई हैं। यहाँ कुछ प्रमुख आलोचनाओं के समाधान का सांख्यसम्मत प्रयास किया गया है।
  • सांख्य का प्रमुख दोष उसका द्वैतवाद है। प्रकृति और पुरुष को दो नितान्त भिन्न और स्वतंत्र तत्त्व मानना सांख्य की प्रमुख भूल है। यदि पुरुष और प्रकृति दो स्वतंत्र और निरपेक्ष तत्त्व हैं तो उनका किसी प्रकार संयोग नहीं हो सकता और संयोग के अभाव में सर्ग नहीं हो सकता।[86]क्या द्वैतवाद को दोष कहा जा सकता है? सृष्टि में जहां तक मानवी बुद्धि के तर्क विचार-प्रणाली का क्षेत्र है वहां तक न्यूनतम द्वैत ही स्थापित है। सांख्यदर्शन तर्कबुद्धि और युक्तिसंगत चिन्तन-प्रणाली है। प्रत्यक्ष से सृष्टि में जड़ चेतन सिद्ध होता है। सृष्टि में व्यक्त जड़ चेतन परस्पर इतने भिन्न हैं कि इनमें किसी एक को मूल कारण मानने का कोई युक्तिसंगत आधार तो हो ही नहीं सकता। हां, यह माना जा सकता है कि जड़ और चेतन कामूल कारण अन्य कोई ऐसा तत्त्व हो सकता है जिससे इन दोनों की उत्पत्ति होती हो, जो न तो जड़ कहा जा सकता है और न चेतन। लेकिन तब उसमें जड़ और चेतन की उत्पत्ति का उपादान भूत कुछ अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा। दर्शन के अब तक के साहित्य में जड़ चेतन से भिन्न किसी तीसरे तत्त्व की स्वीकृति का कोई प्रमाण नहीं मिलता। सृष्टि का मूल कारण जड़ या चेतन एक ही कारण किसी भी युक्ति से सिद्ध नहीं होता। हां, मान लेने की बात अलग है। मूल कारण यदि बुद्धि की तर्क प्रणाली से परे का विषय है और उसे केवल मान लेना ही संभव है तब प्रत्यक्षानुमान से गम्य आधार पर तदनुसार मानना ही युक्ति संगत है। जड़ से चेतन या चेतन से जड़ की उत्पत्ति अकल्पनीय है। अत: जड़ चेतन द्वैतवाद ही युक्तिसंगत है। यह दोष लेशमात्र भी नहीं है।
  • प्रकृति और पुरुष दो सर्वथा भिन्न और स्वंतत्र तत्त्व हैं- ऐसा मानने पर उनमें संयोग संभव नहीं है, इस प्रकार की आलोचना भी सांख्यमत को सही रूप में न समझ पाने के कारण ही है। सांख्यमत में प्रकृति और पुरुष अपनी सत्ता के लिए परस्पराश्रित नहीं है। न प्रकृति पुरुष को उत्पन्न करती है ओर न पुरुष प्रकृति को। सत्ता की दृष्टि से स्वंतत्र और भिन्न होने हुए भी ये प्रथक नहीं रहते। ये दोनों तत्त्व परस्पर असंयुक्त रहते हैं- ऐसा सांख्य कभी नहीं कहता। अत: संयोग संभव है या नहीं- ऐसा प्रश्न ही निर्मूल है। संयोग तो है। जब संयोग है तो निश्चय ही प्रकृति और पुरुष में इसकी योग्यता भी है। अभिव्यक्ति के लिए दोनों तत्त्व परस्परापेक्षी हैं- यह सांख्य का स्पष्ट मत है। डॉ. चन्द्रधर शर्मा लिखते हैं कि प्रकृति अचेतन है और पुरुष उदासीन है और इन दोनों को मिलाने वाला कोई तत्त्व नहीं है। अत: दोनों