गौड़पाद  

गौड़पाद
गौड़पाद
अन्य नाम श्री गौड़पादाचार्य
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र अध्यात्म तथा दर्शन
मुख्य रचनाएँ 'माण्डूक्य कारिका', 'माण्डूक्यों-पनिषत्कारिका', 'उत्तरगीताभाष्य' आदि।
प्रसिद्धि दार्शनिक, संत
नागरिकता भारतीय
संबंधित लेख अद्वैतवाद, शंकराचार्य
विशेष गौड़पाद ने अद्वैत वेदान्त के मुख्य सिद्धांत 'मायावाद', 'विवर्तवाद' या 'अजातिवाद' का बड़ा ही स्पष्ट प्रतिपादन किया है। साथ ही उन्होंने केवल आस्तिक दर्शनों[1] का ही नहीं अपितु बौद्ध दर्शनों का भी सफल खंडन किया।
अन्य जानकारी गौड़पाद अद्वैत सिद्धांत के प्रधान उद्घघोषक थे। इन्होंने अपनी कारिका में जिस सिद्धांत को बीजरूप में प्रकट किया, उसी को शंकराचार्य ने अपने ग्रंथों में विस्तृत रूप से समझाकर संसार के सामने रखा।

गौड़पाद एक सांख्यकारिता व्याख्या के रचियता एवं अद्वैत सिद्धात के प्रसिद्ध आचार्य थे। गौड़पाद सांख्यकारिता के पद्यों एवं सिद्धातों की ठीक-ठीक व्याख्या करने में इनकी टीका महत्त्वपूर्ण है। गौड़पादाचार्य के जीवन के बारे में कोई विशेष बात नहीं मिलती। आचार्य शंकर के शिष्य सुरेश्वराचार्य के 'नैष्कर्म्यसिद्धि' ग्रंथ से केवल इतना पता लगता है कि वे गौड़ देश के रहने वाले थे। इससे प्रतीत होता है कि उनका जन्म 'बडाग्ल' प्रांत के किसी स्थान में हुआ था। शंकर के जीवन चरित्र से इतना ज्ञात होता है कि गौड़पादाचार्य के साथ उनकी भेंट हुई थी, परंतु इसके अन्य प्रमाण नहीं मिलते।

गौड़पाद के सिद्धांत

गौड़पाद अद्वैत सिद्धांत के प्रधान उद्घघोषक थे। इन्होंने अपनी कारिका में जिस सिद्धांत को बीजरूप में प्रकट किया, उसी को शंकराचार्य ने अपने ग्रंथों में विस्तृत रूप से समझाकर संसार के सामने रखा। कारिकाओं में उन्होंने जिस मत का प्रतिपादन किया, उसे 'अजातवाद' कहते हैं। सृष्टि के विषय में भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों के भिन्न-भिन्न मत हैं। कोई काल से सृष्टि मानते हैं और कोई भगवान के संकल्प से इसकी रचना मानते हैं। इस प्रकार कोई परिणामवादी हैं और कोई आरम्भवादी। किंतु गौड़पाद के सिद्धांतानुसार जगत् की उत्पत्ति ही नहीं हुई, केवल एक अखण्ड चिदघन सत्ता ही मोहवंश प्रपच्चवत भास रही है। यही बात आचार्य इन शब्दों में कहते हैं-

मनोदृश्यमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थ:।
मनसो ह्ममनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते॥

यह जितना 'द्वैत' है, सब मन का ही दृश्य है। पर मार्थत: तो अद्वैत ही है, क्योंकि मन के मननशून्य हो जाने पर द्वैत की उपलब्धि नहीं होती।

आचार्य ने अपनी कारिकाओं में अनेक प्रकार की युक्तियों से यही सिद्ध किया है कि सत्, असत् अथवा सदसत् किसी भी प्रकार से प्रपच्च की उत्पत्ति सिद्ध नहीं हो सकती। अत: परमार्थत: न उत्पत्ति है, न प्रलय है, न बद्ध है, न साधक है, न मुमुक्षु है और न मुक्त ही है:

