जैन दर्शन में अध्यात्म  

'अध्यात्म' शब्द अधि+आत्म –इन दो शब्दों से बना है, जिसका अर्थ है कि आत्मा को आधार बनाकर चिन्तन या कथन हो, वह अध्यात्म है। यह इसका व्युत्पत्ति अर्थ हे। यह जगत् जैन दर्शन के अनुसार छह द्रव्यों के समुदायात्मक है। वे छह द्रव्य हैं-

  1. जीव,
  2. पुद्गल,
  3. धर्म,
  4. अधर्म,
  5. आकाश और
  6. काल।
  • इनमें जीव द्रव्य चेतन है, जिसे 'आत्मा' शब्द से भी कहा जाता है। शेष पाँचों द्रव्य अजीव हैं, जिन्हें अचेतन, जड़ और अनात्म शब्दों से भी व्यवहृत किया जाता है। पुद्गल द्रव्य स्पर्श, रस, गन्ध और रूप गुणोंवाला होने से इन्द्रियों का विषय है। पर आकाश, काल, धर्म और अधर्म ये चार अजीव द्रव्य इन्द्रियगोचर नहीं हैं, क्योंकि उनमें स्पर्श, गन्ध, रस और रूप नहीं हैं। पर आगम और अनुमान से उनका अस्तित्व सिद्ध है।
  • हमारे भीतर दो द्रव्यों का मेल है- शरीर और आत्मा शरीर अचेतन या जड़ है और आत्मा सचेतन है, ज्ञाता-दृष्टा है। किन्तु वह स्पर्श-रस-गन्ध-वर्ण-शब्द रूप नहीं है। अत: पाँचों इन्द्रियों का विषय नहीं है। ऐसा होने पर भी वह शरीर से भिन्न अपने पृथक् अस्तित्व को मानता है। यद्यपि जन्म में तो शरीर के साथ ही आया। पर मरण के समय यह स्पष्ट हो जाता है कि देह मात्र रह गयी, आत्मा पृथक् हो गया, चला गया।
  • कार्य की उत्पत्ति में दो कारण माने जाते है-
  1. उपादान और
  2. निमित्त।
  • निमित्त कारण वह होता है जो उस उपादान का सहयोगी होता है, पर कारक नहीं। यदि प्रत्येक द्रव्य के परिवर्तन में पर द्रव्य को कर्ता माना जाये तो वह परिवर्तन स्वाधीन न होगा, किन्तु पराधीन हो जायेगी और ऐसी स्थिति में द्रव्य की स्वतन्त्रता समाप्त हो जायेगी। इस सिद्धान्त के अनुसार जीव द्रव्य की संसार से मुक्ति पराधीन हो जायेगी, जब कि मुक्ति स्वाधीनता का नाम है या ऐसा कहिए कि पराधीनता से छूटने का नाम ही मुक्ति है।
  • संसार में जीवन का बंधन यद्यपि पर के साथ है, पर उस बंधन में अपराध उस जीव का स्वयं का हें वह निज के स्वरूप को न जानने की भूल से पर को अपनाता है और वहीं उसका बंधन है। और यह बंधन ही संसार है। इस बंधन से छूटने के लिये जब उसे अपनी भूल का ज्ञान होता है, तो वह उस मार्ग से विरक्त होता है।
  • सारांश यह है कि संसारी आत्मा अपने विकारी भावों के कारण कर्म से बंधा है और अपने आत्मज्ञान रूप अविकारी भाव से ही कर्मबंधन से मुक्त होता है। पर संसारी और मुक्ति दोनों अवस्था में अपने उन उन भावों का कर्त्ता वह स्वयं है, अन्य कोई नहीं। ज्ञानी ज्ञान भाव का कर्त्ता है और अज्ञानी अज्ञानमय भावों का कर्त्ता है। समयसार में आचार्य कुन्दकुन्द ने यही लिखा है—

यं करोति भावमात्मा कर्त्ता सो भवति तस्य भावस्य।
ज्ञानिनस्तुज्ञानमयोऽज्ञानमयोऽज्ञानिन:॥ -संस्कृत छाया,126॥

