ब्रह्मास्त्र  

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ब्रह्मास्त्र एक दैवीय हथियार है, जो सदैव अचूक और इच्छित परिणाम देने वाला रहा है। रामायण और महाभारत काल में यह गिने चुने योद्धाओं के पास था। यह देवताओं और गन्धर्वों द्वारा प्रदत्त किया जाता है। रामायण काल में यह विभीषण और लक्ष्मण के पास था। द्रोणाचार्य को इसकी प्राप्ति राम जामदग्नेय से हुई थी। अर्जुन ने इसे द्रोण से पाया था। ऐसा भी कहा गया है कि उसे इन्द्र ने यह हथियार भेंट किया था। अपने शत्रुओं के विनाश के लिए अर्जुन, कृष्ण, कुवलाश्व, युधिष्ठिर, कर्ण, प्रद्युम्न आदि ने 'ब्रह्मास्त्र' का प्रयोग समय-समय पर किया था।[1]

मान्त्रिक-अस्त्र

ब्रह्मास्त्र अचूक और एक विकराल अस्त्र है। यह शत्रु का नाश करके ही छोड़ता है। इसका प्रतिकार दूसरे ब्रह्मास्त्र से ही हो सकता है, अन्यथा नहीं। ये वे आयुध हैं, जो मन्त्रों से चलाये जाते हैं। ये दैवी हैं। प्रत्येक शस्त्र पर भिन्न-भिन्न देव या देवी का अधिकार होता है और मन्त्र-तन्त्र के द्वारा उसका संचालन होता है। वस्तुत: इन्हें दिव्य तथा मान्त्रिक-अस्त्र कहते हैं।

प्रलयकारी अस्त्र

दो ब्रह्मास्त्रों के आपस में टकराने से प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इससे समस्त पृथ्वी के समाप्त होने का भय रहता है। यदि ऐसा हो जाये तो फिर से एक नई पृथ्वी तथा जीवधारियों की उत्पत्ति करनी पड़ेगी। महाभारत के युद्ध में ब्रह्मास्त्र का बड़ा ही रोचक वर्णन आया है, जो इस प्रकार से है-

'महाभारत का युद्ध अठारह दिन तक चलता रहा। अश्वत्थामा को जब दुर्योधन के अधर्म-पूर्वक किये गये वध के विषय में पता चला, तो वे क्रोध से अंधे हो गये। उन्होंने शिविर में सोते हुए समस्त पांचालों[2] को मार डाला। द्रौपदी को समाचार मिला तो उसने आमरण अनशन कर लिया और कहा कि वह अनशन तभी तोड़ेगी, जब कि अश्वत्थामा के मस्तक पर सदैव बनी रहने वाली मणि उसे प्राप्त होगी। कौरव-पांडवों के युद्ध में अश्वत्थामा ने अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था। शिव-प्रदत्त पाशुपत अस्त्र से अर्जुन ने ब्रह्मास्त्र का निवारण किया।[3] पांडवों को जड़-मूल से नष्ट करने के लिए अश्वत्थामा ने गर्भवती उत्तरा पर भी वार किया था। अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र छोड़ा, प्रत्युत्तर में अर्जुन ने भी छोड़ा। अश्वत्थामा ने पांडवों के नाश के लिए छोड़ा था और अर्जुन ने उसके ब्रह्मास्त्र को नष्ट करने के लिए। नारद तथा व्यास के कहने से अर्जुन ने अपने ब्रह्मास्त्र का उपसंहार कर दिया, किंतु अश्वत्थामा ने वापस लेने की सामर्थ्य की न्यूनता बताते हुए पांडव परिवार के गर्भों को नष्ट करने के लिए छोड़ा।

कृष्ण ने अश्वत्थामा से कहा- 'उत्तरा को परीक्षित नामक बालक के जन्म का वर प्राप्त है। उसका पुत्र होगा ही। यदि तेरे शस्त्र-प्रयोग के कारण मृत हुआ तो भी मैं उसे जीवनदान करूंगा। वह भूमि का सम्राट होगा और तू? नीच अश्वत्थामा! तू इतने वधों का पाप ढोता हुआ तीन हज़ार वर्ष तक निर्जन स्थानों में भटकेगा। तेरे शरीर से सदैव रक्त की दुर्गंध नि:सृत होती रहेगी। तू अनेक रोगों से पीड़ित रहेगा।' व्यास ने श्रीकृष्ण के वचनों का अनुमोदन किया। अश्वत्थामा ने कहा कि वह मनुष्यों में केवल व्यास मुनि के साथ रहना चाहता है। जन्म से ही अश्वत्थामा के मस्तक में एक अमूल्य मणि विद्यमान थी, जो कि उसे दैत्य, दानव, अस्त्र-शस्त्र, व्याधि, देवता, नाग आदि से निर्भय रखती थी। वही मणि द्रौपदी ने मांगी थी। व्यास तथा नारद के कहने से उसने वह मणि द्रौपदी के लिए दे दी।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. महाभारत, आदिपर्व, अध्याय 167, वनपर्व, अध्याय 19, 167, 170, 204, 280, उद्योगपर्व, अध्याय 184-185.
  2. द्रौपदी के पाँच पुत्र
  3. शिव पुराण, 7।52

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