लाला श्रीनिवासदास

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लाला श्रीनिवासदास (अंग्रेज़ी: Lala Shrinivas Das, जन्म- 1850; मृत्यु- 1907) को हिंदी का पहला उपन्यास लिखने का गौरव प्राप्त है। नाटक लेखन में वे भारतेंदु हरिश्चंद्र के समकक्ष माने जाते थे। लाला जी मथुरा, उत्तर प्रदेश के निवासी थे और हिंदी, उर्दू, संस्कृत, फ़ारसी और अंग्रेज़ी के अच्छे ज्ञाता थे।

लेखन कार्य

भारतेंदु के सम-सामयिक लेखकों में लाला श्रीनिवासदास का भी एक विशेष स्थान था। उन्होंने कई नाटक लिखे हैं-

  • "प्रह्लाद चरित्र" 11 दृश्यों का एक बड़ा नाटक है, पर उसके संवाद आदि रोचक नहीं हैं। भाषा भी अच्छी नहीं है।
  • "तप्ता-संवरण नाटक" सन 1874 के 'हरिश्चंद्र मैगजीन' में छपा था, पीछे सन 1883 ई. में पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ। इसमें तप्ता और संवरण की पौराणिक प्रेम कथा है।
  • लाला श्रीनिवासदास के "रणधीर और प्रेममोहनी" नाटक की उस समय अधिक चर्चा हुई थी। पहले पहल यह नाटक संवत 1934 में प्रकाशित हुआ था और इसके साथ एक भूमिका थी जिसमें नाटकों के संबंध में कई बातें अंग्रेज़ी नाटकों पर दृष्टि रखकर लिखी गई थीं। यह स्पष्ट जान पड़ता है कि यह नाटक उन्होंने अंग्रेज़ी नाटकों के ढंग पर लिखा था।
  • 'रणधीर और प्रेममोहनी' नाम ही "रोमियो ऐंड जुलियट" की ओर ध्यान ले जाता है। कथा-वस्तु भी इसकी सामान्य प्रथानुसार पौराणिक या ऐतिहासिक न होकर कल्पित है। पर यह वस्तु-कल्पना मध्ययुग के राजकुमार-राजकुमारियो के क्षेत्र के भीतर ही हुई है।
  • लालाजी का "संयोगता-स्वयंवर" नाटक सबसे पीछे का है। यह पृथ्वीराज चौहान द्वारा संयोगिता के हरण का प्रचलित प्रवाद लेकर लिखा गया है।
  • श्रीनिवासदास ने "परीक्षागुरु" नाम का एक शिक्षाप्रद उपन्यास भी लिखा।

भाषा शैली

लाला श्रीनिवासदास खड़ी बोली की बोलचाल के शब्द और मुहावरे अच्छे लाते थे। उपर्युक्त चारों लेखकों में प्रतिभाशालियों को मनमौजीपन था, पर लाला श्रीनिवासदास व्यवहार में दक्ष और संसार का ऊँचा-नीचा समझने वाले पुरुष थे। अतः उनकी भाषा संयत और साफ-सुथरी तथा रचना बहुत कुछ सोद्देश्य होती थी।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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