औरंगज़ेब तथा दक्कन के राज्य  

औरंगज़ेब तथा दक्कन के राज्य (1658-87)

दक्कन राज्यों के साथ मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के सम्बन्धों को तीन चरणों में विभक्त किया जा सकता है। 'पहला चरण' 1668 ई. तक था, जिसके दौरान मुग़लों का प्रमुख लक्ष्य अहमदनगर राज्य के उन क्षेत्रों को भी बीजापुर से वापस लेना था, जो 1636 ई. की संधि के अंतर्गत बीजापुर को मिल गये थे। 'दूसरा चरण' 1684 ई. तक चला, जिसके दौरान दक्कन में सबसे अधिक ख़तरा मराठों को समझा गया और मुग़लों ने शिवाजी तथा उसके पुत्र शम्भाजी के ख़िलाफ़ बीजापुर तथा गोलकुण्डा को अपने पक्ष में मिलाने के प्रयास किये। साथ ही मुग़लों ने दक्कन के राज्यों के क्षेत्रों पर भी हमले शुरू किये और उन्हें पूरी तरह मुग़लों के अधीन लाने का प्रयत्न किया। 'अंतिम चरण' उस समय शुरू हुआ जब मराठों के ख़िलाफ़ बीजापुर तथा गोलकुण्डा का सहयोग हासिल करने से निराश होकर औरंगज़ेब ने बीजापुर तथा गोलकुण्डा को ही पूरी तरह अपने क़ब्ज़े में करने का निश्चय किया।

प्रथम चरण (1658-1668 ई.)

1636 की संधि के अंतर्गत मराठों के ख़िलाफ़ बीजापुर तथा गोलकुण्डा के समर्थन को प्राप्त करने के लिए शाहजहाँ ने रिश्वत के रूप में अहमदनगर राज्य के एक तिहाई क्षेत्र को उन्हें देने के अलावा यह वचन दिया था कि वह कभी भी बीजापुर तथा गोलकुण्डा पर क़ब्ज़ा नहीं करेगा। लेकिन इस नीति का शाहजहाँ ने स्वयं ही त्याग कर दिया। 1657-58 में गोलकुण्डा तथा बीजापुर के राज्यों को मिटा देने की धमकी दी गई। गोलकुण्डा को बहुत बड़ा हर्जाना देना पड़ा तथा बीजापुर को 1636 में मिले निज़ामशाही क्षेत्रों को समर्पित करना पड़ा। मुग़लों ने इस कार्य को इस आधार पर उचित ठहराया कि बीजापुर तथा गोलकुण्डा ने कर्नाटक के विस्तृत क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा कर लिया था और वे इसके लिए मुग़लों को हर्जाना देने पर इसलिए बाध्य थे, क्योंकि ये दोनों राज्य मुग़लों के अधीन थे तथा उनकी विजय मुग़लों की तटस्थता के कारण ही सम्भव हो सकी थी। इसके अलावा दक्कन में मुग़ल सेना का खर्चा बहुत अधिक था और दक्कन के राज्यों से प्राप्त राशि इसके लिए पूरी नहीं पड़ती थी। बहुत समय तक यह खर्चा मालवा तथा गुजरात के ख़ज़ाने की राशि से पूरा किया जाता रहा।

औरंगज़ेब की आंशिक सफलता

दक्कन में सीमित रूप से आगे बढ़ने की मुग़लों की नीति के दूरगामी प्रभाव पड़े, जिसे न तो शाहजहाँ और न ही औरंगज़ेब उस समय पूरी तरह समझ सके। इस नीति के कारण हमेशा के लिए मुग़लों की संधियाँ तथा उनके वायदों के प्रति अविश्वास हो गया और इसके कारण मुग़ल, मराठों के विरुद्ध अन्य शक्तियों को संगठित नहीं कर सके। औरंगज़ेब ने 25 वर्षों तक इस नीति की सफलता के लिए प्रयास किए, लेकिन उसे विशेष सफलता नहीं मिली।

