बाबूराम सक्सेना  

बाबूराम सक्सेना
बाबूराम सक्सेना
पूरा नाम बाबूराम सक्सेना
जन्म 1897 ई.
जन्म भूमि लखीमपुर
मुख्य रचनाएँ 'अर्थ-विज्ञान (1951 ई.)', 'सामान्य भाषा-विज्ञान (1953 ई.)','दक्खिनी हिन्दी' (1943 ई.)
भाषा हिन्दी
प्रसिद्धि भाषावैज्ञानिक
नागरिकता भारतीय
पद रायपुर विश्व विद्यालय तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति रहे।
अन्य जानकारी बाबूराम सक्सेना का प्रबन्ध हिन्दी के भाषावैज्ञानिकों के लिए आदर्श और मानक रूप में रहा है। भाषाविज्ञान के सैद्धांतिक पक्षों पर भी इन्होंने विचार किया है।

बाबूराम सक्सेना (जन्म-1897 ई., लखीमपुर) भारत के भाषावैज्ञानिक थे। ये प्रयाग विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग अध्यक्ष थे। प्रारम्भ से ही राष्ट्रीय दृष्टिकोण होने के कारण भारतीय संस्कृति और हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में इनकी विशेष रुचि रही हैं।

परिचय

बाबूराम सक्सेना का जन्म 1897 ई. में लखीमपुर जिले में हुआ। इनकी शिक्षा एम. ए., डी. लिट. प्रयाग तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में और लन्दन स्कूल ऑफ ओरियण्टल स्टडीज में हुई। बाबूराम जी शोध-प्रबन्ध 'अवधी का विकास' हिन्दी से सम्बद्ध पहला प्रबन्ध माना जाता है।

बाबूराम ने अनेक वर्षों तक प्रयाग विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग अध्यक्ष रहे। फिर कुछ समय तक सागर विश्वविद्यालय में भाषाविज्ञान विभाग के अध्यक्ष रहे। इसके बाद क्रमश: तकनीकी शब्दावली आयोग के अध्यक्ष और रायपुर विश्व विद्यालय के कुलपति तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। संस्कृत और भाषाविज्ञान दोंनों ही इनके कार्य की प्रमुख दिशाएँ हैं। हिन्दी के भाषावैज्ञानिकों में बाबूराम का नाम आग्रणी है। इनके उद्योग और प्रेरणा से हिन्दी क्षेत्र में भाषाविज्ञान सम्बन्धी कार्य हुआ। हिन्दी साहित्य सम्मेलन, लिंग्विस्टिक सोसाइटी ऑफ इण्डिया, भारतीय हिन्दी-परिषद जैसी संस्थाओं में घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध रहे हैं और उनके अधिवेशनों की अध्यक्षता की है। प्रारम्भ से ही राष्ट्रीय दृष्टिकोण होने के कारण भारतीय संस्कृति और हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में विशेष रुचि रही हैं।

डॉक्टर टर्नर का सहयोग

डॉक्टर सक्सेना का शोध-प्रबन्ध 'अवधी का विकास' अपने ढंग का पहला अध्ययन है। इंग्लैण्ड में रहकर प्रसिद्ध भाषाविज्ञानी डॉक्टर टर्नर के सहयोग में बाबूराम ने कार्य किया था। 'अवधी का विकास' में प्रयोगात्मक ध्वनि-विज्ञान के निष्कर्षों का प्रथम बार प्रयोग हुआ है। वस्तुत: आपका प्रबन्ध हिन्दी के भाषावैज्ञानिकों के लिए आदर्श और मानक रूप में रहा है। भाषा-विज्ञान के सैद्धांतिक पक्षों पर भी इन्होंने विचार किया है।[1]

कृतियाँ

  • अर्थ-विज्ञान (1951 ई.)
  • सामान्य भाषा-विज्ञान (1953 ई.)
  • दक्खिनी हिन्दी' (1943 ई.)
  • कीर्त्तिलता' (सम्पादन- 1930 ई.)
  • एवल्यूशन ऑफ अवशी' (अंग्रेजी में 1938 ई.)।
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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी साहित्य कोश भाग-2 |लेखक: डॉ. धीरेन्द्र वर्मा |प्रकाशक: ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 377 |

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