ईश्वरकृष्ण  

ईश्वरकृष्ण को सांख्य का प्रधान दार्शनिक कहा जाता है। सांख्य दर्शन की परम्परा अत्यधिक प्राचीन है, इसीलिए ईश्वरकृष्ण को सांख्य का आदि प्रवर्तक नहीं कहा जा सकता। उनके पहले कपिल, आसुरि, पंचशिख आदि के नाम आते हैं। फिर भी ईश्वरकृष्ण को सांख्य का प्रधान दार्शनिक कह सकते हैं। उनकी पुस्तक 'सांख्यकारिका' को सांख्य का प्रामाणिक और प्राचीन ग्रंथ (चौथी शताब्दी) माना जाता है। इस पर माठरवृत्ति, गौड़पाद भाष्य, युक्तिदीपिका आदि अनेक टीकायें हैं।

सांख्यकारिका के तत्व

सांख्यकारिका में दो मौलिक तत्व स्वीकार किये गए हैं- 'पुरुष' तथा 'प्रकृति'। सम्भवत: यह इसलिए किया गया है कि उपनिषदों में पुरुष या आत्मा को अपरिवर्तनशील कहा गया है। अत: जगत् की सृष्टि के लिए परिवर्तनशील तत्व प्रकृति को मानना आवश्यक प्रतीत हुआ। अद्वैत वेदान्त में इसी प्रकृति को त्रिगुणात्मिका माया कहा गया है। इसी से सांख्य के मत में जगत् सत्य और वेदान्त मत में जगत् मिथ्या माना गया। सांख्य का वेदांत से दूसरा मतभेद पुरुष की अनेकता के विषय में है।

सांख्यकारिका के प्रारम्भ में ही यह कहा गया है कि आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक तीनों प्रकार के दु:खों से आत्यंतिक और पूर्ण मुक्ति प्राप्त करने के लिए तत्वज्ञान ही एकमात्र उपाय है। शास्त्रीय अन्य लौकिक उपायों से दु:ख से पूर्ण और स्थायी मुक्ति नहीं मिल सकती। उनमें हिंसा आदि का भी दोष है। दु:ख अज्ञान से होता है, अत: उसकी आत्यंतिक निवृत्ति ज्ञान से ही हो सकती है। उस ज्ञान का अर्थ है- पुरुष प्रकृति का ज्ञान या पुरुष-प्रकृति के भेद का ज्ञान (विवेकख्याति)।

पुरुष विषय

पुरुष के विषय में तीन मुख्य प्रश्न उठते हैं, पुरुष का अस्तित्व, उसका स्वरूप और प्रकृति के साथ उसका सम्बन्ध। पुरुष के अस्तित्व-विषयक तर्क सत्रहवीं कारिका में इस प्रकार दिये गए हैं-

  1. प्रथम जगत् में देखा जाता है कि जो कुछ संघात के रूप में है, वह किसी अन्य के प्रयोजन के लिए होता है, जैसे बिस्तरा, कुर्सी आदि। जैसे ये सब वस्तुएं अपने लिये नहीं बल्कि दूसरे के प्रयोजन के लिए होती है, वैसे ही प्रकृति के संघात अपने लिये नहीं बल्कि किसी अन्य (पुरुष) के लिए होते हैं। अत: प्रकृति के अतिरिक्त पुरुष है। ऐसा मानने से कि एक संघात दूसरे संघात के लिए होता है, अनवस्था दोष उत्पन्न हो जाएगा।
  2. दूसरा तर्क यह है कि त्रिगुणात्मक प्रकृति और उसके विकार जिसके लिए हैं, वह (पुरुष) स्वयं त्रिगुणात्मक न होकर उससे भिन्न होगा। वह अविकारी होगा।
  3. तीसरा तर्क यह है कि जिस प्रकार रथ को हांकने के लिए रथी की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार जड़ प्रकृति के निर्देशन के लिए पुरुष की आवश्यकता है।
  4. चौथा तर्क यह है कि सुख-दु:खादि भोग किसी जड़ तत्व के लिए नहीं हो सकते। उसके लिए चैतन्य तत्व की आवश्यकता है।
  5. पांचवां तर्क यह है कि मुक्ति की इच्छा पुरुष की हो सकती है, क्योंकि त्रिविध दु:खों का अनुभव चेतन पुरुष को ही होता है, जड़ प्रकृति को नहीं। अत: पुरुष है।

