मदनमोहन मालवीय  

मदनमोहन मालवीय
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पूरा नाम पंडित महामना मदनमोहन मालवीय
जन्म 25 दिसम्बर, 1861
जन्म भूमि इलाहाबाद
मृत्यु 12 नवम्बर, 1946
मृत्यु स्थान इलाहाबाद
अभिभावक ब्रजनाथ और भूनादेवी
पति/पत्नी कुन्दन देवी
नागरिकता भारतीय
प्रसिद्धि समाज सुधारक
पार्टी कांग्रेस
पद कांग्रेस के अध्यक्ष
शिक्षा एफ.ए., बी.ए., वक़ालत
विद्यालय श्री धर्मज्ञानोपदेश पाठशाला, इलाहाबाद ज़िला स्कूल, म्योर सेंट्रल कॉलेज
भाषा हिंदी
पुरस्कार-उपाधि 'भारत रत्न' (24 दिसम्बर, 2014)
विशेष योगदान काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना, हिन्दी भाषा का विकास, शिक्षा का विकास
कर्मक्षेत्र शिक्षक, वकील, सम्पादक, समाज सुधारक, नेता, स्वतंत्रता सेनानी
रचनाएँ अभ्युदय, लीडर, हिन्दुस्तान टाइम्स, मर्यादा, सनातन धर्म-संग्रह

मदनमोहन मालवीय (अंग्रेज़ी: Madan Mohan Malaviya, जन्म- 25 दिसम्बर, 1861 ; मृत्यु- 12 नवम्बर, 1946) महान् स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ और शिक्षाविद ही नहीं, बल्कि एक बड़े समाज सुधारक भी थे। इतिहासकार वीसी साहू के अनुसार हिन्दू राष्ट्रवाद के समर्थक मदन मोहन मालवीय देश से जातिगत बेड़ियों को तोड़ना चाहते थे। उन्होंने दलितों के मन्दिरों में प्रवेश निषेध की बुराई के ख़िलाफ़ देशभर में आंदोलन चलाया। 24 दिसम्बर, 2014 को भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने पंडित मदनमोहन मालवीय को मरणोपरांत देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से नवाजा।

संक्षिप्त परिचय

  • बहुआयामी व्यक्तित्व। शिक्षाविद। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीरचयू) के संस्थापक। स्वतंत्रता संग्राम सेनानीहिन्दू महासभा के नेता।
  • 25 दिसम्बर, 1861 को इलाहाबाद में जन्म। इलाहाबाद डिस्ट्रिक्ट स्कूल में शिक्षा के रूप में करियर शुरू करने के साथ पढ़ाई जारी रखी।
  • वकालत की पढ़ाई करने के बाद पहले ज़िला और बाद में हाई कोर्ट में प्रेक्टिस शुरू की। 1886 में नवगाठित कांग्रेस के कोलकाता में आयोजित दूसरे वार्षिक सत्र में प्रेरणादायक भाषण देकर राजनीतिक परिदृश्य में उभरे।
  • 50 वर्षों तक कांग्रेस में सक्रिय रहे। 1909 (लाहौर), 1918 (दिल्ली), 1930 (दिल्ली) और 1932 (कोलकाता) में कांग्रेस अध्यक्ष रहे।
  • स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान उदारवादियों और राष्ट्रवादियों के बीच सेतु का काम किया।
  • 1930 में जब गांधी जी ने नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया तो मदनमोहन मालवीय ने उसमें हिस्सा लिया और जेल गए।
  • 50वीं वर्षगांठ पर देश सेवा के लिए वकालत छोड़ने का फैसला लिया।
  • 1909 में इलाहाबाद से प्रभावी अंग्रेज़ी अखबार 'द लीडर' शुरू किया।
  • 1903-18 के दौरान प्रांतीय विधायी परिषद और 1910-20 तक केंद्रीय परिषद के सदस्य रहे।
  • 1916-18 के दौरान भारतीय विधायी सभा के निर्वाचित सदस्य रहे।
  • 1931 में दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन द्वितीय में हिस्सा लिया
  • 1937 में राजनीति से सन्न्यास लिया। सामाजिक मुद्दों के प्रति ध्यान केंद्रित किया।
  • महिलाओं की शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया और बाल विवाह का विरोध किया।
  • 12 नवम्बर, 1946 को निधन हो गया।

