बसाढ़  

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बसाढ़ वैशाली का प्राचीन नाम हैं। इतिहासकार कनिंघम राजा विशाल की पहचान वैशाली के प्रसिद्ध संस्थापक विशाल से करते हैं।

इतिहास

वैशाली लिच्छवियों की राजधानी थी। लिच्छवी छठी शताब्दी ई.पू. में एक प्रमुख गण था। लिच्छवी जनपदकालीन पूर्वी भारत के महान् एवं शक्तिशाली वज्जिसंघ[1] का मुख्य सदस्य था। यह संघ अत्यंत मज़बूत था। इसकी शासन व्यवस्था आदर्श थी। मगध शासक अजातशत्रु ने वैशाली गणराज्य को एक लम्बे संघर्ष में छलपूर्वक पराजित करके मगध का अंग बना दिया। गुप्त वंश के चन्द्रगुप्त प्रथम (320-335 ई.) ने लिच्छवी कन्या कुमारदेवी से विवाह किया था। गुप्त वंश के पराक्रमी सम्राट समुद्रगुप्त का जन्म इसी लिच्छवी रानी से हुआ था।

जातक कथाओं से ज्ञात होता है कि बुद्ध के काल में वैशाली नगर तीन प्राचीरों से परिवृत्त था और तीनों स्थानों पर पहरे की मीनारों और इमारतों सहित फाटक बने हुए थे। कई बौद्ध ग्रंथों के आधार पर कहा जा सकता है कि वैशाली एक वैभवपूर्ण, समृद्धिशाली, जनसंकुल और प्रचुर खाद्य पदार्थों वाला नगर था। यहाँ पर अनेक ऊँचे भवन, कंगूरेदार इमारतें, पुष्कर आदि थे। बौद्ध साहित्य में यहाँ की प्रसिद्ध गणिका आम्रपाली के विशाल प्रासाद तथा उद्यान का वर्णन है। महात्मा बुद्ध ने अपने अनेक अमर वचन यहीं पर कहे थे। बुद्ध के निर्वाण के 100 वर्ष पश्चात् 'द्वितीय बौद्ध संगीति' वैशाली में ही हुई थी। यह नगर जैन और बौद्ध दोनों ही धर्मों के प्रारम्भिक इतिहास की गतिविधियों का गवाह रहा है। इससे बुद्ध और महावीर की पुण्य स्मृतियाँ अनुलग्न रही हैं। महावीर को तो वैशाली नगर का ही निवासी कहा जाता था। वैशाली के निकट स्थित 'कुण्डग्राम' उनका जन्म स्थान था।

चीनी यात्री

पाँचवीं शताब्दी ईस्वी में चीनी यात्री फ़ाह्यान वैशाली आया था। उसके अनुसार इसके उत्तर में एक विशाल वन था, जिसमें एक विहार था, जहाँ पर महात्मा बुद्ध रहते थे। यहाँ आनन्द के शरीरार्ध पर निर्मित एक स्तूप था। युवानच्वांग ने वैशाली नगर की परिधि का ब्यौरा भी दिया है। वह लिखता है कि- "यह आमों, केलों और अन्य फलों से युक्त एक अत्यंत उपजाऊ क्षेत्र था। यहाँ के लोग ईमानदार, सत्कार्यों में अभिरुचि वाले थे।"

ध्यान दें अधिक जानकारी के लिए देखें:- वैशाली

टीका टिप्पणी और संदर्भ

भारतीय ऐतिहासिक स्थल कोश से पेज संख्या 322-323 | डॉ. हुकम चन्द जैन | जैन प्रकाशन मन्दिर

  1. आठ गणों का संघ

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