अठारह बौद्ध निकाय  

  • भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण के अनन्तर बुद्धवचनों में प्रक्षेप (अन्य वचनों को डाल देना) और अपनयन (कुछ बुद्धवचनों को हटा देना) न होने देने के लिए क्रमश: तीन संगीतियों का आयोजन किया गया। प्रथम संगीति बुद्ध के परिनिर्वाण के तत्काल बाद प्रथम वर्षावास के काल में ही राजगृह में महाकाश्यप के संरक्षकत्व में सम्पन्न हुई। इसमें आनन्द ने सूत्र (इसमें अभिधर्म भी सम्मिलित है) और उपालि ने विनय का संगायन किया। इस तरह इस संगीति में सम्मिलित पाँच सौ अर्हत भिक्षुओं ने प्रथम बार बुद्धवचनों को त्रिपिटक आदि में विभाजन किया। भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद सौ वर्ष बीतते-बीतते आयुष्मान यश ने वैशाली के वज्जिपुत्तक भिक्षुओं को विनय विपरीत दस वस्तुओं का आचरण करते हुए देखा, जिसमें सोने-चाँदी का ग्रहण भी एक था। अनेक भिक्षुओं की दृष्टि में उनका यह आचरण अनुचित था। इसका निर्णय करने के लिए द्वितीय संगीति बुलाई गई। महास्थविर रेवत की अध्यक्षता में सम्पन्न इस संगीति में सम्मिलित सात सौ अर्हत भिक्षुओं ने उन (वज्जिपुत्तक भिक्षुओं) का आचरण विनयविपरीत निश्चित किया। वैशाली के वज्जिपुत्तक भिक्षुओं ने महास्थविरों के इस निर्णय को अमान्य कर दिया और कौशाम्बी में एक पृथक् संगीति आयोजित की, जिसमें दस हज़ार भिक्षु सम्मिलित हुए थे। यह सभा 'महासंघ' या 'महासंगीति' कहलाई तथा इस सभा को मानने वाले 'महासांघिक' कहलाए।
  • इस प्रकार बौद्ध संघ दो भागों या निकायों में विभक्त हो गया, स्थविरवादी और महासांघिक। आगे चलकर भगवान के परिनिर्वाण के 236 वर्ष बाद सम्राट अशोक के काल में आयोजित तृतीय संगीति के समय तक बौद्ध संघ अठारह निकायों में विकसित हो गया था।
  • महासांघिक भी कालान्तर में दो भागों में विभक्त हो गए-
  1. एकव्यावहारिक और
  2. गोकुलिक।
  • गोकुलिक से भी दो शाखाएं विकसित हुई, यथा-
  1. प्रज्ञप्तिवादी और
  2. बाहुलिक या बाहुश्रुतिक।
  • बाहुलिक से चैत्यवादी नामक एक और शाखा प्रकट हुई। इस तरह महासांघिक से पाँच शाखाएं निकली, जो महासांघिक के साथ कुल 6 निकाय होते हैं।
  • दूसरी ओर स्थविरवादी भी पहले दो भागों में विभक्त हुए, यथा- वज्जिपुत्तक और महीशासक। वज्जिपुत्तक 4 भागों में विभक्त हुए, यथा-
  1. धर्मोत्तरीय,
  2. भद्रयाणिक,
  3. छन्रागरिक (षाण्णागरिक) और
  4. सम्मितीय।
  • महीशासक से भी दो शाखाएं विकसित हुई, यथा-
  1. धर्मगुप्तिक और
  2. सर्वास्तिवादी।
  • सर्वास्तिवादियों से क्रमश: काश्यपीय, काश्यपीय से सांक्रान्तिक और सांक्रान्तिक से सूत्रवादी सौत्रान्तिक निकाय विकसित हुए। इस प्रकार स्थविरवादी निकाय से 11 निकाय विकसित हुए, जो स्थविरवादी निकाय के साथ कुल 12 होते हैं। दोनों प्रकार के निकायभेद मिलकर कुल अठारह निकाय होते हैं।