का मिलन असम्भव है। इस प्रकार की आलोचना प्रकृति-पुरुष के अन्य लक्षणों को अनदेखा करके ही की जा सकती है। पुरुष में भोक्तृभाव और कैवल्यार्थप्रवृत्त् को सांख्यमत में स्वीकार किया गया है। अत: पुरुष की उदासीनता को विशेष अर्थ में ही समझना होगा। उदासीनता का पुरुष में उल्लेख कर्तृत्व निषेधपरक है[87]। डॉ. मुसलगांवकर ने ठीक ही कहा है-'सूत्रकार ने आत्मा को उदासीन अर्थात् अकर्ता कहकर उसके अपरिणामित्वरूप है अद्रष्टृत्वरूप नहीं[88]'। सांख्य को निरीश्वर मानने पर संयोग का कारण पुरुष के भोक्तृस्वरूप तथा प्रकृति का विषयरूप होना बताया जा सकता है। प्राचीन प्रमाणों से यह स्पष्ट है कि सांख्यमत में पुरुष (जीवात्मचेतना) प्रकृति में संयोग हेतु तीसरा तत्त्व मान्य है। दोनों स्थितियों में प्रकृति-पुरुष-संयोग तो है। इनके क्रमश: अचेतन तथा उदासीनता के साथ जो अन्य लक्षण बताये गये हैं। उनसे इनके मिलन की संभावना स्पष्ट है।
  • सांख्य ने प्रकृति में कर्तृत्व तथा पुरुष में भोक्तृत्व का आरोप करके कर्मवाद को ठुकरा दिया है और कृतनाश और अकृतागम के दोषों को निमन्त्रण दिया है।[89]इस आलोचना का आधार सांख्य पर असांख्यीय मतारोपण ही हो सकता है। प्रकृति में जिस कर्तृत्व को सांख्यदर्शन में स्वीकार किया गया है वह नानावधि अनेकरूप व्यक्त का कर्तृत्व है। प्रकृति त्रिगुणात्मक है। तीनों गुणों के परस्पर संघात की अनेकविधता के कारण सृष्टि में भी अनेकता, विषमता है। इस अनेकता और विषमता का कारण त्रिगुण है। पुरुष चूंकि अत्रिगुण और अपरिणामी अविकारी है अत: विषमता या अनेकता का वह उपादान नहीं बन सकता। पुरुष अचेतन सृष्टि का प्रयोक्ता है। प्रयुक्त्यनुसार भोग है। अविवेकवश वह प्रकृति-कर्तृत्व को अपना कर्तृत्व मान बैठता है। इसलिए दु:ख भोगता है। वास्तव में पुरुष का भोग प्रकृति के कर्तृत्व के कारण नहीं वरन् स्वयं पुरुष के भोक्तृस्वरूप के कारण है। अत: कर्मवाद का उल्लंघन सांख्यदर्शन में नहीं है। फिर; कर्मवाद में कर्म का जो रूप है वह प्रकृति कर्ममात्र नहीं वरन् कर्म का पुरुष-सम्बन्धरूप है। इस सम्बन्ध के द्वारा ही फल का रूप भी निर्धारित होता है। अत: कृतनाश और अकृतागत की प्रसक्ति ही नहीं होती।
  • सांख्यदर्शन की एक भूल की चर्चा करते हुए डॉ. शर्मा कहते हैं- सांख्य विशुद्ध चैतन्य स्वरूप पुरुष में तथा अन्त:करण प्रतिबिम्बित चैतन्य रूप जीव में भेद नहीं करता। बन्धन, संसरण और मोक्ष जीवों के होते हैं, किन्तु सांख्य पुरुष और जीव के भेद को भूलकर पुरुष को अनेक मानता है। साक्षी और निर्विकार पुरुष में भोक्तृत्व की कल्पना करता है। नित्य पुरुष को जन्म मरणशील मानता है।[90]
