अवलोकितेश्वर  

अवलोकितेश्वर
अवलोकितेश्वर
विवरण 'अवलोकितेश्वर' महायान बौद्ध धर्म सम्प्रदाय के सबसे लोकप्रिय बोधिसत्वों में से एक हैं। धर्म-कथाओं में कहा गया है कि बिना संसार के समस्त प्राणियों का उद्धार किये वे स्वयं निर्वाण लाभ नहीं करेंगे।
अन्य नाम 'कुआन् यिङ्'[1], 'कान्नोन'[2], 'चन्रे ज़िग्'[3], 'निदु-बेर उजेगकि'[4], 'लोकेश्वर'[5]
सात स्वरूप 'शो कान्नोन', 'जू-इचि-मैन कान्नोन', 'सेंजु कान्नोन', 'जन-तेइ-कान्नोन', 'फ़ुकु-केनजाकु-कान्नोन', 'बा-तो-कान्नोन', 'न्यो-इ-रिन कान्नोन'।
विशेष थेरवादी देशों में अवलोकितेश्वर एक ऐसे महायान बौद्ध आराध्य देव हैं, जिनकी आमतौर पर पूजा की जाती है।
संबंधित लेख बुद्ध, बौद्ध धर्म, बौद्ध चिन्तन, बौद्ध संगीति
अन्य जानकारी अवलोकितेश्वर स्वयंभू शाश्वत बुद्ध, अमिताभ के अवतार हैं, जिनकी आकृति शिरोवस्त्र पहने दिखाई जाती है और जिन्होंने ऐतिहासिक गौतम बुद्ध के प्रस्थान और भावी बुद्ध, मैत्रेय के प्रकट होने के मध्य काल में विश्व का कल्याण किया था।

अवलोकितेश्वर बौद्ध धर्म की महायान शाखा के सबसे लोकप्रिय आराध्य देव हैं। इनकी विश्व भर में मान्यता है। उनमें अनंत करुणा है। धर्म-कथाओं में कहा गया है कि बिना संसार के समस्त प्राणियों का उद्धार किये वे स्वयं निर्वाण लाभ नहीं करेंगे। कहा जाता है कि अवलोकितेश्वर अपनी असीम करुणा में कोई भी रूप धारण करके किसी दु:खी प्राणी की सहायता के लिए आ सकते हैं। महायान बौद्ध ग्रंथ 'सद्धर्मपुंडरीक' में 'अवलोकितेश्वर बोधिसत्व' के माहात्म्य का चमत्कारपूर्ण वर्णन मिलता है। जब प्रसिद्ध चीनी यात्री फ़ाह्यान भारत यात्रा पर आया था, तब उसने सभी जगह अवलोकितेश्वर की पूजा होते हुए देखी थी।

नाम का अर्थ

'अवलोकित' एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है- 'दृष्टा' और ईश्वर' या 'स्वामी'। चीनी भाषा में 'कुआन् यिङ्', जापानी भाषा में 'कान्नोन', असीमित करुणा और दया के बोधिसत्व[6], संभवत: बौद्ध आराध्य देवों में से सर्वाधिक लोकप्रिय, जिनकी विश्व भर में मान्यता है। प्रत्येक व्यक्ति को निर्वाण प्राप्त कराने में सहायता पहुंचाने तक अपने बुद्धत्व को विलंबित करने के कारण उन्हें "बोधिसत्व का सर्वोच्च दृष्टांत" माना जाता है।

व्याख्या

अवलोकितेश्वर के नाम की अलग-अलग रूप से व्याख्या की गई है। ऐसे स्वामी, जो हर दिशा में देखते हैं और उस विश्व[7] के स्वामी, जिसे हम देखते हैं। तिब्बत में उन्हें 'चन्रे ज़िग्'[8] और मंगोलिया में 'निदु-बेर उजेगकि'[9] के रूप में माना जाता है। थाईलैंड और हिंद-चीन में उन्हें 'लोकेश्वर'[10] का नाम दिया गया है।

बुद्ध के अवतार

अवलोकितेश्वर स्वयंभू शाश्वत बुद्ध, अमिताभ के अवतार हैं, जिनकी आकृति शिरोवस्त्र पहने दिखाई जाती है और जिन्होंने ऐतिहासिक गौतम बुद्ध के प्रस्थान और भावी बुद्ध, मैत्रेय के प्रकट होने के मध्य काल में विश्व का कल्याण किया था। अवलोकितेश्वर नौका दुर्घटना, अग्नि, हत्यारों, डकैतों और वन्य जीवों से रक्षा करते हैं। वह उस चौथे विश्व के सृजनकर्ता हैं, जो वास्तविक ब्रह्मांड है और जिसमें हम रहते हैं।

