नीराजन विधि  

  • भारत में धार्मिक व्रतों का सर्वव्यापी प्रचार रहा है। यह हिन्दू धर्म ग्रंथों में उल्लिखित हिन्दू धर्म का एक व्रत संस्कार है।
  • कार्तिक कृष्ण पक्ष की द्वादशी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तक (पूर्णिमान्त गणना से) यह व्रत किया जाता है।
  • राजा के लिए सम्पादित।
  • राजा को राजधानी की उत्तर-पूर्व दिशा में एक बृहद् पण्डाल खड़ा करना चाहिए, जिस पर झण्डे आदि एवं तीन तोरण खड़े करने चाहिए।
  • देव पूजा एवं होम करना चाहिए।
  • जब सूर्य चित्रा नक्षत्र से स्वाति नक्षत्र में प्रवेश करता है तो कृत्य आरम्भ होते हैं और सम्पूर्ण स्वाति तक चलते रहते हैं।
  • जलपूर्ण पात्र जो पल्लवों एवं पाँच रंग के धागों से अलंकृत रहते हैं। तोरण के पश्चिम में गज एवं अश्व मन्त्रों के साथ नहलाये जाते हैं।
  • पुरोहित एक हाथी को भोजन अर्पित करता है।
  • यदि हाथी उसे प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण कर लेता है तो विजय की भविष्यवाणी होती है।
  • यदि वह ग्रहण नहीं करता है तो महान् भय का पूर्ण निर्देश मिलता है।
  • हाथी की अन्य क्रियाओं से भाँति-भाँति की भविष्यवाणियाँ की जाती हैं।
  • आयुधों एवं राजकीय प्रतीकों, यथा—छत्र एवं ध्वज की पूजा; जब तक सूर्य स्वाति में रहते हैं, अश्वों एवं हाथियों को सम्मानित किया जाता है।
  • उन्हें कठोर शब्द नहीं कहे जाते हैं और न ही उन्हें किसी भी प्रकार से पीटा जाता है।
  • मण्डप की रक्षा आयुधों से सज्जित कर्मचारी करते रहते हैं और ज्योतिषी, पुरोहित एवं मुख्य पशु-चिकित्सक तथा गज वैद्य को मण्डप में सदा उपस्थित रहना चाहिए।
  • उस दिन जब सूर्य स्वाति को छोड़कर विशाखा में प्रविष्ट होता है, तब घोड़ों एवं हाथियों को अलंकृत किया जाता है, उन पर तलवार एवं छत्र, ढोल आदि पर मन्त्रों का पाठ किया जाता है।
  • सर्वप्रथम राजा अपने घोड़े पर बैठता है और फिर अपेन हाथी पर बैठता है, तोरण से बाहर आता है तथा अपनी सेना एवं नागरिकों के साथ राज-प्रासाद की ओर बढ़ता है और वहाँ पहुँचकर लोगों को सम्मानित करता है और सब से छुट्टी लेता है।
  • यह शान्ति कृत्य है और राजाओं द्वारा घोड़ों तथा हाथियों की वृद्धि एवं कल्याण के लिए किया जाना चाहिए।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हेमाद्रि (व्रतखण्ड 2, 675-680, विष्णुधर्मोत्तरपुराण 2|159 से उद्धरण)। देखिए मूलग्रन्थ, खण्ड 3, पृ0 230-231। और देखिए कृत्यरत्नाकर (333-336); स्मृतिकौस्तुभ (334-341)। नीराजन एक शान्ति है; राजनीतिप्रकाश (पृष्ठ 433-437, विष्णुधर्मोत्तरपुराण से उद्धरण)।
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