अर्थात् जो आत्मा जिस समय जिस भाव को करता है उस समय उस भाव का कर्त्ता वही है। ज्ञानी का भाव ज्ञानमय होता है और अज्ञानी का भाव अज्ञानमय होता है।
  • आचार्य अमृतचन्द्र भी लिखते हैं-

ज्ञानिनो ज्ञाननिर्वृत्ता: सर्वे भावा भवन्ति हि।
सर्वेऽप्यज्ञाननिर्वृत्ता भवन्त्यज्ञानिनस्तु ते॥67॥

  • कर्ता और कर्म के सम्बन्ध में आचार्य अमृतचन्द्र कहते हैं-

य: परिणमति स कर्ता य: परिणामो भवेत्तु तत् कर्म।
या परिणति: क्रिया सा त्रयमपि भिन्नं न वस्तुतया ॥51॥

  • जो पदार्थ परिवर्तित होता है वह अपनी परिणति का स्वयं कर्त्ता है और वह परिणमन उसका कर्म है और परिणति ही उसकी क्रिया हैं। ये तीनों वस्तुत: एक ही वस्तु में अभिन्न रूप में ही हैं, भिन्न रूप में नहीं।

एक: परिणमति सदा परिणामो जायते ते सदैकस्य।
एकस्य परिणति: स्यात् अनेकमप्येकमेव यत: ॥52॥

  • द्रव्य अकेला ही निरन्तर परिणमन करता है वह परिणमन भी उस एक द्रव्य में ही पाया जाता है और परिणति क्रिया उसी एक में ही होती है इसलिये सिद्ध है कर्ता, कर्म, क्रिया अनेक होकर भी एक सत्तात्मक है। तात्पर्य यह है कि हम अपने परिणमन के कर्ता स्वयं हैं दूसरे के परिणमन के कर्ता नहीं हैं। आगे चलकर आचार्य अमृतचन्द्र लिखते हैं-

आसंसारत एव धावति परं कुर्वेऽहमित्युच्चकै:
दुर्वारं ननु मोहिनामिह महाहङ्काररूपं तम:।
तद्भूतार्थपरिग्रहेण विलयं यद्येकवारं व्रजेत्
तत् किं ज्ञानधनस्य बंधनमहो भूयो भवेदात्मन:॥55॥

  • अर्थात् संसारी प्राणियों की अनादि काल से ही ऐसी दौड़ लग रही है कि मैं पर को ऐसा कर लूँ। यह मोही अज्ञानी पुरुषों का मिथ्या अहंकार है। जब तक यह टूट न हो तब तक उसका कर्म बंध नहीं छूटता। इसीलिये वह दु:खी होता है और बंधन में पड़ता है। इसी को स्पष्ट करने के लिये उन्होंने यह सिद्धांत स्थापित किया है कि-

आत्मभावान् करोत्यात्मा परभावान् सदा पर:।
आत्मैव ह्यात्मनो भावा: परस्य पर एव ते॥56॥

  • इसका तात्पर्य यह है कि आत्मा अपने ही भावों का कर्ता है और परद्रव्यों के भावों का (परिवर्तनों का) कर्ता परद्रव्य ही है। आत्मभाव आत्मा ही है।

जैन कर्म सिद्धान्त : नामकर्म के विशेष सन्दर्भ में

जैन कर्म सिद्धान्त इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि इसके माध्यम से ईश्वरादि परकर्तृत्व या सृष्टकिर्तृत्व के भ्रम को तोड़कर प्रत्येक प्राणी को अपने पुरुषार्थ द्वारा उस अनन्त चतुष्टय (अनन्त-दर्शन, अनन्त-ज्ञान, अनन्त-बल और अनन्त-वीर्य) की प्राप्ति का मार्ग सहज और प्रशस्त किया है। वस्तुत: प्रत्येक प्राणी अपने भाग्य का स्वयं सष्टा, स्वर्ग-नरक का निर्माता और स्वयं ही बंधन और मोक्ष को प्राप्त करने वाला है। इसमें ईश्वर आदि किसी अन्य माध्यम को बीच में लाकर उसे कर्तृत्व मानना घोर मिथ्यात्व बतलाया गया है। इसीलिए 'बुज्झिज्जत्ति उट्टिज्जा बंधणं परिजाणिया'- आगम का यह वाक्य स्मरणीय है जिसमें कहा गया है कि बंधन को समझो और तोड़ों, तुम्हारी अनन्तशक्ति के समक्ष बन्धन की कोई हस्ती नहीं है।