जीवन परिचय

इलाहाबाद में 25 दिसम्बर, 1861 में जन्मे पंडित मदन मोहन मालवीय अपने महान् कार्यों के चलते 'महामना' कहलाये। इनके पिता का नाम ब्रजनाथ और माता का नाम भूनादेवी था। चूँकि ये लोग मालवा के मूल निवासी थे, इसीलिए मालवीय कहलाए। महामना मालवीय जी ने सन् 1884 में उच्च शिक्षा समाप्त की। शिक्षा समाप्त करते ही उन्होंने अध्यापन का कार्य शुरू किया पर जब कभी अवसर मिलता वे किसी पत्र इत्यादि के लिये लेखादि लिखते। 1885 ई. में वे एक स्कूल में अध्यापक हो गये, परन्तु शीघ्र ही वक़ालत का पेशा अपना कर 1893 ई. में इलाहाबाद हाईकोर्ट में वक़ील के रूप में अपना नाम दर्ज करा लिया। उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी प्रवेश किया और 1885 तथा 1907 ई. के बीच तीन पत्रों- हिन्दुस्तान, इंडियन यूनियन तथा अभ्युदय का सम्पादन किया।

शिक्षा

मदनमोहन मालवीय की प्राथमिक शिक्षा इलाहाबाद के ही श्री धर्मज्ञानोपदेश पाठशाला में हुई जहाँ सनातन धर्म की शिक्षा दी जाती थी । इसके बाद मालवीयजी ने 1879 में इलाहाबाद ज़िला स्कूल से एंट्रेंस की परीक्षा उत्तीर्ण की और म्योर सेंट्रल कॉलेज से एफ.ए. की। आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण मदनमोहन को कभी-कभी फ़ीस के भी लाले पड़ जाते थे। इस आर्थिक विपन्नता के कारण बी.ए. करने के बाद ही मालवीयजी ने एक सरकारी विद्यालय में 40 रुपए मासिक वेतन पर अध्यापकी शुरू कर दी।

विवाह

मदन मोहन मालवीय का विवाह मीरजापुर के पं. नन्दलाल जी की पुत्री कुन्दन देवी के साथ 16 वर्ष की आयु में हुआ था।[1]

राजनीतिक जीवन

जीवनकाल के प्रारम्भ से ही मालवीय जी राजनीति में रुचि लेने लगे और 1886 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में सम्मिलित हुए। मालवीय जी दो बार 1909 तथा 1918 ई. में कांग्रेस के अध्यक्ष हुए। 1902 ई. में मालवीय जी उत्तर प्रदेश 'इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल' के सदस्य और बाद में 'सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली' के सदस्य चुने गये। मालवीय जी ब्रिटिश सरकार के निर्भीक आलोचक थे और उन्होंने पंजाब की दमन नीति की तीव्र आलोचना की, जिसकी चरम परिणति जलियांवाला बाग़ काण्ड में हुई। वे कट्टर हिन्दू थे, परन्तु शुद्धि (हिन्दू धर्म को छोड़कर दूसरा धर्म अपना लेने वालों को पुन: हिन्दू बना लेते) तथा अस्पृश्यता निवारण में विश्वास करते थे। वे तीन बार हिन्दू महासभा के अध्यक्ष चुने गये। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि 1915 ई. में 'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय' की स्थापना है। विश्वविद्यालय स्थापना के लिए उन्होंने सारे देश का दौरा करके देशी राजाओं तथा जनता से चंदा की भारी राशि एकत्रित की।

सम्पादक

बालकृष्ण भट्ट के ‘हिन्दी प्रदीप’ में हिन्दी के विषय में उन्होंने उन दिनों बहुत कुछ लिखा सन् 1886 ई. में कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन के अवसर पर कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह से उनका परिचय हुआ तथा मालवीय जी की भाषा से प्रभावित होकर राजा साहब ने उन्हें दैनिक 'हिन्दुस्तान' का सम्पादक बनने पर राजी कर लिया। मालवीय जी के लिए यह एक यशस्वी जीवन का शुभ श्रीगणेश सिद्ध हुआ।

