गुप्त नवरात्र  

(गुप्त नवरात्रे से पुनर्निर्देशित)
गुप्त नवरात्र
देवी दुर्गा
अन्य नाम माघी नवरात्र, आषाढ़ी नवरात्र
अनुयायी हिन्दू, भारतीय
तिथि गुप्त नवरात्र माघ मास में शुक्ल पक्षआषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में आते हैं।
उत्सव इन दिनों में देवी दुर्गा के व्रत रखे जाते हैं और स्थान–स्थान पर माँ की मूर्तियाँ बनाकर उनकी विशेष पूजा की जाती है।
संबंधित लेख शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री
विवरण 'चैत्र' या 'वासंतिक नवरात्र' और 'आश्विन' या 'शारदीय नवरात्र' के अतिरिक्त भी दो और नवरात्र होते हैं, जिन्हें 'गुप्त नवरात्र' कहा जाता है।
महत्त्व गुप्त नवरात्रों को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने से कई बाधाएँ समाप्त हो जाती हैं, जैसे- विवाह, नौकरी, रोग, धन-सम्पदा, ग्रहों का विपरीत प्रभाव आदि।
अन्य जानकारी "शिवसंहिता" के अनुसार गुप्त नवरात्र भगवान शंकर और आदिशक्ति माँ पार्वती की उपासना के लिए भी श्रेष्ठ हैं।

गुप्त नवरात्र हिन्दू धर्म में उसी प्रकार मान्य हैं, जिस प्रकार 'शारदीय' और 'चैत्र नवरात्र'। आषाढ़ और माघ माह के नवरात्रों को "गुप्त नवरात्र" कह कर पुकारा जाता है। बहुत कम लोगों को ही इसके ज्ञान या छिपे हुए होने के कारण इसे 'गुप्त नवरात्र' कहा जाता है। गुप्त नवरात्र मनाने और इनकी साधना का विधान 'देवी भागवत' व अन्य धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। श्रृंगी ऋषि ने गुप्त नवरात्रों के महत्त्व को बतलाते हुए कहा है कि- "जिस प्रकार वासंतिक नवरात्र में भगवान विष्णु की पूजा और शारदीय नवरात्र में देवी शक्ति की नौ देवियों की पूजा की प्रधानता रहती है, उसी प्रकार गुप्त नवरात्र दस महाविद्याओं के होते हैं। यदि कोई इन महाविद्याओं के रूप में शक्ति की उपासना करें, तो जीवन धन-धान्य, राज्य सत्ता और ऐश्वर्य से भर जाता है।

तिथि

सामान्यत: लोग वर्ष में पड़ने वाले केवल दो नवरात्रों के बारे में ही जानते हैं- 'चैत्र' या 'वासंतिक नवरात्र' व 'आश्विन' या 'शारदीय नवरात्र', जबकि इसके अतिरिक्त दो और नवरात्र भी होते हैं, जिनमें विशेष कामनाओं की सिद्धि की जाती है। कम लोगों को इसका ज्ञान होने के कारण या इसके छिपे हुए होने के कारण ही इसको "गुप्त नवरात्र" कहते हैं। वर्ष में दो बार गुप्त नवरात्र आते हैं- माघ मास के शुक्ल पक्षआषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में। इस प्रकार कुल मिला कर वर्ष में चार नवरात्र होते हैं। यह चारों ही नवरात्र ऋतु परिवर्तन के समय मनाये जाते हैं। इस विशेष अवसर पर अपनी विभिन्न मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए पूजा-पाठ आदि किये जाते हैं।