चैतन्य रूप पुरुष के स्वरूप के विषय में 19वीं कारिका होती है कि पुरुष साक्षी है, अर्थात् इसमें कर्तृत्व नहीं है। पुरुष में कैवल्य अर्थात् दु:ख से मुक्ति है। पुरुष मध्यस्थ है, सुख-दु:ख से अप्रभावित है। पुरुष द्रष्टा है और कर्तृत्व शून्य है। अर्थात् पुरुष अनेक है। स्पष्ट है कि ये तर्क जीवों के विषय में संगत है, शुद्ध चैतन्य के विषय में इनको लागू नहीं किया जा सकता। इसी से अद्वैत अनेक जीव मानता है, परन्तु आत्मा नहीं मानता। 20वीं कारिका में प्रकृति पुरुष के संयोग की बात कही गई है। जड़ चेतन में संयोग कैसे होता है या हो सकता है, यह स्पष्ट नहीं किया गया है। केवल यही कहा गया है कि पुरुष के संयोग से जड़ प्रकृति चेतन के समान जान पड़ती है और उदासीन पुरुष में कर्तृत्व का आभास होता है। पुरुष प्रकृति का संयोग लंगड़े और अंधे मनुष्य के संयोग के समान है। प्रकृति जड़ होने के कारण अंधी है और पुरुष निष्क्रिय होने के कारण लंगड़ा है। इस संयोग से ही सृष्टि प्रारम्भ होती है। सृष्टि के दो उद्देश्य हैं- एक तो पुरुष को कर्मों का फलभोग प्रदान करता है और दूसरे पुरुष को मोक्ष देना।

सत्कार्यवाद सिद्धांत

प्रकृति त्रिगुणात्मिका है और सूक्ष्म है। वह प्रत्यक्ष प्रमाण से गम्य नहीं है। अत: उसके अस्तित्व की सिद्धि अनुमान से की जाती है। सत्कार्यवाद के सिद्धांत के अनुसार कार्य के आधार पर कारण की सिद्धि की जाती है। इस सिद्धांत के अनुसार कार्य कारण में स्थित रहता है और उन दोनों की समानता होती है। इस सिद्धांत को[1] इसके विरोधी सिद्धांत असत्कार्यवाद का खंडन करके सिद्ध किया जाता है। खंडन के लिए दिये गए तर्क इस प्रकार हैं-

  1. कार्य का अस्तित्व अवश्य ही पहले से ही रहना चाहिए, क्योंकि जो असत् है उसकी उत्पत्ति किसी भी प्रकार नहीं की जा सकती है।
  2. किसी भी कार्य के उत्पादन के लिए उपयुक्त सामग्री की आवश्यकता होती है, जैसे तेल के उत्पादन के लिए तिल की, दही के उत्पादन के लिए दूध की। बालू से तेल पानी से दही नहीं बनाया जा सकता। इसका अर्थ यह है कि कारण में कार्य पहले से वर्तमान रहता है।
  3. यदि कार्य-कारण में भेद माना जाये तो दुनिया की किसी भी वस्तु से किसी भी अन्य वस्तु की उत्पत्ति सम्भव होनी चाहिए। परन्तु ऐसा सम्भव नहीं है। किसी भी वस्तु से कोई भी वस्तु उत्पन्न नहीं हो सकती। अत: कारण और कार्य में अभेद मानना आवश्यक है।
  4. सामर्थ्यवान कारण से ही कार्य की उत्पत्ति देखी जाती है। चने के बीज से ही चना और जौ के बीज से ही जौ उत्पन्न होता है। अर्थात् कारण में कार्योत्पत्ति की क्षमता या योग्यता पहले से ही होती है।
  5. कारण और कार्य में समानता देखी जाती है। जैसा सूत वैसा कपड़ा होता है। दही और दूध में अनेक समानताएं पाई जाती हैं। अत: कारण में कार्य वर्तमान रहता है।