रचनाएँ

अभ्युदय

सन 1905 ई. में मालवीय की हिन्दू विश्वविद्यालय की योजना प्रत्यक्ष रूप धारण कर चुकी थी। इसी के प्रचार की दृष्टि से उन्होंने 1907 ई. में 'अभ्युदय' की स्थापना की। मालवीय जी ने दो वर्ष तक इसका सम्पादन किया। प्रारम्भ में यह पत्र साप्ताहिक रहा, फिर सन् 1915 ई. से दैनिक हो गया।

लीडर और हिन्दुस्तान टाइम्स

'लीडर' और 'हिन्दुस्तान टाइम्स' की स्थापना का श्रेय भी मालवीय जी को ही है। 'लीडर' के हिन्दी संस्करण 'भारत' का आरम्भ सन् 1921 में हुआ और 'हिन्दुस्तान टाइम्स' का हिन्दी संस्करण 'हिन्दुस्तान' भी वर्षों से निकल रहा है। इनकी मूल प्रेरणा में मालवीय जी ही थे।

मर्यादा

'लीडर' के एक वर्ष बाद ही मालवीय जी ने 'मर्यादा' नामक पत्रिका निकलवाने का प्रबन्ध किया था। इस पत्र में भी वे बहुत दिनों तक राजनीतिक समस्याओं पर निबन्ध लिखते रहे। यह पत्रिका कुछ दिनों तक ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी से प्रकाशित होती रही।

सनातन धर्म

सन 1906 ई. में इलाहाबाद के कुम्भ के अवसर पर उन्होंने सनातन धर्म का विराट अधिवेशन कराया, जिसमें उन्होंने 'सनातन धर्म-संग्रह' नामक एक बृहत ग्रंथ तैयार कराकर महासभा में उपस्थित किया। कई वर्ष तक उस सनातन धर्म सभा के बड़े-बड़े अधिवेशन मालवीय जी ने कराये। अगले कुम्भ में त्रिवेणी के संगम पर इनका सनातन धर्म सम्मेलन भी इस सभा से मिल गया। सनातन धर्म सभा के सिद्धांतों के प्रचारार्थ काशी से 20 जुलाई, 1933 ई. को मालवीय जी की संरक्षता में 'सनातन धर्म' नामक साप्ताहिक पत्र भी प्रकाशित होने लगा और लाहौर से ’मिश्रबन्धु’ निकला यह सब मालवीय जी के प्रयत्नों का ही फल था।
अन्य पत्रों को भी मालवीय जी सदा सहायक करते रहे। वे पत्रों द्वारा जनता में प्रचार करने में बहुत विश्वास रखते थे। और स्वयं वर्षों तक कई पत्रों के सम्पादक रहे। पत्रकारिता के अतिरिक्त वे विविध सम्मेलनों, सार्वजनिक सभाओं आदि में भी भाग लेते रहे। कई साहित्यिक और धार्मिक संस्थाओं से उनका सम्पर्क हुआ तथा उनका सम्बन्ध आजीवन बना रहा। इसके अतिरिक्त 'सनातन धर्म सभा' के नेता होने के कारण देश के विभिन्न भागों में जितने भी सनातन धर्म महाविद्यालयों की स्थापना हुई, वह मालवीय जी की सहायता से ही हुई। इनमें कानपुर, लाहौर, अलीगढ़, आदि स्थानों के सनातन धर्म महाविद्यालय उल्लेखनीय हैं।

प्राचीन संस्कृति के समर्थक

मालवीय जी प्राचीन संस्कृति के घोर समर्थक थे। सार्वजनिक जीवन में उनका पदार्पण विशेषकर दो घटनाओं के कारण हुआ-

  1. अंग्रेज़ी और उर्दू के बढ़ते हुए प्रभाव के कारण हिन्दी भाषा को क्षति न पहुँचे, इसके लिए जनमत संग्रह करना।
  2. भारतीय सभ्यता और संस्कृति के मूल तत्वों को प्रोत्साहन देना।

