संथाल  

संथाल भारत की एक प्रमुख जनजाति है। इस जाति के लोग परिश्रमी, उदार विचारों वाले, कुशल कृषक और उत्तम आखेटक होते हैं। इनका जीवन अपने निकटवर्ती क्षेत्रों के लोगों से सदा संघर्ष का जीवन रहा है। संथाल जनजाति हिन्दू धर्म, ईसाई धर्म, बौद्ध धर्म, एवं आदि-धर्म को मानने वाली है।

निवास क्षेत्र

संथाल लोगों का निवास क्षेत्र बड़ा व्यापक है। यह झारखण्ड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में फैला हुआ है। झारखण्ड में ही इनका सबसे अधिक जमाव पाया जाता है, विशेषत: संथाल परगना, जो भागलपुर डिवीजन में है। इस संथाल बहुत प्रदेश के उत्तर में भागलपुर ज़िला हैं।

शारीरिक गठन

शारीरिक दृष्टि से संथाल जनजाति के लोग छोटे से मध्यम क़द के होते हैं। इनका रंग काला व गहरा भूरा, आँख की पुतलियाँ सामान्यत: सीधी एवं मध्यम आकर और काले रंग की, ललाट चौड़ा, बाल काले सीधे और कभी-कभी घुँघराले, शरीर व दाढ़ी-मूछों पर कम बाल और सिर लम्बा तथा नाक कुछ बैठी हुई, चेहरा बड़ा तथा होंठ मोटे होते हैं।

दैनिक प्रयोग के यंत्र

संथालों के घरों में प्राय: लकड़ी, पीतल या मिट्टी के बर्तन, जैसे- चारपाई, मटकियाँ, थालियाँ, दोने, चम्मच, कुछ डलियाँ, झाडू, बैठने की लकड़ी का तख्ता, ऊखल, धान कूटने की मशीन और खाना पकाने के बर्तन, आदि होते हैं। शिकार करने के लिए अथवा आक्रमण करने के लिए धनुष बाण, कुल्हाड़ी, फन्दे या जाल, भाले और ढाल, आदि शस्त्र होते हैं। ढोल, तुरही, बाँसुरी आदि इनके प्रमुख वाद्य यंत्र होते हैं। खेती के लिए हल, जूआ, पट्टा, कुदाली, खुरपी, दांतली तथा धान कूटने के लिए मूसल और ऊखल, धेंकी आदि व्यवहार में लाई जाती हैं।

भोजन

संथाल लोगों का मुख्य भोजन उबला हुआ चावल होता है। ये दिन में दो बार भोजन करते हैं। प्रात:काल के भोजन में रात को उबाले गए चावल, कुछ नमक, मिर्च और छोंकी गई सब्जियों का उपयोग करते हैं। रात्रि के भोजन में उबला चावल और कढी होती है। सुखाए गए तथा उबले चावल से केक बनाए जाते हैं, जिन्हें 'पीठा' कहते हैं। 'खपरा पीठा' चावल से बनाया जाता है तथा चावल और मांस से बनाया गया 'पीठा' 'जेल पीठा' कहलाता है। सूर्यताप में सुखाए गए चावलों से तैयार की गई शराब, 'हाँडी' या 'हण्डिया' तथा महुआ के फलों की शराब, जिसे 'पौद्रा' कहते हैं, उसका भी खूब उपयोग संथाली लोग करते हैं। ये लोग तम्बाकू खाते और हुक़्क़ा भी पीते हैं।

धर्म

संथाल लोग हिन्दुओं के देवी-देवता, शिव, दुर्गा आदि को भी मानने लगे हैं। संथाली धर्म में अनेक देवी-देवताओं और आत्माओं का पूजन किया जाता है। सबसे बड़ा देवता, जिसने सृष्टि की रचना की है, 'ठाकुर' को माना जाता है। यही देवता जीवन, वर्षा, फ़सलों और अन्य आवश्यक बातों पर नियंत्रण रखता है। इसकी अप्रसन्नता अकाल अथवा भीषण महामारियों के रूप में प्रदर्शित होती है। ठाकुर को ये लोग अनेक नामों से पुकारते हैं, कांडो, सिन-कांडो, कांडो बोंगा, सिन बोंगा, इन सभी को सूर्य देवता माना जाता है। अन्य देवता मानव लिए हितकारी होते हैं, जो वन, पहाडों, नदियों में निवास करते माने जाते हैं। ये सर्वशक्तिमान होते हैं। इनसे संथाल बड़े डरते हैं। इनको प्रसन्न करने के लिए पशुओं का बलिदान करते हैं, देवताओं की पूजा करते हैं। ऐसे देवता मोरांग-बारू, गोसाई-ईरा, परगना बोंगा, माँझी बोंगा, जोहरा-ईरा हैं।

अंध-विश्वासी

संथाल जाति के लोग जादू-टोने में भी अधिक विश्वास करते हैं। इसके लिए 'ओझा'जादू-टोने आदि का जानने वला का उपयोग किया जाता है। संथाल स्त्रियाँ, जो भूत-प्रेत आदि से ग्रसित होती हैं, उन्हें जादू द्वारा सुधारने का प्रयास किया जाता है। ओझा लोग मंत्रों द्वारा रोगों का भी इलाज करते सुने गए हैं। जड़ी-बूटियों का प्रयोग दवा के रूप में एवं मंत्रों से इलाज के साथ भी किया जाता है।


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