न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधक:।
न मुमुक्षर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता॥

बस जो समस्त विरुद्ध कल्पनाओं का अधिष्ठान, सर्वगत, असंग अप्रमेय और अविकारी आत्मतत्त्व है, एक मात्र वही सदृस्तु हैं। माया की महिमा से रज्जू में सर्प, शुक्ति में रजत और सुवर्ण में आभूषणादि के समान उस सर्वसंगशून्य निर्विशेष चित्तत्त्व में ही समस्त पदार्थों की प्रतीति हो रही है।

गौड़पाद की रचनाएँ

गौड़पादाचार्य का सबसे प्रधान ग्रंथ है- 'माण्डूक्यों-पनिषत्कारिका'। इसका शंकराचार्य ने भाष्य लिखा है। इस कारिका की 'मिताक्षरा' नामक टीका भी मिलती है। उनकी अन्य टीका है- 'उत्तर गीता-भाष्य'। उत्तर गीता (महाभारत) का अंश है, परंतु यह अंश महाभारत की सभी प्रतियों में नहीं मिलता।

माण्डूक्य-कारिका

गौड़पाद रचित 'माण्डूक्य-कारिका' शंकर पूर्व वेदान्त का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है। गौड़पाद शंकराचार्य के गुरु गोविन्दपाद के गुरु कहे जाते हैं। यह निश्चित नहीं है कि 'माण्डूक्य-कारिका' के रचयिता गौड़पाद 'सांख्यकारिका' पर भाष्य लिखने वाले गौड़पाद ही हैं या कोई अन्य। 'माण्डूक्य-कारिका' को 'गौड़पाद कारिका' भी कहा जाता है। 'माण्डूक्य-कारिका' 'माण्डूक्योपनिषद' पर लिखी हुई टीका के रूप में मानी जाती है। गौड़पाद की एक कृति 'उत्तरगीताभाष्य' भी है, परन्तु उनके दार्शनिक सिद्धांत के लिए कारिका ही प्रसिद्ध है। कारिका पर शंकराचार्य का भाष्य भी है। दोनों का हिन्दी अनुवाद गीता प्रेस, गोरखपुर में छपा है।

प्रथम प्रकरण

माण्डूक्योपनिषद में कुल बारह मंत्र हैं, किन्तु वे बड़े ही महत्त्व के हैं। उनमें अद्वैत वेदान्त के सभी मूल तत्त्व पाए जाते हैं। कारिका का प्रथम प्रकरण (आगम प्रकरण) छठे मंत्र के बाद प्रारम्भ होता है। इन छह मंत्रों में कहा गया है कि आत्मा चार वेदों वाला है, ठीक वैसे ही जैसे 'ओंकार' में चार पद होते हैं। ओंकार के अ, उ, म के अनुरूप स्थूल (जाग्रत), सूक्ष्म (स्वप्न) और कारण (सुषुप्ति) शरीर है और तदनुरूप जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति के तीन देवता (समिष्टिरूप) विश्व, तेजस् एवं प्राज्ञ हैं। इन्हीं को वैश्वानर, हिरण्यगर्भ एवं ईश्वर कहा जाता है। इस प्रकार व्यष्टि एवं समष्टि में अनुरूपता है। परन्तु उपर्युक्त तीन के अतिरिक्त आत्मा का एक चौथा पद है, जो ओंकार का अमात्ररूप है। वह प्रथम तीन से विलक्षण, उनमें अनुगत, उनका अधिष्ठान तथा उनका साक्षी है। आत्मा की वह तुरीयावस्था अव्यवहार्य, प्रपंचोपशम, शिव एवं अद्वैत है। जिज्ञासु के लिए वही ज्ञातव्य है। वह आत्मा, अलक्षण, अग्राह्य, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य तथा एकात्मप्रत्ययसार है। वह न अन्त:प्रज्ञ है, न बहिष्प्रज्ञ है, न उभयत:प्रज्ञ है और न प्रज्ञानघन है। उपनिषद के बाद वाले मंत्रों में प्रथम तीन अवस्थाओं की उपासना का फल बतलाया गया है और कहा गया है कि तुरीयावस्था को जानने वाला व्यक्ति ही परमार्थतत्त्व की प्राप्ति करता है।