आर्य समाज से मतभेद

आर्य समाज के प्रवर्तक तथा अन्य कार्यकर्ताओं ने हिन्दी की जो सेवा की थी, मालवीय जी उसकी कद्र करते थे किंतु धार्मिक और सामाजिक विषयों पर उनका आर्य समाज से मतभेद था। समस्त कर्मकाण्ड, रीतिरिवाज, मूर्तिपूजन आदि को वे हिन्दू धर्म का मौलिक अंग मानते थे। इसलिए धार्मिक मंच पर आर्यसमाज की विचार धारा का विरोध करने के लिए उन्होंने जनमत संगठित करना आरम्भ किया। इन्हीं प्रयत्नों के फलस्वरूप पहले 'भारतधर्म महामण्डल' और पीछे 'अखिल भारतीय सनातन धर्म' सभा की नींव पड़ी। धार्मिक विचारों को लेकर दोनों सम्प्रदायों में चाहे जितना मतभेद रहा हो किंतु हिन्दी के प्रश्न पर दोनों का मतभेद था। शिक्षा और प्रचार के क्षेत्र में सनातन धर्म सभा ने हिन्दी को उन्नत करने के लिए जो कुछ किया, उसका श्रेय मालवीय जी को ही है।

हिन्दी के विकास में योगदान

मालवीय जी एक सफल पत्रकार थे और हिन्दी पत्रकारिता से ही उन्होंने जीवन के कर्मक्षेत्र में पदार्पण किया। वास्तव में मालवीय जी ने उस समय पत्रों को अपने हिन्दी-प्रचार का प्रमुख साधन बना लिया और हिन्दी भाषा के स्तर को ऊँचा किया था। धीरे-धीरे उनका क्षेत्र विस्तृत होने लगा। पत्र सम्पादन से धार्मिक संस्थाएँ और इनसे सार्वजनिक सभाएँ विशेषकर हिन्दी के समर्थनार्थ और यहाँ से राजनीति की ओर इस क्रम ने उनसे सम्पादन कार्य छुड़वा दिया और वे विभित्र संस्थाओं के सदस्य, संस्थापक अथवा संरक्षक के रूप में सामने आने लगे। पत्रकार के रूप में उनकी हिन्दी सेवा की यही सीमा है, यद्यपि लेखक की हैसियत से वे भाषा और साहित्य की उत्रति के लिए सदा प्रयत्नशील रहे। हिन्दी के विकास में उनके योगदान का तब दूसरा अध्याय आरम्भ हुआ।

Blockquote-open.gif "भारतीय विद्यार्थियों के मार्ग में आने वाली वर्तमान कठिनाईयों का कोई अंत नहीं है। सबसे बड़ी कठिनता यह है कि शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा न होकर एक अत्यंत दुरुह विदेशी भाषा है। सभ्य संसार के किसी भी अन्य भाग में जन-समुदाय की शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं है।" Blockquote-close.gif

- मदनमोहन मालवीय

हिन्दी की सबसे बड़ी सेवा मालवीय जी ने यह की कि उन्होंने उत्तर प्रदेश की अदालतों और दफ़्तरों में हिन्दी को व्यवहार योग्य भाषा के रूप में स्वीकृत कराया। इससे पहले केवल उर्दू ही सरकारी दफ़्तरों और अदालतों की भाषा थी। यह आन्दोलन उन्होंने सन् 1890 ई. में आरम्भ किया था। तर्क और आँकडों के आधार पर शासकों को उन्होंने जो आवेदन पत्र भेजा उसमें लिखा कि “पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध की प्रजा में शिक्षा का फैलना इस समय सबसे आवश्यक कार्य है और गुरुतर प्रमाणों से यह सिद्ध किया जा चुका है कि इस कार्य में सफलता तभी प्राप्त होगी जब कचहरियों और सरकारी दफ़्तरों में नागरी अक्षर जारी किये जायेंगे। अतएव अब इस शुभ कार्य में जरा-सा भी विलम्ब न होना चाहिए। सन् 1900 ई. में गवर्नर ने उनका आवेदन पत्र स्वीकार किया और इस प्रकार हिन्दी को सरकारी कामकाज में हिस्सा मिला। 'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय' के कुलपति की स्थिति में उपाधिवितरणोंत्सवों पर प्राय: मालवीय जी हिन्दी में ही भाषण करते थे। शिक्षा के माध्यम के विषय में मालवीय जी के विचार बड़े स्पष्ट थे। अपने एक भाषण में उन्होंने कहा था कि "भारतीय विद्यार्थियों के मार्ग में आने वाली वर्तमान कठिनाईयों का कोई अंत नहीं है। सबसे बड़ी कठिनता यह है कि शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा न होकर एक अत्यंत दुरुह विदेशी भाषा है। सभ्य संसार के किसी भी अन्य भाग में जन-समुदाय की शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं है।"

