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जगत सेठ  

जगत सेठ नवाब सिराजुद्दौला के शासनकाल में मुर्शिदाबाद का एक अमीर व्यापारी था। उसे 'फ़तेहचंद्र' नाम से भी जाना जाता था। मुर्शिदाबाद में वह जैन मारवाड़ी व्यवसायी परिवार से आया था। बंगाल के बहुत धनी महाजन मलिकचंद्र के गोद लिए हुए लड़के फ़तेहचंद्र को दिल्ली के बादशाह ने 1723 ई. में ‘जगत सेठ’ की उपाधि प्रदान की थी।

महत्त्वपूर्ण कार्य

जगत सेठ ने अपनी कोठियाँ ढाका, (बांग्ला देश), पटना और मुर्शिदाबाद में स्थापित की थीं। उसकी कोठी से रुपयों का लेन-देन तो होता ही था, वह बंगाल की सरकार के भी कई कार्यों को पूर्ण करने का काम करती थीं। प्रान्तीय सरकार की तरफ़ से मालगुज़ारी वसूल करना, शाही खज़ाने को दिल्ली भेजना, सिक्के की विनिमय दर तय करना आदि भी जगत् सेठ की ही ज़िम्मेदारी थी।

जगत सेठ उपाधि

फ़तेहचंद्र (जगत सेठ) के बाद उसका पौत्र 'महताबचंद्र' दूसरा जगत् सेठ बना। जब नवाब सिराजुद्दौला ने उसे अपमानित किया, तो वह अंग्रेज़ों के पक्ष में चला गया और प्लासी की लड़ाई से पहले और बाद में रुपये पैसों से उनकी बड़ी मदद की। यद्यपि मीर ज़ाफ़र के नवाब होने पर उसे फिर सम्मान प्राप्त हो गया था, और जगत् सेठ का नाम एक महत्त्वपूर्ण उपाधि बन चुका था, किंतु मीर क़ासिम ने गद्दी पर बैठते ही उसकी वफ़ादारी पर संदेह करके 1763 ई. में उसे मरवा डाला। इसके बाद ही बंगाल का शासन अंग्रेज़ों के हाथ में आ गया और उन्होंने ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ के ऊपर जगत् सेठ का कोई कर्ज़ होने से इंकार कर दिया।

अवनति

इसके कुछ समय बाद ही जगत् सेठ घराने की अवनति शुरू हो गई। फिर भी 1912 ई. तक इस घराने के किसी न किसी व्यक्ति को जगत् सेठ की उपाधि और थोड़ी-बहुत पेंशन अंग्रेज़ों की तरफ़ से मिलती रही। 1912 ई. के बाद यह सिलसिला भी बंद हो गया।


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