  • इसलिए जैन एवं वेदान्त दर्शन का यही स्वर बार-बार याद आता है कि रे आत्मन्। तेरी मुक्ति तेरे ही हाथ में है, तू ही बन्धन करने वाला है और तू ही अपने को मुक्त करने वाला भी है-

स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते।
स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद् विमुज्यते॥

  • इसीलिए एक को दूसरों के सुख-दु:ख, जीवन-मरण का कर्ता मानना अज्ञानता है। यदि ऐसा मान लिया जाए तो फिर स्वयं कृत शुभाशुभ कर्म निष्फल सिद्ध होंगे। इस सन्दर्भ में आचार्य अमितगति का यह कथन स्मरणीय है-

स्वयं कृतं कर्म यदात्मना पुरा, फलं तदीयं लभते शुभाशुभम्।
परेणदत्तं यदि लभ्यते स्फुटं, स्वयं कृतं कर्म निरर्थकं तदा॥
निजार्जितं कर्म विहाय देहिनो, न कोऽपि कस्यापि ददाति किंचन।
विचारयन्नेवमनन्य मानस: परो ददातीति विमुच्य शेमुषीम्॥

  • इस तरह जैन कर्म सिद्धान्त दैववाद नहीं अपितु अध्यात्मवाद है। क्योंकि इसमें दृश्यमान सभी अवस्थाओं को कर्मजन्य कहकर यह प्रतिपादन किया गया है कि 'आत्मा अलग है और कर्मजन्य शरीर अलग हैं।' इस भेद विज्ञान का सर्वोच्च उपदेष्टा होने के कारण जैन कर्म सिद्धान्त अध्यात्मवाद का ही दूसरा नाम सिद्ध होता है।
  • कर्मबन्ध के चार भेद हैं —
  1. कर्मों में ज्ञान आदि गुणों को घातने, सुख-दु:खादि देने का स्वभाव पड़ना प्रकृतिबंध है।
  2. कर्म बंधने पर जितने समय तक आत्मा के साथ बद्ध रहेंगे, उस समय की मर्यादा का नाम स्थितिबंध है।
  3. कर्म तीव्र या मन्द जैसा फल दे उस फलदान की शक्ति का पड़ना अनुभागबन्ध है।
  4. कर्म परमाणुओं की संख्या के परिणाम को प्रदेशबंध कहते हैं।

नामकर्म का स्वरूप

नामकर्म के विशेष विवेचन के पूर्व सर्वप्रथम उसका स्वरूप जान लेना भी आवश्यक है।

  • आचार्य कुन्दकुन्द ने कहा है-

कम्मं णामसमक्खं सभावमध अप्पणो सहावेण।
अभिभूय णरं तिरियं णेरइयं वासुरं कुणदि ॥ प्रवचनसार 117॥