  • इस प्रसंग में भी सांख्यदर्शन में भूल या दोष नहीं है। जीव और पुरुष में भेद तो है, लेकिन यह भेद अस्तित्वभेद नहीं है। बिना पुरुषसंयुक्ति प्रतिबिम्बन या सन्निधि के जीव की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। केवल अन्त:करणोपाधि जीव नहीं कहा जाता। संसरण आदि में अन्त:करणादि तो वाहन रूप साधन है। संसरण तो पुरुष ही का होता है। पुरुष के नित्य निर्विकार होने में और संसरणशील होने में कोई विरोध नहीं है। अन्त:करणयुक्त होने पर पुरुष विकृत नहीं होता। वह चैतन्य स्वरूप ही रहता है। नित्य पुरुष के जन्ममरण का अर्थ पुरुष का उत्पत्ति-विनाश नहीं हैं। शरीर में व्यक्त होना जन्म है और ऐसा न होना अर्थात स्थूल शरीर अलग हो जाना मृत्यु। जन्म और मृत्यु शरीर में प्रवेश करने और निकल जाने को कहते हैं। प्रवेश करने वाले तत्त्व की नित्यता की इसमें हानि नहीं होती है।
  • सांख्य दर्शन भारत के ही नहीं विश्व के दार्शनिक चिन्तन के इतिहास में प्राचीनतम दर्शन है। केवल दर्शन ही नहीं ज्ञान की अन्य भारतीय विधाओं पर सांख्यदर्शन का प्रचुरता से प्रभाव परिलक्षित होता है। सांख्य के प्रकृति, पुरुष, विधाओं पर सांख्यदर्शन का प्रचुरता से प्रभाव परिलक्षित होता है। सांख्य के प्रकृति, पुरुष, त्रिगुण, महत आदि पारिभाषिक शब्दों का संस्कृत साहित्यकारों की रचनाओं में भी यथार्थ प्रयोग दिखता है। सांख्य जड़-चेतन-भेद से द्वैतवादी तथा अजाविनाशी तत्त्वों के भेद से त्रैतवादी है।

सांख्य साहित्य

सांख्यप्रवचनभाष्य

  • सांख्यप्रवचनसूत्र पर आचार्य विज्ञानभिक्षु का भाष्य है। आचार्य विज्ञानभिक्षु ने सांख्यमत पुन: प्रतिष्ठित किया। विज्ञानभिक्षु का समय आचार्य उदयवीर शास्त्री के अनुसार सन् 1350 ई. के पूर्व का होना चाहिए। अधिकांश विद्वान इन्हें 15वीं-16वीं शताब्दी का मानते हैं। विज्ञानभिक्षु की कृतियों में सांख्यप्रवचनभाष्य के अतिरिक्त योगवार्तिक, योगसार संग्रह, विज्ञानामृतभाष्य, सांख्यसार आदि प्रमुख रचनायें हैं। सांख्य दर्शन की परंपरा में विज्ञानभिक्षु ने ही सर्वप्रथम सांख्यमत को श्रुति और स्मृतिसम्मत रूप में प्रस्तुत किया। सांख्य दर्शन पर लगे अवैदिकता के आक्षेप का भी इन्होंने सफलता पूर्वक निराकरण किया। अपनी रचनाओं के माध्यम से आचार्य ने सांख्य दर्शन का जो अत्यन्त प्राचीन काल में सुप्रतिष्ठित वैदिक दर्शन माना जाता था, का विरोध परिहार करते हुए परिमार्जन किया।