किंवदंती

किंवदंती के अनुसार, एक बार उनका शीश विश्व में अब तक अनुद्धारितों की संख्या जानकर दु:ख से खंडित हो गया था। अमिताभ बुद्ध ने प्रत्येक टुकड़े को एक अलग पूरा सिर बना दिया और उन्हें तीन-तीन के तीन स्तरों में रखकर 10वें टुकड़े को सबसे ऊपर रखा। इन सबके ऊपर उन्होंने अपनी प्रतिकृति को रखा। कभी-कभी 11 सिर के अवलोकितेश्वर को हज़ारों भुजाओं के साथ दिखाया जाता है। भुजाएं मोर के पंखों की तरह फैली हुई दिखाई देती हैं। चित्रों में उन्हें केवल सफ़ेद रंग[11] में दिखाया गया है। उनकी सहचरी देवी तारा हैं। उनका पारंपरिक निवास 'पोताला पर्वत' है और उनकी आकृति को प्राय: पर्वत शिखरों पर रखा जाता है।

सर्वोच्च सम्मान

उत्तरी भारत में अवलोकितेश्वर को सर्वोच्च सम्मान तीसरी से सातवीं शताब्दी के बीच में मिला। चीन में उनकी पूजा[12] पहली शताब्दी ई. में शुरू हुई और छठीं शताब्दी तक यह सभी बौद्ध मंदिरों में प्रतिष्ठापित हो गए। चीन में 'सुंग वंश' (960-1126 ई.) से पहले बोधिसत्व को केवल पुरुष रूप में दिखाया गया। बाद में उनकी आकृतियां दोनों लिंगों में बनीं। इस परिवर्तन की एक विवेचना यह भी है कि बोधिसत्व न तो पुरुष हैं और न ही नारी, वह तो लैंगिक भेद से परे हैं और सांसारिक मंडल में उनमें अन्य सभी प्रकार का दुहरापन है। इस दृष्टिकोण के अनुसार, उनके शरीर की कोमल रूपरेखा और लहराते वस्त्र को प्रदर्शित करती मूर्तियों और चित्रों में जान-बूझकर दृष्टिगोचर मूंछों का समावेश किया गया, ताकि लैंगिक परिचय की अनुपस्थिति पर बल दिया जा सके।

इसके अलावा 'पद्मसूत्र' से यह अर्थ निकला है कि अवलोकितेश्वर के पास कष्टों के हरण के लिए मनचाहा रूप धारण करने और संतान का वर देने की क्षमता है। इस दार्शनिक सिद्धांत की वैधता को स्वीकृत करते हुए एक अन्य दृष्टिकोण के अनुसार, कम से कम 12 वीं शताब्दी से कुआन्-यिङ् के लोकप्रिय भक्ति मत ने एक देवी माँ के गुणों को बोद्धिसत्व पर अध्यारोपित किया। रक्षक कुआन्-यिङ् की व्यक्तिगत पूजा का केंद्र 'निंग-पो'[13] के निकट पु'तो द्वीप में है।

पवित्र भूमि[14] मत के अनुयायियों के अनुसार, अमिताभ और बोधिसत्व महास्थानप्राप्त[15] के साथ कुआन्-यिङ् सर्वशक्तिमान त्रिमूर्ति के अंग हैं। अनुयायी बुद्ध अमिताभ[16] का पुनर्जन्म पश्चिमी स्वर्ग में मानते हैं। त्रिभूर्ति की आकृति प्राय: मंदिरों में प्रतिष्ठापित है और कुआन्-यिङ् को चित्र में पश्चिमी स्वर्ग में मृतकों का स्वागत करते दिखाया जाता है। कुआन्-यिङ् का व्यक्तित्व 'पवित्र भूमि' शाखा के धर्म ग्रंथों पर आधारित है, जिनका तीसरी से पांचवीं शताब्दी के बीच चीनी भाषा में अनुवाद किया गया।