निकाय-परम्परा

आचार्य विनीतदेव आदि प्रमुख आचार्यों की मान्यता है कि चार ही मूल निकाय हैं, जिनसे आगे चल कर सभी अठारह निकाय विकसित हुए। वे हैं-

  1. आर्य सर्वास्तिवादी,
  2. आर्य महासांघिक,
  3. आर्यस्थविर एवं
  4. आर्य सम्मितीय।

मूलसंघ से जो यह विभाजन हुआ या अठारह या उससे अधिक निकायों का जो जन्म हुआ, वह किसी गतिशील श्रेष्ठ धर्म का लक्षण है, न कि ह्रास का। भगवान बुद्ध ने स्वयं ही किसी भी शास्ता के वचन या किसी पवित्र ग्रन्थ के वचन को अन्तिम प्रमाण मानने से अपने अनुयायी भिक्षुओं को मना कर दिया था। उन्होंने स्वतन्त्र चिन्तन, अपने अनुभव की प्रामाणिकता, वस्तुसङ्गत दृष्टि और उदार विचारों के जो बीज भिक्षुसंघ में निक्षिप्त (स्थापित0 किये थे, उन्हीं बीजों से कालान्तर में विभिन्न शाखाओं वाला सद्धर्म रूपी महावृक्ष विकसित हुआ, जिसने भारत सहित विश्व के कोटि-कोटि विनेय जनों की आकांक्षाएं अपने पुष्प, फल, पत्र और छाया के द्वारा पूर्ण कीं और आज भी कर रहा है।

अठारह निकायों के सामान्य सिद्धान्त

आचार्य वसुमित्र, भावविवेक आदि महापण्डितों के ग्रन्थों के दार्शनिक सिद्धान्तों से सभी अठारह निकाय प्राय: सहमत हैं-

ज्ञान में ग्राह्य (विषय) के आकार का अभाव

बौद्ध दार्शनिकों में इस विषय पर पर्याप्त चर्चा उपलब्ध होती है कि ज्ञान जब अपने विषय में प्रवृत्त होता है, तब विषय के आकार को ग्रहण करके अर्थात् विषय के आकार से आकारित (साकार) होकर विषय ग्रहण करता है या निराकार रहते हुए। सौत्रान्तिकों का मानना है कि चक्षुर्विज्ञान नीलाकार होकर नील विषय में प्रवृत्त होता है। उनका कहना है कि जिस समय चक्षुर्विज्ञान उत्पन्न होता है, उस समय उसका ग्राह्य (नील आलम्बन) निरुद्ध रहता है। क्योंकि नील आलम्बन कारण है और चक्षुर्विज्ञान उसका कार्य। कारण को कार्य से नियत पूर्ववर्तों होना चाहिएं इसलिए नील आलम्बन चक्षुर्विज्ञान से एक क्षण पूर्व निरुद्ध हो जाता है। किन्तु ज्ञान में विषय का आकार विद्यमान होने से वह ज्ञान 'नीलज्ञ' कहा जाता है।

ज्ञान में स्वसंवेदनत्व का अभाव

वैभाषिक प्रमुख सभी अठारह निकायों में ज्ञान में जैसे ज्ञेय (विषय) का आकार नहीं माता जाता अर्थात् जैसे उसे निराकार माना जाता है, उसी प्रकार ज्ञान में ग्राहक-आकार अर्थात् अपने स्वरूप (स्वयं) को ग्रहण करने वाला आकार भी नहीं माना जाता। स्वयं (अपने स्वरूप) को ग्रहण करने वाला ज्ञान 'स्वसंवेदन' कहलाता है। आशय यह कि वे (वैभाषिक आदि) स्वसंवेदन नहीं मानते। ज्ञात है कि बौद्ध नैयायिक सौत्रान्तिक आदि चार प्रत्यक्ष मानते हैं-

  1. इन्द्रिय प्रत्यक्ष,
  2. मानस प्रत्यक्ष,
  3. स्वसंवेदन प्रत्यक्ष और
  4. योगी-प्रत्यक्ष।