  • सांख्यकारिका-व्याख्या के आधार पर प्रचलित सांख्यदर्शन में कई स्पष्टीकरण व संशोधन विज्ञानभिक्षु ने किया। प्राय: सांख्यदर्शन में तीन अंत:करणों की चर्चा मिलती है। सांख्यकारिका में भी अन्त:करण त्रिविध[91] कहकर इस मत को स्वीकार किया। लेकिन विज्ञानभिक्षु अन्त:करण को एक ही मानते हैं। उनके अनुसार 'यद्यप्येकमेवान्त:करणं वृत्तिभेदेन त्रिविधं लाघवात्' सा.प्र.भा. 1/64)। आचार्य विज्ञानभिक्षु से पूर्व कारिकाव्याख्याओं के आधार पर प्रचलित दर्शन में दो ही शरीर सूक्ष्म तथा स्थूल मानने की परम्परा रही है। लेकिन आचार्य विज्ञानभिक्षु तीन शरीरों की मान्यता को युक्तिसंगत मानते हैं। सूक्ष्म शरीर बिना किसी अधिष्ठान के नहीं रहा सकता, यदि सूक्ष्म शरीर का आधार स्थूल शरीर ही हो तो स्थूल शरीर से उत्क्रान्ति के पश्चात् लोकान्तर गमन सूक्ष्म शरीर किस प्रकार कर सकता है? विज्ञानभिक्षु के अनुसार सूक्ष्म शरीर बिना अधिष्ठान शरीर के नहीं रह सकता अत: स्थूल शरीर को छोड़कर शरीर ही है[92]। । 'अङगुष्ठमात्र:पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जना हृदये सन्निविष्ट:[93]', अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं स[94]- आदि श्रुति-स्मृति के प्रमाण से अधिष्ठान शरीर की सिद्धि करते हैं।
  • अन्य सांख्याचार्यों से लिंग शरीर के विषय में विज्ञानभिक्षु भिन्न मत रखते हैं। वाचस्पति मिश्र, माठर, शंकराचार्य आदि की तरह अनिरुद्ध तथा महादेव वेदान्ती ने भी लिंग शरीर को अट्ठारह तत्त्वों का स्वीकार किया। इनके विपरीत विज्ञानभिक्षु ने सूत्र 'सप्तदशैकम् लिंगम्[95]' की व्याख्या करते हुए 'सत्रह' तत्त्वों वाला 'एक' ऐसा स्वीकार करते हैं। विज्ञानभिक्षु अनिरुद्ध की इस मान्यता की कि सांख्यदर्शन अनियतपदार्थवादी है- कटु शब्दों में आलोचना करते हैं[96] अनिरुद्ध ने कई स्थलों पर सांख्य दर्शन को अनियत पदार्थवादी कहा है। 'किं चानियतपदार्थवादास्माकम्[97]', 'अनियतपदार्थवादित्वात्सांख्यानाम्[98]' इसकी आलोचना में विज्ञानभिक्षु इसे मूढ़ प्रलाप घोषित करते हैं। उनका कथन है कि -'एतेन सांख्यानामनियतपदार्थाभ्युपगम इति मूढ़प्रलाप उपेक्षणीय:[99]' । विज्ञानभिक्षुकृत यह टिप्पणी उचित ही है। सांख्यदर्शन में वर्ग की दृष्टि से जड़ चेतन, अजतत्त्वों की दृष्टि से भोक्ता, भोग्य और प्रेरक तथा समग्ररूप से तत्त्वों की संख्या 24, 25 वा 26 आदि माने गए हैं। अत: सांख्य को अनियतपदार्थवादी कहना ग़लत है। हां, एक अर्थ में यह अनियत पदार्थवादी कहा जा सकता है यदि पदार्थ का अर्थ इन्द्रिय जगत् में गोचन नानाविधि वस्तु ग्रहण किया जाय। सत्त्व रजस् तमस् की परस्पर अभिनव, जनन, मिथुन, प्रतिक्रियाओं से असंख्य पदार्थ उत्पन्न होते हैं जिनके बारे में नियतरूप से कुछ नहीं कहा जा सकता।