दक्कन की समस्याएँ

औरंगज़ेब के सम्राट बनने के समय दक्कन में कई समस्याएँ उसके सामने सिर उठाये खड़ी थीं। इनमें से दो समस्याएँ बहुत ही महत्त्वपूर्ण थीं-

  1. मराठा छत्रपति शिवाजी की बढ़ती हुई शक्ति
  2. बीजापुर को इस बात के लिए राज़ी करना कि वह 1636 की संधि के अंतर्गत प्राप्त क्षेत्रों को मुग़लों को वापस कर दे।

1657 में कल्याणी तथा बीदर को वापस ले लिया गया। 1660 में रिश्वत देकर परंदा भी हासिल कर लिया गया। लेकिन शोलापुर अभी भी बचा था। औरंगज़ेब ने यह आशा की थी कि इन प्रतिकूल परिस्थितियों से बाध्य होकर आदिलशाह शिवाजी के विरुद्ध मुग़लों के अभियान में सहर्ष ही साथ देगा। पर यह आशा ग़लत साबित हुई। 1636 में शिवाजी के विरुद्ध आदिलशाह का समर्थन प्राप्त करने के लिए शाहजहाँ ने उसे बहुत बड़ी रिश्वत दी थी। औरंगज़ेब आदिलशाह को 1636 में प्राप्त क्षेत्रों के अलावा और कुछ दे भी नहीं सकता था। इसके विपरीत औरंगज़ेब ने आदिलशाह द्वारा अपनाये गये असहयोग के रवैये से क्रोधित होकर शिवाजी तथा आदिलशाह दोनों को सबक़ सिखाने के लिए राजा जयसिंह को दक्कन भेज दिया।

इससे स्पष्ट है कि औरंगज़ेब को मुग़ल सेना की शक्ति तथा अपने विरोधियों की कमज़ोरी पर पूरा भरोसा था। लेकिन जयसिंह बहुत कुशल कूटनीतिज्ञ था। उसने औरंगज़ेब से कहा "इन दोनों मूर्खों पर एक साथ हमला करना मेरी नासमझी होगी।" उस समय जयसिंह ही अकेला मुग़ल राजनीतिज्ञ था, जिसने दक्कन में पूरी तरह आगे बढ़ने की नीति का समर्थन किया। जयसिंह का विश्वास था कि दक्कन में बिना पूर्ण आक्रामक नीति के मराठों की समस्या नहीं सुलझाई जा सकती। औरंगज़ेब इसी निष्कर्ष पर बीस वर्ष बाद पहुँचा।

जयसिंह की असफलता तथा मृत्यु

बीजापुर के विरुद्ध अभियान की तैयारी करते समय जयसिंह ने औरंगज़ेब को लिखा था- "बीजापुर विजय सारे दक्कन तथा कर्नाटक के विजय की भूमिका है।" लेकिन औरंगज़ेब इतना साहसपूर्ण क़दम उठाने से हिचकिचा रहा था। उसके कारणों का केवल अंदाज़ा लगाया जा सकता हैं। उस समय उत्तर पश्चिम में ईरान के शासक का ख़तरा बना हुआ था। उधर दक्कन का अभियान बड़ा लम्बा तथा कठिन होता और वहाँ सम्राट को स्वयं रहना पड़ता, क्योंकि इतनी बड़ी सेना किसी सरदार या किसी राजकुमार के नेतृत्व में नहीं छोड़ी जा सकती थी। महत्वाकांक्षी शाहजहाँ ने इस बात को अनुभव किया था और इसलिए जब तक शाहजहाँ जीवित था, औरंगज़ेब किसी दूर के अभियान पर कैसे जा सकता था।

