विदिशा  

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विदिशा
वराह अवतार भित्ति मू्र्तिकला, उदयगिरी
विवरण ऐतिहासिक व पुरातात्विक दृष्टिकोण से यह क्षेत्र मध्यभारत का सबसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र माना जा सकता है।
राज्य मध्य प्रदेश
ज़िला विदिशा
निर्माण काल महाभारत काल
भौगोलिक स्थिति उत्तर- 23°32, पूर्व- 77°49
मार्ग स्थिति विदिशा साँची से लगभग 9 किमी की दूरी पर स्थित है।
कैसे पहुँचें हवाई जहाज़, रेल, बस आदि से पहुँचा जा सकता है।
हवाई अड्डा भोपाल हवाई अड्डा
रेलवे स्टेशन विदिशा रेलवे स्टेशन
यातायात टैक्सी
क्या देखें लुहांगी, चरणतीर्थ, विदिशा का क़िला, विजय मंदिर, उदयगिरि गुफ़ाएँ
एस.टी.डी. कोड 7592
Map-icon.gif गूगल मानचित्र
अन्य जानकारी विदिशा को विदिशा नदी के रूप में भी जाना जाता है।
अद्यतन‎

विदिशा भारत के मध्य प्रदेश प्रान्त में स्थित एक प्रमुख शहर है। यह मालवा के उपजाऊ पठारी क्षेत्र के उत्तर- पूर्व हिस्से में अवस्थित है तथा पश्चिम में मुख्य पठार से जुड़ा हुआ है। ऐतिहासिक व पुरातात्विक दृष्टिकोण से यह क्षेत्र मध्यभारत का सबसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र माना जा सकता है। नगर से दो मील उत्तर में जहाँ इस समय बेसनगर नामक एक छोटा-सा गाँव है, प्राचीन विदिशा बसी हुई है। यह नगर पहले दो नदियों के संगम पर बसा हुआ था, जो कालांतर में दक्षिण की ओर बढ़ता जा रहा है। इन प्राचीन नदियों में एक छोटी-सी नदी का नाम वैस है। इसे विदिशा नदी के रूप में भी जाना जाता है।

भौगोलिक स्थिति

इसकी भौगोलिक स्थिति बड़ी ही महत्त्वपूर्ण थी। पाटलिपुत्र से कौशाम्बी होते हुये जो व्यापारिक मार्ग उज्जयिनी (आधुनिक उज्जैन) की ओर जाता था वह विदिशा से होकर गुजरता था। यह वेत्रवती नदी के तट पर बसा था, जिसकी पहचान आधुनिक बेतवा नदी के साथ की जाती है। बेतवा की सहायक नदी धसान नदी के नाम में अवशिष्ट है। कुछ विद्वान इसका नामाकरण दशार्ण नदी (धसान) के कारण मानते हैं, जो दस छोटी- बड़ी नदियों के समवाय- रूप में बहती थी।

इतिहास

विदिशा प्राचीन भारत की प्रसिद्ध नगरी थी, जिसका अभिज्ञान वर्तमान भिलसा या वेसनगर से किया गया है। यह नगरी वेत्रवती नदी[1] के तट पर बसी हुई थी। विदिशा का शायद सर्वप्रथम उल्लेख वाल्मीकि रामायण[2] में है, जिससे सूचित होता है कि शत्रुघ्न के पुत्र शत्रुघाती को विदिशा और सुबाहु को मधुरा या मथुरा का राजा बनाया गया था[3]-

‘सुबाहुर्मघुरा लेभे, शत्रुघाती च वैदिशम्’।

कालिदास ने भी इस तथ्य का उल्लेख 'रघुवंश'[4] में किया है-

'शत्रुघातिनि शत्रुघ्नः, सुबाहौ च बहुश्रुते मधुरा विदिशे सून्वों निर्दधे पूर्वोत्सुकः’।

अशोक के समय में विदिशा दक्षिण पथ की मुख्य नगरी थी। अपने पिता के शासन काल में अशोक दक्षिणा पथ का शासक था और विदिशा में ही रहता था। यहीं के एक धनवान् श्रेष्ठी की कन्या देवी से उसने विवाह किया था। बौद्ध साहित्य से सूचित होता है कि अशोक के पुत्र और पुत्री- महेन्द्र और संघमित्रा, देवी ही की संतान थे।[5] ‘फिर धीरे-धीरे महेन्द्र[6] ने विदिशा नगर में पहुंच कर अपनी माता देवी के दर्शन किए और उन्हें विदिशा गिरि विहार में उतारा’।[7] अशोक ने मगध सम्राट बनने के पश्चात् विदिशा के उपनगर सांची में अपना प्रसिद्ध स्तूप बनवाया था। इसके तोरण शुंग काल में बने थे। पुष्यमित्र शुंग जिस समय मगध का सम्राट था (द्वितीय शती ई. पू.), तब विदिशा में उसका पुत्र अग्निमित्र शासक के रूप में रहता था। कालिदास ने 'मालविकाग्निमित्र' नाटक में विदिशा को अग्निमित्र की राजधानी माना है-

