"श्रावस्ती का विकास": अवतरणों में अंतर
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'''श्रावस्ती''' [[हिमालय]] की तलहटी में बसे [[भारत]]-[[नेपाल]] सीमा के सीमावर्ती ज़िले [[बहराइच]] से महज 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। [[उत्तर प्रदेश]] के इस ज़िले की पहचान विश्व के कोने-कोने में आज बौद्ध तीर्थस्थल के रूप में है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस ऐतिहासिक नगरी का प्राचीनतम इतिहास [[रामायण]] और [[महाभारत]] काल के महाकाव्यों के अनुसार पहले ये उत्तर कौशल की राजधानी हुआ करती थी। | '''श्रावस्ती''' [[हिमालय]] की तलहटी में बसे [[भारत]]-[[नेपाल]] सीमा के सीमावर्ती ज़िले [[बहराइच]] से महज 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। [[उत्तर प्रदेश]] के इस ज़िले की पहचान विश्व के कोने-कोने में आज बौद्ध तीर्थस्थल के रूप में है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस ऐतिहासिक नगरी का प्राचीनतम इतिहास [[रामायण]] और [[महाभारत]] काल के महाकाव्यों के अनुसार पहले ये उत्तर कौशल की राजधानी हुआ करती थी। | ||
==नगर का विकास== | ==नगर का विकास== | ||
हमारे कुछ प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार कोसल का यह प्रधान नगर सर्वदा रमणीक, दर्शनीय, मनोरम और धनधान्य से संपन्न था। इसमें सभी तरह के उपकरण मौजूद थे। इसको देखने से लगता था, मानो देवपुरी अलकनन्दा ही साक्षात धरातल पर उतर आई हो। नगर की सड़कें चौड़ी थीं और इन पर बड़ी सवारियाँ भली भाँति आ सकती थीं। नागरिक शृंगार-प्रेमी थे। वे [[हाथी]], घोड़े और पालकी पर सवार होकर राजमार्गों पर निकला करते थे। इसमें राजकीय कोष्ठागार<ref>कोठार</ref> बने हुये थे, जिनमें [[घी]], तेल और खाने-पीने की चीज़ें प्रभूत मात्रा में एकत्र कर ली गई थीं।<ref name="sravasti"/> | हमारे कुछ प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार कोसल का यह प्रधान नगर सर्वदा रमणीक, दर्शनीय, मनोरम और धनधान्य से संपन्न था। इसमें सभी तरह के उपकरण मौजूद थे। इसको देखने से लगता था, मानो देवपुरी अलकनन्दा ही साक्षात धरातल पर उतर आई हो। नगर की सड़कें चौड़ी थीं और इन पर बड़ी सवारियाँ भली भाँति आ सकती थीं। नागरिक शृंगार-प्रेमी थे। वे [[हाथी]], घोड़े और पालकी पर सवार होकर राजमार्गों पर निकला करते थे। इसमें राजकीय कोष्ठागार<ref>कोठार</ref> बने हुये थे, जिनमें [[घी]], तेल और खाने-पीने की चीज़ें प्रभूत मात्रा में एकत्र कर ली गई थीं।<ref name="sravasti"/> | ||
==जेतवन का निर्माण== | ==जेतवन का निर्माण== | ||
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अनाथपिंडक ने जेतवन के भीतर कुछ और भी मठ बनवा दिये थे, जिनमें भिक्षु लोग रहते थे। इनमें प्रत्येक के निर्माण में एक लाख मुद्रायें ख़र्च हुई थीं। इसके अतिरिक्त उसने [[कुआँ|कुएँ]], तालाब और चबूतरे आदि का भी वहाँ निर्माण करा दिया था। बौद्ध ग्रन्थों में वर्णन मिलता है कि जेतवन में रहने वाले भिक्षु सुबह और शाम [[राप्ती नदी]] में नहाने के लिये आते थे। लगता है कि यह उद्यान इसके तट के समीप ही कहीं स्थित था। अनाथपिंडक ने अपने जीवन की सारी कमाई बौद्ध संघ के हित में लगा दी थी। उसके घर पर श्रमणों को बहुसंख्या में प्रति दिन यथेष्ट भोजन कराया जाता था। [[गौतम बुद्ध]] के प्रति श्रद्धा के कारण श्रावस्ती नरेशों ने इस नगर में दानगृह बनवा रखा था, जहाँ पर भिक्षुओं को भोजन मिलता था।