इनमें से वैभाषिक आदि क्योंकि स्वसंवेदन नहीं मानते, इसलिए इनके मत में शेष तीन प्रत्यक्ष ही माने जाते हैं।

बाह्यार्थ का अस्तित्व

वैभाषिक आदि के मत में ज्ञान में अतिरिक्त बाह्य वस्तुओं की सत्ता मानी जाती है। वे रूप, शब्द आदि बाह्य वस्तुएं परमाणुओं से आरब्ध (निर्मित) होती हैं, न कि विज्ञान के परिणाम के रूप में मानी जाती हैं- जैसा कि योगाचार विज्ञानवादी मानते हैं। योगाचार मतानुसार समस्त बाह्यार्थ आलयविज्ञान या मनोविज्ञान में स्थित वासना के परिणाम होते हैं। वैभाषिक ऐसा नहीं मानते। वैभाषिक मतानुसार घट आदि पदार्थों में स्थित परमाणु चक्षुरिन्द्रिय के विषय होते हैं तथा चक्षुरिन्द्रिय में स्थित परमाणु चक्षुर्विज्ञान के आश्रय होते हैं। इसलिए इनके मत में परमाणु से निर्मित ष्ट आदि स्थूल वस्तुओं की वस्तुसत्ता नहीं मानी जाती। सौत्रान्तिकों के मतानुसार घट आदि में स्थित प्रत्येक परमाणु चक्षुर्विज्ञान का विषय नहीं होता, अत: चक्षुर्विज्ञान में भासित होने वाले घट आदि स्थूल वस्तुओं की वस्तुसत्ता मानी जाती है। जैसे वैशेषिक दार्शनिक अवयवों से अतिरिक्त एक अवयवी द्रव्य की सत्ता स्वीकार करते हैं, वैसे वैभाषिक नहीं मानते, इसलिए घट आदि के अन्तर्गत विद्यमान परमाणु ही इन्द्रिय के विषय होते हैं।

तीनों कालों की सत्ता

जो सभी अतीत, अनागत और प्रत्युत्पन्न कालों का अस्तित्व मानते हैं, वे सर्वास्तिवादी चार प्रकार के हैं, यथा-

  1. भावान्यथिक। इस मत के प्रमुख आचार्य भदन्त धर्मत्रात हैं। इनके अनुसार अध्वों (कालों) में प्रवर्तमान (गतिशील) धर्मों की द्रव्यता में अन्यथात्व नहीं होता। केवल भाव में अन्यथात्व होता है।
  2. लक्षणान्यथिक। इसके प्रमुख आचार्य भदन्त घोषक हैं। इनके अनुसार अध्वों में प्रवर्तमान अतीत धर्म यद्यपि अतीत-लक्षण से युक्त होता है, फिर भी वह प्रत्युत्पन्न और अनागत लक्षण से भी अवियुक्त होता है।
  3. अवस्थान्यथिक। इसके प्रमुख आचार्य भदन्त वसुमित्र हैं। इनके अनुसार अध्वों में प्रवर्तमान धर्म भिन्न-भिन्न अवस्थाओं को प्राप्त कर अवस्था की दृष्टि से भिन्न-भिन्न निर्दिष्ट किया जाता है, न कि भिन्न-भिन्न द्रव्य की दृष्टि से भिन्न-भिन्न निर्दिष्ट होता है।
  4. अन्यथान्यथिक। इसके प्रमुख आचार्य भदन्त बुद्धदेव हैं। इनके अनुसार अध्वों में प्रवर्तमान धर्म पूर्व, अपर की अपेक्षा से भिन्न-भिन्न कहा जाता है।

निरुपधिशेष निर्वाण

वैभाषिक आदि निकायों के मत में निरुपधिशेष निर्वाण की अवस्था में व्यक्तित्व की सर्वथा निवृत्ति (परिसमाप्ति) मानी जाती है। इस अवस्था में अनादि काल में चली आ रही व्यक्ति की नाम-रूप सन्तति सर्वथा शान्त हो जाती है, जैसे दीपक के बुझ जाने पर उसकी किसी भी प्रकार की सन्तति अवशिष्ट नहीं रहती।

