नागा  

हार्नबिल त्योहार मनाते हुए नागा

नागा भारत की प्रमुख जनजातियों में से एक है। भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य नागालैण्ड, जिसमें नंगा पर्वत श्रेणियाँ फैली हुई हैं, नागा जनजाति का मूल निवास स्थान है। 'नागा' शब्द की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों के विचार भिन्न-भिन्न हैं। कुछ की मान्यता है कि यह शब्द संस्कृत के 'नागा' शब्द से निकला है, जिसका अर्थ 'पहाड़' से होता है और इस पर रहने वाले लोग 'पहाड़ी' या 'नागा' कहलाते हैं। कच्छारी भाषा में 'नागा' से तात्पर्य 'एक युवा बहादुर लड़ाकू व्यक्ति' से लिया जाता है। टोल्मी के अनुसार 'नागा' का अर्थ 'नंगे' रहने वाले व्यक्तियों से है। डॉक्टर वैरियर इल्विन का कथन है कि 'नगा' शब्द की उत्पत्ति 'नॉक' या 'लोग' से हुई है। अत: उत्तरी-पूर्वी भारत में रहने वाले इन लोगों को 'नगा' कहते हैं। नंगे रहने से 'नगा' शब्द का सम्बन्ध नहीं माना जाता, क्योंकि यह जनजाति पूर्णत: नंगी नहीं रहती।

स्वभाव

नागा लोग स्वाभाव से लड़ाकू होते हुए भी सरल और दिल के सच्चे होते हैं। वे सहनशील होते हैं, किंतु शत्रुता हो जाने पर जान के पीछे भी पड़ जाते हैं। एक बार मित्रता हो जाने पर पिछली शत्रुता भुलाकर सदा के लिए हितैषी और मित्र बन जाते हैं।

उत्पत्ति विवाद

हार्नबिल त्योहार मनाते हुए नागा

'नागा' लोगों की उत्पत्ति के बारे में विवाद पाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इन लोगों का सम्बन्ध 'इण्डी-मंगोलॉयड' प्रजाति से है, जो कि सम्पूर्ण पूर्वी सीमावर्ती भागों में पाई जाती है।

निवास क्षेत्र

नागा जाति नगालैण्ड में कोहिमा, मोकोकचुंग और तुएनसांग ज़िलों में तथा मणिपुर राज्य में पाई जाती है। इस प्रदेश में नंगा पहाड़ियाँ चार समानांतर श्रेणियों में फैली हैं, जो सभी उत्तर-पूर्वी दिशा में हैं, इनके नाम हैं- 'लंगवेंनकोंग', 'आसुकोंग', 'चांगीकोंग' और 'चावीकोंग'। इस क्षेत्र में नागा जनजाति का सबसे अधिक केन्द्रीकरण नंगा पर्वतों पर हुआ है।

शारीरिक गठन

इस जनजाति के लोगों की चमड़ी का रंग हल्के पीले से गहरा भूरा, चेहरा ललाई लिए हुए, बाल काले, घुंघराले, सीधे तथा लहरदार, आँखें गहरी भूरी, मंगोल आकृति की, गाल की हड्डियाँ उभरी हुईं, दाढ़ी और मूँछों के बाल कम, होंठ साधारणत: पतले, ठुड्डी अण्डाकार, सिर चौड़ा, शरीर से मध्यम आकार का, नाक चौड़ी से संकरी, नथुने चौड़े, शरीर का गठन सुन्दर तथा क़द मध्यम से लम्बा होता है। प्रजातीय दृष्टि से इनका सम्बन्ध इण्डो-मंगोलियन लोगों से माना जाता है।

भोजन

नागा जाति में कृषि उत्पादन आवश्यकतानुसार नहीं होता, अत: भोजन के आभाव को पूरा करने के लिए ये शिकार, कन्दमूल, फल, आदि से भोजन की भरपाई करते हैं। नागाओं का मुख्य भोजन चावल है, किंतु चावल, मांस, मछली और सब्जियों को नमक तथा मिर्ची के साथ अलग-अलग उबाला जाता है।
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चावल मिट्टी के बर्तनों में और बाँस की नलियों में पकाया जाता है। बिल्ली को छोड़कर सभी घरेलू पशुओं का ये लोग मांस खाते हैं। नागा लोगों में गाय, बैल, साँप, मेढक, मछली और कछुआ का मांस बड़ा स्वादिष्ट माना जाता है। नागा पुरुषों के लिए जिन पशुओं का मांस खाना निषिद्ध है, वे हैं- चीता, तेंदुआ, गिब्बन, जंगली कुत्ता, चमगमगादड़, गिलहरी, गिद्ध, उल्लू, कौआ, धारीदार बत्तख, आदि। नागा स्त्रियों के लिए इन पशुओं के अतिरिक्त हाथी, बकरी, गाय, भालू, कुत्ता, बन्दर, ऊँट, बाँस-चूहा, मेढक, श्वेत चीटियाँ, आदि का माँस खाना भी वर्जित है।

देवता

नागा लोग मुख्यत: तीन देवताओं को मानते हैं। स्वर्ग का स्वामी 'लुगं किनाजिंगबा', जो सभी प्रणियों के भाग्य का निर्धारण करता है और जो किसी को हानि नहीं पहुँचाता। 'लिजबा', पृथ्वी का स्वामी, जो पृथ्वी का जन्मदाता माना जाता है तथा जो वर्षा, तूफ़ान, जन्म, मृत्यु बीमारी और मानव कल्याण को नियंत्रित करता है। 'मोजूगं', जो मृतक की देखभाल करता है। इनके अतिरिक्त इनके और भी देवता होते हैं। सभी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए उत्सवों पर पशुओं की बलि चड़ाई जाती है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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