गुण

इस सिद्धांत के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि जगत् की वस्तुओं में तीन गुण सत्व, रजस् और तमस् पाये जाते हैं। अत: अवश्य ही वे उनके कारण प्रकृति में भी होंगे। जो कारण में नहीं है, वह कार्य में कैसे जा सकता है? अनावस्था दोष से बचने के लिए अंतिम कारण के रूप में प्रकृति को मान लिया जाता है। 15वीं कारिका में यह कहा गया है कि कारण रूप प्रकृति है, क्योंकि जगत् की वस्तुएं सीमित हैं, त्रिगुणात्मक रूप से समान है, शक्तिमान कारण ही कार्य को उत्पन्न करता है तथा कारण से कार्य की उत्पत्ति तथा पुन: उसका कारण में विलय देखा जाता है। अत: असीमित स्वतंत्र, सर्वव्यापक, शक्तिमान प्रकृति को मूल कारण के रूप में मानना आवश्यक है।

प्रकृति और लक्षण

प्रकृति को अव्यक्त भी कहा जाता है। उसके परिणामों को व्यक्त कहते हैं। व्यक्त कार्य, अनित्य, अव्यापी, सक्रिय, अनेक आश्रित, सावयव परतंत्र तथा द्योतक (लिंग) है। ठीक इसके विपरीत अव्यक्त कारणरहित, नित्य, व्यापक, निष्क्रिय, एक, अनाश्रित, लिंगहीन, अवयवहीन तथा स्वतंत्र है।[2] व्यक्त और अव्यक्त में समानताएं भी हैं। दोनों त्रिगुण रूप, अविवेकी, विषय, सामान्य, अचेतन तथा प्रसवधर्मी हैं।[3] पुरुष इन दोनों से भिन्न है। तीनों गुण व्यक्त और अव्यक्त में समान रूप से रहते हैं। उनके लक्षण इस प्रकार हैं- सत्वगुण-सुखरूप, प्रकाशक, लघुरूप, गुरु और आवरण करने वाला। ये तीनों पदार्थ या पुरुष के लिए हैं। इन गुणों में पार्थक्य नहीं, सहयोग है, जैसे दीपक में तेल, बत्ती आदि का सहयोग होता है। एक ही प्रकृति से तीन प्रकार के फल- सुख, दु:ख और मोह- वैसे ही निकलते हैं, जैसे एक सुन्दर गुणवती स्त्री पति के लिए सुखद (सपत्नियों) अपनी सौतों के लिए दु:खद तथा परपुरुष के लिए मोहोत्पादक होती है। ये तीनों गुण एक दूसरे का अभिभाव, सहकारित्व, उत्पादन तथा सहचार करने वाले हैं।[4]

पुरुष संयोग से प्रकृति की साम्यवस्था, जिसमें परिणाम-लक्षण क्रिया होती रहती है, भंग होती है। उससे सर्वप्रथम महत् (बुद्धि) से अंहकार और अंहकार से सत्व की प्रधानता के कारण पांच ज्ञानेन्द्रियाँ, पांच कर्मेन्द्रियां तथा मन (जो दोनों हैं) की उत्पत्ति होती है और तमस् की प्रधानता से पंच तन्मात्राओं (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) या सूक्ष्मतत्वों की उत्पत्ति होती है। बुद्धि, अंहकार और तन्मात्राएं, ये सात प्रकृति और विकृति दोनों (उत्पन्न और उत्पादक दोनों) हैं। मूल प्रकृति केवल उत्पादक है। पंच तन्मात्राओं से उत्पन्न पंच महाभूत तथा ग्यारह इन्द्रियां, ये सोलह केवल विकृति (उत्पन्न) हैं। पुरुष इन सबसे भिन्न है।