महत्त्व

गुप्त नवरात्रों का बड़ा ही महत्त्व बताया गया है। मानव के समस्त रोग-दोष व कष्टों के निवारण के लिए गुप्त नवरात्र से बढ़कर कोई साधना काल नहीं हैं। श्री, वर्चस्व, आयु, आरोग्य और धन प्राप्ति के साथ ही शत्रु संहार के लिए गुप्त नवरात्र में अनेक प्रकार के अनुष्ठान व व्रत-उपवास के विधान शास्त्रों में मिलते हैं। इन अनुष्ठानों के प्रभाव से मानव को सहज ही सुख व अक्षय ऎश्वर्य की प्राप्ति होती है। "दुर्गावरिवस्या" नामक ग्रंथ में स्पष्ट लिखा है कि साल में दो बार आने वाले गुप्त नवरात्रों में भी माघ में पड़ने वाले गुप्त नवरात्र मानव को न केवल आध्यात्मिक बल ही प्रदान करते हैं, बल्कि इन दिनों में संयम-नियम व श्रद्धा के साथ माता दुर्गा की उपासना करने वाले व्यक्ति को अनेक सुख व साम्राज्य भी प्राप्त होते हैं। "शिवसंहिता" के अनुसार ये नवरात्र भगवान शंकर और आदिशक्ति माँ पार्वती की उपासना के लिए भी श्रेष्ठ हैं।[1] गुप्त नवरात्रों को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने से कई बाधाएँ समाप्त हो जाती हैं, जैसे-

विवाह बाधा

वे कुमारी कन्याएँ जिनके विवाह में बाधा आ रही हो, उनके लिए गुप्त नवरात्र बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। कुमारी कन्याओं को अच्छे वर की प्राप्ति के लिए इन नौ दिनों में माता कात्यायनी की पूजा-उपासना करनी चाहिए। "दुर्गास्तवनम्" जैसे प्रामाणिक प्राचीन ग्रंथों में लिखा है कि इस मंत्र का 108 बार जप करने से कुमारी कन्या का विवाह शीघ्र ही योग्य वर से संपन्न हो जाता है-

कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरू ते नम:।।

  • इसी प्रकार जिन पुरुषों के विवाह में विलंब हो रहा हो, उन्हें भी लाल रंग के पुष्पों की माला देवी को चढ़ाकर निम्न मंत्र का 108 बार जप पूरे नौ दिन तक करने चाहिए-

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।

देवी की महिमा

शास्त्र कहते हैं कि आदिशक्ति का अवतरण सृष्टि के आरंभ में हुआ था। कभी सागर की पुत्री सिंधुजा-लक्ष्मी तो कभी पर्वतराज हिमालय की कन्या अपर्णा-पार्वती। तेज, द्युति, दीप्ति, ज्योति, कांति, प्रभा और चेतना और जीवन शक्ति संसार में जहाँ कहीं भी दिखाई देती है, वहाँ देवी का ही दर्शन होता है। ऋषियों की विश्व-दृष्टि तो सर्वत्र विश्वरूपा देवी को ही देखती है, इसलिए माता दुर्गा ही महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में प्रकट होती है। 'देवीभागवत' में लिखा है कि- "देवी ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश का रूप धर संसार का पालन और संहार करती हैं। जगन्माता दुर्गा सुकृती मनुष्यों के घर संपत्ति, पापियों के घर में अलक्ष्मी, विद्वानों-वैष्णवों के हृदय में बुद्धि व विद्या, सज्जनों में श्रद्धा व भक्ति तथा कुलीन महिलाओं में लज्जा एवं मर्यादा के रूप में निवास करती है। 'मार्कण्डेयपुराण' कहता है कि- "हे देवि! तुम सारे वेद-शास्त्रों का सार हो। भगवान विष्णु के हृदय में निवास करने वाली माँ लक्ष्मी-शशिशेखर भगवान शंकर की महिमा बढ़ाने वाली माँ तुम ही हो।"[1]

सरस्वती पूजा महोत्सव

माघी नवरात्र में पंचमी तिथि सर्वप्रमुख मानी जाती है। इसे 'श्रीपंचमी', 'वसंत पंचमी' और 'सरस्वती महोत्सव' के नाम से कहा जाता है। प्राचीन काल से आज तक इस दिन माता सरस्वती का पूजन-अर्चन किया जाता है। यह त्रिशक्ति में एक माता शारदा के आराधना के लिए विशिष्ट दिवस के रूप में शास्त्रों में वर्णित है। कई प्रामाणिक विद्वानों का यह भी मानना है कि जो छात्र पढ़ने में कमज़ोर हों या जिनकी पढ़ने में रुचि नहीं हो, ऐसे विद्यार्थियों को अनिवार्य रूप से माँ सरस्वती का पूजन करना चाहिए। देववाणी संस्कृत भाषा में निबद्ध शास्त्रीय ग्रंथों का दान संकल्प पूर्वक विद्वान् ब्राह्मणों को देना चाहिए।