  • अनिरुद्ध प्रत्यक्ष के दो भेद-निर्विकल्प तथा सविकल्प, की चर्चा करते हुए सविकल्प प्रत्यक्ष को स्मृतिजन्य अत: मनोजन्य, मानते हैं। विज्ञानभिक्षु इसका खण्डन करते हैं। विज्ञानभिक्षु अनिरुद्धवृत्ति को लक्ष्य कर कहते हैं- 'कश्चित्तु सविकल्पकं तु मनोमात्रजन्यमिति' लेकिन 'निर्विकल्पकं सविकल्पकरूपं द्विविधमप्यैन्द्रिकम्' हैं। आचार्य उदयवीर शास्त्री ने भोग विषयक अनिरुद्ध मत का भी विज्ञान भिक्षु की मान्यता से भेद का उल्लेख किया है[100]। तदनुसार अनिरुद्ध ज्ञान भोग आदि का संपाइन बुद्धि में मानते हैं। विज्ञानभिक्षु उक्त मत उपेक्षणीय कहते हुए कहते हैं। 'एवं हि बुद्धिरेव ज्ञातृत्वे चिदवसानो भोग: इत्यागामी सूत्रद्वयविरोध: पुरुषों प्रभाणाभावश्च। पुरुषलिंगस्य भोगस्य बुद्धावेव स्वीकारात्[101]'। यदि ज्ञातृत्व भोक्तृत्वादि को बृद्धि में ही मान लिया गया तब चिदवसानो भोग:[102] व्यर्थ हो जायेगा। साथ ही भोक्तृभावात् कहकर पुरुष की अस्तित्वसिद्धि में दिया गया प्रमाण भी पुरुष की अपेक्षा बुद्धि की ही सिद्धि करेगा। तब पुरुष को प्रमाणित किस तरह किया जा सकेगा।
  • सांख्य दर्शन को स्वतंत्र प्रधान कारणवादी घोषित कर सांख्यविरोधी प्रकृति पुरुष संयोग की असंभावना का आक्षेप लगाते हैं। विज्ञानभिक्षु प्रथम सांख्याचार्य है, जिन्होंने संयोग के लिए ईश्वरेच्छा को माना। विज्ञानभिक्षु ईश्वरवादी दार्शनिक थे। लेकिन सांख्य दर्शन में ईश्वर प्रतिषेध को वे इस दर्शन की दुर्बलता मानते हैं[103]। विज्ञानभिक्षु के अनुसार सांख्य दर्शन में ईश्वर का खण्डन प्रमाणापेक्षया ही है। ईश्वर की सिद्धि प्रमाणों (प्रत्यक्षानुमान) से नहीं की जा सकती इसलिए सूत्रकार ईश्वरासिद्धे:[104] कहते हैं। यदि ईश्वर की सत्ता की अस्वीकृत वांछित होती तो 'ईश्वराभावात्'- ऐसा सूत्रकार कह देते। इस प्रकार विज्ञानभिक्षु सांख्य दर्शन में ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करके योग, वेदान्त तथा श्रुति-स्मृति की धारा में सांख्य दर्शन को ला देते हैं, जैसा कि महाभारत पुराणादि में वह उपलब्ध था। इस तरह विज्ञानभिक्षु सांख्य दर्शन को उसकी प्राचीन परम्परा के अनुसार ही व्याख्यायित करते हैं। ऐसा करके वे सांख्य, योग तथा वेदान्त के प्रतीयमान विरोधों का परिहार कर समन्वय करते हैं। प्रतिपाद्य विषय में प्रमुखता का भेद होते हुए भी सिद्धान्तत: ये तीनों ही दर्शन श्रुति-स्मृति के अनुरूप विकसित दर्शन हैं। अद्वैताचार्य शंकर ने विभिन्न आस्तिक दर्शनों का खण्डन करते हुए जिस तरह अद्वैतावाद को ही श्रुतिमूलक दर्शन बताया उससे यह मान्यता प्रचलित हो चली थी कि इनका वेदान्त से विरोध है। विज्ञानभिक्षु ही ऐसे प्रथम सांख्याचार्य हैं जिन्होंने किसी दर्शन को 'मल्ल' घोषित न कर एक ही धरातल पर समन्वित रूप में प्रस्तुत किया।
  1. सांख्यसूत्रवृत्तिसार-अनिरुद्धवृत्ति का सारांश ही है जिसके रचयिता महादेव वेदान्ती हैं।