काशी नागरी प्रचारिणी सभा

सन 1893 ई. में मालवीय जी ने काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना में पूर्ण योग दिया। वे सभा के प्रवर्तकों में थे और आरम्भ से ही सभा को उनकी सहायता का सम्बल रहा। सभा के प्रकाशन, शोध और हिन्दी प्रसार-कार्य में मालवीय जी की रुचि बराबर बनी रही और अंतिम दिन तक वे उसका मार्गदर्शन करते रहे।

अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन

हिन्दी आन्दोलन के सर्वप्रथम नेता होने के कारण मालवीय जी पर हिन्दी साहित्य की अभिवृद्धि का दायित्व भी आ गया। इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति हेतु सन् 1910 ई. में उनकी सहायता से इलाहाबाद में 'अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन' की स्थापना हुई। उसी वर्ष अक्टूबर में सम्मेलन का प्रथम अधिवेशन काशी में हुआ। जिसके सभापति मालवीय जी थे। मालवीय जी विशुद्ध हिन्दी के पक्ष में थे। वे हिन्दी और हिन्दुस्तानी को एक नहीं मानते थे। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने जो अद्वितीय कार्य किया है, उसका भी एक आवश्यक अंग साहित्यिक है।

उच्च कोटि के वक्ता और लेखक

Blockquote-open.gif हम धर्म को चरित्र-निर्माण का सीधा मार्ग और सांसारिक सुख का सच्चा द्वार समझते हैं। हम देश-भक्ति को सर्वोत्तम शक्ति मानते हैं जो मनुष्य को उच्चकोटि की निःस्वार्थ सेवा करने की ओर प्रवृत्त करती है। Blockquote-close.gif

- मदन मोहन मालवीय

'हिन्दी साहित्य सम्मेलन' जैसी साहित्यिक संस्थाओं की स्थापना द्वारा 'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय' तथा अन्य शिक्षण केन्द्रों के निर्माण द्वारा और सार्वजनिक रूप से हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व कर उसे सरकारी दफ़्तरों में स्वीकृत कराके मालवीय जी ने हिन्दी की सेवा की उसे साधारण नहीं कहा जा सकता। उनके प्रयत्नों से हिन्दी को यश विस्तार और उच्च पद मिला है किंतु इस बात पर कुछ आश्चर्य होता है कि ऐसी शिक्षा-दीक्षा पाकर और विरासत में हिन्दी तथा संस्कृत का ज्ञान प्राप्त करके मालवीय जी ने एक भी स्वतंत्र रचना नहीं की। उनके अग्रलेखों, भाषणों, तथा धार्मिक प्रवचनों के संग्रह ही उनकी शैली और ओज पूर्ण अभिव्यक्ति के परिचायक के रूप में उपलब्ध है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि वे उच्च कोटि के विद्वान, वक्ता और लेखक थे। सम्भव है बहुधन्धी होने के कारण उन्हें कोई पुस्तक लिखने का समय नहीं मिला। अपने जीवन काल में जो उन्होंने कुछ हिन्दी भाषा और साहित्य के लिए किया सभी हिन्दी प्रेमियों के लिए पर्याप्त है किंतु उनकी निजी रचनाओं का अभाव खटकता है। उनके भाषणों और फुटकर लेखों का कोई अच्छा संग्रह आज उपलब्ध नहीं है। केवल एक संग्रह उनके जीवनकाल में ही सीता राम चतुर्वेदी ने प्रकाशित किया था, वह भी पुराने ढंग का है और उतना उपयोगी नहीं जितना होना चाहिए।

हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान

लोकमान्य तिलक, राजेन्द्र बाबू, और जवाहरलाल नेहरू के मौलिक या अनुदित साहित्य की तरह मालवीय जी की रचनाओं से हिन्दी की साहित्य निधि भरित नहीं हुई। इसलिए उनके सम्पूर्ण कृतित्व को आँकते हुए यह मानना होगा कि हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में मालवीय जी का योगदान क्रियात्मक अधिक है, रचनात्मक साहित्यकार के रूप में कम है। महामना मालवीय जी अपने युग के प्रधान नेताओं में थे। जिन्होंने हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान को सर्वोच्च स्थान पर प्रस्थापित कराया।

असहयोग आंदोलन

सरोजिनी नायडू, महात्मा गांधी और पंडित मदनमोहन मालवीय

मालवीय ने गांधी जी के असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। 1928 में उन्होंने लाला लाजपत राय, जवाहर लाल नेहरू और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मिलकर साइमन कमीशन का ज़बर्दस्त विरोध किया और इसके ख़िलाफ़ देशभर में जनजागरण अभियान भी चलाया। महामना तुष्टीकरण की नीतियों के ख़िलाफ़ थे। उन्होंने 1916 के लखनऊ पैक्ट के तहत मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचक मंडल का विरोध किया। वह देश का विभाजन नहीं होने देना चाहते थे। उन्होंने गांधीजी को आगाह किया था कि वह देश के बंटवारे की कीमत पर स्वतंत्रता स्वीकार न करें। मालवीय जी ने 'सत्यमेव जयते' के नारे को जन-जन में लोकप्रिय बनाया। उन्होंने 1931 में पहले गोलमेज सम्मेलन में देश का प्रतिनिधित्व किया।

सामाजिक कार्य

पं. मदन मोहन मालवीय जी कई संस्थाओं के संस्थापक तथा कई पत्रिकाओं के सम्पादक रहे। इस रूप में वे हिन्दू आदर्शों, सनातन धर्म तथा संस्कारों के पालन द्वारा राष्ट्र-निर्माण की पहल की थी। इस दिशा में 'प्रयाग हिन्दू सभा' की स्थापना कर समसामयिक समस्याओं के संबंध में विचार व्यक्त करते रहे। सन् 1884 ई. में वे हिन्दी उद्धारिणी प्रतिनिधि सभा के सदस्य, सन् 1885 ई. में 'इण्डियन यूनियन' का सम्पादन, सन् 1887 ई. में 'भारत-धर्म महामण्डल' की स्थापना कर सनातन धर्म के प्रचार का कार्य किया। सन् 1889 ई. में 'हिन्दुस्तान' का सम्पादन, 1891 ई. में 'इण्डियन ओपीनियन' का सम्पादन कर उन्होंने पत्रकारिता को नई दिशा दी। इसके साथ ही सन् 1891 ई. में इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत करते हुए अनेक महत्त्वपूर्ण व विशिष्ट मामलों में अपना लोहा मनवाया था। सन् 1913 ई. में वकालत छोड़ दी और राष्ट्र की सेवा का व्रत लिया ताकि राष्ट्र को स्वाधीन देख सकें।

  • यही नहीं वे आरम्भ से ही विद्यार्थियों के जीवन-शैली को सुधारने की दिशा में उनके रहन-सहन हेतु छात्रावास का निर्माण कराया। सन् 1889 ई. में एक पुस्तकालय भी स्थापित किया।
  • इलाहाबाद में म्युनिस्पैलिटी के सदस्य रहकर सन् 1916 तक सहयोग किया। इसके साथ ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य के रूप में भी कार्य किया।
  • सन् 1907 ई. में बसन्त पंचमी के शुभ अवसर पर एक साप्ताहिक हिन्दी पत्रिका अभ्युदय नाम से आरम्भ की, साथ ही अंग्रेजी पत्र लीडर के साथ भी जुड़े रहे।
  • पिता की मृत्यु के बाद पंडित जी देश-सेवा के कार्य को अधिक महत्व दिया। 1919 ई. में 'कुम्भ-मेले' के अवसर पर प्रयाग में 'प्रयाग सेवा समिति' बनाई ताकि तीर्थयात्रियों की देखभाल हो सके। इसके बाद निरन्तर वे स्वार्थरहित कार्यो की ओर अग्रसर हुए तथा महाभारत, महाकाव्य के निम्नलिखित उदाहरण को अपना आदर्श जीवन बनाया -
न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं न पुनर्भवम् । कामये दुःख तप्तानाम् प्राणिनामार्तनाशनम् ।।[1]