  • अर्थात् नाम संज्ञा वाला कर्म जीव के शुद्ध स्वभाव को आच्छादित करके उसे मनुष्य, तिर्यंच, नारकी अथवा देवरूप करता है। धवला टीका[1] में कहा है- जो नाना प्रकार की रचना निर्वृत्त करता है वह नामकर्म है[2]। शरीर, संस्थान, संहनन, वर्ण, गन्ध आदि कार्यों के करने वाले जो पुद्गल जीव में निविष्ट हैं वे 'नाम' इस संज्ञा वाले होते हैं[3]
  • आचार्य पूज्यपाद ने सर्वार्थसिद्धि[4] में बतलाया है कि आत्मा का नारक आदि रूप नामकरण करना नामकर्म की प्रकृति (स्वभाव) है, जो आत्मा को नमाता है या जिसके द्वारा आत्मा नमता है, वह 'नामकर्म' है।
  • इस नामकर्म की बयालीस प्रकृतियाँ तथा तैरानवे उत्तर प्रकृतियाँ हैं। इनमें शरीर नामकर्म के अन्तर्गत शरीर के पाँच भेदों का निरूपण विशेष दृष्टव्य है। वस्तुत: औदारिक या वैक्रियिक शरीर योग्य कर्म वर्गणाओं को ग्रहण करना-यही जन्म का प्रारम्भ है। कर्मों के ही उदय से वह जीव बिना चाहे हुए मरण करके दूसरी पर्याय में उत्पन्न होता है। वहाँ वर्गणाओं का ग्रहण नामकर्म के उदय से स्वयमेव होता रहता है। ये वर्गणायें स्वयं ही पर्याप्ति, निर्माण, अंगोपांग आदि के उदय से औदारिक या वैक्रियिक शरीर के आकार परिणमन कर जाती है। जैसे- जीव के अशुद्ध भावों का निमित्त पाकर लोक में सर्वत्र फैली हुई कार्मण वर्गणायें स्वयं ही अपने-अपने स्वभावनानुसार ज्ञानावरणादि पूर्वोक्त आठ कर्मस्थ परिणमन कर जाती है। इसी तरह नामकर्म तथा गोत्रकर्म के उदय से भिन्न-भिन्न जाति की वर्गणायें स्वयं ही अनेक प्रकार के देव, नारकी, मनुष्य, तिर्यचों के शरीर के आकार रूप परिणमन कर जाती है। इस तरह यह शरीर आत्मा का कोई कारण या कार्य नहीं है, कर्मों का ही कार्य है।

