बरन  

बरन उत्तर प्रदेश के आधुनिक बुलन्दशहर का प्राचीन नाम है। लगभग 800 ई० में मेवाड़ से भागकर आने वाले दोर राजपूतों की एक शाखा ने बरन पर अधिकार कर लिया था। माना जाता है कि महाभारत के अर्जुन के प्रपौत्र जन्मेजय ने इस नगर को बसाया था।

  • जैन अभिलेखों में बरन का 'उच्छ' नगर के नाम से उल्लेख किया गया है।
  • राजपूतों ने 1018 ई० में आक्रमणकारी महमूद ग़ज़नवी का डटकर सामना किया था। वे अपने पड़ौसी तोमर राजाओं से भी वे मोर्चा लेते रहे, किंतु बडगूजरों से जो तोमरों के मित्र थे, उन्हें दबना पड़ा।
  • 1193 ई० में कुतुबुद्दीन ऐबक ने उनकी शक्ति को पूरी तरह से कुचल दिया।
  • 'फ़तूहाते फ़िरोजशाही' का प्रख्यात लेखक 'जियाउद्दीन बरनी' बरन का ही रहने वाला था, जैसा कि उसके उपनाम से सूचित होता है।
  • मुस्लिमों के शासन काल में बरन उत्तर भारत का महत्त्वपूर्ण नगर था।[1]
  • मान्यता है कि बरन नगर की स्थापना जन्मेजय ने की थी।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 'वरण' नामक एक नगर का बुद्धचरित 21, 25 में उल्लेख है। संभवत: यह बरन का ही संस्कृत रूप है
  • ऐतिहासिक स्थानावली | विजयेन्द्र कुमार माथुर | वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग | मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार

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