लामाओं में लोकप्रिय

बोधिसत्व का तिब्बत में प्रवेश सातवीं शताब्दी में हुआ, जहां वह शीघ्र ही लामाओं में सर्वाधिक लोकप्रिय बन गए और प्रत्येक दलाई लामा में बार-बार पुनर्अवतरित हुए। प्रार्थना मंत्र 'ओम मणि पद्महुम'[17] की शुरुआत करने का श्रेय तिब्बत के लोगों को प्राप्त है। कुआन्-यिङ् का व्यक्तित्व जापान में संभवत: कोरिया[18] होकर पहुंचा। नारा में सबसे पहले ज्ञात मध्य सातवीं शताब्दी की आकृतियां 'होर्यो जी'[19] में हैं। बोधिसत्व की पूजा किसी एक मत तक सीमित नहीं थी और पूरे जापान में इनकी व्यापक तौर पर उपासना की जाती रही।

सात प्रमुख स्वरूप

चीन की तरह कान्नोन के लिंग के विषय में कुछ भ्रम बना रहा है। जापान में विभिन्न स्वरूप धारण करने की कान्नोन की क्षमता से सात प्रमुख स्वरूप उभरकर सामने आए-

  1. 'शो कान्नोन' - सबसे सरल स्वरूप, प्राय: दो हाथों वाली खड़ी या बैठी हुई आकृति, जो एक हाथ में कमल पकड़े हुए है।
  2. 'जू-इचि-मैन कान्नोन' - 11 सिरों के साथ दो या चार भुजाओं वाली आकृति।
  3. 'सेंजु कान्नोन' - एक हज़ार भुजाओं वाले बोधिसत्व
  4. 'जन-तेइ-कान्नोन' - सबसे कम मिलने वाला 18 भुजाओं के साथ बैठा हुआ स्वरूप, कभी-कभी भारतीय देवी कुंती से संबंधित।[20]
  5. 'फ़ुकु-केनजाकु-कान्नोन' - तेंदई मत में लोकप्रिय, जिनका विशेष प्रतीक चिह्न 'कमंद' है।
  6. 'बा-तो-कान्नोन' - बालों में घोड़े के सिर से जटित, प्रचंड रूप में, संभवत: तिब्बत में घोड़ों के रक्षक 'हयग्रीवा' से संबंधित।
  7. 'न्यो-इ-रिन कान्नोन' - छह भुजाओं के साथ बैठी हुई मुद्रा में, हाथों में इच्छा पूर्ण करने वाला मणि या रत्न धारण किए हुए।

गुण

अवलोकितेश्वर के गुणों और चमत्कारों का कई बौद्ध सूत्रों में वर्णन है। तीसरी शताब्दी में अवलोकितेश्वर सूत्र को सर्वाधिक लोकप्रिय 'सद्धर्मपुंडरीक सूत्र' या 'पद्मसूत्र' में सम्मिलित किया गया था। हालांकि यह चीन में एक स्वतंत्र ग्रंथ के रूप में भी प्रचलित है और उनकी व्यक्तित्व पूजा का प्रमुख ग्रंथ है।

थेरवादी देशों में अवलोकितेश्वर एक ऐसे महायान बौद्ध आराध्य देव हैं, जिनकी आमतौर पर पूजा की जाती है। इन देशों में पालि धर्मसूत्र पर आधारित पूजा होती है और यहाँ बोधिसत्व की अवधारणा को आमतौर पर मान्यता नहीं दी जाती। श्रीलंका में उन्हें नाथ-देव[21] के रूप में माना जाता है।


पन्ने की प्रगति अवस्था
आधार
प्रारम्भिक
माध्यमिक
पूर्णता
शोध

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. चीन में
  2. जापान में
  3. तिब्बत में
  4. मंगोलिया में
  5. हिन्द-चीन में
  6. बुद्ध बनना
  7. वास्तविक, सृजित विश्व
  8. करुणामय दृष्टि वाले
  9. जो आंखों से देखते हैं
  10. विश्व के स्वामी
  11. नेपाल में लाल रंग
  12. कुआन्-यिङ् के रूप में
  13. बोधिसत्व के पारंपरिक पर्वतीय निवास पोताला से संबंधित
  14. प्योर लैंड
  15. चीनी में ताई-शिह-चिह
  16. चीनी में ओ-मी-तो-फो; जापान में अमिदा
  17. जिसका प्राय: अनुवाद किया गया कि 'कमल में रत्न है'
  18. जहाँ बौद्ध धर्म अपनी शुरुआत के तुरंत बाद पहुंच चुका था
  19. जी मंदिर
  20. सात लाख बुद्धों की माता
  21. जिन्हें ग़लती से संभावी बुद्ध, मैत्रेय माना जाता है

संबंधित लेख

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"https://bharatdiscovery.org/bharatkosh/w/index.php?title=अवलोकितेश्वर&oldid=593914" से लिया गया