गौरैया  

गौरैया
गौरैया
जगत जंतु (Animalia)
संघ कोर्डेटा (Chordata)
वर्ग एवीज (Aves)
गण पैसरीफोर्म्स (Passeriformes)
कुल पैसरेडी (Passeridae)
जाति पैसर (Passer)
प्रजाति डोमेस्टिकस(domesticus)
द्विपद नाम पैसर डोमेस्टिकस (Passer domesticus‌)
संबंधित लेख विश्व गौरैया दिवस
अन्य जानकारी नर गौरैया के सिर का ऊपरी भाग, नीचे का भाग तथा गालों का रंग भूरा होता है। गला, चोंच और आँखों पर काला रंग होता है। जबकि मादा चिड़िया के सिर और गले पर भूरा रंग नहीं होता।

गौरैया एक घरेलू चिड़िया है जो यूरोप और एशिया में सामान्य रूप से हर जगह पाई जाती है। यह विश्व में सबसे अधिक पाए जाने वाले पक्षियों में से है। लोग जहाँ भी घर बनाते हैं देर सबेर गौरैया के जोड़े वहाँ रहने पहुँच ही जाते हैं।

सामान्य परिचय

गौरैया एक छोटी चिड़िया है। यह हल्की भूरे रंग या सफेद रंग में होती है। इसके शरीर पर छोटे-छोटे पंख और पीली चोंच व पैरों का रंग पीला होता है।
गौरैया
नर गौरैया की पहचान उसके गले के पास काले धब्बे से होती है। 14 से 16 सेमी लंबी यह चिड़िया मनुष्य के बनाए हुए घरों के आसपास रहना पसंद करती है। इसे हर तरह की जलवायु पसंद है। गाँवों- कस्बों-शहरों और खेतों के आसपास यह बहुतायत से पायी जाती है। नर गौरैया के सिर का ऊपरी भाग, नीचे का भाग तथा गालों का रंग भूरा होता है। गला, चोंच और आँखों पर काला रंग होता है। जबकि मादा चिड़िया के सिर और गले पर भूरा रंग नहीं होता। लोग इन्हें चिड़ा-चिड़िया भी कहते हैं। यह निहायत ही घरेलू किस्म का पक्षी है, जो यूरोप और एशिया में सामान्य रुप से पाया जाता है। मनुष्य जहाँ-जहाँ भी गया, इस पक्षी ने उसका अनुसरण किया। उन्हीं के घरों के छप्परों में घोंसला बनाया और रहने लगा। इस तरह यह अफ़्रीका, यूरोप, आस्ट्रेलिया और एशिया में सामान्यतया पाया जाने लगा।

प्रजातियाँ

इस पक्षी (गौरैया) की मुख्य छः प्रजातियां पायी जाती है-

  1. हाउस स्पेरो अथवा घरेलू चिड़िया
  2. स्पेनिश स्पेरो
  3. सिंड स्पेरो
  4. रसेट स्पेरो
  5. डेड सी स्पेरो
  6. ट्री स्पेरो।
गौरैया
इनके अलावा सोमाली, पिंक बैक्ड, लागो, शेली, स्कोट्रा, कुरी, कैप, नार्दन ग्रे हैडॆड, स्वैनसन, स्वाहिल, डॆहर्ट, सुडान गोल्ड, अरैबियन गोल्ड,चेस्टनट आदि चिड़िया विभिन्न देशों में पायी जाती है। इनके रंग-रुप-आकार- प्रकार देश-प्रदेश की जलवायु के अनुसार परिवर्तित हुए हैं।[1]
नर गौरैया

धार्मिक महत्त्व

भारतीय पौराणिक मान्यताओं अनुसार यह चिड़िया जिस भी घर में या उसके आंगन में रहती है वहां सुख और शांति बनी रहती है। खुशियां उनके द्वार पर हमेशा खड़ी रहती है और वह घर दिनोंदिन तरक्की करता रहता है। इसके अलावा भी हिंदू धर्म में ऐसे और भी पक्षी हैं जिनका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। पक्षियों को हिंदू धर्म में देवता और पितर माना गया है। कहते हैं जिस दिन आकाश से पक्षी लुप्त हो जाएंगे उस दिन धरती से मनुष्य भी लुप्त हो जाएगा। किसी भी पक्षी को मारना अपने पितरों को मारना माना गया है।[2]