नामकर्म और उसकी प्रकृतियाँ

  • नामकर्म की बयालीस प्रकृतियाँ हैं। इन्हें पिण्ड प्रकृतियाँ भी कहते हैं। ये इस प्रकार हैं- गति, जाति, शरीर, बन्धन, संघात, संस्थान, संहनन, अंगोपांग, वर्ण, रस, गन्ध, स्पर्श, आनुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, आतप, उद्योत, विहायोगति, त्रस, स्थावर, सूक्ष्म, बादर, पर्याप्त, अपर्याप्त, साधारण, प्रत्येक, स्थिर, शुभ, सुभग, आदेय, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, दु:स्वर, अयशस्कीर्ति, सुस्वर, यशस्कीर्ति, निर्माण और तीर्थंकरत्व[5]
  • ये बयालीस प्रकृतियाँ ही नामकर्म के भेद (प्रकार) कहे जाते हैं। इस प्रकार हैं-
  1. गति नामकर्म-गति, भव, संसार— ये पर्यायवाची शब्द है[6]। जिसके उदय से आत्मा भवान्तर को गमन करता है वह गति नामकर्म है। यदि वह कर्म न हो तो जीव गति रहित हो जायेगा। इसी गति नामकर्म के उदय से जीव में रहने से आयु कर्म की स्थिति रहती है और शरीर आदि कर्म उदय को प्राप्त होते हैं। नरक, तिर्यच, मनुष्य और देवगति – ये इसके चार भेद हैं। जिन कर्मस्कन्धों के उदय से आत्मा को नरक, तिर्यच आदि भव प्राप्त होते हैं, उनसे युक्त जीवों को उन-उन गतियों में नरक-गति, तिर्यकगति आदि संज्ञायें प्राप्त होती हैं।
  2. जाति नामकर्म— जिन कर्मस्कन्धों से सदृशता प्राप्त होती है, जीवां के उस सदृश परिणाम को जाति कहते हैं[7] अर्थात् उन गतियों में अत्यभिचारी सादृश से एकीभूत स्वभाव (एकरूपका) का नाम जाति है। यदि जाति नामकर्म न हो तो खटमल-खटमल के समान, बिच्छू-बिच्छू के समान इसी प्रकार अन्य सभी सामान्यत: एक जैसे नहीं हो सकते। जाति के पांच भेद हैं- एकेन्द्रिय द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय। इनके लक्षण इस प्रकार हैं – जिसके उदय से जीव एकेन्द्रिय जाति में पैदा हो अर्थात् एकेन्द्रिय शरीर धारण करे उसे एकेन्द्रिय जाति नामकर्म कहते हैं। इसी प्रकार द्वीन्द्रियादि का स्वरूप बनता है।
  3. शरीरनामकर्म— जिसके उदय से आत्मा के लिए शरीर की रचना होती है वह शरीर नामकर्म है। यह कर्म आत्मा को आधार या आश्रय प्रदान करता है। क्योंकि कहा है कि 'यदि शरीर-नामकर्म न स्यादात्मा विमुक्त: स्यात्[8] अर्थात् यदि यह कर्म न हो तो आत्मा मुक्त हो जाय। इसके भी पांच भेद हैं – औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तेजस और कार्माण शरीर। जिसके उदय से जीव के द्वारा ग्रहण किये गये आहार वर्गणा रूप पुद्गलस्कन्ध रस, रुधिर, मांस, अस्थि, मज्जा और शुक्र स्वभाव से परिणत होकर औदारिक शरीर रूप हो जाते हैं उसका नाम औदारिक शरीर है। इसी प्रकार अन्य भेदों का स्वरूप बनता है[9]
  4. बन्धन नामकर्म— शरीर नामकर्म के उदय से जो आहार-वर्गणारूप पुद्गल-स्कन्ध ग्रहण किये उन पुद्गलस्कन्धों का परस्पर संश्लेष सम्बन्ध जिस कर्म के उदय से हो उसे बंधन-नामकर्म कहते हैं। यदि यह कर्म न हो तो यह शरीर बालू द्वारा बनाये हुए पुरुष के शरीर की तरह हो जाय। इसके भी औदारिक, वैक्रियिक शरीर, बन्धन आदि पांच भेद हैं[10]
  5. संघात नामकर्म— जिसके उदय से औदारिक शरीर, छिद्र रहित परस्पर प्रदेशों का एक क्षेत्रावगाह रूप एकत्व प्राप्त हो उसे संघात नामकर्म कहते हैं[11] इसके भी औदारिक-शरीर संघात आदि पांच भेद हैं।
  6. संस्थान नामकर्म— जिसके उदय से औदारिक आदि शरीर के आकार की रचना हो वह संस्थान नामकर्म है। इसके छह भेद हैं- समचतुरस्त्र, न्यग्रोधपरिमण्डल, स्वाति कुष्जक, वामन और हुंडक (विषम आकार) संस्थान।
  7. संहनन नामकर्म— जिसके उदय से हड्डियों की संधि में बंधन विशेष होता है वह संहनन नामकर्म है। इसके छह भेद हैं। 1.वज्रर्षभनाराच, 2.वज्रनाराच, 3. नाराच, 4.अर्द्धनाराच, 5.कीलक और 6. असंप्राप्तासृपाटिका संहनन[12]
  8. अंगोपांग नामकर्म— जिस कर्म के उदय से अंग और उपांगों की स्पष्ट रचना हो वह अंगोपांग नामकर्म हैं इसके तीन भेद हैं- औदारिक, वैक्रियिक और आहारक शरीर, अंगोपांग[13]
  9. वर्ण नामकर्म— जिस कर्म के उदय से शरीर में कृष्ण, नील, रक्त, हरित और शुक्ल – ये वर्ण (रंग या रूप) उत्पन्न हों वह वर्ण नामकर्म है। इन 5 वर्णों से ही इसके पांच भेद बनते हैं। जिस कर्म के उदय से शरीर के पुद्गलों में कृष्णता प्राप्त होती है वह कृष्णवर्ण नामकर्म है। इसी तरह अन्य हैं[14]
  10. रस नामकर्म— इसके उदय से शरीर में जाति के अनुसार जैसे नीबू, नीम आदि में प्रतिनियत तिक्त, कटुक, कषाय, अम्ल और मधुर रस उत्पन्न होते हैं। यही इस नामकर्म के पांच भेद हैं।
  11. गन्ध नामकर्म— जिसके उदय से जीव के शरीर में उसकी जाति के अनुसार गन्ध उत्पन्न हो वह गन्ध नामकर्म है। इसके दो भेद हैं- सुगन्ध और दुर्गन्ध।
  12. स्पर्श नामकर्म— जिस कर्मस्कन्ध के उदय से जीव के शरीर में उसकी जाति के अनुरूप स्पर्श उत्पन्न हो। जैसे सभी उत्पल, कमल आदि में प्रतिनियत स्पर्श देखा जाता है। इसके आठ भेद हैं- कर्कश, मृदु, गुरु, लघु, स्निग्ध, सूक्ष, शीत और उष्ण।