माण्डूक्योपनिषद की इसी शिक्षा को आधार बनाकर कारिका की रचना की गई है, जो छठे मंत्र के बाद से प्रारम्भ होती है। कारिका में चार प्रकरण हैं। आगम प्रकरण, वैतथ्य प्रकरण, अद्वैत प्रकरण तथा अलातशान्ति प्रकरण। प्रथम प्रकरण में आगम या श्रुति को आधार बनाया गया है। गौड़पाद का कहना है कि तीनों अवस्थाओं में जो तीन प्रकार के भोज्य और भोक्ता हैं (स्थूल-विश्व, सूक्ष्म-तैजस्, आनन्द-प्राज्ञ) उनको जानने वाला व्यक्ति सभी भोगों को भोगते हुए भी भोग में लिप्त नहीं होता (कारिका 5)। सृष्टि करने की भला क्यों इच्छा हो सकती है। इसी से अद्वैत वेदान्त में सृष्टि विषयक चर्चा का विशेष महत्त्व नहीं है। उसकी उपयोगिता केवल अद्वैत सिद्धांत के स्थापन में ही है। अद्वैत ही परमार्थ है और द्वैत माया है। तुरीयावस्था का अनुभव या अद्वैत का बोध माया से मुक्त होने पर ही होता है। तुरीयावस्था या समाधि की अवस्था जाग्रत एवं स्वप्न से ही नहीं बल्कि निद्रावस्था से भी भिन्न है, क्योंकि आत्मा सर्वदा सर्वदृक् है (कारिका 12. 13)। अनादिमाया से मुक्त होकर जीव इन तीनों से परे जाता है, क्योंकि ज्ञान हो जाने पर किसी प्रकार का द्वैत नहीं रह जाता है।[2]

ऊपर ओंकार और आत्मा की जो चतुष्पादविषयक अनुरूपता बतलाई गई है, उसी के आधार पर ओंकार को ही पर और ऊपर ब्रह्म कहा गया है और ओंकार की उपासना का उपदेश है। ओंकार का उपासक चिन्ता और भय से मुक्त हो जाता है, क्योंकि वह अन्तत: आत्म ज्ञानी हो जाता है।