सीमित साधनों के कारण जयसिंह के बीजापुर अभियान (1665) को असफल होना ही था। इस अभियान के कारण दक्कन के राज्य मुग़लों के ख़िलाफ़ संगठित हो गये और क़ुतुबशाह ने बीजापुर की सहायता के लिए एक बड़ी सेना भेजी। दक्कन के राज्यों ने छापामार नीति अपनाई। उन्होंने जयसिंह को बीजापुर के दूर-दराज़ क्षेत्रों में आक्रमण करने दिया, ताकि मुग़लों को वहाँ बाद में कोई रसद प्राप्त न हो सके। जब जयसिंह को महसूस हुआ कि वह शहर पर हमला नहीं कर सकता था, क्योंकि वह अपने साथ बड़ी तोपों को नहीं लाया था और शहर की घेराबंदी असम्भव थी। पीछे लौटना भी उसे बड़ा मंहगा पड़ा। जयसिंह के इस अभियान से मुग़लों को न तो धन और न ही किसी क्षेत्र की प्राप्ति हो सकी। इस निराशा तथा औरंगज़ेब की नाराज़गी के कारण ही जयसिंह की 1667 ई. अकाल मृत्यु हो गई। इसके अगले वर्ष 1668 में मुग़लों ने रिश्वत देकर शोलापुर को हासिल कर लिया और इस प्रकार प्रथम चरण समाप्त हुआ।

दूसरा चरण (1668-1681 ई.)

1668 तथा 1676 के बीच मुग़ल चुपचाप दक्कन की स्थिति को भाँपते रहे। इस अवधि में गोलकुण्डा में 'मदन्ना' तथा 'अखन्ना' के शक्तिशाली होने से दक्कन की राजनीति में एक नया तत्व पैदा हो गया था। ये दोनों योग्य भाई 1672 से लेकर 1687 में इस राज्य की समाप्ति तक, वहाँ के राजा जितने शक्तिशाली बने रहे। इन भाइयों ने गोलकुण्डा, बीजापुर तथा शिवाजी को साथ मिलाकर एक त्रिगुटीय शक्ति स्थापित करने का प्रयत्न किया। यह नीति बीजापुर के दरबार के आंतरिक झगड़ों तथा शिवाजी की असीम महत्वाकांक्षा के कारण सफल नहीं हो सकी। बीजापुर के विभिन्न वर्गों से यह आशा भी नहीं की जा सकती थी कि वे एक स्थिर नीति पर क़ायम रहें। अपने तत्कालिक हितों के अनुसार वे कभी तो मुग़लों का साथ देते और कभी उनके ख़िलाफ़ हो जाते थे। शिवाजी भी कभी बीजापुर को लूटता तो कभी मुग़लों के विरुद्ध संघर्ष में उसका साथ देता। यद्यपि औरंगज़ेब दक्कन में मराठों की बढ़ती शक्ति से चिन्तित था, फिर भी वह दक्कन में मुग़ल विस्तार पर रोक लगाना चाहता था। इसलिए उसने कई बार बीजापुर की गद्दी पर ऐसे शासक को बैठाने के प्रयास किए, जो शिवाजी के विरुद्ध मुग़लों का साथ दे और गोलकुण्डा से प्रभावित न हो।

इस नीति के अंतर्गत मुग़लों ने बीजापुर में कई बार हस्तक्षेप किया। पहली बार उन्होंने 1676 में हस्तक्षेप किया, जब वहाँ के प्रतिशासक ख़वास ख़ाँ को जिसने रिश्वत लेकर शिवाजी के ख़िलाफ़ मुग़लों का साथ देने का वचन दिया था, उखाड़ फैंका गया। मुग़लों ने ख़वास ख़ाँ को अपने अफ़ग़ान प्रतिद्वन्द्वियों को समाप्त करने के लिए मदद दी। लेकिन इस प्रयास में मुग़लों को बीजापुर तथा गोलकुण्डा की संगठित शक्ति का सामना करना पड़ा। यद्यपि मुग़लों ने रिश्वत का रास्ता अपनाकर नालदुर्ग तथा गुलवर्ग को हासिल कर लिया, वे मराठों के विरोधी तथा अपने पक्ष के किसी शासक को गद्दी पर बैठाने के मूल लक्ष्य को पूरा नहीं कर सके।