बुद्धि के प्रकार

बुद्धि दो प्रकार की होती है- 'सत्व-प्रधान' एवं 'तमस्-प्रधान'। सत्व-प्रधान बुद्धि में अध्यवसाय[5] ज्ञान, विराम एवं ऐश्वर्य पाये जाते हैं। तमस्-प्रधान बुद्धि में इसके विपरीत गुण पाये जाते हैं। अंहकार का अर्थ अभिमान है। मन भी इन्द्रिय है, क्योंकि इसका सम्बन्ध दोनों प्रकार की इन्द्रियों[6] से होता है। यह संकल्प विकल्प करने वाला है। जिस प्रकार विभिन्न गुणों के न्यूनाधिक्य से विभिन्न वस्तुएं उत्पन्न होती हैं, वैसे ही गुणों से विभिन्न इन्द्रियाँ भी उत्पन्न होती हैं। बुद्धि, अंहकार और मन तीनों का अंत:करण कहते हैं। अन्य इन्द्रियों को बाह्यकरण कहते हैं। अंत:करण के कारण पंच प्राण, प्राण, अपान, समान, उदान तथा व्यान, काम करते हैं। प्रत्यक्ष विषय के प्रसंग में (तीनों) अंत:करण और एक इन्द्रिय कभी क्रमश: और कभी एक साथ काम करते हैं। किन्तु परोक्ष विषय के प्रसंग में केवल अंत:करण क्रमश: और एक साथ काम करते हैं। इनके कार्यों में एक समन्वय या एकता होती है, क्योंकि इनकी वृत्तियां पुरुष के लिए होती हैं, अन्य किसी की प्रेरणा से वे प्रेरित नहीं होते। तेरह कारणों के कार्य-अहार्य, धार्य और प्रकाश्य है।[7]

तीन प्रमाण

ईश्वरकृष्ण को तीन प्रमाण मान्य हैं-

  1. प्रत्यक्ष
  2. अनुमान
  3. शब्द

अन्यत्र स्वीकृत अन्य प्रमाणों का समावेश वे इन तीनों के अंतर्गत कर लेते हैं। इन्द्रियों के संयोग पर आश्रित बुद्धि का अध्यवसाय प्रत्यक्ष है। अभाव का ज्ञान भी प्रत्यक्ष ही है। उपमान और अर्थापत्ति एक प्रकार के अनुमान हैं। अतीन्द्रिय विषयों का ज्ञान अनुमान से होता है और उससे भी जो प्राप्त न हो वह शब्द प्रमाण से जाना जाता है। प्रत्यक्ष में कोई कारणों से बाधा होती है, जैसे यदि वस्तु अत्यन्त दूर हो, अत्यन्त समीप हो, इन्द्रियां अस्वस्थ हों, मन चंचल हो, वस्तु सूक्ष्म हो, आवृत्त हो अविभव हो या वस्तु सदृश्यवस्तु में मिल जाये, तो प्रत्यक्ष नहीं हो पाता। बुद्धि या अंत:करण बाहर जाकर विषयों का आकार ग्रहण करता है। जब आलोचन मात्र होता है, तब उसे निर्विकल्प प्रत्यक्ष कहते हैं और जब उसमें मन द्वारा विशिष्टता आती है, तब उसे सविकल्प कहते हैं। सांख्य में प्रमाण्य और अप्रामाण्य दोनों स्वत: होते हैं। भ्रम तब होता है, जब हम किसी वस्तु के अंश को देखकर पूर्ण की कल्पना कर लेते हैं अथवा दो वस्तुओं के भेद को नहीं मानते। ये सिद्धांत सांख्य के सत्कार्यवाद के कारण माने गए हैं।