  2. भाष्यसार विज्ञानभिक्षुकृत सांख्यप्रवचनभाष्य का सार है जिसके रचयिता नागेश भट्ट हैं।
  3. सर्वोपकारिणी टीका यह अज्ञात व्यक्ति की तत्त्वसमास सूत्र पर टीका है।
  4. सांख्यसूत्रविवरण तत्त्व समास सूत्र पर अज्ञात व्यक्ति की टीका है।
  5. क्रमदीपिका भी तत्त्वसमास सूत्र की टीका है कर्ता का नाम ज्ञात नहीं है।
  6. तत्त्वायाथार्थ्यदीपन- तत्वसमास को यह टीका विज्ञानभिक्षु के शिष्य भावागणेश की रचना है यह भिक्षु विचारानुरूप टीका है।
  7. सांख्यतत्त्व विवेचना- यह भी तत्वसमास सूत्र की टीका है जिसके रचयिता षिमानन्द या क्षेमेन्द्र हैं।
  8. सांख्यतत्त्वालोक- सांख्ययोग सिद्धान्तों पर हरिहरानन्द आरण्य की कृति है।
  9. पुराणेतिहासयो: सांख्ययोग दर्शनविमर्श: - नामक पुस्तक पुराणों में उपलब्ध सांख्यदर्शन की तुलनात्मक प्रस्तुति है। इसके लेखक डा. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हैं। और इसका प्रकाशन, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से सन् 1979 ई. में हुआ।
  10. सांख्ययोगकोश:- लेखक आचार्य केदारनाथ त्रिपाठी वाराणसी से सन् 1974 ई. में प्रकाशित।
  11. श्रीरामशंकर भट्टाचार्य ने सांख्यसार की टीका तथा तत्त्वयाथार्थ्यदीपन सटिप्पण की रचना की। दोनों ही पुस्तकें प्रकाशित हैं[105]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. सांख्य सूत्र 1/9
  2. कारिका 1
  3. सांख्य सूत्र 1।87
  4. 1/89
  5. कारिका 5
  6. सांख्य सूत्र 1/108
  7. सांख्य कारिका 6
  8. सांख्य सूत्र 1/100
  9. सां.प्र.भा. 1/100 पर गजानन शास्त्री मुसलगांवकरकृत व्याख्या
  10. 5वीं कारिका पर तत्त्वकौमुदी
  11. सांख्य सूत्र 1/103
  12. वहीध् अदृष्टस्वलक्षणसामान्यविषयम्।
  13. रूपादिज्ञाने क्रियात्वेन करणत्वानुमानम् सां. प्र. भा. 1/103
  14. कारिका-9
  15. सांख्य सूत्र 1/102
  16. तत्त्वयाथार्थ्यदीपन सं.रा.शं. भट्टाचार्य, भारतीय विद्या प्रकाशन, वाराणसी 23
  17. कारिका 5 पर कौमुदी
  18. 6वीं कारिका पर ज्योतिष्मती टीका
  19. सांख्ययोग एपिस्टेमालाजी पृष्ठ-55
  20. सांख्य सूत्र 1/56
  21. सांख्य सूत्र 1/56 1/114
  22. सांख्य सूत्र 1/56 1/114, 1/115/18 साथ ही द्रष्टव्य कारिका-9
  23. सांख्य सूत्र 1/56 1/114, 1/115/18 साथ ही द्रष्टव्य कारिका-9 1/136
  24. सांख्य सूत्र 1/56 1/114, 1/115/18 साथ ही द्रष्टव्य कारिका-9 1/136
  25. सांख्य कारिका 1/56 1/114, 1/115/18,साथ ही द्रष्टव्य कारिका-9 1/136 10, 11
  26. द सांख्य सन्सप्ट आफ पर्सनालिटी-अभयकुमार मजूमदार
  27. सांख्यप्रज्ञा-बी. कामेश्वर राव