महानवमी को पूर्णाहुति

गुप्त नवरात्र में संपूर्ण फल की प्राप्ति के लिए अष्टमी और नवमी तिथि को आवश्यक रूप से देवी के पूजन का विधान शास्त्रों में वर्णित है। माता के संमुख "जोत दर्शन" एवं कन्या भोजन करवाना चाहिए।[1]

स्त्री रूप में देवी पूजा

'कूर्मपुराण' में पृथ्वी पर देवी के बिंब के रूप में स्त्री का पूरा जीवन नवदुर्गा की मूर्ति के रूप से बताया गया है। जन्म ग्रहण करती हुई कन्या "शैलपुत्री", कौमार्य अवस्था तक "ब्रह्मचारिणी" व विवाह से पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल होने से "चंद्रघंटा" कहलाती है। नए जीव को जन्म देने के लिए गर्भ धारण करने से "कूष्मांडा" व संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री "स्कन्दमाता" होती है। संयम व साधना को धारण करने वाली स्त्री "कात्यायनी" व पतिव्रता होने के कारण पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से "कालरात्रि" कहलाती है। संसार का उपकार करने से "महागौरी" व धरती को छोड़कर स्वर्ग प्रयाण करने से पहले संसार को सिद्धि का आशीर्वाद देने वाली "सिद्धिदात्री" मानी जाती हैं।

घट स्थापना

शास्त्रीय मान्यता के अनुसार स्वच्छ दीवार पर सिंदूर से देवी की मुख-आकृति बना ली जाती है। सर्वशुद्धा माता दुर्गा की जो तस्वीर मिल जाए, वही चौकी पर स्थापित कर दी जाती है, परंतु देवी की असली प्रतिमा "घट" है। घट पर घी-सिंदूर से कन्या चिह्न और स्वस्तिक बनाकर उसमें देवी का आह्वान किया जाता है। देवी के दायीं ओर जौ व सामने हवनकुंड रखा जाता है। नौ दिनों तक नित्य देवी का आह्वान फिर स्नान, वस्त्र व गंध आदि से षोडशोपचार पूजन करना चाहिए। नैवेद्य में बताशे और नारियल तथा खीर का भोग होना चाहिए। पूजन और हवन के बाद "दुर्गा सप्तशती" का पाठ करना श्रेष्ठ है। साथ ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त करने के लिए नवदुर्गा के प्रत्येक रूप की प्रतिदिन पूजा-स्तुति करनी चाहिए।[1]