औरंगज़ेब की नीति

अब औरंगज़ेब ने एक नया तरीक़ा अपनाया। उसने मुग़ल प्रशासक बहादुर ख़ाँ को वापस बुलाकर उसकी जगह ऐसे अफ़ग़ान सरदार और सैनिक दिलेर ख़ाँ को भेजा, जिसके बीजापुर के अफ़ग़ानों के साथ बड़े अच्छे सम्बन्ध थे। दिलेर ख़ाँ ने अफ़ग़ान नेता बहलोल ख़ाँ पर गोलकुण्डा के ख़िलाफ़ मुग़ल अभियान में साथ देने के लिए ज़ोर डाला। गोलकुण्डा के शासक ने अपनी राजधानी में शिवाजी का खुले दिल से स्वागत किया था, क्योंकि वहाँ वास्तविक शक्ति मदन्ना तथा अखन्ना के हाथों में थी। इन्हीं भाइयों के कारण मुग़लों तथा बीजापुर का मिलाजुला अभियान 1677 में असफल हो गया। बीजापुर के अफ़ग़ान अब मुसीबत में पड़ गये और उन्हें आदिलशाही सम्राज्य को बचाने के लिए क़ुतुबशाह की सहायता माँगनी पड़ी। क़ुतुबशाह ने सहायता के बदले कुछ शर्तें रखीं, जिन्हें अफ़ग़ानों को मानना पड़ा। इनके अनुसार दक्कनी गुट के नेता सीदी मसूद को प्रतिशासक बनाया गया तथा यह निश्चय हुआ कि सीदी मसूद को अफ़ग़ान सैनिकों का वेतन चुकाने और उसके बाद उन्हें बर्ख़ास्त करने के लिए छः लाख रुपये दिये जाएँगे और बीजापुरी प्रशासन के कामकाज में गोलकुण्डा से एक सलाहकार भेजा जाएगा। इस सलाहकार पद पर अखन्ना को नियुक्त किया गया। बीजापुर तथा दक्कन की राजनीति में हैदराबाद के प्रभाव का यह चर्मोत्कर्ष था।

शिवाजी का समझौते से अलग रहना

कुछ समय तक शिवाजी इस समझौते से अलग रहे। उन्होंने अपने कर्नाटक के अभियान के दौरान लूटी गई सम्पत्ति का हिस्सा क़ुतुबशाह को देने से इंकार कर उसका क्रोध मोल ले लिया था। अब इस बात पर समझौता हुआ कि शिवाजी अपनी गतिविधियों को कोंकण तक ही सीमित रखेंगे। इस सारी स्थिति में सबसे अधिक अनिश्चयता शिवाजी के कारण ही बनी थी, जो अपनी भूमिका अकेले ही निभाना चाहते थे। कर्नाटक से लौटकर उन्होंने हिंसा की नीति जारी रखी और बीजापुर को अपने पक्ष में करने का षड़यंत्र रचा। सीदी मसूद ने शिवाजी को लिखा "हम पड़ोसी हैं। हम एक ही नमक खाते हैं। राज्य के कल्याण में आपकी और हमारी समान दिलचस्पी है। हमारा दुश्मन[1] हमें तबाह करने के लिए दिन-रात प्रयत्न कर रहा है। हम दोनों को साथ मिलकर विदेशियों को निकाल देना चाहिए।"

मसूद मुग़ल सरदार दिलेर ख़ाँ से भी मिला। शान्ति प्रयास के रूप में आदिलशाह ने अपनी बहन, जिसकी बहुत प्रतिष्ठा थी, की शादी औरंगज़ेब के पुत्र से करने का वायदा किया। मसूद ने औरंगज़ेब की आज्ञा-पालन तथा शिवाजी का साथ न देने का भी वचन दिया। लेकिन इसी बीच मसूद तथा शिवाजी के बीच चल रही बातचीत की ख़बर मुग़लों के कानों तक पहुँच गई और उन्होंने 1679 में बीजापुर पर आक्रमण करने का निश्चय किया।