<ref name="sravasti">{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=हमारे पुराने नगर |लेखक=डॉ. उदय नारायण राय |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=हिन्दुस्तान एकेडेमी, इलाहाबाद |पृष्ठ संख्या=43-46 |url=}}</ref> | अनाथपिंडक ने जेतवन के भीतर कुछ और भी मठ बनवा दिये थे, जिनमें भिक्षु लोग रहते थे। इनमें प्रत्येक के निर्माण में एक लाख मुद्रायें ख़र्च हुई थीं। इसके अतिरिक्त उसने [[कुआँ|कुएँ]], तालाब और चबूतरे आदि का भी वहाँ निर्माण करा दिया था। बौद्ध ग्रन्थों में वर्णन मिलता है कि जेतवन में रहने वाले भिक्षु सुबह और शाम [[राप्ती नदी]] में नहाने के लिये आते थे। लगता है कि यह उद्यान इसके तट के समीप ही कहीं स्थित था। अनाथपिंडक ने अपने जीवन की सारी कमाई बौद्ध संघ के हित में लगा दी थी। उसके घर पर श्रमणों को बहुसंख्या में प्रति दिन यथेष्ट भोजन कराया जाता था। [[गौतम बुद्ध]] के प्रति श्रद्धा के कारण श्रावस्ती नरेशों ने इस नगर में दानगृह बनवा रखा था, जहाँ पर भिक्षुओं को भोजन मिलता था।<ref name="sravasti">{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=हमारे पुराने नगर |लेखक=डॉ. उदय नारायण राय |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=हिन्दुस्तान एकेडेमी, इलाहाबाद |पृष्ठ संख्या=43-46 |url=}}</ref> | ||
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[[श्रावस्ती]] की भौतिक समृद्धि का प्रमुख कारण यह था कि यहाँ पर तीन प्रमुख व्यापारिक पथ मिलते थे, जिससे यह व्यापार का एक महान केंद्र बन गया था। यह नगर पूर्व में [[राजगृह]] से, उत्तर-पश्चिम में [[तक्षशिला]] से और दक्षिण में [[प्रतिष्ठान]] से जुड़ा हुआ था।<ref>विशुद्धानंद पाठक, हिस्ट्री आफ कोशल, (मोतीलाल बनारसीदास, [[वाराणसी]], 1963), पृष्ठ 59</ref> राजगृह से 45 योजन दूर आकर [[बुद्ध]] (शास्ता) ने श्रावस्ती में विहार किया था- | [[श्रावस्ती]] की भौतिक समृद्धि का प्रमुख कारण यह था कि यहाँ पर तीन प्रमुख व्यापारिक पथ मिलते थे, जिससे यह व्यापार का एक महान केंद्र बन गया था। यह नगर पूर्व में [[राजगृह]] से, उत्तर-पश्चिम में [[तक्षशिला]] से और दक्षिण में [[प्रतिष्ठान]] से जुड़ा हुआ था।<ref>विशुद्धानंद पाठक, हिस्ट्री आफ कोशल, (मोतीलाल बनारसीदास, [[वाराणसी]], 1963), पृष्ठ 59</ref> राजगृह से 45 योजन दूर आकर [[बुद्ध]] (शास्ता) ने श्रावस्ती में विहार किया था- | ||
12:38, 22 मार्च 2017 का अवतरण
श्रावस्ती का विकास
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विवरण | श्रावस्ती उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों में से एक है। बौद्ध एवं जैन तीर्थ स्थानों के लिए श्रावस्ती प्रसिद्ध है। यहाँ के उत्खनन से पुरातत्त्व महत्त्व की कई वस्तुएँ मिली हैं। |
ज़िला | श्रावस्ती |
