"वीर -रामधारी सिंह दिनकर": अवतरणों में अंतर
भारत डिस्कवरी प्रस्तुति
प्रीति चौधरी (वार्ता | योगदान) ('{| style="background:transparent; float:right" |- | {{सूचना बक्सा कविता |चित्र=Dinkar.jpg |चि...' के साथ नया पन्ना बनाया) |
No edit summary |
||
पंक्ति 32: | पंक्ति 32: | ||
<poem> | <poem> | ||
सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं | सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं | ||
स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं | |||
सच है, विपत्ति जब आती है, | |||
कायर को ही दहलाती है , | कायर को ही दहलाती है, | ||
सूरमा नहीं विचलित होते , | सूरमा नहीं विचलित होते, | ||
क्षण एक नहीं धीरज खोते , | क्षण एक नहीं धीरज खोते, | ||
विघ्नों को गले लगाते हैं , | विघ्नों को गले लगाते हैं, | ||
कांटों में राह बनाते | कांटों में राह बनाते हैं। | ||
मुहँ से न कभी उफ़ कहते हैं , | मुहँ से न कभी उफ़ कहते हैं, | ||
संकट का चरण न गहते हैं , | संकट का चरण न गहते हैं, | ||
जो आ पड़ता सब सहते हैं , | जो आ पड़ता सब सहते हैं, | ||
उद्योग - निरत नित रहते हैं , | उद्योग - निरत नित रहते हैं, | ||
शूलों का मूळ नसाते हैं, | |||
बढ़ खुद विपत्ति पर छाते | बढ़ खुद विपत्ति पर छाते हैं। | ||
है कौन विघ्न ऐसा जग में , | है कौन विघ्न ऐसा जग में, | ||
टिक सके आदमी के मग में ? | टिक सके आदमी के मग में? | ||
ख़म ठोंक ठेलता है जब नर | ख़म ठोंक ठेलता है जब नर | ||
पर्वत के जाते | पर्वत के जाते पाँव उखड़, | ||
मानव जब जोर लगाता है , | मानव जब जोर लगाता है, | ||
पत्थर पानी बन जाता | पत्थर पानी बन जाता है। | ||
गुन बड़े एक से एक प्रखर , | गुन बड़े एक से एक प्रखर, | ||
हैं छिपे मानवों के | हैं छिपे मानवों के भीतर, | ||
मेंहदी में जैसी लाली हो , | मेंहदी में जैसी लाली हो, | ||
वर्तिका - बीच उजियाली हो , | वर्तिका - बीच उजियाली हो, | ||
बत्ती जो नहीं जलाता है , | बत्ती जो नहीं जलाता है, | ||
रोशनी नहीं वह पाता | रोशनी नहीं वह पाता है। | ||
</poem> | </poem> | ||
{{Poemclose}} | {{Poemclose}} | ||
<br /> | |||
==संबंधित लेख== | ==संबंधित लेख== |
09:59, 23 अगस्त 2011 का अवतरण
| ||||||||||||||||||
|
सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं |
संबंधित लेख