कपिलवस्तु  

कपिलवस्तु प्राचीन समय में शाक्य वंश की राजधानी के रूप में प्रसिद्ध था। ये नगर, सिद्धार्थ नगर से 20 किलोमीटर और गोरखपुर से 97 किलोमीटर दूर स्थित है। कपिलवस्तु महात्मा बुद्ध के पिता शुद्धोधन के राज्य की राजधानी थी। यहाँ भगवान बुद्ध ने अपना बचपन व्यतीत किया था। यह श्रावस्ती का समकालीन नगर था। परंपरा के अनुसार वहाँ कपिल मुनि ने तपस्या की, इसीलिये यह कपिलवस्तु (अर्थात् महर्षि कपिल का स्थान) नाम से प्रसिद्ध हो गया। नगर के चारों ओर एक परकोटा था, जिसकी ऊँचाई अठारह हाथ थी। गौतम बुद्ध के काल में भारतवर्ष के समृद्धिशाली नगरों में इसकी गणना होती थी। यह उस समय तिजारती रास्तों पर पड़ता था। वहाँ से एक सीधा रास्ता वैशाली, पटना और राजगृह होते हुये पूरब की ओर निकल जाता था, दूसरा रास्ता वहाँ से पश्चिम में श्रावस्ती की ओर जाता था।

ऐतिहासिक तथ्य

ज़िला बस्ती, उत्तर प्रदेश के उत्तरी भाग में पिपरावां नामक स्थान से 9 मील उत्तर-पश्चिम तथा रुमिनीदेई या प्राचीन लुंबिनी से 15 मील पश्चिम की ओर मेमिराकोट के पास प्राचीन कपिलवस्तु की स्थिति बताई जाती है। इसी क्षेत्र में स्थित तिलौरा या तिरोराकोट को भी कुछ लोग कपिलवस्तु मानते हैं, किंतु इन स्थानों पर अभी तक उत्खनन न होने के कारण इस विषय में निश्चित रूप से कुछ कहना कठिन है। किंतु लुंबनी का अभिज्ञान ज़िला बस्ती में नेपाल-भारत सीमा पर स्थित ककराहा ग्राम से 13 मील उत्तर में वर्तमान रुमिनीदेई के साथ निश्चित होने के कारण कपिलवस्तु की स्थिति भी इसी के आसपास कुछ मील के भीतर रही होगी, यह भी निश्चित समझना चाहिए।[1]

गौतम बुद्ध के पिता शाक्यवंशी शुद्धोधन की राजधानी कपिलवस्तु में थी। सौंदरानंद-काव्य में महाकवि अश्वघोष ने कपिलवस्तु के बसाई जाने का विस्तृत वर्णन किया है, जिसके अनुसार यह नगर कपिल मुनि के आश्रम के स्थान पर बसाया गया था। यह आश्रम हिमाचल के अंचल में स्थित था-

तस्य विस्तीर्णतपसः पार्श्वे हिमवतः शुभे, क्षेत्रं चायतनं चैव तपसामाश्रमोअभवत्[2]

तपस्वियों के निवास स्थान और तपस्या के क्षेत्र उस आश्रम में कुछ इक्ष्वाकु राजकुमार बसने की इच्छा से गए-

तेजस्विंसदनं तपं क्षेत्रं तमाश्रमम्, केचिदिक्ष्वाकुवो जम्मुः राजपुत्रा विवत्सवः[3]