‘स्वस्ति। यज्ञशरणात्सेनापतिः पुष्यमित्रों वैदिशस्थं पुत्रमायुष्मन्तमग्निमित्रं स्नेहात्परिष्वज्येदमनुदर्शयति’।[8]

विदिशा उस समय समृद्धशालिनी नगरी थी तथा यहाँ व्यापारिक सार्थ निरंतर आते-जाते रहते थे-

‘इमांतथागत भ्रातृकां मया सार्धमपवाह्म भवत् संबंधापेक्षया पथिकसार्थ विदिशागामिनमनु प्रविष्ट’।[9]

विदिशा का दशार्ण की राजधानी के रूप में उल्लेख तथा उसके निकट बहने वाली नदी वेत्रवती का सुंदर वर्णन कालिदास ने 'मेघदूत'[10] में इस प्रकार किया है-

‘तेषां दिक्षु प्रथितविदिशालक्षणां राजधानीम् गत्वा सद्यः फलमतिमहत कामुकत्वस्य लब्ध्वा, तीरोपरान्तस्तनिक सुभगं पास्यसि स्वादुयुक्तम्, सभ्रूभंग मुखमिव पयो वेत्रवत्याश्चलोमिः’।

इस वर्णन से इस बात का प्रमाण मिलता है कि कालिदास के समय तक (संभवतः 5वीं शती ई. का पूर्व भाग) विदिशा ‘प्रथित’ अथवा प्रसिद्ध नगरी थी। महाकवि बाणभट्ट (7वीं शती ई. तक) ने 'कादंबरी' के प्रारंभ में ही अपनी कथा के पात्र राजा शूद्रक की राजधानी विदिशा में वेत्रवती के तट पर बताई है-

‘वेत्रवत्या सरिता परिगतविदिशाभिधाना नगरी राजधान्यासीत्’।

विष्णुपुराण[11] में भी विदिशा का नामोल्लेख है-

'विदिशाख्यं पुरं गत्वा तदवस्थ ददर्शतम्’।

गुप्त युग के पश्चात् काफी समय तक विदिशा का इतिहास तिमिराच्छन रहा। 11वीं शती में अलबेरूनी ने विदिशा या भिलसा का नाम महाबलिस्तान बताया है। मध्य युग में विदिशा के बहुत दिनों तक मालवा के सुल्तानों के शासनाधीन रहने के प्रमाण मिलते हैं। मुग़ल काल में विदिशा (भिलसा) मालवा के सूबे की छोटी सी नगरी मात्र थी। धर्माध औरंगज़ेब ने इस प्राचीन नगरी का नाम बदलकर आलमगीर रखा था, जो कभी प्रचलित न हुआ। 18वीं शती में विदिशा में मराठों का राज्य स्थापित हो गया और तब से आधुनिक काल तक यह भूतपूर्व ग्वालियर रियासत की एक छोटी किंतु महत्वपूर्ण नगरी बनी रही। विदिशा के अनेक प्राचीन स्मारकों में विजयामंडल या बीजमंडल नामक मसजिद भी है, जो 11वीं शती के लगभग बने चर्चिका या विजयादेवी के मंदिर को तोड़कर उसी के मसाले से बनवाई गई थी। इसका प्रमाण मसजिद के एक स्तंभ पर उत्कीर्ण संस्कृत लेख से मिलता है। बेसनगर (पाली बेसनगर) विदिशा की प्राचीन मुख्य नगरी का ही एक भाग था और भिलसा इस नगरी के मध्ययुगीन संस्करण का नाम है।

