जयपाल  

जयपाल ओहिन्द (उद्भांडपुर) के हिन्दुशाही वंश का राजा था, जिसका राज्य कांगड़ा से लेकर अफ़ग़ानिस्तान तक फैला हुआ था। उसके समय में ग़ज़नी की गद्दी पर उसका समसामयिक अमीर सुबुक्तगीन (977-997) सिंहासनासीन था। जयपाल को जब खबर मिली कि सुबुक्तगीन अफ़ग़ानिस्तान में उसके राज्य पर हमला कर रहा है तो उसने उसे रोकने का निश्चय किया।

सुबुक्तगीन से युद्ध

युद्ध के लिए जयपाल सेना लेकर ग़ज़नी और लगमान के बीच गुजुक नामक स्थान तक बढ़ गया। परन्तु अचानक एक बर्फीला तूफान आ गया और जयपाल को बड़ा भारी नुकसान उठाना पड़ा। उसे सुबुक्तगीन के साथ एक अपमानजनक संधि कर लेनी पड़ी। परंतु उसने शीघ्र ही इस संधि की शर्तों की तोड़ दिया और सुबुक्तगीन के साथ फिर से लड़ाई छिड़ गई। सुबुक्तगीन की 997 में मृत्यु हो गई। उसके बाद उसके उत्तराधिकारी सुल्तान महमूद ग़ज़नवी ने फिर से युद्ध शुरू कर दिया और 1001 ई. में पेशावर के निकट जयपाल को बुरी तरह परास्त किया।

आत्महत्या

जयपाल इतना अभिमानी और देशभक्त था कि इस पराजय की ग्लानि के बाद उसने जीवित रहना और राज्य करना पसंद नहीं किया। वह जलती हुई चिता में जिवित कूद गया। उसको आशा थी कि उसका उत्तराधिकारी पुत्र आनंदपाल देश की रक्षा अधिक सफलता के कर सकेगा। जयपाल एकमात्र हिन्दू राजा था, जिसने उत्तर-पश्चिम से भारत पर आक्रमण करने वाले मुस्लिमों के ख़िलाफ़ आक्रामक नीति अपनायी और अपनी आहूति देकर आत्महत्या का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

भारतीय इतिहास कोश |लेखक: सच्चिदानन्द भट्टाचार्य |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |पृष्ठ संख्या: 163 |


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