भड्डरी  

भड्डरी का हिन्दी के लोक कवियों में महत्त्वपूर्ण स्थान है। घाघ की तरह भड्डरी का जीवन वृत्त भी निर्विवाद नहीं है। भड्डरी कौन थे, किस प्रान्त के थे और किस भाषा में उन्होंने कहावतों का सृजन किया, यह आज भी विद्वानों में चर्चा का विषय है।

जीवन परिचय

भड्डरी के जन्म के सम्बन्ध में ग्रामीण अंचलों में अनेक किंवदन्तियाँ प्राप्त होती हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि काशी में एक ज्योतिषी रहते थे। एक बार उन्होंने ज्योतिष गणना से यह देखा कि ऐसा शुभ मुहूर्त आने वाला है जिसमें गर्भाधान होने पर बड़ा ही विद्वान् और यशस्वी पुत्र पैदा होगा। ऐसा विचार कर ज्योतिषी ने काशी से अपने पैतृक निवास के लिए प्रस्थान किया। काशी से भड्डरी का घर काफ़ी दूर था जिसकी वजह से वे निश्चित अवधि तक अपने घर नहीं पहुँच पाये और उन्हें रास्ते में अहीर के घर रात बितानी पड़ी। अहीर की युवती कन्या उनके लिए भोजन बनाने बैठी तो उनका उदास चेहरा देखकर पूछा कि आप इतने उदास क्यों हैं? ज्योतिषी जी ने कुछ इधर-उधर टालने के बाद सच्चाई से उसे अवगत कराया। उस युवती के मन में इस पुत्र को पाने की इच्छा जागृत हुई। उन दोनों की इच्छा का परिणाम भड्डरी के जन्म के रूप में हुआ। वीएन मेहता ने अपनी पुस्तक ‘युक्त प्रान्त की कृषि सम्बन्धित कहावतें’ में इस कथा को थोड़े परिवर्तित रूप में प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार –“भड्डरी के विषय में ज्योतिषाचार्य वराहमिहिर की एक बड़ी ही मनोहर कहानी कही जाती हैं।” एक समय, जब कि वे तीर्थ-यात्रा में थे, उनको मालूम हुआ कि अमुक दिन का उत्पन्न हुआ बच्चा गणित और फलित ज्योतिष का बहुत बड़ा पण्डित होगा। उन्हों स्वयं ही ऐसे पुत्र के पिता होने की उत्सुकता हुई और उन्होंने अपने घर उज्जैन के लिए प्रस्थान किया परन्तु उज्जैन इतना दूर था कि वे उस शुभ-दिन तक वहां न पहुँच सके। अतएव रास्ते के एक गाँव में एक गड़रिये की कन्या से विवाह कर लिया। उस स्त्री से उनको एक पुत्र हुआ जो ब्राह्मणों की भाँति शिक्षा न पाने पर भी स्वभावतः बहुत बड़ा ज्योतिषी हुआ। आज सभी नक्षत्र-संबंधी कहावतों के वक्ता भड्डरी या भड्डली कहे जाते हैं।” भड्डरी को वराहमिहिर का पुत्र मानना तर्कसंगत नहीं है क्योंकि वराहमिहिर का समय ‘पंचसिद्धान्तिका’ के अनुसार शक 427 या सन् 505 ई. के लगभग है। भड्डरी की कहावतों की भाषा उस युग की नहीं हो सकती, यह निश्चित है।[1]

