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अमीचन्द  

अमीचंद (मृत्यु 1767 ई.), संभवत: वास्तविक नाम अमीरचंद का बंगाली उच्चारण है। अमीचन्द एक धनी किन्तु धूर्त सेठ था, जो 18वीं शताब्दी के मध्य में कलकत्ता में रहता था।

परिचय

अमीचंद (अमीरचंद) वस्तुत: अमृतसर का रहनेवाला सिक्ख व्यवसायी था और दीर्घ काल से कलकत्ता में बस गया था। सामयिक अंग्रेजों ने तथा उन्हीं के आधार पर इतिहासकार मेकाले ने उसे बंगाली बताया है। किंतु अँग्रेजों के प्रभुत्व का प्रसार सर्वप्रथम दक्षिण में हुआ, किंतु अँग्रेजी साम्राज्य के संस्थापन की नींव बंगाल में ही पड़ी।

अँग्रेजों की सहायता

बंगाल में व्यवसायलाभ की भावना से प्रेरित होकर अँग्रेजों के सर्वप्रथम संपर्क में आनेवाले भारतीय व्यवसायी ही थे। अलीवर्दी खाँ के कठोर नियंत्रण में तो अँग्रेज अपने प्रभुत्व का विस्तार करने में असमर्थ रहे, किंतु अल्पवयस्क, अपरिपक्वबुद्धि तथा उद्धतप्रकृति सिराजुद्दौला के राज्यारोहण से यह संभव हो सका। कूटनीतिज्ञता के दृष्टिकोण से वैध या अवैध उपायों से, अँग्रेजों के सामूहिक तथा व्यक्तिगत लाभ की अभिवृद्धि के लिए, सिराजुद्दौला के राज्यारोहण के बाद उसके प्रभुत्व का दमन कर अव्यवस्थित शासन को और भी अव्यवस्थित बनाना तत्कालीन अँग्रेजों की दृष्टि से वाँछनीय था। इस घटनाक्रम में सिराजुद्दौला ने अंग्रेजों के मुख्य व्यावसायिक केंद्र कलकत्ता पर आक्रमण करने का निश्चय किया। इस आक्रमण के पूर्व अँग्रेजों ने केवल संदेह के आधार पर अमीचंद को बंदी बनाने के लिए सिपाही भेजे। सिपाहियों ने अमीचंद के अंत:पुर पर आक्रमण कर दिया। अपमानित होने से बचने के लिए अंत:पुर में उसने अपनी 13 पत्नियों की हत्या कर दी। ऐसे मर्मातक अपमान के होने पर भी नितांत स्वार्थ लाभ से प्रेरित होकर अमीचंद ने अँग्रेजों की यथेष्ट सहायता की। कलकत्ता पतन के बाद उसने अनेक अँग्रेज शरणार्थियों को आश्रय दिया तथा अन्य प्रकारों से भी सहायता प्रदान की। किंतु, इतिहास में उसका नाम अपरिचित ही रहता यदि प्लासी युद्ध के पूर्व क्लाइव के अनैतिक आचरण से इंग्लैंड की पार्लियामेंट में तथा अँग्रेज इतिहासकारों द्वारा क्लाइव के कार्य की कटु आलोचना न हुई होती। अमीचंद ने अँग्रेजों के व्यावसायिक संपर्क में आकर यथेष्ट धन अर्जित कर लिया था। क्लाइव ने अमीचंद को वाट्सन का दूत बनाकर नवाब की राजधानी मुर्शिदाबाद भेजा। इस स्थिति में उसने अँग्रेजों का साथ दिया। संभवत:, चंद्रनगर पर अँग्रेजों के आक्रमण के लिए नवाब से अनुमति दिलवाने में अमीचंद का ही हाथ था। उसी ने नवाब के प्रमुख अधिकारी महाराज नंदकुमार को सिराजुद्दौला से विमुख कर अँग्रेजों का तरफदार बनाया।

सिराजुद्दौला के विरुद्ध षड़्यंत्र तथा अंग्रेजों से धन की माँग

अमीचंद ने नवाब सिराजुद्दौला को अपदस्थ कर मीर ज़ाफ़र को बंगाल का नवाब बनाने के लिए कलकत्ता में अंग्रेज़ों और मुर्शिदाबाद में नवाब के विरोधियों के बीच गुप्त वार्ताएँ चलाईं। जब यह गुप्त वार्ताएँ काफ़ी आगे बढ़ चुकीं और नवाब सिराजुद्दौला के विरुद्ध षड़यंत्र में अंग्रेज़ों की पूर्ण भागीदारी स्पष्ट हो चुकी, तब अमीचन्द ने मुर्शिदाबाद में नवाब के ख़जाने की लूट से प्राप्त होने वाले धन से लम्बे कमीशन की माँग की तथा यह धमकी दी कि यदि उसे वांछित धनराशि नहीं दी गई तो वह नवाब को सारे षड़यंत्र की सूचना दे देगा।

मृत्यु

बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के विरुद्ध जगतसेठ मीरजाफ़र के साथ अंग्रेजों ने जिस गुप्त षड्यंत्र का आयोजन किया था उसमें भी अमीचंद का बहुत बड़ा हाथ था। बाद में, जब क्लाइव के साथ मीरजाफर की संधि वार्ता चल रही थी, अमीचंद ने अँग्रेजों को धमकी दी कि यदि सिराजुद्दौला की पदच्युति के बाद प्राप्त खजाने का पाँच प्रतिशत उसे न दिया जाएगा तो वह सब भेद नवाब पर प्रकट कर देगा। अमीचंद को विफलप्रयत्न करने के लिए दो संधिपत्र तैयार किए गए। एक नकली, जिसमें अमीचंद को पाँच प्रतिशत भाग देना स्वीकार किया गया था, तथा दूसरा असली, जिसमें यह अंश छोड़ दिया गया था। ऐडमिरल वाट्सन ने नकली संधिपत्र पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया, तब क्लाइव ने उसपर वाट्सन के हस्ताक्षर नकल कर, वह नकली संधिपत्र अमीचंद को दिखा, उसे आश्वस्त कर दिया। सामयिक इतिहासकार ओर्मी का कथन है कि सिराजुद्दौला की पदच्युति के बाद जब वास्तविक स्थिति अमीचंद को बताई गई तो इस आघात से उसका मस्तिष्क विकृत हो गया तथा कुछ समय उपरांत उसकी मृत्यु हो गई। किंतु, इतिहासकार बेवरिज के मतानुसार वह दस वर्ष और जीवित रहा। अँग्रेजों से उसके संपर्क बने रहे जिसका प्रमाण यह है कि उसने फाउंड्लिंग अस्पताल को दो हजार पाउंड दान दिए जिसकी भित्ति पर 'कलकत्ते के काले व्यवसायी' की सहायता स्वीकृत है। उसने लंदन के मेग्डालेन अस्पताल को भी दान दिया था।[1]




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टीका टिप्पणी और संदर्भ

(पुस्तक 'भारतीय इतिहास कोश') पृष्ठ संख्या-14

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 205 |

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