मुग़ल राजनीतिक तथा सैनिक प्रयास

इस प्रकार मुग़लों के राजनीतिक तथा सैनिक प्रयासों का परिणाम यही हुआ कि उन्होंने अपने ख़िलाफ़ तीनों दक्कनी शक्तियों को संगठित हो जाने का अवसर दिया। बीजापुर को क़ब्ज़े में करने का दिलेर ख़ाँ का आख़िरी प्रयास (1579-1580 ई.) भी असफल रहा। क्योंकि किसी भी मुग़ल प्रशासक के पास ऐसे साधन नहीं थे, जिससे वह दक्कन के राज्यों की संगठित शक्ति का मुक़ाबला कर सकता। इसके अलावा इस संघर्ष में कर्नाटक के पैदल सैनिकों ने भी बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। बीजापुर पर डाले गये मुग़ल घेरे को उठाने के लिए विराद के शासक प्रेम नाइक ने 30,000 सैनिक भेजे। शिवाजी ने भी बीजापुर की सहायता के लिए एक बड़ी सेना भेजी तथा चारों तरफ़ मुग़लों के क्षेत्रों पर आक्रमण आरम्भ कर दिया। इस प्रकार दिलेर ख़ाँ के हाथों कुछ न लगा। इसके विपरीत मुग़ल क्षेत्र मराठों के आक्रमणों के लिए खुल गए। औरंगज़ेब ने दिलेर ख़ाँ को भी वापस बुला लिया।

1676 और 1680 के बीच दक्कन में मुग़लों को कोई विशेष सफलता हासिल नहीं हुई। अपने विद्रोही पुत्र राजकुमार अकबर का पीछा करते हुए औरंगज़ेब 1681 में जब दक्कन पहुँचा, तब उसने अपनी सारी शक्ति शिवाजी के लड़के तथा उत्तराधिकारी शम्भाजी के ख़िलाफ़ लगा दी। बीजापुर तथा गोलकुण्डा को मराठों का साथ छोड़ देने पर राज़ी करने के प्रयास किए गए। लेकिन उसके प्रयासों का भी वही फल हुआ, जो पहले के मुग़ल सरदारों की चेष्टाओं का हुआ था। मुग़ल के ख़िलाफ़ मराठे ढाल के समान थे और दक्कन के राज्य यह नहीं चाहते थे कि उनकी यह सुरक्षा समाप्त हो जाए।

औरंगज़ेब की ठोस कार्रवाई

अब औरंगज़ेब ने ठोस क़दम उठाने का निश्चय किया। उसने आदिलशाह को अपने अधीन राजा होने के कारण आदेश दिया कि वह मुग़ल सेना को रसद दे, मुक्त-रूप से अपने क्षेत्र से होकर गुज़रने दे तथा मराठों के ख़िलाफ़ संघर्ष के लिए 5000 से 6000 घुड़सवार दे। उसने मुग़लों का विरोध करने वाले प्रमुख बीजापुरी सरदार शरज़ाख़ाँ को भी बर्खास्त करने की माँग की। इससे आदिलशाह और मुग़लों के बीच का मतभेद उभर कर सामने आना ही था। आदिलशाह ने गोलकुण्डा तथा शम्भाजी दोनों से सहायता का अनुरोध किया और उसे यह सहायता तुरन्त प्राप्त हुई। लेकिन इसके बावजूद दक्कन राज्यों की यह संगठित सेना भी मुग़ल सेना की शक्ति का मुक़ाबला नहीं कर सकी और विशेषकर जब, जैसा कि पहले भी हुआ था, इसका नेतृत्व स्वयं मुग़ल सम्राट अथवा एक उत्साही राजकुमार के हाथों में हो। इसके बावजूद मुग़लों को अठारह महीनों तक घेरा डाल कर रहना पड़ा। इसके अंतिम चरणों में सेना का नेतृत्व औरंगज़ेब ने स्वयं अपने हाथों में ले लिया। अंत में 1686 में बीजापुर को हार माननी पड़ी। जिस कठिनाई से यह अभियान सफल हुआ, उससे पहले के जयसिंह (1665) तथा दिलेर ख़ाँ (1679-80) के अभियानों की असफलता की बात समझ में आती है।