निर्माण काल | प्राचीन काल से ही रामायण, महाभारत तथा जैन, बौद्ध साहित्य आदि में अनेक उल्लेख। |
मार्ग स्थिति | श्रावस्ती बलरामपुर से 17 कि.मी., लखनऊ से 176 कि.मी., कानपुर से 249 कि.मी., इलाहाबाद से 262 कि.मी., दिल्ली से 562 कि.मी. की दूरी पर है। |
प्रसिद्धि | पुरावशेष, ऐतिहासिक एवं पौराणिक स्थल। |
कब जाएँ | अक्टूबर से मार्च |
कैसे पहुँचें | हवाई जहाज़, रेल, बस आदि से पहुँचा जा सकता है। |
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लखनऊ हवाई अड्डा |
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बलरामपुर रेलवे स्टेशन |
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मेगा टर्मिनस गोंडा, श्रावस्ती शहर से 50 कि.मी. की दूरी पर है |
संबंधित लेख | जेतवन, शोभनाथ मन्दिर, मूलगंध कुटी विहार, कौशल महाजनपद आदि।
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श्रावस्ती हिमालय की तलहटी में बसे भारत-नेपाल सीमा के सीमावर्ती ज़िले बहराइच से महज 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। उत्तर प्रदेश के इस ज़िले की पहचान विश्व के कोने-कोने में आज बौद्ध तीर्थस्थल के रूप में है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस ऐतिहासिक नगरी का प्राचीनतम इतिहास रामायण और महाभारत काल के महाकाव्यों के अनुसार पहले ये उत्तर कौशल की राजधानी हुआ करती थी।
नगर का विकास
हमारे कुछ प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार कोसल का यह प्रधान नगर सर्वदा रमणीक, दर्शनीय, मनोरम और धनधान्य से संपन्न था। इसमें सभी तरह के उपकरण मौजूद थे। इसको देखने से लगता था, मानो देवपुरी अलकनन्दा ही साक्षात धरातल पर उतर आई हो। नगर की सड़कें चौड़ी थीं और इन पर बड़ी सवारियाँ भली भाँति आ सकती थीं। नागरिक शृंगार-प्रेमी थे। वे हाथी, घोड़े और पालकी पर सवार होकर राजमार्गों पर निकला करते थे। इसमें राजकीय कोष्ठागार[1] बने हुये थे, जिनमें घी, तेल और खाने-पीने की चीज़ें प्रभूत मात्रा में एकत्र कर ली गई थीं।[2]
जेतवन का निर्माण

वहाँ के नागरिक गौतम बुद्ध के बहुत बड़े भक्त थे। 'मिलिन्दप्रश्न' नामक ग्रन्थ में चढ़ाव-बढ़ाव के साथ कहा गया है कि इसमें भिक्षुओं की संख्या 5 करोड़ थी। इसके अलावा वहाँ के तीन लाख सत्तावन हज़ार गृहस्थ बौद्ध धर्म को मानते थे। इस नगर में 'जेतवन' नाम का एक उद्यान था, जिसे वहाँ के 'जेत' नामक राजकुमार ने आरोपित किया था। इस नगर का अनाथपिंडक नामक सेठ जो बुद्ध का प्रिय शिष्य था, इस उद्यान के शान्तिमय वातावरण से बड़ा प्रभावित था। उसने इसे ख़रीद कर बौद्ध संघ को दान कर दिया था।[2] बौद्ध ग्रन्थों में कथा आती है कि इस पूँजीपति ने जेतवन को उतनी मुद्राओं में ख़रीदा था, जितनी कि बिछाने पर इसके पूरे फ़र्श को भली प्रकार ढक देती थीं। उसने इसके भीतर एक मठ भी बनवा दिया, जो कि श्रावस्ती आने पर बुद्ध का विश्रामगृह हुआ करता था। इसे लोग 'कोसल मन्दिर' भी कहते थे।
