लोमश ऋषि  

लोमश ऋषि परम तपस्वी तथा विद्वान थे। इन्हें पुराणों में अमर माना गया है। हिन्दू महाकाव्य महाभारत के अनुसार ये पाण्डवों के ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर के साथ तीर्थयात्रा पर गये थे और उन्हें सब तीर्थों का वृत्तान्त इन्होंने बतलाया था। लोमश ऋषि बड़े-बड़े रोमों या रोओं वाले थे। इन्होंने भगवान शिव से यह वरदान पाया था कि एक कल्प के बाद मेरा एक रोम गिरे और इस प्रकार जब मेरे शरीर के सारे के सारे रोम गिर जाऐं, तब मेरी मृत्यु हो।

प्रवचन तथा शाप

जब लोमश ऋषि प्रवचन करते थे तो सभी श्रोता तन्मय होकर उनका प्रवचन सुनते और लाभान्वित होते। एक दिन वह प्रवचन कर रहे थे। श्रोताओं में चपल स्वभाव का एक व्यक्ति बैठा था, जो बार-बार ऋषि से प्रश्न पूछ कर प्रवचन में बाधा डाल रहा था। कभी पूछता, 'क्या आपने भगवान के दर्शन किए हैं', तो कभी पूछता, 'हम उनके दर्शन कैसे कर सकते हैं?' इससे ऋषि की एकाग्रता भंग हो रही थी। बार-बार व्यवधान पड़ने से आखिरकार लोमश ऋषि का धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने उस व्यक्ति को शाप दिया कि- "कौवे की तरह कांव-कांव कर रहा है, शायद पहले जन्म में कौवा था और अगले जन्म में भी कौवा ही होगा।"

पश्चाताप

लोमश ऋषि ने क्रोध में उस व्यक्ति को शाप तो दे दिया, लेकिन बाद में उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ और वे बहुत दु:खी हुए। उन्होंने देखा कि मेरे द्वारा इतना भयंकर शाप देने के बाद भी वह व्यक्ति शांत बैठा प्रवचन सुन रहा है। उनको इस बात का आश्चर्य हुआ तो उन्होंने पूछ ही लिया- "मेरे शाप से तुम्हें चिंता नहीं हुई? कौवे की योनि तो निम्न मानी गई है। इस तरह का शाप सुनकर भी तुम विचलित नहीं हुए। आखिर बात क्या है, इसका रहस्य क्या है?" उस व्यक्ति ने हाथ जोड़ कर कहा- "इसमें आश्चर्य और रहस्य जैसी कोई बात नहीं है। जो होता है प्रभु की इच्छा से ही होता है, फिर मैं क्यों चिंता करूँ? यदि मैं कौवा बना तो उसमें भी मेरा भला ही होगा। आप जैसे ऋषि एवं परम तपस्वी ने कुछ सोचकर ही यह शाप दिया होगा।"

लोमश ऋषि उस व्यक्ति का यह श्रद्धा भाव देख कर चकित रह गए। उन्होंने कहा- "अब मैं तुम्हें वर देता हूँ कि तुम कौवे के रूप में जहाँ रहोगे, उस क्षेत्र में दूर-दूर तक कलियुग का प्रभाव नहीं पड़ेगा। तुम भक्त पक्षी के रूप में अमरता प्राप्त करोगे।" पुराणों के अनुसार उस व्यक्ति ने अगले जन्म में काकभुशुंडी नामक एक ब्राह्मण के रूप में जन्म लिया, जिसने गरुड़ को रामकथा सुनाई थी।

राजा दशरथ व ऋषि लोमश

एक बार चक्रवर्ती राजा दशरथ अपने लिए एक नये किले की नींव खुदवा रहे थे। उस समय लोमश ऋषि वहाँ आ गऐ। उन्होंने काम कर रहे आदमियों से पूछा- "यह क्या हो रहा है?" आदमियों ने उत्तर दिया- "चक्रवर्ती महाराज दशरथ के किले की नींव खोदी जा रही है।" लोमश ऋषि ने कहा- "जाओ राजा दशरथ से कहो कि लोमश ऋषि ने उन्हें बुलाया है।" महाराजा दशरथ ने ज्यों ही यह सुना तो शीघ्र ही ऋषि के पास दौड़े चले आऐ। उनके समीप जाकर दण्डवत किया और हाथ जोड़कर बोले- "ऋषीवर ! इस दास के लिए क्या आज्ञा है?" ऋषि लोमश ने महाराज दशरथ की ओर बड़ी ही करुणा भरी दृष्टि से देखा और बोले- "राजन ! मुझे एक बात पूछनी है और वह यह कि- "आपको इस मृत्युलोक में कितने दिनों तक रहना है?" राजा दशरथ ने बड़े ही विनीत भाव से उत्तर दिया- "ऋषि श्रेष्ठ ! यह तो मुझे मालूम नहीं।" लोमश ऋषि ने कहा- "राजन ! इतना तो आप जानते ही होंगे कि एक न एक दिन आपको यह जगत छोड़कर जाना है। अधिक से अधिक हजार वर्ष रह जाऐंगे, बस इससे अधिक तो नहीं न? किन्तु मेरे विषय में सुन लो।[1]