उन्होंने जिस स्थान पर निवास किया, वह शाक्य या सागौन वृक्षों से ढका था, इसलिए वे इक्ष्वाकु राजकुमार शाक्य कहलाए। एक दिन उनकी समृद्धि करने की इच्छा से जल का घड़ा लेकर मुनि आकाश में उड़ गए और राजपुत्रों से कहा- "अक्षय जल के इस कलश से जो जलधारा पृथ्वी पर गिरे, उसका अतिक्रमण ना करके कम से मेरा अनुसरण करो।" कपिल मुनि ने उस आश्रम की भूमि के चारों ओर जल की धारा गिराई और चौपड़ की तख्ती की तरह नक्शा बनाया और उसे सीमाचिह्नों से सुशोभित किया। तब वास्तु-विशारदों ने उस स्थान पर कपिल के आदेश अनुसार एक नगर बनाया। उसकी परिखा नदी के समान चौड़ी थी और राजपथ भव्य और सीधा था। प्राचीन पहाड़ों की तरह विशाल थी- जैसे वह दूसरा गिरिव्रज ही हो। श्वेत अट्टालिकाओं से उसका मुख सुंदर लगता था। उसके भीतर बाजार अच्छी तरह से विभाजित थे। वह नगर प्रसाद माला से गिरा हुआ ऐसा जान पड़ता था, मानो हिमालय की कुक्षि हो। धनी, शांत, विद्वान और अनुद्धत लोगों से भरा हुआ वह नगर किन्नरों से मंदराचल की भांति शोभायमान था। वहां पुरवासियों को प्रसन्न करने की इच्छा से राजकुमारों ने प्रसन्नचित्त होकर उद्यान नामक यश के सुंदर स्थान बनवाये। सब दिशाओं में सुंदर झीलें निर्मित कीं, जो स्वच्छ जल से पूर्ण थीं। मार्गों और उपवनों में चारों ओर मनोरम, सुंदर, ठहरने के स्थान बनवाए गए, जिनके साथ कूप भी थे।[4] क्योंकि कपिल मुनि के आश्रम के स्थान पर वह नगर बसाया गया था, अतः कपिलवस्तु कहलाया-

कपिलस्य च तस्यष्रेस्तस्मिन्नाश्रमवास्तुनि, यस्मात्तत्पुरं चकुस्तस्मात् कपिलवास्तु तत्।[5][1]

सिद्धार्थ ने कपिलवस्तु में ही अपना बचपन बिताया था और सच्चे ज्ञान और सुख की प्राप्ति की लालसा से अपने परिवार और राजधानी को छोड़कर चले गये थे। बुद्धत्व को प्राप्त करने पर वे अंतिम बार कपिलवस्तु आए थे और तब उन्होंने अपने पिता शुद्धोधन और पत्नी यशोधरा को अपने धर्म में दीक्षित किया था।

कपिलवस्तु अशोक (मृत्यु 232 ई.पू.) के समय में तीर्थ के समान समझा जाता था। अपने गुरु उपगुप्त के साथ सम्राट ने कपिलवस्तु की यात्रा की और यहां स्तूप आदि स्मारक बनवाए। किंतु शीघ्र ही इस नगर की अवनति का युग प्रारंभ हो गया और इसका प्राचीन गौरव घटता चला गया। इस अवनति का कारण अनिश्चित है। संभवतः कालप्रवाह में नेपाल की तराई क्षेत्र में होने के कारण कपिलवस्तु के स्थान को घने वनों ने आच्छादित कर लिया था और इस कारण यहां पहुंचना दुष्कर हो गया होगा। चीनी यात्री फ़ाह्यान (405-411 ई.) के समय तक कपिलवस्तु नगरी उजाड़ हो चुकी थी। केवल थोड़े-से बौद्ध भिक्षु यहां निवास करते थे, जो अपनी जीविका कभी-कभी आ जाने वाले यात्रियों के दान में दिए गए धन से चलाते थे। यह भी उल्लेखनीय है कि फ़ाह्यान के समय तक बौद्ध धर्म से घनिष्ठ रूप से संबंधित अन्य प्रमुख स्थान जैसे बोधगया और कुशीनगर भी उजाड़ हो चले थे। वास्तव में बौद्ध धर्म का अवनति काल इस समय प्रारंभ हो गया था। हर्ष के शासनकाल में प्रसिद्ध चीनी पर्यटक युवानच्वांग ने कपिलवस्तु की यात्रा की थी (630 ई. के लगभग)। उसके वर्णन के अनुसार कपिलवस्तु में पहले एक सहस्र संघाराम थे, किंतु अब केवल एक ही बचा था, जिसमें 30 भिक्षु रह रहे थे। स्मिथ के अनुसार युवानच्वांग द्वारा उल्लिखित कपिलवस्तु पिपरावा से 10 मील उत्तर-पश्चिम की ओर नेपाल की तराई में स्थित तिलौराकिट नामक स्थान रहा होगा[6]

