कंजर  

कंजर एक घुमक्कड़ कबीला है जो संपूर्ण उत्तर भारत की ग्राम्य और नगरीय जनसंख्या में छितराया हुआ है। ये संभवत: द्रविड़ मूल के हैं। 'कंजर' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत 'कानन-चर' से हुई भी बताई जाती है। वैसे भाषा, नाम, संस्कृति आदि में उत्तर भारतीय प्रवृत्तियाँ कंजरों में इतनी बलवती हैं कि उनका मूल द्रविड़ मानना वैज्ञानिक नहीं जान पड़ता। कंजरों तथा साँसिया, हाबूरा, बेरिया, भाट, नट, बंजारा, जोगी और बहेलिया आदि अन्य घुमक्कड़ कबीलों में पर्याप्त सांस्कृतिक समानता मिलती है।

इतिहास

एक किंवदंती के अनुसार कंजर दिव्य पूर्वज 'मान' गुरु की संतान हैं। मान अपनी पत्नी नथिया कंजरिन के साथ जंगल में रहता था। मान गुरु के पुरावृत्त को ऐतिहासिकता का पुट भी दिया गया है, जैसा उस आख्यान से विदित है जिसमें मान दिल्ली सुल्तान के दरबार में शाही पहलवान को कुश्ती में हराता है। कंजरों का कबीली संगठन विषम है। वे बहुत से अंतिर्विवाही (एंडोगैमस) विभागों और बहिर्विवाही (एक्सोगैमस) उपविभागों के नाम 1891 की जनगणना में दर्ज किए गए 106 कंजर उपविभागों के नाम हिंदू और 6 के नाम मुसलमानी थे। कंजरों का विभाजन पेशेवर विभागों में हुआ है, जैसा उनके जल्लाद, कूँचबंद, पथरकट, दाछबंद आदि विभागीय नामों से स्पष्ट होता है।[1]

विवाह

कंजरों में वयस्क विवाह प्रचलन है। यद्यपि स्त्रियों को विवाहपूर्व यौन स्वच्छंदता पर्याप्त मात्रा में प्राप्त होती है, तथापि विवाह के पश्चात्‌ उनसे पूर्ण पतिव्रता की अपेक्षा की जाती है। स्त्रीं एवं पुरुष दोनों के विवाहेतर यौन संबंध हेय समझे जाते हैं और दंडस्वरूप वंचित पति को अधिकार होता है कि वह अपराधी पुरुष की न केवल संपत्ति वरन् संतान भी हस्तगत कर ले। विवाह वधूमूल्य देकर होता है। रकम का भुगतान दो किस्तों में होता है, एक विवाह के समय और दूसरी संतोनात्पत्ति के पश्चात्‌। परंपरागत विवाहों के अतिरिक्त पलायन विवाह (मैरिज बाई एलोपमेंट) का भी चलन है। अज्ञातवास से लौटने पर युग्म पूरे गाँव को भोज पर आमंत्रिक कर वैध पति पत्नी का पद प्राप्त कर सकता है। विधवा विवाह संभव है और विधवा अधिकतर अपने अविवाहित देवर से ब्याही जाती है।[1]

व्यवसाय

पेशेवर नामधारी होने पर भी कंजरों ने किसी व्यवसाय विशेष को नहीं अपनाया। कुछ समय पूर्व तक ये यजमानी करते थे और गाँव वालों का मनोरंजन करने के बदले धन और मवेशियों के रूप में वार्षिक दान पाते थे। प्रत्येक कंजर परिवार की यजमानी में कुछ गाँव आते थे जहाँ वे उत्सव और विशेष अवसरों पर नाच गाकर गाँव वालों का मनोरंजन करते थे। इनमें से कुछ परिवार गाँव की गूजर, मीना और अन्य जातियों के परंपरागत चारण और वंशावली संग्रहकर्ता का काम करते थे। छिपकली, साँडा, साँप और गिद्ध की खाल से विशेष प्रकार का तेल निकालकर ये उसे दु:साध्य रोगों की दवा कहकर बेचते हैं। भीख माँगने वाली कंजर स्त्रियाँ प्राय: संभ्रांत कृषक महिलाओं को अपनी बातों फँसाकर बाँझपन तथा अन्य स्त्री रोगों की दवा बेचती हैं और हाथ देखकर भाग्य बताती हैं। कुछ कंजर स्त्रियाँ भीख माँगने के साथ-साथ वेश्यावृत्ति भी करती थीं। किंतु वर्तमान कंजर अपने परंपरागत धंधों को छोड़ आर्थिक दृष्टि से अधिक लाभदायक पेशों की ओर आकृष्ट हो रहे हैं।[1]

वेशभूषा एवं खान-पान

वेशभूषा में कंजर गूजरों के सदृश होते हैं। इनकी स्त्रियाँ मुसलमान स्त्रियों की भाँति लहँगे की बजाया लंबा कुरता और पाजामा पहनती हैं। खान-पान में ये कबीले जौ, बाजरे, कंद, मूल, फल से लेकर छिपकली, गिरगिट और मेढ़क का मांस तक खाते हैं।

विशेषताएँ

  • ‘कंजर’ शब्द की उत्पति ‘काननचार’ अथवा ’कनकचार’ से हुई है जिसका अर्थ है ‘जंगलों में विचरण करने वाला’।
  • झालावाड़ , बाराँ, कोटा ओर उदयपुर ज़िलों में निवास करते हैं।
  • कंजरों की कबीली पंचायत शक्तिशाली और सर्वमान्य सभा है। सभ्य समाज की दृष्टि से पेशेवर अपराधी माने जाने वाले कंजरों में भी कबीली नियमों के उल्लंघन की कड़ी सजा मिलती है। अपराध स्वीकृति के निराले और यातनापूर्ण ढंग अपनाए जाते हैं।
  • पाती माँगना– ये अपराध करने से पूर्व ईश्वर का आशीर्वाद लेते है। उसको पाती माँगना कहा जाता है।
  • हाकम राजा का प्याला – ये हाकम राजा का प्याला पीकर कभी झूठ नहीं बोलते है।
  • इन लोगों के घरों में भागने के लिए पीछे की तरफ खिडकी होती है परन्तु दरवाज़े पर किवाड़ नहीं होते है।
  • कंजर कबीली देवी-देवताओं के साथ हिंदू देवी देवताओं की भी मनौती करते हैं।
  • ये लोग हनुमान और चौथ माता की पूजा करते है।
  • विपत्ति पड़ने पर कबीली देवता 'अलमुंदी' और 'आसपाल' के क्रोध-शमन-हेतु बकरे, सुअर और मुर्गे की बलि दी जाती है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 कंजर (हिंदी) भारतखोज। अभिगमन तिथि: 19 दिसम्बर, 2013।

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