आइन-ए-दहसाला  

आइन-ए-दहसाला मुग़ल साम्राज्य में बादशाह अकबर के शासन काल में राजा टोडरमल द्वारा स्थापित की गई भू-राजस्व व्यवस्था की पद्धति थी।

  • अकबर के शासन काल में 1571 से 1580 ई. (10 वर्षों) के आंकड़ों के आधार पर भू-राजस्व का औसत निकालकर 'आइन-ए-दहसाला' प्रणाली को लागू किया गया था।
  • इस प्रणाली के अन्तर्गत राजा टोडरमल ने अलग-अलग फ़सलों पर नक़द के रूप में वसूल किये जाने वाले लगान का क़रीब 10 वर्ष का औसत निकालकर, उस औसत का एक-तिहाई भू-राजस्व के रूप में निश्चित किया।
  • कालान्तर में इस प्रणाली में सुधार के अन्तर्गत न केवल स्थानीय क़ीमतों को आधार बनाया गया, बल्कि कृषि उत्पादन वाले परगनों को विभिन्न कर हलकों में बांटा गया। अब किसान को भू-राजस्व स्थानीय क़ीमत एवं स्थानीय उत्पादन के अनुसार देना होता था।
  • ‘आइन-ए-दहसाला’ व्यवस्था को ‘टोडरमल बन्दोबस्त’ भी कहा जाता था।
  • इस व्यवस्था के अन्तर्गत भूमि की पैमाइश हेतु उसे 4 भागों में विभाजित किया गया-
  1. पोलज भूमि - इस भूमि पर नियमित रूप से खेती होती थी।
  2. परती भूमि - यह भूमि उर्वरा-शक्ति प्राप्त करने हेतु एक या दो वर्ष तक परती पड़ी रहती थी।
  3. छच्छर या चाचर भूमि - ऐसी भूमि, जिस पर लगभग तीन या चार वर्षों तक खेती नहीं की जाती थी।
  4. बंजर भूमि - निकृष्ट कोटि की भूमि, जिसे लगभग 5 वर्षों तक काश्त के प्रयोग में लाया गया हो।
  • लगान खेती के लिए प्रयुक्त भूमि पर ही वसूला जाता था।


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