ग़ज़नवी वंश  

ग़ज़नवी वंश (977-1186 ई.), ख़ुरासान (पूर्वोत्तर ईरान), अफ़ग़ानिस्तान और उत्तर भारत में शासन करने वाला एक तुर्क वंश। इस वंश की स्थापना सुबुक्तगीन (शासनकाल, 977-997 ई.) ने की थी। सुबुक्तगीन भूतपूर्व तुर्क ग़ुलाम था। उसे 'सामानी'[1] 'ग़ज़ना'[2] का सूबेदार मानते थे। सामानी वंश के कमज़ोर होने पर सुबुक्तगीन ने अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली और भारतीय सीमा तक अपने क्षेत्र का विस्तान कर लिया। उसके पुत्र महमूद ग़ज़नवी (शासनकाल, 998-1030 ई.) ने पिता के समान ही विस्तारवादी नीति जारी रखी।

महमूद द्वारा साम्राज्य विस्तार

1005 ई. तक सामानी क्षेत्र बंट चुके थे। सामानी साम्राज्य के दो उत्तराधिकारी राज्यों के बीच ऑक्सस नदी सीमा का काम करती थी, जिसके पश्चिम में 'ग़ज़नवी' और पूर्व में 'क्वारख़ानी' शासन करते थे। महमूद ग़ज़नवी के शासनकाल के दौरान ग़ज़नवी शक्ति अपने चरम तक पहुंच चुकी थी। साम्राज्य ऑक्सस[3] से सिंधु घाटीहिन्द महासागर तक फैला था। महमूद ने अपने विजय अभियानों से पश्चिम में ईरानी नगरों, 'राय' और 'हमदां' को बुयिदों से छीन लिया। महमूद एक धर्मनिष्ठ मुस्लिम था, जिसने ग़ज़नवियों को उनके मूर्तिपूजक तुर्क मूल से इस्लामी वंश में तब्दील कर दिया था और इस्लाम की सीमाओं का विस्तार किया।[4]

फ़िरदौसी

फ़ारसी भाषा के कवि फ़िरदौसी (मृत्यु-1020 ई.) ने महमूद ग़ज़नवी के दरबार में लगभग 1010 ई. में अपने महाकाव्य 'शाहनामा'[5] को पूरा किया था।

मसूद की पराजय

महमूद ग़ज़नवी का पुत्र मसूद ग़ज़नवी[6] (शासनकाल,1031-1041 ई.) अपनी सत्ता और ग़ज़नवी साम्राज्य की अखंडता को बनाए रखने में नाकामयाब रहा। ख़ुरासान और ख्वारिज़्म में सेल्जुक़ तुर्कों ने ग़ज़नवी सत्ता को चुनौती दी। दंडक़ान के युद्ध (1040 ई.) में मसूद की क़रारी हार हुई और ईरान व मध्य एशिया के सभी ग़ज़नवी क्षेत्रों पर सेल्जुक़ों का अधिकार हो गया। ग़ज़नवियों के पास केवल पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान और उत्तरी भारत का ही क्षेत्र बचा रह सका, जिन पर 1186 ई. तक वे शासन करते रहे। उसके बाद लाहौर पर गुरियों का क़ब्ज़ा हो गया।

ग़ज़नवी कला

ग़ज़नवी कला के बहुत कम अंश आज मौजूद हैं, लेकिन यह काल ईरान में सेल्जुक़ तुर्कों और भारत में इस्लामी कला पर अपने प्रभाव के लिए महत्त्वपूर्ण है। ग़ज़नवियों ने अफ़ग़ानिस्तान में 'क़ल्ह-ए-बस्त' के उत्तर में हेलमंद नदी के पठार पर, लश्करी गाह के नज़दीक लश्करी बाज़ार के महल में पहली बार 'चार ऐवान' शिल्प योजना शुरू की थी। 'ऐवान' एक मेहराबदार सभागार होता है, जो तीन तरफ़ से बंद और चौथी तरफ़ आंगन में खुलता है। चार ऐवानों से घिरे आंगन की शैली सेल्जुक़ मस्जिद वास्तुकला का प्रमुख लक्षण रही और फ़ारस में तैमूरी व सफ़वी कालों तक बराबर चलती रही।[4]

विजय मीनार

मसूद तृतीय द्वारा निर्मित 'विजय मीनार', जिसका निर्माण 1099-1115 ई. में किया गया था, सेल्जुक़ तुर्ब या मक़बरे की मीनार की पूर्ववर्ती है। इसकी दो मूल मंज़िलों में से आज मौजूद एक मंज़िल पर अलंकृत अभिलेख हैं। लश्करी बाज़ार स्थित महल की खुदाई से ऐसे चित्रांकन मिले हैं, जिनकी शैली आरंभिक सेल्जुक़ कलाकृतियों से मिलती-जुलती है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. एक ईरानी मुस्लिम
  2. आधुनिक ग़ज़नी, अफ़ग़ानिस्तान
  3. आधुनिक अमु दरिया
  4. 4.0 4.1 भारत ज्ञानकोश, खण्ड-2 |लेखक: इंदु रामचंदानी |प्रकाशक: एंसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली और पॉप्युलर प्रकाशन, मुम्बई |संकलन: भारतकोश पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 41 |
  5. राजाओं की गाथा
  6. कुछ इतिहासकारों के अनुसार महमूद का भतीजा

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