डंडा नृत्य  

डंडा नृत्य छत्तीसगढ़ राज्य का लोकनृत्य है। इस नृत्य को 'सैला नृत्य' भी कहा जाता है। यह पुरुषों का सर्वाधिक कलात्मक और समूह वाला नृत्य है। डंडा नृत्य में ताल का विशेष महत्व होता है। डंडों की मार से ताल उत्पन्न होता है। यही कारण है कि इस नृत्य को मैदानी भाग में 'डंडा नृत्य' और पर्वती भाग में 'सैला नृत्य' कहा जाता है। 'सैला' शैल का बदला हुआ रूप है, जिसका अर्थ 'पर्वतीय प्रदेश' से किया जाता है।

वस्त्र विन्यास

डंडा नृत्य करने वाले समूह में 46 से लेकर 50 या फिर 60 तक सम संख्या में नर्तक होते हैं। ये नर्तक घुटने से उपर तक धोती-कुर्ता और जेकेट पहनते हैं। इसके साथ ही ये लोग गोंदा की माला से लिपटी हुई पगड़ी भी सिर पर बाँधकर धारण करते हैं। इसमें मोर के पंख की कडियों का झूल होता है। इनमें से कई नर्तकों के द्वारा 'रूपिया'[1], सुताइल, बहुंटा, चूरा, और पाँव में घुंघरू आदि पहने जाते हैं। आँख में काजल, माथे पर तिलक और पान से रंगे हुए ओंठ होते हैं।[2]

नृत्य पद्धति

एक कुहकी देने वाला, जिससे नृत्य की गति और ताल बदलता है; एक मांदर बजाने वाला और दो-तीन झांझ-मंजीरा बजाने वाले भी होते हैं। बाकी बचे हुए नर्तक इनके चारों ओर वृत्ताकार रूप में नाचते हैं। नर्तकों के हाथ में एक या दो डंडे होते हैं। नृत्य के प्रथम चरण में ताल मिलाया जाता है। दूसरा चरण में कुहका देने पर नृत्य चालन और उसी के साथ गायन होता है। नर्तक एक दूसरे के डंडे पर डंडे से चोंट करते हैं। कभी उचकते हुए, कभी नीचे झुककर और अगल-बगल को क्रम से डंडा देते हुए, झूम-झूमकर फैलते-सिकुड़ते वृत्तों में त्रिकोण, चतु कोण और षटकोण की रचना करते हुए नृत्य किया जाता है। डंडे की समवेत ध्वनि से एक शोरगुल भरा दृश्य उपस्थित होता है। नृत्य के आरंभ में ठाकुर देव की वंदना फिर माँ सरस्वती, गणेश और राम-कृष्ण के उपर गीत गाए जाते हैं।[2]

'पहिली डंडा ठोकबो रे भाई, काकर लेबो नाम रे ज़ोर,
गावे गउंटिया ठाकुर देवता, जेकर लेबो नाम रे ज़ोर।
आगे सुमिरो गुरु आपन ला, दूजे सुमिरों राम ज़ोर,
माता-पिता अब आपन सुमिरों गुरु के सुमिरों नाम रे ज़ोर।'

  • डंडा नृत्य कार्तिक माह से फाल्गुन माह तक होता है। पौष पूर्णिमा यानी की छेरछेरा के दिन मैदानी भाग में इसका समापन होता है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित मुकुटधर पाण्डेय ने इस नृत्य को छत्तीसगढ का रास कहकर सम्बोधित किया है।

मत-मतांतर

डंडा नृत्य के बारे में कई लोगों की अलग-अलग राय हैं। गोंड लोग इसे अपना जातीय नृत्य मानते हैं। वे मानते हैं कि राम-रावण युद्ध में वे राम की ओर से लड़े थे और विजय मिलने पर यह नृत्य प्रारंभ किया था। ये लोग डंडा नृत्य 'विजयादशमी' से शुरू करते हैं। एक अन्य मत के अनुसार इस नृत्य का प्रारम्भ श्री कृष्ण के रास नृत्य से हुआ है। इस नृत्य में राम और कृष्ण दोनों के पद गाए जाते हैं। डॉ. प्यारेलाल गुप्त ने अपनी पुस्तक 'प्राचीन छत्तीसगढ़' में डंडा नृत्य के प्रकारों का वर्णन किया है। उनके अनुसार दुधइया नृत्य, तीन डंडिया, पनिहारिन सेर, कोटरी झलक, भाग दौड़, चरखा भांज आदि विशेष रूप से प्रचलित है।[2]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. सिक्का
  2. 2.0 2.1 2.2 केशरवानी, अश्विनी। छत्तीसगढ़ के लोकनृत्य (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 29 मार्च, 2012।

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