विलुप्त होती गौरैया

गौरैया

घरों को अपनी चीं चीं से चहकाने वाली गौरैया अब दिखाई नहीं देती। इस छोटे आकार वाले खूबसूरत पक्षी का कभी इंसान के घरों में बसेरा हुआ करता था और बच्चे बचपन से इसे देखते बड़े हुआ करते थे। अब स्थिति बदल गई है। गौरैया के अस्तित्व पर छाए संकट के बादलों ने इसकी संख्या काफ़ी कम कर दी है और कहीं कहीं तो अब यह बिल्कुल दिखाई नहीं देती। पहले यह चिड़िया जब अपने बच्चों को चुग्गा खिलाया करती थी तो इंसानी बच्चे इसे बड़े कौतूहल से देखते थे। लेकिन अब तो इसके दर्शन भी मुश्किल हो गए हैं और यह विलुप्त हो रही प्रजातियों की सूची में आ गई है। पक्षी विज्ञानी हेमंत सिंह के मुताबिक गौरैया की आबादी में 60 से 80 फीसदी तक की कमी आई है। यदि इसके संरक्षण के उचित प्रयास नहीं किए गए तो हो सकता है कि गौरैया इतिहास की चीज बन जाए और भविष्य की पीढ़ियों को यह देखने को ही न मिले। ब्रिटेन की ‘रॉयल सोसायटी ऑफ प्रोटेक्शन ऑफ बर्डस’ ने भारत से लेकर विश्व के विभिन्न हिस्सों में अनुसंधानकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययनों के आधार पर गौरैया को ‘रेड लिस्ट’ में डाला है। आंध्र विश्वविद्यालय द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक गौरैया की आबादी में क़रीब 60 फीसदी की कमी आई है। यह ह्रास ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में हुआ है। पश्चिमी देशों में हुए अध्ययनों के अनुसार गौरैया की आबादी घटकर खतरनाक स्तर तक पहुंच गई है।

विश्व गौरैया दिवस

गौरैया पर मंडरा रहे खतरे के कारण ही सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद मोहम्मद ई. दिलावर जैसे लोगों के प्रयासों से आज दुनिया भर में '20 मार्च' को 'विश्व गौरैया दिवस' मानाया जाता है, ताकि लोग इस पक्षी के संरक्षण के प्रति जागरूक हो सकें।
मादा गौरैया
दिलावर द्वारा शुरू की गई पहल पर ही आज बहुत से लोग गौरैया बचाने की कोशिशों में जुट रहे हैं। पक्षी विज्ञानी हेमंत सिंह के अनुसार आवासीय ह्रास, अनाज में कीटनाशकों के इस्तेमाल, आहार की कमी और मोबाइल फोन तथा मोबाइल टॉवरों से निकलने वाली सूक्ष्म तरंगें गौरैया के अस्तित्व के लिए खतरा बन रही हैं। लोगों में गौरैया को लेकर जागरूकता पैदा किए जाने की ज़रूरत है क्योंकि कई बार लोग अपने घरों में इस पक्षी के घोंसले को बसने से पहले ही उजाड़ देते हैं। कई बार बच्चे इन्हें पकड़कर पहचान के लिए इनके पैर में धागा बांधकर इन्हें छोड़ देते हैं। इससे कई बार किसी पेड़ की टहनी या शाखाओं में अटक कर इस पक्षी की जान चली जाती है। इतना ही नहीं कई बार बच्चे गौरैया को पकड़कर इसके पंखों को रंग देते हैं जिससे उसे उड़ने में दिक्कत होती है और उसके स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर पड़ता है। पक्षी विज्ञानी के अनुसार गौरैया को फिर से बुलाने के लिए लोगों को अपने घरों में कुछ ऐसे स्थान उपलब्ध कराने चाहिए जहां वे आसानी से अपने घोंसले बना सकें और उनके अंडे तथा बच्चे हमलावर पक्षियों से सुरक्षित रह सकें। उनका मानना है कि गौरैया की आबादी में ह्रास का एक बड़ा कारण यह भी है कि कई बार उनके घोंसले सुरक्षित जगहों पर न होने के कारण कौए जैसे हमलावर पक्षी उनके अंडों तथा बच्चों को खा जाते हैं।[3]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. दु‍ष्यंतकुमार यादव का आलेख - घरेलू चिड़िया (हिंदी) रचनाकार (ब्लॉग)। अभिगमन तिथि: 26 जुलाई, 2014।
  2. गौरैया (हिंदी) वेबदुनिया हिंदी। अभिगमन तिथि: 19 दिसम्बर, 2013।
  3. गौरैया.. विलुप्त प्रजातियों की सूची में (हिंदी) वेबदुनिया हिंदी। अभिगमन तिथि: 26 जुलाई, 2014।

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