महाभारत, रामायण में विदिशा

इस नगर का सबसे पहला उल्लेख महाभारत में आता है। इस पुर के विषय में रामायण में एक परंपरा का वर्णन मिलता है जिसके अनुसार रामचन्द्र ने इसे शत्रुघ्न को सौंप दिया था। शत्रुघ्न के दो पुत्र उत्पन्न हुये जिनमें छोटा सुबाहु नामक था। उन्होंने इसे विदिशा का शासक नियुक्त किया था। थोड़े ही समय में यह नगर अपनी अनुकूल परिस्थितियों के कारण पनप उठा। भारतीय आख्यान, कथाओं एवं इतिहास में इसका स्थान निराले तरह का है। इस नगर की नैसर्गिक छटा ने कवियों और लेखकों को प्रेरणा प्रदान की। वहाँ पर कुछ विदेशी भी आये और इसकी विशेषताओं से प्रभावित हुये। कतिपय बौद्ध ग्रन्थों के वर्णन से लगता है कि इस नगर का सम्बन्ध संभवत: किसी समय अशोक के जीवन के साथ भी रह चुका था। इनके अनुसार इस नगर में देव नामक एक धनीमानी सेठ रहता था जिसकी देवा नामक सुन्दर पुत्री थी। अपने पिता के जीवनकाल में अशोक उज्जयिनी का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। पाटलिपुत्र से इस नगर को जाते समय वह विदिशा में रूक गया थां देवा के रूप एवं गुणों से वह प्रभावित हो उठा और उससे उसने विवाह कर लिया। इस रानी से महेन्द्र नामक आज्ञाकारी पुत्र और संघमित्रा नामक आज्ञाकारिणी पुत्री उत्पन्न हुई। दोनों ही उसके परम भक्त थे और उसे अपने जीवन में बड़े ही सहायक सिद्ध हुये थे। संघमित्रा को बौद्ध ग्रन्थों में विदिशा की महादेवी कहा गया है।

कालिदास के मेघदूत में

इस नगर का वर्णन कालिदास ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ मेघदूत में किया है। अनेक अनुसार यहाँ पर दशार्ण देश की राजधानी थी। प्रवासी यक्ष अपने संदेशवाहक मेघ से कहता है- अरे मित्र! सुन। जब तू दशार्ण देश पहुँचेगा, तो तुझे ऐसी फुलवारियाँ मिलेंगी, जो फूले हुये केवड़ों के कारण उजली दिखायी देंगी। गाँव के मन्दिर कौओं आदि पक्षियों के घोंसलों से भरे मिलेंगे। वहाँ के जंगल पकी हुई काली जामुनों से लदे मिलेंगे और हंस भी वहाँ कुछ दिनों के लिये आ बसे होगें।

बीजामंडल, विदिशा

हे मित्र! जब तू इस दशार्ण देश की राजधानी विदिशा में पहुँचेगा, तो तुझे वहाँ विलास की सब सामग्री मिल जायेगी। जब तू वहाँ सुहावनी और मनभावनी नाचती हुई लहरों वाली वेत्रवती (बेतवा) के तट पर गर्जन करके उसका मीठा जल पीयेगा, तब तुझे ऐसा लगेगा कि मानो तू किसी कटीली भौहों वाली कामिनी के ओठों का रस पी रहा है।

वहाँ तू पहुँच कर थकावट मिटाने के लिये 'नीच' नाम की पहाड़ी पर उतर जाना। वहाँ पर फूले हुय कदम्ब के वृक्षों को देखकर ऐसा जान पड़ेगा कि मानों तुझसे भेंट करने के कारण उसके रोम-रोम फरफरा उठे हों। उस पहाड़ी की गुफ़ाओं से उन सुगन्धित पदार्थों की गन्ध निकल रही होगी, जिन्हें वहाँ के रसिक वेश्याओं के साथ रति करते समय काम में लाते हैं। इससे तुझे यह भी पता चल जायेगा कि वहाँ के नागरिक कितनी स्वतंत्रता से जवानी का आनन्द लेते हैं। कालिदास के इस वर्णन से लगता है कि वे इस नगर में रह चुके थे और इस कारण वहाँ के प्रधान स्थानों तथा पुरवासियों के सामाजिक जीवन से परिचित थे।