  13. आनुपूर्वी नामकर्म— जिस कर्म के उदय से विग्रहगति में पूर्वशरीर (मरण से पहले के शरीर) का आकार रहे उसका नाम आनुपूर्वी है। इस कर्म का अभाव नहीं कहा जा सकता क्योंकि विग्रहगति में उस अवस्था के लिए निश्चित आकार उपलब्ध होता है और उत्तम शरीर ग्रहण करने के प्रति गमन की उपलब्धि भी पायी जाती है। इसके चार भेद हैं- नरकगति प्रायोग्यानुपूर्व्य, तिर्यग्गति., मनुष्यगति., देवगतिंप्रायोग्यानुपूर्व।
  14. अगुरुलघु नामकर्म— जिसके उदय से यह जीव अनन्तानन्त पुद्गलों से पूर्ण होकर भी लोहपिण्ड की तरह गुरु (भारी) होकर न तो नीचे गिरे और रुई के समान हल्का होकर ऊपर भी न जाय उसे अगुरुलघु नामकर्म कहते हैं।
  15. उपघात नामकर्म— 'उपेत्य घात: उपघात:' अर्थात् पास आकर घात होना उपघात है। जिस कर्म के उदय से अपने द्वारा ही किये गये गलपाश आदि बंधन और पर्वत से गिराना आदि निमित्तों से अपना घात हो जाता है वह उपघात नामकर्म है। अथवा जो कर्म जीवको अपने ही पीड़ा में कारणभूत बड़े-बड़े सींग, उदर आदि अवयवों को रचना है वह उपघात है।
  16. परघात नामकर्म— जिसके उदय से दूसरे का घात करने वाले अंगोपांग हो उसे परघात नामकर्म कहते हैं। जैसे बिच्छू की पूंछ आदि।
  17. उच्छ्रवास— जिसके उदय से जीव को श्वासोच्छवास हो।
  18. आतप— जिसके उदय से जीव का शरीर आतप अर्थात् उसमें अन्य को संतप्त करने वाला प्रकाश उत्पन्न होता है वह आतप है। जैसे सूर्य आदि में होने वाले पृथ्वी कायिक आदि में ऐसा तापकारी प्रकाश दिखता है।
  19. उद्योत— जिसके उदय से जीव के शरीर में उद्योत (शीतलता देने वाला प्रकाश) उत्पन्न होता है वह उद्योत नामकर्म है। जैसे चन्द्रमा, नक्षत्र, विमानों और जुगनू आदि जीवों के शरीरों में उद्योत होता है।
  20. विहायोगति— जिसके उदय से आकाश में गमन हो उसे विहायोगति नामकर्म कहते हैं। इसके प्रशस्त और अप्रशस्त ये दो भेद हैं।
  21. त्रस नामकर्म— जिसके उदय से द्वीन्द्रियादिक जीवों में उत्पन्न हो, उसे त्रस नामकर्म कहते हैं।
  22. स्थावर (स्थूल)- जिसके उदय से एकेन्द्रिय जीवों (स्थावर कायों) में उत्पन्न हो वह स्थावर नामकर्म है।
  23. बादर (स्थूल)— जिसके उदय से दूसरे को रोकने वाला तथा दूसरे से रुकने वाला स्थूल शरीर प्राप्त हो उसे बादर शरीर नामकर्म कहते हैं।
  24. सूक्ष्म नामकर्म— जिसके उदय से ऐसा शरीर प्राप्त हो, जो न किसी को रोक सकता हो और न किसी से रोका जा सकता हो, उसे सूक्ष्म शरीर नामकर्म कहते हैं।
  25. पर्याप्ति— जिसके उदय से आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छवास, भाषा और मन-इन छह पर्याप्तियों की रचना होती है वह पर्याप्ति नामकर्म है। ये ही इसके छह भेद हैं।
  26. अपर्याप्ति— उपर्युक्त पर्याप्तियों की पूर्णता का न होना अपर्याप्ति है।
  27. प्रत्येक शरीर नामकर्म— जिसके उदय से एक शरीर का एक ही जीव स्वामी हो उसे प्रत्येक शरीर नामकर्म कहते हैं।
  28. साधारण शरीर नामकर्म— जिसके उदय से एक शरीर के अनेक जीव स्वामी हों, उसे साधारण-शरीर नामकर्म कहते हैं।
  29. स्थिर नामकर्म— जिस कर्म के उदय से शरीर की धातुएं (रस, रुधिर, मांस, मेद, मज्जा, हड्डी और शुक्र) इन सात धातुओं की स्थिरता होती है वह स्थिर नामकर्म है।
  30. अस्थिर— जिसके उदय से इन धातुओं में उत्तरोत्तर अस्थिर रूप परिणमन होता जाता है वह अस्थिर नामकर्म है।
  31. शुभनामकर्म— जिसके उदय से शरीर के अंगों और उपांगों में रमणीयता (सुन्दरता) आती है वह शुभ नामकर्म है।
  32. अशुभनामकर्म— जिसके उदय से शरीर के अवयव अमनोज्ञ हों उसे अशुभनाम कर्म कहते हैं।
  33. सुभग,
  34. दुर्भगनामकर्म— जिसके उदय से स्त्री-पुरुष या अन्य जीवों में परस्पर प्रीति उत्पन्न हो उसे सुभग नामकर्म तथा रूपादि गुणों से युक्त होते हुए भी लोगों के जिसके उदय से अप्रीतिकार प्रतीत होता है उसे दुर्भग नामकर्म कहते हैं।
  35. आदेय,
  36. अनादेय नामकर्म— जिसके उदय से आदेय-प्रभा सहित शरीर हो वह आदेय तथा निष्प्रभ शरीर हो वह अनादेय नामकर्म है।
  37. सुस्वर,
  38. दुस्वर नामकर्म- जिसके उदय से शोभन (मधुर) स्वर हो वह सुस्वर तथा अमनोज्ञ स्वर होता है वह दु:स्वर नामकर्म है।
  39. यश:कीर्ति,
  40. अयश:कीर्ति नामकर्म— जिसके उदय से जीव की प्रशंसा हो वह यश:कीर्ति तथा निप्दा हो वह अयश: कीर्ति नामकर्म है।
  41. निमान (निर्माण) नामकर्म— निश्चित मान (माप) को निमान कहते हैं। इसके दो भेद हैं – प्रमाण और स्थान। जिस कर्म के उदय से अंगोपांगों की रचना यथाप्रमाण और यथास्थान हो उसे निमान या निर्माण नामकर्म कहते हैं।
  42. तीर्थंकर नामकर्म— जिस कर्म के उदय से तीन लोकों में पूज्य परम आर्हन्त्य पद प्राप्त होता है वह परमोत्कृष्ट तीर्थंकर नामकर्म है।