अन्य राज्यों में

  • गुजरात में सभी हिन्दू त्योहार विक्रमी चांद्र वर्ष की तिथियों के अनुसार भारत के अन्य प्रदेशों की तरह मनाए जाते हैं और इस चांद्र वर्ष का आरंभ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से माना जाता है। किंतु लोहाना वंश के गुजरातियों के कुची, हलारी तथा ठक्कर गोत्र के लोग अपना नववर्ष 'आषाढ़  बीज' (आषाढ़ शुक्ल द्वितीया) को मनाते हैं। 'लोहाना समाज' अपना मूल स्थान लाहौर (पाकिस्तान) के समीपस्थ लोहाना नामक ग्राम बताते हैं। समूचे भारत में जहाँ नववर्ष का आरंभ चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से माना जाता है और उसी दिन से वासंतिक नवरात्र आरंभ हो जाते हैं; फिर भी सिन्धी समाज नववर्ष के आरंभ का बोधक 'चेटी चांद महोत्सव' चैत्र शुक्ला द्वितीया को मनाता है। विचित्र संयोग की बात है कि लोहाना समाज का नववर्ष भी द्वितीया तिथि को मनाया जाता है, भले ही महीना चैत्र के स्थान पर आषाढ़ हो। वस्तुत: यह 'आषाढ़ी गुप्त नवरात्र' का दूसरा दिन होता है। संयोग की बात है कि उड़ीसा प्रांत में स्थित जगन्नाथपुरी की रथयात्रा का उत्सव भी 'आषाढ़ी गुप्त नवरात्र' की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण अपनी पत्नी या रासलीला वाली सहेली राधा के साथ नहीं, बल्कि अपने बड़े भाई बलराम तथा बहन सुभद्रा के साथ मूर्तिमान रहते हैं। इन तीनों की चल मूर्तियों को आषाढ़ द्वितीया वाली शोभा-यात्रा में अलग-अलग रथों पर सजाया जाता है। इन रथों का निर्माण कार्य प्रतिवर्ष 'अक्षय तृतीया' के शुभ दिन से ही आरंभ होता है, जबकि उस दिन वृंदावन, मथुरा, उत्तर प्रदेश वाले 'बांके बिहारी मंदिर' में स्थापित भगवान कृष्ण की मूर्ति को चंदन का लेप करके सजाया जाता है। उन दोनों भाइयों समेत सुभद्रा की पूजा वहीं पर होती है।[2]
  • महाराष्ट्र के 'वारकरी संप्रदाय' के श्रद्धालुगण भगवान श्रीकृष्ण को 'विट्ठलनाथ', 'विठोबा' अथवा 'प्रभु पुण्डरीक' पुकारते हैं। महाराष्ट्र के पुणे के पंढरपुर नामक स्थान पर विट्ठलनाथ का प्राचीनतम मंदिर है, जिसकी यात्रा आषाढ़ माह की एकादशी अर्थात् 'देवशयनी एकादशी' से आरंभ हो जाती है। जनश्रुति है कि विट्ठलनाथ जी अपनी पटरानी रुक्मिणी जी को बताए बिना गुप्त रूप में पंढरपुर चले आए थे। वे उन्हें ढ़ूंढ़ती हुई पंढरपुर पहुंच गई थीं। अत: विट्ठलनाथ जी की मूर्ति के साथ मंदिर में रुक्मिणी जी भी विद्यमान रहती हैं।
  • बंगाल में आषाढ़ की शुक्ल पक्ष द्वितीया को 'मनोरथ द्वितीया व्रत' कहा जाता है। उस दिन स्त्रियाँ दुर्गा से अपनी मनोकामनाएँ पूर्ति हेतु व्रत रखती हैं। आषाढ़ शुक्ल षष्ठी को बंगाल में 'कर्दम षष्ठी', 'कुसुंभा षष्ठी' तथा 'स्कन्द षष्ठी' भी कहा जाता है। उस दिन भगवान शिव और माता पार्वती के छोटे पुत्र स्कंद और उनकी पत्नी षष्ठी देवी की पूजा की जाती है। आषाढ़ माह की शुक्ल सप्तमी को भारत के पूर्वी भाग में सूर्य की पूजा का उत्सव मनाया जाता है। आषाढ़ शुक्ल अष्टमी को त्रिपुरा में खरसी-पूजा उत्सव मनाया जाता है। तत्संबंधी प्रसिद्ध मेला खवेरपुर नामक कस्बे में मनाया जाता है, जिसमें अधिकतर संन्यासी ही भाग लेते हैं। सन्न्यास धारिणी स्त्रियाँ तंबाकू से भरी हुई चिलम में कश लगाकर, धुआँ छोड़कर लोगों को आश्चर्यचकित कर देती हैं।[2]
  • तमिलनाडु में आषाढ़ मास की अष्टमी को मनाए जाने वाले महोत्सव को 'अदिपुरम' कहा जाता है। आषाढ़ मास को तमिल भाषा में 'अदि' और 'पर्व' को 'पुरम' कहा जाता है। उस दिन लोग अपने परिवार की सुख-शांति हेतु शक्ति-देवी की पूजा करते हैं।

आषाढ़ शुक्ल नवमी गुप्त नवरात्र का अंतिम दिन होता है। उस दिन भारत के कश्मीर के भवानी मंदिर में विशाल मेला लगता है। उसी दिन 'हरि जयंती' के कारण वैष्णव भक्त व्रत भी रखते हैं और वैष्णव मंदिरों में मनोकामनाओं की पूर्ति और दर्शनार्थ जाते हैं। उसी दिन 'भडल्या नवमीं' पर व्रतधारिणी स्त्रियाँ भी घर में अथवा देवी-मंदिर में पूजा करती हैं।[2]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 सिद्धिदायक हैं- गुप्त नवरात्र (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 06 जून, 2013।
  2. 2.0 2.1 2.2 गुप्त नवरात्र (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 06 जून, 2013।

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