लावणी  

लावणी नृत्यंगनाएँ, महाराष्ट्र

लावणी महाराष्ट्र राज्य की लोक नाट्य-शैली तमाशा का अभिन्न अंग है। आज इसे महाराष्ट्र के सबसे लोकप्रिय और प्रसिद्ध लोक नृत्य शैली के रूप में जाना जाता है। लावणी नृत्य की विषय-वस्तु कहीं से भी ली जा सकती है, लेकिन वीरता, प्रेम, भक्ति और दु:ख जैसी भावनाओं को प्रदर्शित करने के लिए यह शैली उपयुक्त है। संगीत, कविता, नृत्य और नाट्य सभी मिलकर लावणी बनाते हैं। इनका सम्मिश्रण इतना बारीक होता है कि इनको अलग कर पाना लगभग असम्भव है।

प्रसिद्धि

यह माना जाता है कि नृत्य अभिव्यक्ति का सबसे अच्छा माध्यम होते हैं। ऐसे में किसी राज्य की संस्कृति से रूबरू होने के लिए वहाँ की लोक नृत्य कलाओं को जानना सबसे अच्छा रहता है। महाराष्ट्र में विभिन्न प्रकार के लोक नृत्य किए जाते हैं, किंतु इन नृत्यों में लावणी नृत्य सबसे ज़्यादा प्रसिद्ध लोक नृत्य है। लावणी शब्द 'लावण्य' से बना है, जिसका अर्थ होता है- "सुन्दरता"। लावणी नृत्य इतना अधिक प्रसिद्ध है कि हिन्दी फ़िल्मों में अनेकों गाने इस पर फ़िल्माये गए हैं।

नृत्यांगना स्वरूप

रंग-बिरंगी भड़कीली साड़ियों और सोने के गहनों से सजी, ढोलक की थापों पर थिरकती लावणी नृत्यांगनाएँ इस नृत्य कला के नाम को सार्थक करती हुए दशर्कों को वशीभूत कर लेती हैं। नौ मीटर लम्बी पारम्परिक साड़ी पहनकर और पैरों में घुँघरू बांध कर सोलह श्रृंगार करके जब ये नृत्यांगनाएँ ख़ूबसूरती से अपने जिस्म को लहराती हैं और दर्शकों को निमंत्रित करते भावों से उकसाती हैं तो दर्शक मदहोश हुए बिना नहीं रह पाते।

नृत्य का विषय

माना जाता है कि इस नृत्य कला का आरंभ मंदिरों से हुआ है, जहाँ देवताओं को प्रसन्न करने के लिए नृत्य और संगीत का आयोजन किया जाता था। इसमें नृत्य के साथ-साथ पारंम्परिक गीत भी गाए जाते हैं। गीत का विषय धर्म से लेकर प्रेम रस आदि, कुछ भी हो सकता है। लेकिन इस नृत्य कला में अधिकतर गीत प्रेम और वियोग के ही होते हैं।

प्रकार

लावणी नृत्य दो प्रकार का होता है-

  1. निर्गुणी लावणी
  2. श्रृंगारी लावणी

निर्गुणी लावणी में जहाँ आध्यात्म की ओर झुकाव होता है, वहीं श्रृंगारी लावणी श्रृंगार रस में डूबा होता है। बॉलीवुड की अनेक फ़िल्मों में भी लावणी पर आधारित नृत्य फ़िल्माए गए हैं।


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