गोस्वामी  

गोस्वामी हिन्दू साधुओं तथा भिक्षुओं का एक सम्प्रदाय और जातिर्सज्ञक उपाधिवेशेष। 'गोस्वामी' संस्कृत के मूल शब्द 'गोस्वामिन्‌' से व्युत्पन्न है, इसके अन्य तद्भव रूप 'गुसाईं', 'गोसाईं', 'गोसामी' आदि हैं।

अर्थ

'गोस्वामी' का अर्थ है- 'जितेंद्रिय' अथवा 'गौओं'[1] का स्वामी। यह हिन्दू साधुओं तथा भिक्षुओं का एक संप्रदाय और जातिर्सज्ञक उपाधिविशेष। ये लोग उत्तर प्रदेश, बंगाल, मुम्बई, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दक्षिण भारत में पाए जाते हैं।[2]

वर्ग

संप्रदाय विशेष की दृष्टि से गोस्वामियों के दो वर्ग हैं-

  1. शैव गोस्वामी
  2. वैष्णव गोस्वामी

शैव गोस्वामी

शैव मतावलंबी गोस्वामी शंकराचार्य के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी बताए जाते हैं। उनके चार मुख्य शिष्यों से दस वर्गों अथवा दशनामियों की उत्पत्ति हुई। इसके दो प्रधान विभाग 'मठधारी' अथवा 'संन्यासी' और 'घरबारी' अथवा 'गृहस्थ' हैं। मठधारी शैव गोस्वामी वाराणसी, हरिद्वार आदि तीर्थ स्थानों में स्थित अपने अखाड़ों या मठों में निवास करते हैं। इनसे संबंधित एवं दीक्षित गृहस्थ व्यवसायी हैं, जो व्यापार के साथ अन्य धंधे भी करते और पारिवारिक जीवन व्यतीत करते हैं। इस संप्रदाय में निम्नतम वर्ग को छोड़ कर अन्य सभी वर्णों के बालक प्रवेश पाते हैं। वाराणसी आदि स्थानों में संप्रदाय की दीक्षा के लिये 'शिवरात्रि' के दिन विशेष पर्व और आयोजन होते हैं।[2]

वैष्णव गोस्वामी

वैष्णव गोस्वामी पद पूर्वी बंगाल तथा आसाम के वैष्णव प्रधानों के लिये भी प्रयुक्त होता है। इनमें भी 'मठधारी' और 'घरबारी' होते है। मुम्बई, उत्तर प्रदेश तथा बंगाल के गुसाईं अपनी रक्त की शुद्धता, प्रतिष्ठा और संप्रदाय की मूलधारा से अविच्छिन्नता के कारण उल्लेखनीय हैं। किंतु घुमक्कड़ जाति अथवा भिक्षुक रूप में निर्देशित गुसाईं, पथ भ्रष्ट भी हो गये थे। मध्य काल तथा परवर्ती काल में भी इन कृत्रिम गुसाइयों का आंतक देश के कई भागों में व्याप्त था। बाद में ये मराठों की सेना में ये भरती हुए। महादजी सिंधिया की सेवा में गुसाइयों की एक बड़ी संख्या नियुक्त थी।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. इंद्रियों, गोपियों
  2. 2.0 2.1 गोस्वामी (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 14 अप्रैल, 2015।

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