कैप्टन ख़ान मोहम्मद  

कैप्टन ख़ान मोहम्मद 'आज़ाद हिंद फौज' के बहादुर सैनिकों में से एक थे। जब सादे गाँव के पास एक पहाड़ी पर अंग्रेज़ सेना ने अधिकार कर लिया, तब कैप्टन ख़ान मोहम्मद ने अपने सैनिकों के साथ उस पहाड़ी को अंग्रेज़ों के कब्जे से मुक्त कराया। इस समय उनके कई साथी बीमार थे और कई नंगे पैर थे। फिर भी उन्होंने अंग्रेज़ सेना से टक्कर ली और उन्हें पराजिए किया।

पहाड़ी पर आक्रमण का आदेश

16 मार्च, 1945 को कैप्टन ख़ान मोहम्मद को 'सादे' गांव के निकट एक पहाड़ी पर आक्रमण करके उस पर अधिकार करने का आदेश प्राप्त हुआ। सादे की पहाड़ी पर एक बटालियन अंग्रेज़ सेना थी, जिसने वहां पर अपना अधिकार जमा रखा था। पहाड़ी पर स्थित अंग्रेज़ सेना उस क्षेत्र की आज़ाद हिंद फौज' की गतिविधियों के मार्ग में व्यवधान उत्पन्न कर रही थी। कैप्टन ख़ान मोहम्मद अपनी सैनिक टुकड़ी को लेकर पहाड़ी के उस भाग में गए, जहां नीचे एक पानी का नाला बह रहा था। पहाड़ी चट्टानी थी और उसकी ऊंचाई एकदम खड़ी थी। ख़ान मोहम्मद की सेना में कुछ सिपाही बीमार थे और कुछ बहुत कमजोर थे। उनकी सैनिक टुकड़ी में बहुत से सैनिकों ने जूते भी नहीं पहन रखे थे।[1]

अंग्रेज़ सेना से सामना

कैप्टन ख़ान मोहम्मद ने बीमार और कमजोर सिपाहियों को नीचे छोड़ दिया, क्योंकि एक तो वह अभियान में भाग लेने की स्थिति में नहीं थे तथा दूसरे उस रास्ते को खुला एवं सुरक्षित रखना आवश्यक था, क्योंकि उन्हें उधर से ही वापस लौटना था। कैप्टन ख़ान मोहम्मद ने शेष सैनिकों के साथ पहाड़ी पर चढ़ना प्रारंभ किया था, इसलिए शत्रु उन्हें देख तो नहीं सका, पर पत्थरों के लुढ़कने की आवाज सुनकर उन्हें पता चल गया कि कोई पहाड़ी पर चढ़ने की कोशिश कर रहा है। इस पर अंग्रेज़ सैनिकों ने गोलियों की बौछार शुरू कर दी। आज़ाद हिंद फौज के सैनिकों ने जवाब में गोलियां चलाईं और धीरे-धीरे वे उनकी चौकी के बिल्कुल निकट पहुंच गए। जब अंग्रेजों ने देखा कि वह गंभीर खतरे में हैं, तो उन्होंने दूसरे शिविर के सैनिकों को अपनी सहायता के लिए बुलाया। जब तक सहायक सेना सहायता के लिए पहुंचती, उससे पूर्व ही कैप्टन ख़ान मोहम्मद ने अपने साथियों के साथ तीव्र गति से आक्रमण कर दिया। इस पर आमने-सामने की लड़ाई शुरू हो गई। इतने में ही अंग्रेज़ सेना की सहायता के लिए एक सहायक सेना पहुंच गई और उसने ख़ान मोहम्मद के साथियों को दोनों ओर से घेर लिया। इसी समय अंग्रेज़ सेना की अतिरिक्त कुमुद भी सादे पहाड़ी की ओर झपटी।

कैप्टन ख़ान मोहम्मद के थोड़े से बीमार और नंगे पैर सैनिक इस समय पहाड़ी के नीचे थे। अब वे भी लड़ाई में कूदने के लिए विवश हो गए थे। वे यह भूल गए थे कि उनके पांव में जूते नहीं हैं। भीषण युद्धघोष के साथ 'भारत माता की जय' एवं 'नेता जी की जय' के नारे लगाते हुए वे सहायता के लिए जाती हुई सहायक अंग्रेज़ी सेना पर टूट पड़े और उन्हें मार-मार कर गिराने लगे। जब उनका गोला बारूद समाप्त हो गया, तो फिर वे किरिचें खींच कर शत्रु सेना पर टूट पड़े और लाशों पर लाशों के ढेर लगाने लगे।

अंग्रेज़ों की पराजय

दोनों पक्षों के बीच लड़ाई रात्रि के 3:00 बजे से प्रातः 5:00 बजे तक चलती रही। इस लड़ाई में अंग्रेज़ पराजित हुए और सादे पहाड़ी पर कैप्टन ख़ान मोहम्मद और उसके साथियों का अधिकार हो गया। इस विजय की प्राप्ति के बाद कैप्टन ख़ान मोहम्मद अपने शिविर में वापस आ गए। इस युद्ध में 'आज़ाद हिंद फौज' के केवल 17 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए जबकि शत्रु पक्ष के 200 जवान मारे गए।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. स्वतंत्रता सेनानी कोश, भारतकोश पुस्तकालय

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