द्वितीय प्रकरण

वैतथ्य का अर्थ मिथ्यात्व है। अत: द्वितीय प्रकरण या वैतथ्य प्रकरण में द्वैत का मिथ्यात्व युक्ति या तर्क द्वारा दिखलाया गया है। इस प्रकरण की मुख्य युक्ति यह है कि जाग्रत और स्वप्निक पदार्थों में वास्तव में कोई भेद नहीं है, अर्थात् जैसे स्वप्निक जगत् काल्पनिक या मिथ्या है, वैसे ही जाग्रत जगत् भी काल्पनिक या मिथ्या है।[3] साधारणतया स्वप्न और जाग्रत में यह भेद किया जाता है कि जाग्रत जगत् अधिक स्थायी है, अधिक विस्तार वाला है, सर्व प्रत्यक्ष तथा स्वप्न को बाधित करने वाला है। किन्तु विचारपूर्वक देखा जाये तो यह तर्क ठीक ज्ञान नहीं पड़ता, क्योंकि विस्तार, स्थायित्व, सर्वप्रत्यक्षत्व आदि गुण जाग्रत और स्वप्न में प्रकार का भेद नहीं सिद्ध करते हैं। बल्कि केवल मात्रा का भेद सिद्ध करते हैं। यह भी कहा जा सकता है कि जैसे जाग्रत पदार्थों में स्वप्न जगत् बाधित हो जाता है, वैसे ही स्वप्न में भी जाग्रत पदार्थों की विपरीतता देखी जाती है।[4] उदाहरणार्थ पानी पीकर सोये व्यक्ति को प्यास का स्वप्न होता है। जिस प्रकार प्रकार जाग्रत अवस्था में सत्य और असत्य का भेद किया जाता है, वैसे ही स्वप्नावस्था में भी सत्यासत्य का भेद किया जाता है, यद्यपि पूरा स्वप्न ही असत्य होता है। इस प्रकार जाग्रत जगत् और स्वप्न जगत-प्रकारत: समान जान पड़ते हैं। सारे दृश्य पदार्थ चाहे वे स्वप्न के हों चाहे जाग्रत के, स्वयंप्रकाश-आत्मा की माया या कल्पना है। आन्तरिक या बाह्य सभी पदार्थ मिथ्या हैं, चाहे वे चित्कालिक हों या द्विकालिक। जो वस्तु आदि और अन्त में नहीं है, वह मध्य काल या दृश्य काल में नहीं है।[5] पदार्थों का भेद केवल इन्द्रियों के कारण है। अज्ञान के कारण जैसे रज्जु में सर्प का आभास होता है, वैसे ही सारे पदार्थ आत्मा में कल्पित हैं। जैसे रज्जु का ज्ञान होने पर सर्प के मिथ्यात्व का निश्चय हो जाता है, वैसे ही आत्मा का ज्ञान हो जाने पर जगत् का मिथ्यात्व ज्ञान पड़ता है। मूल तत्त्व के विषय में[6] कई वाद हैं, परन्तु वे सभी वाद इस आत्मतत्त्व में ही कल्पित हैं। वास्तव में न प्रलय है, न उत्पत्ति, न साधक हैं, न मुमुक्षु हैं और न मुक्त ही। ऐसा ज्ञान ही परमार्थता है।[7] ब्रह्म से पृथक् या अपृथक् कोई अन्य वस्तु नहीं है। इस अद्वैत तत्त्व को जानकर ज्ञानी जगत् में जड़वत् व्यवहार करता है।

तृतीय प्रकरण

कारिका तृतीय प्रकरण अद्वैत प्रकरण है, जिसमें तर्क और दृष्टांत की सहायता से अद्वैत सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया है। यहाँ आत्मा की तुलना आकाश से की गई है। जैसे आकाश सर्वव्यापी, समान, अविकारी तथा एक है, वैसे ही आत्मा है। जीव घटाकाश के समान है न कि आत्मा का विका या अवयव।[8] जैसे घट के फूट जाने पर घटाकाश और बाह्यकाश की एकता स्पष्ट हो जाती है, वैसे ही अज्ञान के नष्ट हो जाने पर आत्मा और ब्रह्म की एकता स्पष्ट हो जाती है। जैसे मूर्ख व्यक्ति को आकाश मलिन जान पड़ता है, वैसे ही अज्ञानी को आत्मा विकारी मालूम पड़ती है। देहादि समस्त संघात मायाजन्य स्वप्न के समान हैं। श्रुति में उत्पत्ति बोधक वाक्य गौण हैं।[9] मृत्तिका, लौह, विस्फुलिंग आदि के उदाहरण ब्रह्म और आत्मा की एकता दिखाने को हैं। विभिन्न स्तरों के अधिकारियों को ध्यान में रखकर उपनिषदों में विभिन्न प्रकार की उपासनाओं की शिक्षा है। किन्तु अद्वैत तत्त्व तो केवल ज्ञानगम्य ही है। मताविशेष पर आग्रह करने के कारण द्वैतवादियों का आपस में विरोध होता है, उनसे अद्वैतवाद का क्या विरोध हो सकता है, जबकि अद्वैतवाद के लिए सभी प्रकार के भेद मिथ्या हैं।[10] द्वैत तो व्यवहार क्षेत्र का विषय है। वह केवल माया के कारण आभासित होता है। आत्मा का न जन्म है, न मृत्यु है और आत्मा एक है। इस सिद्धांत को दृष्टि में रखकर ही श्रुति के सृष्टि विषयक वाक्य समझने चाहिए। किसी भी वस्तु का जन्म माया से हो सकता है, तत्वत: नहीं।[11] जो लोग जन्म और मरण मानते हैं, उनके मत में भी जो उत्पत्तिशील और मरणशील है, उसी का जन्म-मरण होता है। अजन्मा और अनश्वर का नहीं।