  28. सांख्य सूत्र 1/61
  29. सांख्य कारिका-3
  30. तत्त्वसमाससूत्र 1-3
  31. तत्त्वयाथार्थ्यदीपन/1
  32. सी.का-11
  33. सी. का.-11
  34. सांख्य सूत्र 1/130.32
  35. सांख्य सूत्र 1/127
  36. साथ ही द्रष्टव्य सांख्य सूत्र 2/27
  37. सां.का.-24
  38. सांख्य सूत्र 2/13
  39. सांख्य सूत्र 2/14
  40. सां. का. 23
  41. सां.सि. पृष्ठ-250
  42. शांति पर्व(अध्याय 249)(श्लोक सं. 23
  43. सांख्य सूत्र-2/16
  44. सांख्यदर्शनम्
  45. सांख्यदर्शनम्-25
  46. सां.का.-20
  47. सां.प्र.भा. 2/18
  48. सांख्य सूत्र,(2/17
  49. सां.का.-33
  50. सांख्य सूत्र-2/26, सां.का.-27
  51. सांख्य सूत्र 1/139
  52. तद्विपरीतस्तथा च पुमान् का-11
  53. सांख्य सूत्र 1/140-42
  54. सांख्य सूत्र 1/143-44
  55. सांख्य प्रज्ञा 17-19
  56. सांख्यदर्शनम् पृष्ठ -285
  57. सांख्याचार्या: बहूनि पुरुषानान्मत्वेन वदन्ति।
  58. सांख्य सूत्र 1/149
  59. त्रिगुणादिविर्यपाच्चैव, कारिका-18
  60. इसका समाधान विज्ञानभिक्षु ने इस प्रकार किया-जन्ममरणे चात्र नोत्पत्तिविनाशे .. संघातविशेषेण संयोगश्च वियोगश्च भोगतदभावनियमकाविति। सां. प्र. भा. 1/149
  61. सां. प्र. भा. 1/1
  62. माठर-1
  63. सर्वमेव दु:खं मानसम्
  64. कारिका-55
  65. सां.प्र.भा. 1/55
  66. सूत्र-21
  67. सां. का.-64
  68. माठर-62
  69. जयमंगला-62
  70. सां. का. -17
  71. सां.सू. 1/104
  72. सां.का.-55
  73. सां.सि. पृष्ठ 185-189
  74. सां.प्र.भा. उपोद्घात
  75. सां.प्र.भा. उपोद्घात 1/192
  76. सां. प्र. भा. 6/64
  77. सां.सि. पृष्ठ-53
  78. 61वीं कारिका पर माठरवृत्ति
  79. सां.द.ऐ.प. पृष्ठ 193
  80. सां. त. की हिन्दी व्याख्या में व्याख्याकार का निवेदन
  81. सां.सि. पृष्ठ-64
  82. सांख्य कन्सप्ट आफ पर्सनालिटी पृष्ठ 33-34
  83. सां.द.ऐ.प. पृष्ठ-31
  84. सांख्य सि.
  85. सांख्यदर्शनम् भाष्यप्रदीप
  86. आ. अ. पृष्ठ 162-63
  87. सां.प्र.भा. 1/163
  88. भाष्यप्रदीप 1/163
  89. भा.द.आ.अ. पृष्ठ-163
  90. भा.द.आ.अ. पृष्ठ-163
  91. कारिका 33
  92. वही- 1/12
  93. कठोपनिषद 1॥6। 17
  94. महाभारत वनपर्व 397/17
  95. 3/9
  96. सांख्यानामनियतपदार्थाम्युपगम इति मूढप्रलाप उपेक्षणीय:। सां.प्र.भा. 1/61
  97. सां. सू. 1/।45
  98. 5/85
  99. सा.प्र.भा. 1/61
  100. सां. द.इ. पृष्ठ 348-49
  101. सा.प्र.भा. 1/99
  102. सूत्र 1/104
  103. सां. प्र.भा. 1/92
  104. सूत्र 1/92
  105. आधुनिक काल में रचित अन्य कुछ रचनाओं के लिए द्रष्टव्य एन्सायक्लापीडिया आफ इण्डियन फिलासफी भाग-4

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