मीर जुमला  

मीर जुमला का पूरा नाम 'मीर जुमला मीर मुहम्मद सईद' था। वह एक ईरानी व्यापारी था, जो प्रारम्भ में गोलकुंडा में हीरे का व्यापार करता था। उसकी समृद्धी तथा ऐश्वर्य को गोलकुंडा का सुल्तान पसन्द नहीं करता था। इस कारण बाद में मीर जुमला ने मुग़ल बादशाह शाहजहाँ की शरण
ले ली, जहाँ उसे बड़े वज़ीर का पद दे दिया गया। मीर जुमला के नेतृत्व में कई सैनिक अभियान हुए, जिनमें विजय प्राप्त कर उसने मुग़ल साम्राज्य की कीर्ति को नई ऊँचाईयाँ प्रदान कीं।

मुग़लों से गठबन्धन

अपने प्रारम्भिक समय में मीर जुमला हीरों का प्रसिद्ध व्यापारी था। बाद में वह गोलकुंडा के सुल्तान अब्दुल्ला कुतुबशाह (1626-1672 ई.) की सेवा में जाकर क्रमश: उसका वज़ीर बन गया। वह राजनेता के साथ-साथ एक महान् सिपहसलार भी था। उसकी संपत्ति, शक्ति तथा प्रतिष्ठा के कारण गोलकुंडा का सुल्तान उससे ईर्ष्या करने लगा था और वह उसे दंडित करना चाहता था। मीर जुमला ने मुग़लों से साजिश और गठबन्धन करके शाहज़ादा औरंगज़ेब की सहायता से, जो उस समय गोलकुंडा पर हमला करने वाली मुग़ल सेना का नेतृत्व कर रहा था, 1656 ई. में दक्खिन में बादशाह शाहजहाँ की सेवा स्वीकार कर ली। इसके बाद ही वह शाहजहाँ का बड़ा वजीर नियुक्त हो गया।

विजय अभियान

शाहजहाँ के लड़कों में उत्तराधिकार का युद्ध छिड़ने पर मीर जुमला ने औरंगज़ेब का पक्ष लिया और उसे धर्मट की लड़ाई जीतने में भारी मदद की। 1660 ई. में औरंगज़ेब ने उसे बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया, जहाँ पहुँच कर उसने शुजा को प्रांत से बाहर खदेड़ दिया। बाद में उसने आसाम पर चढ़ाई की, अहोम राजा को अपनी राजधानी छोड़कर भागने तथा 1662 ई. संधि करने के लिए विवश किया। इस संधि के द्वारा अहोम राजा हर्जाने के रूप में एक बड़ी रकम देने तथा दक्षिणी आसाम का बहुत-सा भाग मुग़लों को सौंप देने के लिए राजी हो गया।

मृत्यु

आसाम के जंगलों से वापस लौटते समय मुग़ल सेना को बड़ी कठिनाइयाँ झेलनी पड़ीं मीर जुमला बीमार पड़ गया। वह 'प्लूरिसी' रोग से पीड़ित हो गया था। उसके फेफड़ों में सूजन और छाती में असहनीय दर्द था। इसी रोग के कारण जनवरी, 1636 ई. में ढाका से वापस लौटते समय उसने रास्ते में ही दम तोड़ दिया।


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