अल्फ्रेड  

अल्फ्रडे (ल. 848-9000 ई.) प्राचीन इंग्लैंड के राजाओं में अपने पराक्रम और तप के कारण यह राजा 'महान' की उपाधि से विभूषित हुआ है। उस काल के इंग्लैंड के राजाओं का डेनों से महान संघर्ष हुआ। डेनों के दल के दल सागर पार से द्वीप में उतर आते और उसे लूट खसोट कर स्वदेश लौट जाते। उनकी मार से इंग्लैंड जर्जर हो उठा और उसके राजाओं को बार-बार पराजय का शिकार होना पड़ा। उन्हीं के प्रतिकार में अल्फ्रडे ने जीवन भर संघर्ष किया और अनेक बार तो उसकी स्थिति सामान्य भगोड़े जैसी हो गई। देश की रोमांचक ऐतिहासिक लोकस्मृतियों में अल्फ्रडे की कहानी बड़ी प्रिय हो गई है और उसकी जनप्रियता का परिणाम यह हुआ कि उसके संबंध में सच झूठ दोनों प्रकार की अनुश्रुतियां प्रचलित हो गई हैं। एक का तो यहाँ तक कहना है कि अल्फ्रडे को एक बार डेनों से हारकर गड़ेरिए के घर में शरण लेनी पड़ी थी जहाँ गड़ेरिए की पत्नी ने उसे अनजाने कड़ी-कड़ी बातें कही थीं। राणा प्रताप सा वीर जीवन बिताने वाले अल्फ्रडे का चरित सचमुच इतिहास की प्रिय कथा बन गया है।

अल्फ्रडे का जन्म वांटेज में हुआ। वह राजा ईथेन बुल्क का पांचवां बेटा था। उसके पिता के मरने पर उसके दो बड़े भाइयों, ईथेल बाल्ट और ईथेल बर्ट ने बारी-बारी राज किया। फिर उनसे छोटा भाई इंग्लैंड की गद्दी पर बैठा और तभी से अल्फ्रडे राजनीति के क्षेत्र में उतरा। 668 ई. में दोनों भाईयों ने पहली बार मरसिया में डेनों का सामना किया, पर उन्हें वे जीत न सके। दो साल बाद डेनों के विरुद्ध संघर्ष और घना हो गया और 891 में अल्फ्रडे ने उनसे नौ-नौ लड़ाइयाँ लड़ीं। हार और जीत का जैसे ताँता बंध गया और इन्हीं के बीच जब बड़ा भाई ईथेल रेड मरा तब अल्फ्रडे इंग्लैंड की गद्दी पर बैठा। अभी वह भाई की लाश दफनाने में ही लगा था कि उसे उनसे फिर लड़ना पड़ा। पर जो संधि हुई उसके अनुसार अल्फ्रडे को दम लेने के लिए पाँच साल मिल गए। डेन इंग्लैंड के अन्य भागों में व्यस्त थे और 876 ई. में वे फिर उनकी ओर लौटे। उन्होंने एग्ज़ीटर छीन लिया, पर शीघ्र ही अल्फ्रडे की चोट और अपना जहाजी बेड़ा तूफान में उड़ जाने के कारण उन्हें हारकर मरसिया लौटना पड़ा। अगले साल डेन फिर लौटे और अल्फ्रडे को गिने-चुने आदमियों के साथ जंगल और दलदल लाँघ अथेलनी में शरण लेनी पड़ी। इसी शरण की कहानी गड़ेरिए की किंवदंती से संबंध रखती है। राजा गाँव में वहाँ छिपा जरूर था, पर वस्तुत: वह वहाँ जीत की तैयारी कर रहा था।

878 ई. की मई में वह अपने आश्रय से बाहर निकला और राह में मिलती जाती सेनाओं के साथ डेनों से लोहा लेने चला। विल्टशायर के एडिंग्टर नगर के पास दोनों की मुठभेड़ हुई और अल्फ्रडे पूर्ण विजयी हुआ। डेनों के राजा ग्थ्रुाम ने आत्मसमर्पण कर ईसाई धर्म स्वीकार किया। अगले साल वेसेक्स और मरसिया से वेडमोर की सुलह के मुताबिक डेन सेनाएँ बाहर निकल गईं, यद्यपि लंदन और इंग्लैंड के उत्तर पूर्वी भाग अब भी उन्हीं के कब्जे में बने रहे। कुछ साल शांति रही, पर 885 में जो संघर्ष हुआ उससे लंदन भी अल्फ्रडे के हाथ में आ गया। उसके बाद डेनों के जो दल आए उनके साथ उनके बीबी बच्चे भी थे जिससे प्रकट हो गया इस बार वे जमकर इंग्लैंड जीतने आए हैं। डेनों की देशी और विदेशी फौजें मिलकर इंग्लैंड जीतने का प्रयास करने लगीं। पहले फार्नहम में उनकी हार हुई फिर घने मोर्चे के बाद एग्ज़ीटर में। लड़ाई पर लड़ाई होती गई, पर अल्फ्रडे ने न स्वयं दम लिया, न डेनों को लेने दिया। अंत में मजबूर होकर उन्होंने लड़ाई से हाथ खींच लिया। कुछ इंग्लैंड में बस गए, कुछ सागर पार उतर गए।

अल्फ्रडे ने डेनों की शक्ति तोड़ देने के बाद देश के शांतिमय शासन में चित्त लगाया। राज्य को सुशासन के लिए उसने 'शायरों', 'हंड्रेडा', 'बुर्गों' में बांटा और वहाँ न्याय की प्रतिष्ठा की। स्थल और नौसेनाओं को भी उसने बढ़ाया और किलों को मजबूत किया, उनमें लक्षक सेनाएँ रखीं। अल्फ्रडे का नाम जिस आदर से देशसेवा के संबंध में लिया जाता है उसी आदर से उसके पांडित्य का उल्लेख भी इतिहास में होता है। उसने अनेक ग्रंथों में लातीनी से स्वयं अंग्रेजी में अनुवाद किया। प्रसिद्ध अंग्रेज लेखक बीड उसका समकालीन था और उसका प्रसिद्ध ग्रंथ 'एक्लेसियस्टिकल हिस्ट्री ऑव दी इंग्लिश पीपुल' भी अल्फ्रडे का ही अनुवाद माना जाता है, यद्यपि इधर कुछ दिनों से कुछ लोगों को इसमें संदेह होने लगा है।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 264-65 |

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