इस प्रकार ये नामकर्म की 42 पिण्ड प्रकृतियाँ हैं। इन्हीं में एक-एक की अपेक्षा इनके 93 भेद हैं। इनमें अन्तिम तीर्थंकर नामकर्म का आस्त्रव दर्शनविशुद्धि आदि सोलहकारण भावनाओं का विधान है। यद्यपि ये एक साथ सभी सोलह भावनायें आवश्यक नहीं है। किन्तु एक दर्शनविशुद्धि अति आवश्यक होती है। दो से लेकर सोलह कारणों के विकास से भी तीर्थंकर नामकर्म का बंध होता है।


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. धवला टीका,6/1, 9 तथा 10/13/3
  2. जैन साहित्य का इतिहास प्रथम भाग पृ. 38
  3. जैन साहित्य का इतिहास प्रथम भाग पृ. 38
  4. सर्वार्थसिद्धि,6/1, 9 तथा 10/13/3
  5. मूलाचार 12/193-196 तत्वार्धसूत्र 8/11
  6. गतिर्भव: संसार: मूलाधार टीका 12/93
  7. जातिर्जीवानां सदृश: परिणाम –मूलाधार टीका
  8. मूलाचारवृत्ति 12/193
  9. मूलाचारवृत्ति 12/193
  10. मूलाचारवृत्ति 12/193
  11. गोम्मटसार कर्मकाण्ड हिन्दी टीका (आर्यिका आदिमती जी) पृ. 26
  12. मूलाचारवृत्ति 12/194
  13. मूलाचारवृत्ति 12/194
  14. मूलाचारवृत्ति 12/194


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