महामुद्रा  

महामुद्रा बौद्ध धर्म के साधकों द्वारा की जाने वाली एक कठिन साधना है। बौद्ध तंत्रों में मण्डलचक्र और मुद्रा-मैथुन में स्त्रियों का उपभोग आवश्यक अनुष्ठान माना जाता था, यद्यपि वे इस साधना को भौतिक रूप में ग्रहण नहीं करते थे।

सिद्धों द्वारा परिकल्पित

'मुद्रा', अर्थात् 'मोद देने वाली'। इस व्याख्या से मुद्रा को नारी रूप में कल्पित किया गया। सिद्धों ने भगवती नैरात्मा को महामुद्रा के रूप में परिकल्पित किया। महामुद्रा की साधना सबसे कठिन साधना मानी जाती थी। इस साधना में निष्णात होने के उपरांत ही साधक की गणना सिद्धाचार्यों में होती थी। अपनी समकक्ष किसी योगिनी को महामुद्रा रूप में वरण कर साधक गुरु के पास जाता है। वहाँ उसे अभिषिक्त किया जाता है, फिर साधक महामुद्रा के साथ मण्डल-चक्र में प्रवेश करता है। 'गुह्यसमाजतंत्र' के अनुसार नारी महामुद्रा के तन में भी पंच तथागतों का वास है, अत: उसकी साधना कर लेने वाला फिर समस्त बाह्य अनुष्ठानों से मुक्त हो जाता है।[1]

रूप और भाग

महामुद्रा को अन्य अनेक रूप और भागों में भी बाँटा गया है। सिद्धों के काल में नायिका-भेद भी महामुद्रा के अन्य रूपों के आधार पर किया गया है, यद्यपि इस विभाजन अथवा विभिन्न नामों के पीछे काव्यशास्त्र की कोई परम्परा न होकर हठयोग तथा मुद्रा-मैथुन सम्बंधी गुह्य संकेत ही हैं। इन अन्य नायिकाओं में से डोम्बी में अद्वैतभाव प्रधान रहता है। क्योंकि यह ज्ञान से सम्बद्ध है, इस कारण नैरात्मा प्रज्ञा को भी डोम्बी कहते हैं। डोम्बी को वायुतत्त्व से संलग्न माना जाता है, जो प्राण तथा अपान वायु के निरोध से सम्बद्ध है। डोम्बी परिशुद्धावती है, इसके नायक को 'कापालिक' कहते हैं। मणिमूल में सम्पुटीकरण के उपरांत चण्डाग्नि प्रज्वलित कर साधक अवधूतिका के द्वारा उसे ऊपर की और प्रवाहित करता है। इसी चण्डाग्नि को ग्रहण करने के कारण अवधूतिका को 'चाण्डाली' कहा जाता है। महामुद्रा नैरात्मा को इस प्रतीक के द्वारा प्राय: प्रकट किया गया है। चाण्डाली सारे चक्रों को पार कर ललाट स्थित कमलचक्र तक पहुँचकर आनन्द उत्पन्न कर पुन: नाभिचक्र में वापस आ जाती है। यही चाण्डाली अपनी ऊर्ध्व गति में डोम्बी और उष्णीष कमल में पहुँचने पर सहज-सुन्दरी कहलाती है।

गृहिणी रूप में वर्णन

काण्हपा तो प्रज्ञा-महामुद्रा को गृहिणी रूप में भी वर्णित करते हैं और स्पष्ट कहते हैं कि-

"जैसे नमक पानी में धुल जाता है, उसी प्रकार गृहिणी को अपने चित्त में धारण करो।"[2]

बाद में वैष्णवों में परकीया रूप पर जो इतना संग्रह मिलता है, उसका सिद्धों में सर्वथा अभाव है। उन्होंने नायिका के स्वकीया रूप पर विशेष बल दिया है। वे उसे 'वधू' रूप में भी अभिहित करते हैं। परिणय के लिए वरयात्रा की सारी सज्जा का प्रचुर वर्णन मिलता है।[1]

नायिकाएँ

सिद्धों द्वारा वर्णित विभिन्न नायिकाओं में 'शुण्डिनी' भी एक है, जो दो घड़ों में बल्कल-चूर्ण से मदिरा खींचती हैं। उनके मदिरालय के कई द्वार हैं, जिनमें से दशम वैरोचन द्वार से ग्राहक चिह्न दिखाकर आते हैं, जिन्हें वह मदिरा पिलाकर संतुष्ट करती है। एक नायिका मातंगी भी है, जो गंगा तथा यमुना के बीच से नाव खेकर ले जाती है और सभी यात्रियों को नाव पर बिठाकर बारी-बारी से उतारती है। सिद्धों के पदों में नायिकाओं का मुग्धात्व, मध्यात्व तथा प्रौढ़ात्व, तीनों ही प्रवृत्तियाँ मिलती हैं। शबरपा की शबरी संसार से दूर ऊँचे पर्वत पर मोर के पंखों से श्रृंगार किये हुए अबोध-प्रकृति बालिका की भाँति रहती है। उसकी जिन चेष्टाओं का विवरण शबरपा ने दिया है, उनसे उसका मुग्धात्व प्रकट होता है।[3]

कुक्करीपा द्वारा वर्णित वधू रूप में मध्यात्व और महामुद्रा की प्रौढ़ा प्रवृत्ति का संकेत योगिनी में मिलता है, जो रतिप्रिया प्रौढ़ा है एवं नायक को पूर्ण तथा आनन्द देने में समर्थ है।[4] कृष्णाचार्यपा इसी को 'डोम्बी वधू' बताते हुए उसके साथ विवाह समारोह रचाते हैं और इसी को 'कामचण्डाली' की संज्ञा भी देते हैं। आधी रात को कमल खिलता है, बत्तीस योगिनियाँ उसके दलों पर क्रीड़ा करती हैं। उनकी नायिका को 'पद्मिनी' कहा जाता हैं, क्योंकि मृणाल बनकर वह कमलरस को प्रवाहित कर रही है। यही 'अवधूतिका' है, जो मृणाल बनकर कमलरस को प्रवाहित करती है, इसे 'कमलिनी' भी कहा जाता है। बौद्धों की भावसाधना के अंतर्गत बोधिचित्त और शून्यता की प्रणयकेलि में विभिन्न रूपकों को व्यक्त करने के लिए नायक तथा नायिका के रूप में तथागत और भगवती नैरात्मा को माना गया, अर्थात् तथागत की नायिका को 'नैरात्मा' कहा जाता है। उसी विश्वव्याप्त प्रणयकेलि में साधक बोधिचित्त को नायक और नैरात्मज्ञान को नायिका मानकर अपने चित्त में आयोजित करता है।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 हिन्दी साहित्य कोश, भाग 1 |प्रकाशक: ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी |संकलन: भारतकोश पुस्तकालय |संपादन: डॉ. धीरेंद्र वर्मा |पृष्ठ संख्या: 491 |
  2. दोहाकोष
  3. चर्यापद
  4. चर्यापद

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