मालविकाग्निमित्रम् में

  • शुंगों के समय में इस नगर का राजनीतिक महत्त्व बढ़ गया। साम्राज्य के पश्चिमी हिस्सों की देख-रेख के लिये वहाँ एक दूसरी राजधानी भी स्थापित की गई। वहाँ शुंग-राजकुमार अग्निमित्र सम्राट के प्रतिनिधि (वाइसराय) के रूप में रहने लगा। यह वही अग्निमित्र है, जो कालिदास के 'मालविकाग्निमित्रम्' नामक नाटक का नायक है। इस ग्रन्थ में उसे वैदिश अर्थात् विदिशा का निवासी कहा गया है। उसका पुत्र वसुमित्र यवनों से लड़ने के लिये सिन्धु नदी के तट पर भेजा गया था। देवी धारिणी, जो अग्निमित्र की प्रधान महिषी थीं उस समय विदिशा में ही थीं। 'मालविकाग्निमित्रम्' में अपने पुत्र की सुरक्षा के लिये उन्हें अत्यन्त व्याकुल दिखाया गया है।
हेलिओडोरस स्तंभ, विदिशा
  • शुंगों के बाद विदिशा में नाग राजा राज्य करने लगे। इस नाग-शाखा का उल्लेख पुराणों में हुआ है। इसी वंश में गणपतिनाग हुआ था, जिसके नाम का उल्लेख समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति में हुआ है। वह बड़ा पराक्रमी लगता है। उसके राज्य में मथुरा का भी नगर सम्मिलित था। वहाँ से उसके सिक्के मिले हैं। कुछ लोगों का अनुमान है कि जब समुद्रगुप्त उत्तरी भारत में दिग्विजय कर रहा था उस समय वहाँ के नव राजाओं ने उसके विरुद्ध एक गुटबन्दी की, जिसका नायक गणपतिनाग था। ऐसा गुट सचमुच बना या नहीं, इस विषय में हम बहुत निश्चित तो नहीं हो सकते। पर इतना स्पष्ट है कि उस समय के राजमंडल में गणपतिनाग का नाम बड़े ही आदर के साथ लिया जाता था।
  • भरहुत के लेखों से लगता है कि विदिशा के निवासी बड़े ही दानी थे। वहाँ के एक अभिलेख के अनुसार वहाँ का रेवतिमित्र नामक एक नागरिक भरहुत आया हुआ था। उसकी भार्या चंदा देवी ने वहाँ पर एक स्तम्भ का निर्माण किया था। भरहुत के अन्य लेखों में विदिशा के कतिपय उन नागरिकों के नाम मिलते हैं, जिन्होंने या तो किसी स्मारक का निर्माण किया था या वहाँ के मठों के भिक्षुसंघ को किसी तरह का दान दिया था। इनमें भूतरक्षित, आर्यमा नामक महिला तथा वेणिमित्र की भार्या वाशिकी आदि प्रमुख थे।
  • कला के क्षेत्र में इस नगर का महत्त्व कुछ कम नहीं थां पेरिप्लस नामक विदेशी महानाविक के अनुसार वहाँ हाथी-दाँत की वस्तुएँ उत्तर कोटि की बनती थीं। बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार वहाँ की बनी हुई तेज़ धार की तलवारों की बड़ी माँग थी। इस स्थान सें शुंग-काल का बना हुआ एक गरुड़-स्तम्भ मिला है, जिससे ज्ञात होता है कि वहाँ पर वैष्णव धर्म का विशेष प्रचार था। इस स्तम्भ पर एक लेख मिलता है जिसके अनुसार तक्षशिला से हेलिओडोरस नामक यूनानी विदिशा आया था। वह वैष्णव मतावलम्बी था और इस स्तम्भ का निर्माण उसी ने कराया था।
  • सांस्कृतिक दृष्टि से यह लेख बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है। यह इस बात का परिचायक है कि विदेशियों ने भी भारतीय धर्म और संस्कृति को अपना लिया था। विदिशा में इसी तरह और भी भागों से लोग आये होंगे। इस धर्मकेन्द्र में अपने आध्यात्मिक लाभ के लिये लोगों ने स्मारकों का निर्माण किया होगा। विदिशा को स्कन्द पुराण में तीर्थस्थान कहा गया है।
  • हेलिओडोरस द्वारा निर्मित विदिशा का उपर्युक्त गरुड़-स्तम्भ कला का एक अच्छा नमूना है। वह मूलत: अशोक के ही स्तम्भों के आदर्श पर बना था। पर साथ ही उसमें कुछ मौलिक विशेषतायें भी हैं। इसका सबसे निचला भाग आठ कोनों का है। इसी तरह मध्य भाग सोलह कोने का और ऊपरी भाग बत्तीस कोने का है। यह विशेषता हमें अशोक के स्तम्भों में नहीं दिखाई देती। इससे लगता है कि विदिशा के कलाकार निपुण थे और उनकी प्रतिभा मौलिक कोटि की थी।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. बेतबा
  2. बाल्मीकि रामायण, उत्तर 108,10
  3. ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 855 |
  4. रघुवंश 15,36
  5. महावंश, 13,7
  6. अशोक का पुत्र स्थविर महेंद्र
  7. यहां विदिशागिरि से सांची की पहाड़ी निर्दिष्ट जान पड़ती है।
  8. अंक 5
  9. वहीं, अंक 5
  10. पूर्व मेघ 26
  11. विष्णुपुराण 3,64

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