मुग़लों का गोलकुण्डा पर अधिकार

बीजापुर के पतन के बाद गोलकुण्डा पर मुग़लों का आक्रमण निश्चित था। क़ुतुबशाह के इतने पाप थे कि क्षमा नहीं किए जा सकते थे। उसने ग़ैर-मुसलमानों, मदन्ना तथा अख़न्ना के हाथों में इतनी शक्ति दे दी थी तथा अनेक अवसरों पर शिवाजी का साथ दिया था। विश्वासघात का उसका अन्तिम कार्य औरंगज़ेब की चेतावनी के बावजूद बीजापुर की सहायता के लिए चालीस हज़ार सैनिक भेजना था। 1685 में कड़े मुक़ाबले के बाद मुग़ल गोलकुण्डा पर क़ब्ज़ा करने में सफल हो गए। सम्राट ने बहुत हर्जाने, कुछ क्षेत्रों तथा मदन्ना और अख़न्ना की बर्ख़ास्तगी के बदले क़ुतुबशाह को क्षमा प्रदान करना स्वीकार किया। क़ुतुबशाह भी इस बात पर राज़ी हो गया। मदन्ना और अख़न्ना को घसीटकर सड़क पर लाया गया और 1686 ई. में उनकी हत्या कर दी गई। लेकिन यह अपराध भी क़ुतुबशाही राज्य को नहीं बचा सका। बीजापुर के पतन के बाद औरंगज़ेब ने क़ुतुबशाह को दंड देने का निश्चय किया। 1687 में उसने अपना अभियान आरम्भ किया और छः महीनों के बाद रिश्वत तथा धोखाधड़ी से क़िले पर क़ब्ज़ा करने में सफल रहा।

औरंगज़ेब विजयी तो हो गया था, लेकिन उसे जल्दी ही पता चल गया कि बीजापुर तथा गोलकुण्डा का पतन उसकी कठिनाइयों की शुरुआत ही थी। अब औरंगज़ेब के जीवन का आख़िरी और सबसे कठिन चरण आरम्भ हुआ।

अन्तिम चरण (1687-1707 ई.)

बीजापुर तथा गोलकुण्डा के पतन के बाद औरंगज़ेब ने अपनी सारी शक्ति मराठों के ख़िलाफ़ लगा दी। बुरहानपुर तथा औरंगाबाद पर आक्रमणों के अलावा नये मराठा शासक शम्भाजी ने औरंगज़ेब के विद्रोही पुत्र राजकुमार अकबर को शरण देकर औरंगज़ेब को एक बड़ी चुनौती दी। औरंगज़ेब को इस बात का अत्यन्त भय था कि मराठों के समर्थन का बल पाकर मुग़ल क्षेत्रों में राजकुमार अकबर के आक्रमणों से एक लम्बा गृहयृद्ध शुरू हो जाएगा। लेकिन उधर शम्भाजी ने राजकुमार अकबर को पूरा समर्थन न देकर अपनी शक्ति पुर्तग़ालियों तथा सिदियों के ख़िलाफ़ व्यर्थ की लड़ाई में लगा दी। इससे राजकुमार अकबर का क्षुब्ध होना स्वाभाविक था। जब औरंगज़ेब बीजापुर तथा गोलकुण्डा के ख़िलाफ़ संघर्षों में व्यस्त था, उस समय भी शम्भाजी ने राजकुमार अकबर को बड़ी मात्रा में सहायता देना अस्वीकार कर दिया। इसी कारण 1686 में मुग़ल क्षेत्रों पर राजकुमार अकबर के आक्रमणों को आसानी से असफल किया जा सका था। निराश होकर राजकुमार अकबर समुद्र के रास्ते भागकर ईरान चला गया। जहाँ उसने ईरान के राजा से पनाह माँगी।