बोधि से पूर्व गौतम बुद्ध का पृथग्जन होना

इन निकायों के मतानुसार जन्म ग्रहण करते समय राजकुमार सिद्धार्थ पृथग्जन ही थे। वह बोधिसत्त्व अवश्य थे और मार्ग की दृष्टि से सम्भारमार्ग की अवस्था में विद्यमान थे। घर से बाहर होकर प्रव्रज्या ग्रहण करने के अनन्तर जिस समय बोधिवृक्ष के मूल में समाधि में स्थित थे, तब उन्होंने क्रमश: प्रयोगमार्ग, दर्शनमार्ग और भावनामार्ग को प्राप्त किया। अन्त में उन्होंने उसी आसन पर सम्यक् संबुद्धत्व की प्राप्ति की।

स्थविरवाद

परमार्थ धर्म विचार

अठारह निकायों में स्थविरवाद भी एक है। इन दिनों विश्व में दो ही निकाय जीवित हैं-

  1. स्थविरवाद और
  2. सर्वास्तिवाद की विनय-परम्परा।
  • स्थविरवाद की परम्परा श्रीलंका, म्यामांर, थाईलैण्ड, कम्बोडिया आदि दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में प्रमावी ढंग से प्रचलित है। उसका विस्तृत पालिसाहित्य विद्यमान है और आज भी रचनाएं हो रही हैं। अत: संक्षेप में यहाँ उसके परमार्थसत्य तथा शीलसमाधि और प्रज्ञा का परिचय दिया जा रहा है। शील, समाधि और प्रज्ञा ही मार्गसत्य है, जिससे निर्वाण (मोक्ष) जैसे परमार्थसत्य एवं परम पुरुषार्थ की प्राप्ति सम्भव है।

परमार्थ

जो अपने स्वभाव को कभी भी नहीं छोड़ता तथा जिसके स्वभाव से कभी परिवर्तन नहीं होता ऐसा तत्त्व 'परमार्थ' कहा जाता है। जैसे लोभ का स्वभाव (लक्षण) आसक्ति या लालच है। यह चाहे मनुष्य में हो अथवा पशु में हो अपने आसक्ति या लालची स्वभाव को कभी भी नहीं छोड़ता। भौतिक (रूप) वस्तुओं में भी पृथ्वी का स्वभाव 'कठोर' होना है। यह पृथ्व कहीं भी किसी भी अवस्था में अपने कठोर स्वभाव को नहीं छोड़ती। इसलिए चित्त, स्पर्शवेदना आदि चैतसिक, पृथ्वी अप् आदि महाभूत और भौतिक वस्तु (रूप) तथा निर्वाण परमार्थ कहे जाते हैं।

चित्त-चैतसिक

  • यद्यपि चित्त-चैतसिक पृथक्-पृथक् स्वभाव वाले होते हैं तथापि वे दोनों एक विषय (आलम्बन) में एक साथ उत्पन्न होकर एक साथ निरुद्ध होते हैं। इनमें से वर्ण, शब्द आदि विषयों (आलम्बन) को सामान्य रूपेण जानना मात्र 'चित्त' है। यहाँ चित्त द्वारा आलम्बन का ग्रहण करना या प्राप्त करना ही 'जानना' कहा जाता है। जानना, ग्रहण करना, प्राप्त करना, परिच्छेद (उद्ग्रहण) करना, ये पर्यायवाची हैं।
  • चित्त, मन और विज्ञान एक ही अर्थ के वाचक हैं जो संचय करता है। (चिनोति), वह चित्त है। यही मनस् है, क्योंकि यह मनन करता है (मनुते)।यही विज्ञान है, क्योंकि वह अपने आलम्बन को जानता है (आलम्बनं विजानाति)।