अजातिवाद का सिद्धांत

इसी प्रकरण में गौड़पाद ने अपने प्रसिद्ध सिद्धांत अजातिवाद का प्रतिपादन किया है। कारिका 48 में वे कहते हैं कि कोई भी जीव उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि उसका कोई कारण नहीं है। जिस अजन्मा ब्रह्म में किसी की उत्पत्ति नहीं होती, वही सर्वोत्तम सत्य है। यह पहले कहा जा चुका है कि श्रुति में सृष्टि विषयक वाक्यों का अर्थ यह नहीं है कि सृष्टि वास्तविक है। ऐसे वाक्य भविष्यद् वत्ति से गौण हैं।[12] वास्तुव में श्रुति तो अजातिवाद का ही उपदेश करती है, क्योंकि उपनिषदों में स्पष्ट कहा गया 'नेह नानास्ति किंचन', - 'नेति-नेति' तथा 'नायं कुतश्चिन्न बभुव कश्चित्' आदि। इसी प्रकार तर्कत: भी यह कहा जा सकता है कि असत् (आकाशकुसुम) की तो किसी भी प्रकार उत्पत्ति नहीं हो सकती। उत्पत्ति सत्-रूप की ही हो सकती है, किन्तु वह भी मायाजन्य ही हो सकती है, तत्वत: नहीं। तत्व की उत्पत्ति नहीं हो सकती। न तो एक तत्व दूसरे तत्व की उत्पत्ति कर सकता है और न उसकी उत्पत्ति असत् से हो सकती है। माया से जब तक मन का स्पन्दन होता रहता है, तब तक द्वैत दीखता है।[13] अत: जब अपने भाव की प्राप्ति हाती है, तब द्वैत की उपलब्धि नहीं होती।[14] इसी प्रसंग में गौड़पाद ने अपने भाव[15] तथा अस्पर्श-योग का वर्णन[16] किया है। ब्रह्म की प्राप्ति चित्त के लय हो जाने पर या मनोनाश से ही होती है। उसका साधन अस्पर्श योग है, जिसका अर्थ है, मायाजन्य या जगत् से सर्वथा अछूता या अस्पष्ट रहना या माया के परे जाना।

