विश्वनाथ मंदिर, खजुराहो  

विश्वनाथ मंदिर, खजुराहो
विश्वनाथ मंदिर, खजुराहो
विवरण विश्वनाथ मंदिर खजुराहो, मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध मंदिरों तथा पर्यटन स्थलों में से एक है। यह मंदिर हिन्दू देवता, भगवान शिव को समर्पित है।
राज्य मध्य प्रदेश
ज़िला खजुराहो
निर्माता महाराज धंगदेव वर्मन
निर्माण काल 1002-1003 ई.
Map-icon.gif गूगल मानचित्र
संबंधित लेख हिन्दू देवता, भगवान शिव, कालिदास, शकुंतला
अन्य जानकारी शिव मंदिरों में अत्यंत महत्त्वपूर्ण इस विश्वनाथ मंदिर का निर्माण काल सन 1002-1003 ई. है। पश्चिम समूह की जगती पर स्थित यह मंदिर अति सुंदर है। मंदिर का नामकरण शिव के एक और नाम 'विश्वनाथ' पर किया गया है।
अद्यतन‎ 05:21, 4 जुलाई 2017 (IST)

विश्वनाथ मंदिर खजुराहो, मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध मंदिरों तथा पर्यटन स्थलों में से एक है। यह मंदिर हिन्दू देवता, भगवान शिव को समर्पित है। मुग्ध कर देने वाला संगमरमर का शिवलिंग मुख्य देवता के रूप में पूजा जाता है। महाराज धंगदेव वर्मन द्वारा बनवाया गया यह मंदिर पश्चिमी समूह के मंदिरों के अंतर्गत आता है। यह मंदिर पंचायतन आकार में बना है, जिसमें चारों कोनों पर चार मंदिर बीच में स्थित मुख्य मंदिर को घेरे हुए हैं।

निर्माण काल

शिव मंदिरों में अत्यंत महत्त्वपूर्ण इस विश्वनाथ मंदिर का निर्माण काल सन 1002-1003 ई. है। पश्चिम समूह की जगती पर स्थित यह मंदिर अति सुंदर है। मंदिर का नामकरण शिव के एक और नाम 'विश्वनाथ' पर किया गया है।

देव प्रतिमाएँ

मंदिर की लंबाई 89' और चौड़ाई 45' है। पंचायतन शैली का संधार प्रासाद यह शिव भगवान को समर्पित है। गर्भगृह में शिवलिंग के साथ-साथ केंद्र में नंदी पर आरोहित शिव प्रतिमा स्थापित की गयी है। इस मंदिर में तीन सिर वाले ब्रह्मा जी की मूर्ति स्थापित है। अब इसका कुछ भाग खंडित हो चुका है। भारत में भगवान विष्णु और शिव शंकर के मंदिर तो बहुत जगह हैं, लेकिन ब्रह्मा के मंदिर देश में ढूंढने से भी नहीं मिलते हैं। मंदिर की उत्तरी दिशा में स्थित शेर और दक्षिणी दिशा में स्थित हाथी की प्रतिमाएँ काफ़ी सजीव लगती हैं। इनके अलावा एक नंदी की प्रतिमा भगवान की ओर मुँह किए हुए भी मौजूद है।