चैतसिक

जब कोई चित्त उत्पन्न होता है, तब स्पर्श वेदना आदि चैतसिक भी उत्पन्न होते हैं। चित्त से सम्बद्ध होकर उत्पन्न होने के कारण, चित्त में होने वाले उन स्पर्श वेदना आदि धर्मों को, 'चैतसिक' कहते हैं। यहाँ 'चित्त' आधार है तथा चैतसिक उसमें होने वाले आधेय हैं- ऐसा नहीं समझना चाहिए। हाँ, यह ठीक है कि पूर्वगामी चित्त के अभाव में चैतसिक नहीं हो सकते, इस स्थिति में चित्त के न होने पर चैतसिकों के कृत्य नहीं होंगे, चित्त से सम्बद्ध होने पर ही वे सम्भव हैं, अत: चित्त में होने वाले स्पर्श वेदना आदि धर्म चैतसिक है- ऐसा भी कहा जाता है। यह ठीक भी है, क्योंकि स्पर्श वेदना आदि सदा सर्वथा चित्त में सम्प्रयुक्त होते हैं। चित्त के बिना चैतसिक अपने आलम्बनों को ग्रहण करने में असमर्थ रहते हैं। इसीलिए चित्त-चैतसिकों का साथ-सा उत्पाद निरोध माना जाता है तथा साथ ही समान आलम्बन का ग्रहण एवं समान वस्तु (इन्द्रिय) का आश्रय करना माना जाता है।

रूप

चित्त चैतसिक मनुष्य के चेतन (अभौतिक) पदार्थ (धर्म) हैं, इन्हें बौद्ध परिभाषा में 'अरूप धर्म' या 'नाम धर्म' कहा जाता है। ये नाम धर्म यद्यपि भौतिक (रूप) धर्मों का आश्रय करके ही उत्पन्न होते हैं। तथापि वे भौतिक (रूप) धर्मों का संचालन भी करते रहते हैं। उसका अभिप्राय यह है कि यदि रूप धर्म नहीं होते हैं तो अरूप (नाम)¬ धर्म भी नहीं होते। यदि अरूप (नाम) धर्म नहीं है तो रूप धर्म निष्प्रयोजन हो जाते हैं। यद्यपि भगवान बुद्ध का प्रधान प्रतिपाद्य निर्वाण था और निर्वाण प्राप्ति के लिए कुशल, अकुशल अरूपधर्मों का विवेचन करना भी आवश्यक था, तथापि रूप धर्मों के विवेचन के बिना अरूपधर्मों का विवेचन सम्भव नहीं था, फलत: उन्होंने 28 प्रकार के भौतिक धर्मों का विवेचन किया। इस प्रकार मनुष्य जीवन में यद्यपि अरूपधर्म प्रधान है, तथापि रूपधर्मों की भी अनिवार्यता है। अत: सभी अभिधर्मशास्त्र रूपों का भी विश्लेषण करते हैं।

पृथ्वी अप् आदि 28 रूपों में से पृथ्वी अप्, तेजस, वायु वर्ण, गन्ध, रस और ओजस् ये आठ रूप सदा एक साथ रहते हें। परमाणु, जो सूक्ष्म पदार्थ माना जाता है, उसमें भी ये आठ रूप रहते हैं। इनमें से पृथ्वी, अप् तेजस् और वायु को 'महाभूत' कहते हैं। क्योंकि इन चार रूपों का स्वभाव और द्रव्य अन्य रूपों से महान् होते हैं तथा ये ही मूलभूत होते हैं इन चार महाभूतों का आश्रय लेकर ही वर्ण आदि अन्य रूपों की अभिव्यक्ति होती है। वर्ण, गन्ध आदि रूपों का हमें तभी प्रत्यक्ष हो सकता है, जबकि इनके मूल में संघातरूप महाभूत हों। जब महाभूतों का संघात रहेगा तब वर्ण गन्ध आदि का भी प्रत्यक्ष हो सकेगा।