बौद्ध ग्रथों में

नगर के भीतर एक सभा-भवन बना हुआ था, जहाँ पर शाक्य लोग एकत्र होकर महत्त्वपूर्ण विषयों पर सोच-विचार किया करते थे। बाद में एक सभा-गृह और बनवा दिया गया, जिसका उद्घाटन स्वयं गौतम बुद्ध ने किया था। वे इस अवसर पर अपने शिष्यों सहित वहाँ आये थे। उनके सम्मान में नगर अच्छी तरह सज़ा दिया गया और चारों ओर एक योजन की दूरी तक रोशनी की गई। उनकी सुविधा के लिये इस समय शान्ति की पूरी व्यवस्था कर दी गई थी। कुछ बौद्ध ग्रन्थों में इसकी शोभा का वर्णन अतिशयोक्ति के साथ किया गया है। 'बुद्धचरित' नामक बौद्ध ग्रंथ में इसी पुर को सभी नगरों में श्रेष्ठ (पुराधिराज) कहा गया है। इसकी समता में तत्कालीन कोई भी नगर नहीं आ सकता था और इसके ठाट-बाट को देख कर लगता था, मानों स्वयं राजलक्ष्मी ही वहाँ पर निवास कर रही हों। दरिद्रता के लिये वहाँ कोई अवकाश नहीं था। नागरिकों के घर वहाँ उसी तरह सुशोभित थे, जिस तरह सरोवर में कमलों की पंक्तियाँ। ललितविस्तर नामक ग्रन्थ में इसके सुन्दर उपवन एवं विहार आदि का वर्णन मिलता है। नागरिक समृद्ध, अच्छे विचारों वाले तथा धार्मिक थे। यहाँ लोगों को युद्ध-शिक्षा दी जाती थी। नगर में सुन्दर बाज़ार लगते थे। राजा शुद्धोधन सदाशय और पुरवासियों के हित में संलग्न थे। 'सौन्दरनन्द' नामक काव्य में इसे गौतम की जन्मभूमि कहा गया है। इस ग्रन्थ के अनुसार वहाँ के नागरिकों को अनुचित कर नहीं देने पड़ते थे और वे सुखी एवं संपन्न थे।