प्रतिमाओं का सौंदर्य

खजुराहो प्रतिमाओं का प्रथम परिचय विश्वनाथ मंदिर को देखने से मिलता है, क्योंकि सामने की ओर से आते हुए यह मंदिर पहले आता है। इस मंदिर में 620 प्रतिमाएँ हैं। इन प्रतिमाओं का आकार 2' से 2', 6' तक ऊँचा है। मंदिर के भीतर की प्रतिमाएँ भव्यता एवं सुदरता का प्रतीक है। मंदिर की सुंदरता देखने वालों को प्रभावित करती है। यहाँ की आमंत्रण देती अप्सराएँ मन मोह लेती है। कुछ प्रतिमाएँ मन्मथ- अति का शिकार हैं। प्रतिमाओं में मन्मथ गोपनीय है। कंदारिया मंदिर के पूर्ववर्ती के उपनाम से जाने जाने वाले इस मंदिर में दो उप मंदिर, उत्तर-पूर्वी दक्षिण मुखी तथा दक्षिण पश्चिमी पूर्वोन्मुखी हैं। इन दोनों उप मंदिरों पर भी पट्टिका पर मिथुन प्रतिमाएँ अंकित की गयी हैं। इन मंदिरों के भीतर ही अर्द्धमंडप, मंडप, अंतराल, गर्भगृह तथा प्रदक्षिणापथ निर्मित है। मंदिर के वितान तोरण तथा वातायण उत्कृष्ट हैं। वृक्षिका मूलतः 87 थीं, जिसमें अब केवल नीचे की छः ही बच पायी हैं। पार्श्व अलिंदों की अप्सराओं का सौंदर्य अद्वितीय है। वह सभी प्रेम की पात्र हैं। त्रिभंग मुद्राओं में त्रिआयामी यौवन से भरपुर रसमयी अप्सराएँ अत्यंत उत्कृष्टता से अंकित की गयी हैं। इन प्रतिमाओं को देखकर ऐसा लगता है कि ये अप्सराएँ सारे विश्व की सुंदरियों को मुकाबले के लिए नियंत्रण दे रही हैं। कालिदास की शकुंतला से भी बढ़कर जीवंत और शोखी इन सुंदर प्रतिमाओं में दिखाई देती है। इनके पाँव की थिरकन, जैसे मानव कानों में प्रतिध्वनित हो रही हो, जैसे घुंघरों से कान हृदय में आनंद भर रहे हों। मंदिर की ये प्रतिमाएँ देव- संयम और मानव धैर्य की परीक्षा लेती दिखती हैं।

मंदिर के द्वार शाखों पर मिथुन जागृतावस्था में है। इनके जागृतावस्था एवं सुप्तावस्था में कोई अंतर ही नहीं दिखाई देता है। विश्वनाथ मंदिर की स्थापत्य कला त्रयंग मंदिर प्रतिरथ और करणयुक्त है। प्रमुख नौ रथिकाएँ अधिष्ठान के ऊपरी बाह्य भाग पर अंकित हैं। सात रथिकाओं में गणेश की प्रतिमा दिखाई देती है। एक रथिका पर वीरभद्र विराजमान हैं। छोटी राथिकाओं पर मिथुन है। इनमें भ्रष्ट मिथुनों का अधिक्य पाया जाता है। मंदिर के उरु: श्रृंग की संख्या चार है तथा उपश्रृंग की संख्या सोलह है।

द्वार अभिलेख

मंडप की दीवार पर लगा अभिलेख चंदेल वंश के महान् शासक धंग का है। इसमें संस्कृत में तैंतीस पंक्तियाँ हैं। यहाँ मंदिर में राजा धंग के समय से ही शिव मर्कटेश्वर प्राण प्रतिष्ठित हैं। मंदिर का अधिष्ठान उन्नत है। प्रमुख रथिकाओं पर चंद्रावलोकन है। इनमें सातदेव मातृ प्रतिमाएँ सुंदरता के साथ अंकित की गयी हैं। जंघा भाग कक्षासन्न युक्त है। आसन्न पट्टिका पुष्प चक्रों से सुसज्जित हैं। जंघा भाग पर तीन पालियों में प्रतिमाएँ अंकित की गई हैं। भूमि और श्रृंगों पर आम्लक, चंद्रिका तथा कलश अंकित किया गया है। अंतराल की छत छः मंजिला बनी हुई है। प्रत्येक मंजिल पर रथिकाएँ हैं, जो कि उद्गम युक्त हैं। ऊपरी उद्गम पर शुकनासक है। महामण्डप पिरामिड प्रकृति की है, जो पंद्रह पीढ़ों से बनी है। इसके अतिरिक्त यहाँ उप- पिरामिड भी है। मुख पिरामिड सोलह पीढ़ों से बनी है। यह छोटा और रथिकायुक्त है। मुखमंडप के भीतर भरणी टोड़ायुक्त है। आमलकों पर कीर्तिमुख है। मंडप के स्तंभ मुखमंडप के स्तंभों से मेल खाते हैं। शाल मंजिकाएँ तथा मिथुन प्रतिमाएँ, इस मंदिर की विशेषता है। मंडप के स्तंभ वर्द्यमानक प्रतिकृति के हैं। यहाँ की अप्सराएँ अपनी छटा बिखेरती हैं। कुल मिलाकर यह मंदिर अत्यंत महत्वपूर्ण मंदिर है और मिथुनों के लिए प्रसिद्ध है


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