मनुष्य के शरीर में विद्यमान चार महाभूतों के स्वभाव को समझने के लिए मृत्तिका से बनी हुई मुर्ति को उपमा से विचार किया जाता हे। एक-एक रूप-समुदाय (कलाप) में विद्यमान इन चार महाभूतों को प्राकृत चक्षु द्वारा नहीं देखा जा सकता, वे परमाणु नामक अत्यन्त सूक्ष्म रूप-समुदाय (कलाप) होते हैं अनेक रूपों (कलापों-रूप-समुदायों) का संघात होने पर ही उन्हें प्राकृत चक्षु द्वारा देखा जा सकता है। इस प्रकार अनेक रूप-समुदायों (कलापों) का संघात होने पर मनुष्य का भौतिक शरीर बन जाता है। भौतिक शरीर होने में मनुष्य के पूर्वकृत कर्म (चेतना) मुख्य कारण होते हैं।

निर्वाण

चित्त, चैतसिक और रूप धर्मों का यथार्थ ज्ञान हो जाने पर निर्वाण का साक्षात्कार किया जा सकता है। यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति करने के लिए साधना (विपश्यना) करना चाहिए। साधना (विपश्यना) के द्वारा जो ज्ञान को प्राप्त करता है, वह आर्यपुद्गल है, आर्यपुद्गल ही निर्वाण का साक्षात्कार कर सकते हैं। जिसके दु:ख और दु:ख के कारण (तृष्णा-समुदय) निवृत्त हो जाते हैं, वही निर्वाण का साक्षात्कार कर सकता है, अत: दु:ख तथा तृष्णा से आत्यन्तिकी निवृत्ति ही 'निर्वाण' कहलाता है। यद्यपि निर्वाण दु:खों से आत्यन्तिकी निवृत्ति मात्र का निरोध मात्र को कहते हैं, तथापि वह अभाव नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह आर्यजनों के द्वारा साक्षात करने योग्य है अर्थात् निर्वाण ज्ञानप्राप्त आर्यजनों का विषय (आलम्बन) होने से अभाव नहीं कहा जा सकता। वस्तुत: वह अत्यन्त सूक्ष्म धर्म होने से साधारण जनों के द्वारा जानने एवं कहने योग्य नहीं होने पर भी वह आर्यजनों का विषय होता है। इसलिए निर्वाण को एक परमार्थ धर्म कहते हैं।

निर्वाण शान्ति सुख लक्षण वाला है। यहाँ सुख दो प्रकार का होता है-

  1. शान्ति सुख एवं
  2. वेदयितसुख।

शान्तिसुख वेदयितसुख की तरह अनुभूतियोग्य सुख नहीं है। किसी एक विशेष वस्तु का अनुभव न होकर वह उपशमसुख मात्र है अर्थात् दु:खों से उपशम होना ही है। निर्वाण के स्वरूप के विषय में आजकल नाना प्रकार की विप्रतिपत्तियाँ हैं। कुछ लोग निर्वाण को रूप विशेष एवं नाम विशेष कहते हैं। कुछ लोग कहते हैं। कि नाम-रूपात्मक स्कन्ध के भीतर अमृत की तरह एक नित्यधर्म विद्यमान है, जो नामरूपों के निरुद्ध होने पर भी अवशिष्ट रहता है, उस नित्य, अजर, अमर, अविनाशी के रूप में विद्यमान रहना ही निर्वाण है, जैसे- अन्य भारतीय दार्शनिकों के मत में आत्मा। कुछ लोगों का मत है कि निर्वाण की अवस्था में यदि नामरूप धर्म न रहेंगे तो उस अवस्था में सुख का अनुभव भी कैसे होगा इत्यादि।