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना

मालवीय जी ने सन् 1916 ई. में 'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय' की स्थापना की और कालांतरों में यह एशिया का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय बन गया। वास्तव में यह एक ऐतिहासिक कार्य ही उनकी शिक्षा और साहित्य सेवा का अमिट शिलालेख है। पं0 मदन मोहन मालवीय जी के व्यक्तित्व पर आयरिश महिला डॉ. एनी बेसेंट का अभूतपूर्व प्रभाव पड़ा, जो हिन्दुस्तान में शिक्षा के प्रचार-प्रसार हेतु दृढ़प्रतिज्ञ रहीं। वे वाराणसी नगर के कमच्छा नामक स्थान पर 'सेण्ट्रल हिन्दू कॉलेज' की स्थापना सन् 1889 ई. में की, जो बाद में चलकर हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना का केन्द्र बना। पंडित जी ने तत्कालीन बनारस के महाराज श्री प्रभुनारायण सिंह की सहायता से सन् 1904 ई. में 'बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय' की स्थापना का मन बनाया। सन् 1905 ई. में बनारस शहर के टाउन हाल मैदान की आमसभा में श्री डी. एन. महाजन की अध्यक्षता में एक प्रस्ताव पारित कराया। सन् 1911 ई. में डॉ. एनी बेसेंट की सहायता से एक प्रस्तावना को मंजूरी दिलाई जो 28 नवम्बर 1911 ई. में एक 'सोसाइटी' का स्वरूप लिया। इस 'सोसायटी' का उद्देश्य 'दि बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी' की स्थापना करना था। 25 मार्च 1915 ई. में सर हरकोर्ट बटलर ने इम्पिरीयल लेजिस्लेटिव एसेम्बली में एक बिल लाया, जो 1 अक्टूबर सन् 1915 ई. को 'ऐक्ट' के रूप में मंजूर कर लिया गया। 4 फरवरी, सन् 1916 ई. (माघ शुक्ल प्रतिपदा, संवत् 1972) को 'दि बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी' की नींव डाल दी गई। इस अवसर पर एक भव्य आयोजन हुआ। जिसमें देश व नगर के अधिकाधिक गणमान्य लोग, महाराजगण उपस्थित रहे।[1]

संस्मरण

न्यायमूर्ति 'गिरधर मालवीय जी' के अनुसार - महामना के आगे झुक गई अंग्रेजों की संगीनें