शम्भाजी की हत्या

बीजापुर तथा गोलकुण्डा के पतन के बाद भी शम्भाजी अपने व्यसनों में तथा अपने आंतरिक प्रतिद्वन्द्वियों से निपटने में व्यस्त रहा। 1689 में अपने गुप्त अड्डे, संगेश्वर में एकाएक मुग़लों के आक्रमण से शम्भाजी अचंभित रह गया। उसे औरंगज़ेब के सामने लाया गया और विद्रोही तथा क़ाफ़िर ठहरा कर उसकी हत्या कर दी गई। यह औरंगज़ेब की निस्संदेह एक और बड़ी राजनीतिक ग़लती थी। मराठों से समझौता करके औरंगज़ेब बीजापुर तथा गोलकुण्डा पर अपनी विजय को पक्का कर सकता था। शम्भाजी की हत्या कर न केवल उसने इसका मौक़ा गंवा दिया, बल्कि मराठों को अपना संघर्ष और तेज करने का बहाना दे दिया। किसी एक शक्तिशाली नेता के अभाव में मराठा सरदारों ने खुलेआम मुग़ल क्षेत्रों में लूटपाट आरम्भ कर दी। मुग़ल सेना को देखते ही वे इधर-उधर छिप जाते थे। मराठों को समाप्त करने के बदले औरंगज़ेब ने इन्हें सारे दक्कन में अपनी गतिविधियों को बढ़ाने का अवसर दिया। शम्भाजी के छोटे भाई राजाराम का राज्याभिषेक तो हुआ, लेकिन राजधानी पर मुग़लों का आक्रमण होता देख वह वहाँ से भाग निकला। राजाराम ने भागकर पूर्वी तट पर जिंजी में शरण ली और वहाँ से मुग़लों के ख़िलाफ़ अपने संघर्ष को जारी रखा। इस प्रकार मराठों का विद्रोह पश्चिम से लेकर पूर्वी तट तक फैल गया।

मुग़ल शक्ति का चरमोत्कर्ष

कुछ समय तक औरंगज़ेब ने अपने सारे शत्रुओं को समाप्त कर मुग़ल शक्ति को शिखर पर पहुँच दिया था। उसके कुछ सरदार इस राय के थे कि उत्तर भारत लौट जाना चाहिए और मराठों के ख़िलाफ़ संघर्ष का काम दूसरों पर छोड़ देना चाहिए। इसके अलावा ऐसा लगता है कि एक और पक्ष भी था, जिसे युवराज शाहआलम का समर्थन प्राप्त था और जिसकी राय थी कि कर्नाटक का राज्य बीजापुर तथा गोलकुण्डा के अधीनस्थ शासकों पर छोड़ दिया जाना चाहिए। औरंगज़ेब ने इन सभी प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया। यहाँ तक की दक्कन के शासकों से बातचीत करने के लिए शाहआलम को बंदी बना लिया। उसका विश्वास था कि वह मराठों की शक्ति को कुचलने में सफल हो गया है। इस प्रकार 1690 के बाद औरंगज़ेब ने कर्नाटक के विशाल तथा समृद्ध क्षेत्र को भी अपने क़ब्ज़े में करने पर ध्यान दिया। लेकिन यह औरंगज़ेब के बस के बाहर की बात थी। उसने बीजापुर तथा गोलकुण्डा के राज्यों में स्थिर प्रशासन क़ायम करने के बदले दूर-दूर तक आक्रमण किए, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में सम्पर्क साधन दूर-दूर तक फैल गए, जिनकी रक्षा करना कठिन था और जिन पर मराठों ने हमले करने शुरू कर दिए।