भड्डरी और भड्डली

भड्डरी का जन्म कुलीन जाति में नहीं हुआ था। भड्डरी नाम से भी उनके कुलीन जाति का न होने का संकेत मिलता है। कतिपय विद्वानों ने भड्डरी का सम्बन्ध राजस्थान से जोड़ा है क्योंकि राजस्थानी कहावतों में “डंग कहै हे भड्डली” उल्लेख बार-बार आता है। एक कथा के अनुसार मारवाड़ में भड्डली नामक एक स्त्री थी जो ज्योतिषी थी। उसकी जाति आहिर या गड़रिया नहीं, भंगिन बताई गई है। यह भी कहा जाता है कि मारवाड़ में ‘डंक’ नाम के ब्राह्मण कवि थे जिन्होंने इस भंगिन कन्या भड्डली से विवाह कर लिया था। इन दोनों की संतान ‘डाकोत’ कहलाई। इन जनश्रुतियों के अतिरिक्त भड्डरी के सम्बन्ध में कोई ठोस आधार नहीं प्राप्त होता है, लेकिन इतना अनुमान लगाया जा सकता है कि भड्डरी और भड्डली दो अलग-अलग व्यक्ति एवं नाम हैं क्योंकि दोनों की कहावतों की भाषा में पर्याप्त अन्तर देखने को मिलता है। इसी प्रकार ‘डंक’ और ‘डाक’ के एक होने पर भी विचार किया जाये तो दोनों में काफ़ी समानता दृष्टिगत होती है। दुर्गा शंकर प्रसाद सिंह का अनुमान है कि बिहार के ‘डाक’ कवि ही राजस्थानी ‘डंग’ है।[1]

घाघ और भड्डरी

भड्डरी से संबंधित एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि ये काशी के थे या मारवाड़ के? भड्डरी की कहावतों में भोजपुरी और अवधी के शब्दों की प्रचुरता भी है। यदि इस दृष्टि से देखा जाय तो भड्डरी का काशी के आसपास का होना समीचीन प्रतीत होता है। मारवाड़ के भड्डली निश्चित ही इससे भिन्न प्रतीत होते हैं। वहाँ भड्डली और भड्डली नामक दो अलग-अलग कवि हुए हैं, जिसमें भड्डलि पुरुष हैं और भड्डली स्त्री। इस प्रकार अवधी क्षेत्र के भड्डरी से उन्हें किसी प्रकार भी संबन्धित नहीं माना जा सकता। यह भी सम्भावना है कि भड्डरी की प्रसिद्धि के कारण उनकी अवधी और भोजपुरी कहावतें राजस्थानी भाषा में गढ़ ली गई हों। मारवाड़ में भड्डली पुस्तक ‘भड्डली पुराण’ भी प्रसिद्ध है। पं. रामनरेश त्रिपाठी ने अपनी पुस्तक ‘घाघ और भड्डरी’ में इसका उल्लेख किया है। “घाघ, भड्डरी और डाक को अलग-अलग मानने वालों में प्रसिद्ध विद्वान् डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन भी प्रमुख हैं। उन्होंने इन तीनों कवियों को अपनी पुस्तक ‘बिहार पीजेंट लाइफ’ में अलग-अलग स्थान दिया है।” घाघ और भड्डरी की कहावतें लोक जीवन में प्रसिद्ध है। ग्राम्य अंचल में रोजमर्रा की खेती एवं सामाजिक समस्याओं का निदान व्यक्ति इन्हीं कहावतों के आधार पर कर लेता है। इनकी कहावतें किसानों के लिए गुरुमंत्र हैं। अवधी और भोजपुरी क्षेत्रों में इनका प्रचार-प्रसार कुछ अधिक ही दिखाई पड़ता है। इनकी कहावतों से इस बात का भी अनुमान लगाया जा सकता है कि घाघ और भड्डरी दोनों समकालीन रहे होंगे क्योंकि ‘घाघ कहै सुनु भड्डरी’ का प्रयोग अनेक विषयक है, वहीं भड्डरी की कहावतों का क्षेत्र वर्षा, नीति और ज्योतिष विषयक। घाघ और भड्डरी की कहावतें आज भी प्रासंगिक हैं। उनमें ज्ञान विज्ञान सम्बन्धी प्रचुर सामग्री है। आज शस्य विज्ञान, पादप प्रजनन, पर्यावरण विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान आदि की दृष्टि से इन कहावतों के अध्ययन की आवश्यकता है।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 घाघ और भड्डरी (हिन्दी) इंडिया वाटर पोर्टल (हिन्दी)। अभिगमन तिथि: 18 अप्रॅल, 2015।

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