1924 के प्रयाग कुंभ मेला क्षेत्र में बांस बल्लियों को बांध कर बनाए गए अवरोधक और इसके एक तरफ 'ऑल इंडिया सेवा समिति' के स्वयंसेवक और दूसरी ओर अंग्रेज़ सिपाहियों की संगीनें तनी थीं। एक आवाज़ के साथ ही सैंकड़ों युवक बेरीकेटिंग के पार कर गए। उन्हें न गोली का डर था, ना ही अंग्रेजों का डर। इस समय अंग्रेजों ने गंगा में स्नान पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की थी। महामना मदन मोहन मालवीय ने इस प्रतिबंध का जमकर विरोध किया था व अपने स्वयंसेवकों के साथ गंगा स्नान के लिए मेला क्षेत्र में डट गए थे। इस आंदोलन में पं. जवाहर लाल नेहरू भी शामिल हुए थे। गोली अब चली तब चली के माहौल में मालवीय के आह्वान पर बेरीकेटिंग के पार छलांग लगाने वालों में वह पहली पंक्ति में शामिल थे। मालवीय जी की पौत्र व हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति 'गिरधर मालवीय जी' के अनुसार महामना का व्यक्तित्व ही ऐसा था। कोई उनसे प्रभावित हुए बिना रह नहीं सकता था। अंग्रेज़ भी उनसे ख़ासे प्रभावित थे। यही वजह थी कि महामना द्वारा विरोध करने के साथ ही अंग्रेजों की बंदूकें झुक गई थीं। उनके अनुसार गंगा के लिए महामना लगातार सक्रिय रहे। उन्होंने 1913 में हरिद्वार में बांध बनाने की अंग्रेजों की योजना का विरोध किया था। उनके दबाव में अंग्रेज़ सरकार को झुकना पड़ा था। तत्कालीन भारत सरकार ने महामना के साथ समझौता किया था। इस समझौते में गंगा को हिन्दुओं की अनुमति के बिना न बांधने व 40 प्रतिशत गंगा का पानी किसी भी स्थिति में प्रयाग तक पहुंचाने की शर्त शामिल थी। न्यायमूर्ति पं. मालवीय के अनुसार यही वजह है कि आज गंगा में कुछ पानी हमें मिल जा रहा है।[2]

पं. शशि मालवीय' के अनुसार

महामना मदन मोहन मालवीय समिति के सचिव 'पं. शशि मालवीय' के अनुसार गौ, गंगागायत्री महामना का प्राण थे। उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में बाकायदा एक बड़ी गौशाला बनवायी थी। इस गौशाला को देखरेख के लिए विश्वविद्यालय के कृषि कॉलेज को सौंपा गया था। गंगा उन्हें इस क़दर प्यारी थीं कि उन्होंने न सिर्फ़ गंगा के लिए बड़े आंदोलन किए वरन् गंगा को विश्वविद्यालय के अन्दर भी ले गए थे, जिससे कि पूरा प्रांगण हमेशा पवित्र रहे। न्यायमूर्ति मालवीय के अनुसार महामना सही मायनों में आधुनिक भारत के निर्माणकर्ता थे। देश में इंजीनियरिंग, फार्मेसी आदि की पढ़ाई का कार्य महामना ने ही प्रारंभ किया था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में देश में पहली बार इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू हुई थी। दशकों तक देश में इंजीनियरिंग की डिग्री ख़ास कर 'इलेक्ट्रिकल' व 'मैकेनिकल' की डिग्री बनारस इंजीनियरिंग कॉलेज के माध्यम से ही दी जाती रही है।

सनातन धर्मी छात्रों को शाकाहारी भोजन व रहने की व्यवस्था सुलभ कराने के लिए इलाहाबाद में हिन्दू छात्रावास (हिन्दू बोर्डिग हाउस) की स्थापना, भारती भवन पुस्तकालय, दो अख़बार प्रारंभ करने आदि के कार्य महामना ने किए थे। हिन्दू छात्रावास आज भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय का सबसे बड़ा छात्रावास है। न्यायमूर्ति मालवीय के अनुसार महामना हिन्दी के प्रबल समर्थक थे। वह अंग्रेज़ी में बात करने को देशद्रोह मानते थे। महामना के अथक प्रयासों के फलस्वरूप ही तत्कालीन अंग्रेज़ सरकार ने 18 अप्रैल 1900 को आदेश जारी कर देवनागरी को सरकारी कार्यालयों व न्यायालयों में प्रयोग की अनुमति दी थी।[2]

मृत्यु

मालवीय जी आजीवन देश सेवा में लगे रहे और 12 नवम्बर, 1946 ई. को इलाहाबाद में उनका निधन हो गया।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 महामना पं. मदन मोहन मालवीय का जीवन-परिचय (हिंदी) (एच.टी.एम.एल) मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र। अभिगमन तिथि: 25 दिसम्बर, 2012।
  2. 2.0 2.1 और महामना के आगे झुक गई अंग्रेजों की संगीनें (हिन्दी) (पी.एच.पी) jagran.yahoo.com। अभिगमन तिथि: 31 जनवरी, 2011।

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