अनाथपिंडक ने जेतवन के भीतर कुछ और भी मठ बनवा दिये थे, जिनमें भिक्षु लोग रहते थे। इनमें प्रत्येक के निर्माण में एक लाख मुद्रायें ख़र्च हुई थीं। इसके अतिरिक्त उसने कुएँ, तालाब और चबूतरे आदि का भी वहाँ निर्माण करा दिया था। बौद्ध ग्रन्थों में वर्णन मिलता है कि जेतवन में रहने वाले भिक्षु सुबह और शाम राप्ती नदी में नहाने के लिये आते थे। लगता है कि यह उद्यान इसके तट के समीप ही कहीं स्थित था। अनाथपिंडक ने अपने जीवन की सारी कमाई बौद्ध संघ के हित में लगा दी थी। उसके घर पर श्रमणों को बहुसंख्या में प्रति दिन यथेष्ट भोजन कराया जाता था। गौतम बुद्ध के प्रति श्रद्धा के कारण श्रावस्ती नरेशों ने इस नगर में दानगृह बनवा रखा था, जहाँ पर भिक्षुओं को भोजन मिलता था।[2]
व्यापार का केंद्र

श्रावस्ती की भौतिक समृद्धि का प्रमुख कारण यह था कि यहाँ पर तीन प्रमुख व्यापारिक पथ मिलते थे, जिससे यह व्यापार का एक महान केंद्र बन गया था। यह नगर पूर्व में राजगृह से, उत्तर-पश्चिम में तक्षशिला से और दक्षिण में प्रतिष्ठान से जुड़ा हुआ था।[3] राजगृह से 45 योजन दूर आकर बुद्ध (शास्ता) ने श्रावस्ती में विहार किया था-
'राजगंह कपिलवस्थुतो दूरं सट्ठि योजनानि, सावत्थि पन पंचदश। सत्था राजगहतो पंचतालीसयोजनं आगन्त्या सावत्थियं विहरति।'[4]
श्रावस्ती से राजगृह का रास्ता वैशाली से होकर गुजरता था। यह मार्ग सेतव्य, कपिलवस्तु, कुशीनारा[5], पावा, भोगनगर और वैशाली से होकर जाता था।[6] प्रतिष्ठान को जाने वाला मार्ग साकेत, कोशांबी, विदिशा, गोनधा और उज्जैन से होकर गुजरता था। इस नगर का संबंध वाराणसी से भी था।[7] इन दोनों के मध्य कोटागिरी नामक स्थान पड़ता था।[8] श्रावस्ती से तक्षशिला का मार्ग सोरेय्य आधुनिक सोरों होते हुए जाता था। इस मार्ग में सार्थ निरंतर चलते रहते थे।[9] इस प्रकार हम देखते हैं कि श्रावस्ती का बौद्ध काल में भारत के सभी प्रमुख नगरों से घनिष्ठ व्यापारिक संबंध था।
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श्रावस्ती का विकास | ![]() |
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टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ कोठार
- ↑ 2.0 2.1 2.2 हमारे पुराने नगर |लेखक: डॉ. उदय नारायण राय |प्रकाशक: हिन्दुस्तान एकेडेमी, इलाहाबाद |पृष्ठ संख्या: 43-46 |
- ↑ विशुद्धानंद पाठक, हिस्ट्री आफ कोशल, (मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी, 1963), पृष्ठ 59
- ↑ मच्झिमनिकाय, अट्ठकथा, 1/3/4
- ↑ कुशीनगर
- ↑ पावामोतीचंद्र, सार्थवाह, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना, 1953), पृष्ठ 17
- ↑ सुत्तनिपात (सारनाथ संस्करण), पृष्ठ 212-13
- ↑ मच्झिमनिकाय, पालि टेक्स्ट् सोसायटी, लंदन, भाग 1, पृष्ठ 473; मोतीचंद्र, सार्थवाह, पृष्ठ 17
- ↑ भरतसिंह उपाध्याय, बुद्धकालीन भारतीय भूगोल, पृष्ठ 239
- ऐतिहासिक स्थानावली | विजयेन्द्र कुमार माथुर | वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग | मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार
बाहरी कड़ियाँ
- श्रावस्ती
- श्रावस्ती भ्रमण
- श्री श्रावस्ती, यू.पी.
- Sravasti, Uttar Pradesh, India
- The ancient geography of India, Volume 1 (By Sir Alexander Cunningham), ऑन लाइन पढ़िये और सुनिये
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