जब भगवान शंकर को मैंने तपस्या कर प्रसन्न कर लिया और आशुतोष भगवान ने मुझसे वर मांगने को कहा तो मैंने कहा- "देवाधिदेव ! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो मेरा यह नर तन अजर-अमर कर दीजिऐ, क्योंकि मुझे मृत्यु से बड़ा भय लगता है। भगवान शंकर ने तुरन्त कहा- "लोमश ! यह नहीं हो सकता। इस मृत्युलोक की सारी चीजें नश्वर हैं और देर-सबेर सभी विनाश को प्राप्त होंगी। यह अटूट ईश्वरीय विधान है, इसको कोई नहीं बदल सकता। अतः तुम्हारे इस भौतिक शरीर को मैं भी अजर-अमर नहीं कर सकता। हाँ, आयु चाहे कितनी मांग लो। सीमा बांध लो, क्योंकि सारे भौतिक तत्व सीमित हैं। यह तुम्हारा शरीर भी इन्हीं भौतिक तत्वों का बना है। इसलिए यह असीम नहीं हो सकता।" राजन ! देवाधिदेव की लाचारी जानकर मैंने कहा- "अच्छा! तो मैं यह मांगता हूँ कि एक कल्प के बाद मेरा एक रोम गिरे और इस प्रकार जब मेरे शरीर के सारे के सारे रोम गिर जाऐं, तब मेरी मृत्यु हो। भगवान शंकर 'एवमस्तु' कहकर तुरन्त अंर्त्ध्यान हो गऐ।" लोमश ऋषि ने आगे कहा कि- "जब कोई मुझसे कुटिया बनाकर रहने के लिए कहता है तो मेरे सामने मृत्यु नाचने लगती है और मैं कह देता हूँ कि जब इस देश में रहना ही नहीं है तो कुटिया क्यों बनाऊँ? अभी मेरे तो एक पैर के घुटने तक रोम झड़े हैं। इस हिसाब से तो अभी मुझे बहुत वर्ष तक इस मृत्युलोक में रहना है।

उपदेश

दशरथ मृत्यु के भय से कांपने लगे और लोमश ऋषि के चरणों में गिर गऐ और कहने लगे- "भगवन ! मैं समझ गया। अपने बाहुबल से सारे संसार पर विजय प्राप्त कर मैंने यह विचार किया था कि अब इस किले का निर्माण कर पूर्ण सुरक्षित रूप से आनन्द का जीवन बिताऊँगा। किन्तु मुझे अब ज्ञान हुआ है कि मैं काल से सुरक्षित नहीं रह सकता। मुझे सत्य का उपदेश दीजिऐ। लोमश ऋषी ने कहा- "राजन ! संसार में जितना यश प्राप्त करना था, आपने किया। परन्तु अभी तक आपने अपने लिए कुछ नहीं किया। पता नहीं कब शरीर छूट जाऐ। आप सद्गुरू उपदेश लेकर अपना कार्य करें, जिससे आत्मा को परमात्मा की प्राप्ति हो जाऐ और वह सदा के लिए मृत्यु भय से निर्भय हो जाऐ। यही इस देह धरे का सार है। मैंने अपना काम कर लिया है। किन्तु क्या करूँ, अब वरदान के कारण मुझे अपनी इच्छा के विरुद्ध यहाँ रहना पड़ रहा है।" राजा दशरथ लोमश ऋषि का आशय समझ गऐ और किले के निर्माण के इरादे को छोड़ दिया।


पन्ने की प्रगति अवस्था
आधार
प्रारम्भिक
माध्यमिक
पूर्णता
शोध

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. मृत्यु निश्चित है (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 19 अक्टूबर, 2013।

बाहरी कड़ियाँ

संबंधित लेख

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://bharatdiscovery.org/bharatkosh/w/index.php?title=लोमश_ऋषि&oldid=605078" से लिया गया