मराठों का संघर्ष

1690-1703 के बीच औरंगज़ेब मराठों से समझौता न करने की अपनी ज़िद पर अड़ा रहा। उसने जिंजी में राजाराम पर घेरा डाल दिया, जो बहुत दिनों तक चला। 1698 में जिंजी का पतन हुआ, लेकिन राजाराम वहाँ से निकल भागने में सफल हो गया। इधर मराठों का संघर्ष और तेज़ हो गया और इससे कई अवसरों पर मुग़लों को बड़ी हानि उठानी पड़ी। मराठों ने कई क़िलों को वापस ले लिया और राजाराम भी सतारा लौटने में सफल हुआ। इन पराजयों से औरंगज़ेब हतोत्साहित नहीं हुआ। उसने सभी मराठों के क़िलों पर पुनः क़ब्ज़ा करने की ठानी। 1700 से 1705 के साढ़े पाँच वर्षों तक औरंगज़ेब अपने रुग्ण शरीर को एक क़िले से दूसरे क़िले तक ढोता रहा। बाढ़, महामारी तथा मराठों के छापामारों ने मुग़ल सेना को तबाह कर डाला। अनेक सैनिक मारे गये। सैनिकों तथा सरदारों के बीच असंतोष तथा उनकी थकावट बढ़ती गई। उनका साहस भी धीरे-धीरे खत्म होता गया। यहाँ तक की कई ज़ागीरदारों ने मराठों के साथ गुप्त समझौते कर उन्हें चौथ देना स्वीकार कर लिया, ताकि मराठे उनकी ज़ागीरों को शान्ति से रहने दें।

मराठों तथा औरंगज़ेब में बातचीत

आखिरकार 1703 में औरंगज़ेब ने मराठों के साथ बातचीत शुरू की। वह शम्भाजी के पुत्र साहू को रिहा करने पर सहमत हो गया, जो सतारा में अपनी माँ के साथ बंदी बना लिया गया था। साहू के साथ अच्छा बर्ताव किया गया। उसे राजा की पदवी तथा 7,000 का मनसब प्रदान किया गया था। बड़ा होने पर उसकी शादी प्रतिष्ठित मराठे परिवारों की दो लड़कियों के साथ की गई थी। औरंगज़ेब साहू को शिवाजी का स्वराज्य तथा दक्कन में 'सरदेशमुखी' का अधिकार देकर उसकी विशेष हैसियत को मान्यता प्रदान करने के लिए तैयार था। साहू का स्वागत करने के लिए 70 से अधिक मराठे सरदार इकट्ठे हुए। लेकिन औरंगज़ेब ने अंतिम क्षण में मराठों के उद्देश्यों के प्रति आशंकित होकर इन सभी तैयारियों को रद्द कर दिया।[2]

औरंगज़ेब की मृत्यु

1706 में औरंगज़ेब को विश्वास हो गया कि मराठों के सभी क़िलों पर क़ब्ज़ा करना उसके बस की बात नहीं है। उसने धीरे-धीरे औरंगाबाद की ओर लौटना शुरू किया पर रास्ते में मराठों के आक्रमण बराबर उस पर होते रहे। इस प्रकार 1707 में औरंगाबाद में औरंगज़ेब ने आख़िरी साँस ली। लेकिन इस समय तक वह अपने पीछे एक ऐसा साम्राज्य छोड़ गया, जो क्षीण पड़ गया था और जिसमें तरह-तरह की आंतरिक समस्याएँ उभर कर सामने आ रहीं थीं।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अर्थात् मुग़ल
  2. कहा जाता है कि औरंगज़ेब ने साहू को इस शर्त पर राज लौटाना स्वीकार किया था कि वह मुसलमान हो जाएगा, लेकिन तात्कालिक वृत्तान्त इस बात का समर्थन नहीं करते। अगर औरंगज़ेब साहू को मुसलमान बनाना चाहता था तो यह वह उस समय कर सकता था, जब साहू 13 वर्षों तक उसका बंदी रहा था।

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