बुद्ध द्वारा दीक्षा

गौतम बुद्ध के विश्राम की सुविधा के लिये शाक्यों ने नगर के बाहर शान्त वातावरण में निग्रोधाराम नामक विहार बनवा दिया था। पहली बार वे इसमें अपने बीस हज़ार शिष्यों के साथ पधारे थे। कपिलवस्तु के नागरिकों ने उनके व्यक्तित्व और उपदेशों में इतना आकर्षण पाया कि दूसरे ही दिन उनमें से अधिकांश उनके शिष्य बन गयें उनके भाई नन्द और पुत्र राहुल तथा इसी तरह राजकुल के कुछ और भी सदस्यों ने उनसे दीक्षा ले ली थी। उनके प्रभाव में आकर शाक्य बहुसंख्या में बौद्ध संघ के सदस्य बन गये। इस कारण वहाँ कुछ लोगों ने उनके ऊपर परिवारों को तोड़ने का आरोप लगाया। शुद्धोधन ने भी यह सब देखकर राजनियम बना दिया कि बिना माँ-बाप की अनुमति से राज्य का कोई भी व्यक्ति बौद्ध धर्म में दीक्षा न ग्रहण करे। शाक्यों और उनके विपक्षियों के बीच के झगड़ों में बुद्ध ने कई समयों पर मध्यस्थता की थी। एक बार कोसल के राजा विडुडभ ने शाक्यों से अपने अपमान का बदला लेने के लिये कपिलवस्तु पर आक्रमण कर दिया। इस समय बुद्ध उसे समझाने के लिये इस नगर में आये हुये थे। शाक्यों के पड़ोसी कोलिय लोग रामग्राम में शासन करते थे। दोनों के बीच रोहिणी नदी के जल के प्रश्न को लेकर विवाद खड़ा हुआ। इस झगड़े के कारण भीषण संहार का ख़तरा आ खड़ा हुआ। गौतम बुद्ध की मध्यस्थता के फलस्वरूप दोनों ही दल एक संभावित भयंकर क्षति से बच गये। उनके महापरिनिर्वाण के अनन्तर शाक्यों ने उनके शरीर के अवशेष की प्राप्ति के लिये अपनी माँग पेश की थी। उन्हें उनकी अस्थियों का एक भाग प्राप्त हुआ, जिसके ऊपर उन्होंने स्तूप का निर्माण किया।

लुम्बिनी ग्राम

इस नगर के पास ही लुम्बिनी ग्राम स्थित था, जहाँ पर गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था। इसकी पहचान नेपाल की तराई में स्थित रूमिनदेई नामक ग्राम से की जाती है। बौद्ध धर्म का यह एक प्रमुख केन्द्र माना जाने लगा। अशोक अपने राज्य-काल के बीसवें वर्ष धर्मयात्रा करता हुआ लुम्बिनी पहुँचा था। उसने इस स्थान के चारों ओर पत्थर की दीवाल खड़ी कर दी। वहाँ उसने एक स्तंभ का निर्माण भी किया, जिस पर उसका एक लेख ख़ुदा हुआ है। यह स्तंभ अब भी अपनी जगह पर विद्यमान है। विद्वानों का ऐसा अनुमान है कि अशोक की यह लाट ठीक उसी जगह खड़ी है, जहाँ बुद्ध का जन्म हुआ था। अशोक ने वहाँ के निवासियों को कर में भारी छूट दे दी थी। जो तीर्थयात्री वहाँ आते थे, उन्हें अब यहाँ यात्रा-कर नहीं देना पड़ता था। वह कपिलवस्तु भी आया हुआ थां गौंतम बुद्ध के जिस स्तूप का निर्माण शाक्यों ने किया था, उसे उसने आकार में दुगुना करा दिया था।

महत्त्व

जैसे-जैसे शाक्य गणराज्य का अध:पतन होता गया, वैसे-वैसे कपिलवस्तु का राजनीतिक महत्त्व भी घटने लगा। बाद में चल कर इसकी प्रतिष्ठा अब केवल बौद्ध तीर्थ के रूप में ही रह गई थी। पाँचवीं सदी में जब चीनी यात्री फाहियान यहाँ आया, उस समय इसकी जनसंख्या काफ़ी घट गई थी। सातवीं शताब्दी में हुसेनसांग भी वहाँ आया था। वह लिखता है कि इस नगर में कई स्तूप थे, जो बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद राजाओं और भक्तों द्वारा बनवाये गये थे। वहाँ कई पुराने मठ भी थे, जो अब बर्बाद हो चुके थे। यह नगर इस समय काफ़ी उजड़ गया था। इसके खंडहरों के बीच जंगली जानवर रहते थे, जिनके कारण यात्रियों को ख़तरा बना रहता था।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 133 |
  2. सौंदरानंद 1,5
  3. सौदरानंद 1,18
  4. सौंदरानंद, 1,24-28-29-32-33-41-42-43-48-49-50-51
  5. सौदरानंद 1,57
  6. अर्ली हिस्ट्री ऑव इंडिया, चतुर्थ संस्करण, पृ. 167

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