चौथा प्रकरण

अलातशान्ति प्रकरण चौथा प्रकरण है। इस प्रकरण के बारे में विवाद है कि गौड़पाद द्वारा रचित है या किसी बौद्ध द्वारा, क्योंकि इसमें बुद्ध शब्द[17] का ही नहीं अपितु बौद्ध दर्शन के अनेक शब्दों का प्रयोग है। iपरम्परा के अनुसार गौड़पाद रचित माना गया है। इस प्रकरण में पुन: द्वैतवादियों का खंडन करते हुए कहा गया है कि किसी भी वस्तु के स्वभाव का विपर्यय नहीं होता, अत: अजाति ही परम सत्य है। सांख्य के सत्कार्यवाद का खंडन करते हुए कहा गया है।[18] कि यदि कार्यकरण अभिन्न है तो कार्य भी अजन्मा हो जाता है। अजन्मा से किसी की उत्पत्ति हो, इसके लिए कोई प्रमाण या दृष्टांत नहीं है।[19] इसी प्रकार हेतु और फल के अनादित्व को भी सिद्ध नहीं किया जा सकता। हेतु फल के पूर्वा पर का अज्ञान सिद्ध करता है कि वास्तव में उत्पत्ति का कारण अज्ञान ही है अर्थात् उससे अजाति ही सिद्ध होती है। उत्पत्ति न स्वत: हो सकती है और न परत:।[20] यहाँ पर कुछ लोग गौड़पाद का नागार्जुन से साम्य दिखाते हैं। चित्त से विज्ञान की उत्पत्ति होती है। इस विज्ञानवादी सिद्धांत का भी खंडन किया गया है। वास्तव में चित्त तत्व का स्पर्श नहीं कर सकता। जैसे विज्ञान मिथ्या है, वैसे ही चित्त भी मिथ्या है। यहाँ फिर जगत् को स्वाप्निक बताया गया है। असत् से न तो असत् की उत्पत्ति होती है और न ही सत् की। वैसे ही सत् से न सत् की उत्पत्ति होती है और न असत् की।[21] जगत् की सत्ता तो केवल उपलब्धि और व्यवहार के आधार पर मानी गई है।[22] परमार्थ सत्य तो अजाति ही है, जैसे अलात स्पन्दन से सीधा, टेढ़ा भिन्न भिन्न रूपों में दिखाई पड़ता है, वैसे ही विज्ञान का भी स्कुरण होता है, इसमें द्रव्यत्व नहीं होता है। जब तक हेतु फल पर आग्रह है, तभी तक उत्पत्ति और नाश देखे जाते हैं। जब हेतु फल पर आग्रह क्षीण हो जाता है, तभी संसार का भी अभाव हो जाता है।[23] परमार्थतया सब कुछ अज ही है।[24] आत्मा जो आज भी व्यावहारिक दृष्टि से कहा जाता है। परमार्थत: तो वह शब्द से परे है, अत: उसे अज भी नहीं कहा जा सकता।[25] मंद बुद्धि वाले लोग ही आत्मा के विषय में कहते हैं कि वह है, नहीं है, है और नहीं है, वह नहीं है नहीं है। वास्तव में आत्मा माध्यमिकों की चतुष्कोटि से परे है।[26] द्वैतवादी वास्वत में कृपण हैं, वे अभय रूप अद्वैत तत्व में भय देखने वाले होते हैं (अभेयेभयदर्शिन:)। आत्मज्ञानी ही अकृपण है, वही निर्भय है। बौद्धों में यह सिद्धांत नहीं पाया जाता है।

ऊपर के विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि गौड़पाद ने अद्वैत वेदान्त के मुख्य सिद्धांत मायावाद, विवर्तवाद या अजातिवाद का बड़ा ही स्पष्ट प्रतिपादन किया है। साथ ही उन्होंने केवल आस्तिक दर्शनों (सांख्य, न्याय आदि) का ही नहीं अपितु बौद्ध दर्शनों का भी सफल खंडन किया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने उपलब्धि की शिक्षा में दिखाकर उसकी संगति को तर्क से भी सिद्ध किया है। इस दृष्टि से गौड़पाद कारिका-अद्वैतवाद वेदान्त का अनुपम ग्रंथ है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

त्रिपाठी, प्रो. रमाकान्त विश्व के प्रमुख दार्शनिक (हिन्दी)। भारतडिस्कवरी पुस्तकालय: वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, नई दिल्ली, 193।

  1. सांख्य, न्याय आदि
  2. कारिका 16-18
  3. यथा तत्र तथा स्वप्ने-कारिका 4
  4. कारिका 7
  5. कारिका 6
  6. कारिका 20-28
  7. कारिका 32
  8. कारिका 7
  9. कारिका 14
  10. कारिका 17
  11. कारिका 27
  12. कारिका 14
  13. कारिका 29
  14. कारिका 38
  15. कारिका 34-38
  16. कारिका 39-47
  17. कारिका 1
  18. कारिका 11-12
  19. कारिका 13
  20. कारिका 22
  21. कारिका 40
  22. कारिका 44
  23. कारिका 55-56
  24. कारिका 57 तथा कारिका 71
  25. कारिका 74
  26. कारिका 83-84

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