अनुमान के भेद

अनुमान व्याप्य ज्ञान पर आश्रित ज्ञान है। इसके तीन भेद हैं- पूर्ववत्, शेषवत् तथा सामान्यतोदृष्ट। पूर्ववत् वह अनुमान है, जिसमें पूर्वदृष्ट लिंग और लिंगों के साहचर्य के आधार पर अनुमान किया जाता है, जैसे पूर्वदृष्ट धूम अग्नि के साहचर्य ज्ञान के आधार पर धूम देखकर अग्नि का अनुमान करना। शेषवत् अनुमान वह है, जहाँ सहभाव एवं सह-अस्तित्व के आधार पर अनुमान किया जाता है। कपड़ा और सूत अभिन्न है, क्योंकि कपड़े में सूत पाया जाता है। जहाँ भिन्नत्व है, वहाँ यह सम्बन्ध नहीं पाया जाता। इस प्रकार वह अनुमान समवाय सम्बन्ध की भाव और अभाव पर अवलंबित है। सामान्यतोदृष्ट अनुमान एक क्रिया है। उसके लिए करण की आवश्यकता है, क्योंकि हर एक क्रिया का एक कारण होता है। इससे इन्द्रिय और इन्द्रिय-व्यापार सिद्ध होता है।

सांख्य में शब्द प्रमाण

सांख्य में शब्द प्रमाण के अंतर्गत केवल श्रुतिवचन ही नहीं आता बल्कि कपिल आदि आप्त पुरुषों के वचन भी आते हैं, जो प्रामाणिक हैं, क्योंकि उनका ज्ञान श्रुतिज्ञान पर अवलंबित है। प्रत्यक्ष और अनुमान से जिन वाक्यों का ज्ञान नहीं होता ये शब्द प्रमाण से जाने जाते हैं, जैसे पुनर्जन्म आदि।

सांख्य में पुरुष प्रकृति का अविवेक या उनके भेद का अज्ञान ही बंधन का कारण है। इसी अज्ञान के कारण हम अपने को शरीर, इन्द्रिय आदि समझ लेते हैं, अपने को मरणशील समझते हैं और पुनर्जन्म होता है। जब प्रकृति और पुरुष के भेद का ज्ञान (विवेक) दृढ़ हो जाता है, तब प्रकृति बंधन नहीं कर पाती। ज्ञान होने पर प्रकृति का नग्न रूप या वास्तविक रूप दिखाई पड़ जाता है। उसका मोहक रूप जिससे भोग होता है, दूर हो जाता है। विवेक ज्ञान सात्विक बुद्धि में होता है। इसी से प्रकृति को बंधन और मोक्ष दोनों का कारण कहा गया है। बंधन प्रकृति से नहीं बल्कि उसके मोहक रूप से होता है। इसी से शरीर रहते हुए भी मुक्ति (जीवनमुक्ति) हो सकती है। प्रारब्ध कर्म के कारण शरीर की क्रिया चलती है, परन्तु मोहकत्व नहीं रहता। शरीर छूटने पर विदेह मुक्ति की प्राप्ति होती है। यदि ज्ञान के पहले शरीर छूट जाता है, तो सूक्ष्म शरीर के माध्यम से जीव अन्य लोकों में जाता है और कर्मफल भोग के लिए फिर शरीर धारण करता है, परन्तु ज्ञान हो जाने पर फिर शरीर धारण नहीं होता है। मुक्ति की अवस्था में सुख या आनंद का अनुभव नहीं होता है।  

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

विश्व के प्रमुख दार्शनिक (हिन्दी) |लेखक: प्रो. रमाकांत त्रिपाठी |प्रकाशक: वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, नई दिल्ली, 684 |पृष्ठ संख्या: 63 |

  1. कारिका संख्या 9 में
  2. कारिका संख्या 10
  3. कारिका संख्या 11
  4. कारिका 12
  5. ऐसा निश्चय कि यह मुझे करना है
  6. कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय
  7. कारिका संख्या 30, 31, 32

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