उत्तर  

उत्तर राजा विराट का पुत्र था। इसकी बहन का नाम उत्तरा था जो अर्जुन के बेटे अभिमन्यु को ब्याही गई थी। पाण्डवों ने नाम बदल-बदलकर, अपने अज्ञातवास का समय राजा विराट के यहाँ बिताया था। वह समय जब पूरा हो रहा था तब 'सुशर्मा' ने राजा विराट के 'गोधन' को हरण करने के लिए छापा मारा। उससे युद्ध करने के लिए राजा विराट के अपनी सेना लेकर चले जाने पर दूसरी ओर से भी आक्रमण हो गया। उस समय रनिवास में उत्तर कुमार ने अपनी वीरता की बड़ी डींग हाँकी। उसने कहा कि यदि मैं सुयोग्य सारथि पा जाता तो अकेला होने पर भी शत्रु के छक्के छुड़ा देता। मेरे सदृश योद्धा पृथ्वी पर दूसरा नहीं है, इत्यादि।

बृहन्नला का सारथी बनना

उत्तर की आत्मश्लाघा सैरन्ध्री बनी हुई द्रौपदी को अच्छी न लगी। उसने बृहन्नला[1] को उत्तर का सारथ्य करने लिए राजी करके उत्तर से इसके लिए प्रस्ताव किया। उत्तर ने पहले तो कहा कि हिजड़े को युद्धभूमि में जाने का साहस नहीं हो सकता, किंतु सैरन्ध्री के बृहन्नला की प्रशंसा करने पर वह तैयार हो गया। राजकुमारी उत्तरा के कहने से बृहन्नला ने सारथि बनना स्वीकार कर लिया। उस समय उत्तर के दिये हुए कवच आदि को बृहन्नला ने यह दिखाने के लिए उलटा-पलटा पहनने का उपक्रम किया जिससे विदित हो कि उसके लिए यह काम बिलकुल नया है। यह देखकर उत्तरा और अंत:पुर की अन्य स्त्रियों के कौतुक का ठिकाना न रहा। इसके पश्चात् रथ के जोते जाने पर जब उत्तरा ने कहा कि भीष्म, द्रोण आदि महारथियों को परास्त करने पर उनके उत्तरीय वस्त्र लेते आना, मैं उन वस्त्रों की गुड़िया बनाऊँगी।

उत्तर का पलायन

नगरी से बाहर निकलकर उत्तर ने दूर से शत्रुसेना देखी तो उसके छक्के छूट गये। उसने गिड़गिड़ाकर बृहन्नला से कहा कि रथ को राजधानी में लौटा ले चलो। मैं युद्ध न कर सकूँगा। बृहन्नला के रोकने पर वह जब रथ से कूदकर भाग खड़ा हुआ तब बृहन्नला उसे पकड़ने को रथ खड़ा करके दौड़ा। उस समय बृहन्नला का केशपाश पीठ पर लटक रहा था, ओढ़नी अस्तव्यस्त हो रही थी और उसकी चाल स्त्रियों जैसी थी यह दृश्य देखकर कौरव सैनिक हँसी के मारे लोट-पोट हो गये। किसी-किसी को सन्देह हो गया कि यह बृहन्नला स्वयं अर्जुन है। अंत में बृहन्नला उत्तर को इस शर्त पर लौटा लाया कि वह रथ हाँके और बृहन्नला युद्ध करे।

विजय

रास्ते में शमी वृक्ष के ऊपर रखे हुए अपने धनुष-बाण और कवच आदि उत्तर से निकलवाकर बृहन्नला ने पहने और ऐसा घनघोर युद्ध किया कि कौरवों के छक्के छूट गये। शत्रुओं के बेहोश हो जाने पर बृहन्नला ने उत्तर से कह दिया कि अभी किसी को हमारा प्रकृत परिचय न देकर इस विजय को अपनी ही बतलाना। राजा विराट अपने कुमार का विजय-संवाद सुनकर फूले नहीं समाये। पर कंक नामधारी युधिष्ठिर ने जब इस कार्य को उत्तर कुमार का न माना तो राजा ने क्रुद्ध होकर उनके मुँह में पाँसे दे मारे। इससे कंक के मुँह से रक्त गिरने लगा। उस समय सैरन्ध्री ने लपककर उनके मुँह से गिरते हुए रक्त को एक बर्तन में ले लिया। यदि वह ऐसा न करती तो नया बखेड़ा खड़ा हो जाता।

पाण्डवों का पता चलना

अंत में, असल बात प्रकट होने पर विराट ने सभी पाण्डवों से क्षमा माँगी और उनके साथ रिश्तेदारी कर ली। बिना रिश्तेदारी कर ली। बिना रिश्तेदारी किये लोकलज्जा से उनकी रक्षा नहीं हो सकती थी। वीर पुरुषों को और विशाल वाहिनी को देखने से उत्तर का डरकर भाग खड़ा होना यह सूचित करता है कि उसने इससे पहले कभी समरभूमि में पैर नहीं रखा था। और यदि कोई छोटा-मोटा युद्ध देखा भी हो तो अभी उसका धड़का नहीं खुला था। रनिवास में जो उसने अपनी प्रशंसा आप की थी उसका एक कारण तो लड़कपन हो सकता है और दूसरा कारण है अपनी प्रशंसा के गीत सुना-सुनाकर स्वजनों को विस्मित कर देना। उस बेचारे को यह पता कब था कि नाचने-गाने का पेशा करने वाला बृहन्नला रथ हाँकने को तैयार हो जायगा और डींग मारने का फल हाथोंहाथ मिल जायगा।

वीरता

आगे चलकर जब कुरुक्षेत्र में महाभारत का युद्ध हुआ तब उत्तर कुमार ने किसी प्रकार की कायरता प्रकट नहीं की। उसने डटकर युद्ध किया और प्रख्यात योद्धा मद्रराज शल्य के साथ घमासान युद्ध करके पहले दिन के युद्ध में वीरगति प्राप्त की।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिजड़ा बने हुए अर्जुन ने अपना यही नाम रख लिया था

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