शील-विमर्श

शील विमर्श के अंतर्गत सामान्यतःआचरण मात्र आते हैं। विस्तार से पढ़ें- शील विमर्श

समाधि—विमर्श

समाधि

  • शोभन विषयों में प्रवृत्त राग, द्वेष मोह से रहित पवित्र चित्त (कुशल चित्त) की एकाग्रता (निश्चलता) को समाधि कहते हैं। समाधि का अर्थ समाधान है। अर्थात् एक आलम्बन (विषय) में चित्त चैतसिकों का बराबर (सम्) तथा भलीभांति (सम्यक्) प्रतिष्ठित होना या रखना (आघान) 'समाधन' है। इसलिए जिस तत्त्व के प्रभाव से एक आलम्बन में चित्त-चैतसिक बराबर और भलीभांति विक्षिप्त और विप्रकीर्ण न होते हुए स्थित होते हैं, उस तत्त्व को 'समाधि' कहते हैं।
  • पंतजलि ने भी चित्त की वृत्तियों के निरोध को 'योग' कहा है।[1]
  • व्यास ने योग को समाधि कहा है।[2]
  • वृत्तिकार ने योग का अर्थ 'समाधान' बतलाया है।[3]
  • इस प्रकार बौद्ध और बौद्धेत्तर आचार्यों ने 'समाधि' शब्द की व्युत्पत्ति समानरूप से की है।
  • अंगुत्तरनिकाय में बुद्ध ने समाधि की बहुलता से वर्तमान जीवन में सुखपूर्वक विहार (दृष्टिधर्म-सुखविहार), दिव्यचक्षु-ज्ञान, स्मृति-सम्प्रज्ञान से सम्पन्नता और क्लेश (आस्त्रव) क्षय आदि अनेक गुण बताये हैं।[4] इस प्रकार समाधि का अर्थ एकाग्रता से अधिक महनीय और गम्भीर सिद्ध होता है।

कर्मस्थान

कर्मस्थान दो प्रकार के होते हैं, यथा- शमथ कर्मस्थान और विपश्यना कर्मस्थान। योगी जिन आलम्बनों को अपने भावनाकृत्य की सम्पन्नता के लिए साधन बनाता है, उन्हें 'कर्मस्थान' कहते हैं। पृथ्वी, अप् आदि चालीस प्रकार के साधन 'समाधि' के आलम्बन' (शमथ कर्मस्थान) हैं। तथा पंचस्कन्धात्मक नाम-रूप आदि साधन प्रज्ञा के विषय (विपश्यना कर्मस्थान) हैं। आनापानस्मृति – बौद्ध साधना में श्वास और प्रश्वास को 'आनापान' कहते हैं। इसे ही पातंजल योग-दर्शन में 'प्राणायाम' कहा गया है। यह श्वास-प्रश्वास (आनापान) समाधिलाभ के लिए एक उत्कृष्ट साधन है। यह ठीक भी है, क्योंकि प्राण ही जीवन है। प्राण ही समस्त संसार का मूल कारण है। प्राण के बिना प्राणी का जीवित रहना असम्भव है। सभी जीवों के लिए प्राण अनिवार्य अंग है। जब से जीव जन्म लेता है, तभी से श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। इसलिए बौद्ध और बौद्धेतर भारतीय योगशास्त्र में प्राणायाम या आनापान का अत्यधिक महत्त्व प्रतिपादित किया गया है।

विशुद्धि और ज्ञान

यहाँ योगी नाम-रूप संस्कार धर्मों के प्रति केवल अनित्य या दु:ख या अनात्म की भावनामात्र से मार्ग एवं फल ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता, अपितु उसे संस्कार धर्मों की अनित्य, दु:ख एवं अनात्म-इन तीन स्वभावों (लक्षणो) से विपश्यना-भावना करनी पड़ती है। मार्ग प्राप्ति के पूर्व-क्षण में यदि संस्कार धर्मों के अनित्य स्वभाव को देखता है तो वह मार्ग एवं फल अनिमित्तविमोक्ष कहलाता है। यदि मार्ग प्राप्ति के पूर्व-क्षण में संस्कार धर्मों को दु:ख स्वभाव अथवा अनात्म स्वभाव देखता है तो वह मार्ग एवं फल अप्रणिहित अथवा शून्यताविमोक्ष कहलाता है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. योगश्चित्तवृत्तिनिरोध: 1:2
  2. योग: समाधि: 1:1 पर भाष्य
  3. योगो युक्ति: समाधनम् 1:1 पर भोजवृत्ति
  4. अंगु. चतुक्कनिपात 2-46

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